वाराणसी की तंग गलियों में रात हमेशा थोड़ी लंबी लगती है। खासकर तब, जब गंगा के घाटों पर धुआँ देर तक ठहरा रहे और हवा में राख की महीन गंध तैरती रहे।
अद्वैत ने कभी सोचा भी नहीं था कि उसे अपने दादा की पुरानी हवेली में लौटना पड़ेगा। दादा के निधन के बाद वकील का फोन आया था—“हवेली अब आपके नाम है। लेकिन एक शर्त है… आपको वहाँ कम से कम एक महीना रहना होगा।”
हवेली शहर के पुराने हिस्से में थी, जहाँ सड़कें इतनी संकरी थीं कि दो लोग कंधे से कंधा छूकर निकलते तो तीसरे को दीवार से सट जाना पड़ता। हवेली के बाहर एक जर्जर नेमप्लेट लटक रही थी—“पंडित शंभुनाथ मिश्र।” वही उसके दादा का नाम था।
दरवाज़ा खोलते ही अद्वैत को लगा जैसे किसी ने भीतर से साँस रोकी हो। हवा बंद थी, पर परदे हल्के-हल्के हिल रहे थे।
“शायद खिड़की खुली होगी,” उसने खुद को समझाया।
अंदर कदम रखते ही फर्श ने कराहते हुए उसका स्वागत किया। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें टंगी थीं। एक तस्वीर में दादा के साथ पाँच और लोग खड़े थे। सबकी आँखें अजीब तरह से धुंधली थीं, जैसे किसी ने जानबूझकर खुरच दी हों।
अद्वैत ने तस्वीर उतारकर पास से देखा। खरोंचें ताज़ा नहीं थीं, लेकिन इतनी पुरानी भी नहीं कि समय की मार लगें।
उसी रात उसने पहली बार वह आवाज़ सुनी।
ठक… ठक… ठक…
जैसे कोई लकड़ी पर उँगलियों से दस्तक दे रहा हो।
आवाज़ ऊपर वाले कमरे से आ रही थी—वही कमरा जहाँ दादा अंतिम दिनों में रहा करते थे।
सीढ़ियाँ चढ़ते समय हर पायदान चरमराता, मानो चेतावनी दे रहा हो। ऊपर पहुँचते ही हवा ठंडी हो गई। कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर घुप्प अँधेरा।
अद्वैत ने मोबाइल की टॉर्च जलाई। रोशनी के घेरे में धूल के कण तैर रहे थे। कमरे के बीचों-बीच एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी रखी थी, जो हल्के-हल्के झूल रही थी।
कमरे में कोई नहीं था।
“हवा होगी…” उसने फिर खुद को समझाया।
पर खिड़कियाँ बंद थीं।
अचानक उसके पीछे से धीमी फुसफुसाहट आई—“तू आ गया…”
वह पलटा। कोई नहीं।
दिल की धड़कन इतनी तेज़ हो गई कि उसे लगा, आवाज़ बाहर तक सुनाई दे रही होगी। उसने पूरे कमरे की तलाशी ली। अलमारी, बिस्तर के नीचे, परदे के पीछे—कुछ नहीं।
जब वह बाहर निकलने लगा, उसकी नज़र फर्श पर पड़ी। धूल में उभरे ताज़ा पदचिह्न। नंगे पाँव के।
और वे पदचिह्न उसके अपने जूतों के निशानों के ऊपर-ऊपर बने थे, जैसे कोई उसके कदमों पर कदम रखकर चल रहा हो।
उस रात अद्वैत को नींद नहीं आई। वह नीचे वाले कमरे में बैठा रहा, आँखें दरवाज़े पर टिकाए।
सुबह होते ही उसने पड़ोस में रहने वाली वृद्धा, सावित्री काकी, से मुलाकात की।
“काकी, दादा के बारे में कुछ बताइए,” उसने पूछा।
सावित्री काकी का चेहरा एक पल को सफेद पड़ गया।
“तुम्हें नहीं बताया गया?” उन्होंने धीमे से कहा।
“क्या?”
“तुम्हारे दादा अकेले नहीं रहते थे उस हवेली में।”
“और कौन था?”
काकी ने गहरी साँस ली। “पच्चीस साल पहले, तुम्हारे दादा ने पाँच लोगों के साथ एक साधना शुरू की थी। कहते हैं, वे आत्माओं से बात कर सकते थे। पर एक रात कुछ गलत हो गया।”
“कैसा गलत?”
“अगले दिन चार लोग मृत मिले। पाँचवाँ… गायब।”
अद्वैत का गला सूख गया। “और दादा?”
“वे ज़िंदा थे। पर बदल गए थे। कहते थे, ‘वह अभी यहीं है… बस दिखता नहीं।’”
अद्वैत के कानों में रात की फुसफुसाहट गूँज उठी—“तू आ गया…”
उस शाम जब वह हवेली लौटा, दरवाज़ा खुला मिला।
वह तो सुबह बंद करके गया था।
अंदर घुसते ही उसे लगा, जैसे घर की दीवारें थोड़ी और सिकुड़ गई हों। हवा भारी थी।
दीवार पर टंगी वही तस्वीर अब फर्श पर पड़ी थी। काँच टूटा हुआ।
और इस बार, तस्वीर में पाँचों चेहरों पर खरोंच नहीं थीं।
सिर्फ एक चेहरा गायब था।
वह चेहरा अद्वैत का था।
उसने काँपते हाथों से तस्वीर उठाई। तभी ऊपर से वही ठक… ठक… ठक…
इस बार आवाज़ ज़्यादा तेज़ थी।
जैसे कोई दरवाज़े के अंदर से बाहर निकलना चाहता हो।
अद्वैत ने हिम्मत जुटाई और फिर सीढ़ियाँ चढ़ गया।
ऊपर पहुँचकर उसने देखा—दादा के कमरे का दरवाज़ा पूरी तरह बंद था। अंदर से।
ठक… ठक…
“कौन है?” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
अचानक दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
अंदर अँधेरा नहीं था। कमरे में दीपक जल रहा था। और कुर्सी पर कोई बैठा था।
वह आकृति धीरे-धीरे सिर उठाने लगी।
चेहरा वही था… अद्वैत का।
पर आँखें पूरी तरह काली।
आकृति मुस्कुराई।
“तू देर से आया,” उसने कहा। “मैं कब से इंतज़ार कर रहा था… अपने नए शरीर का।”
अद्वैत चीख पड़ा।
और दीपक बुझ गया।
wait for part-2
by horrorstory
1 thought on “अँधेरे का निमंत्रण Part-1”