अधूरी मुक्ति
सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए अद्वैत ने तय कर लिया था—वह अब इस हवेली में एक रात भी नहीं रुकेगा।
नीचे आँगन में पहुँचते ही उसने दरवाज़ा खोला। बाहर वही तंग गली थी, सुबह की धूप दीवारों से टकराकर अंदर झाँक रही थी। दूर कहीं मंदिर की घंटी बज रही थी—शायद काशी विश्वनाथ मंदिर से।
सावित्री काकी दरवाज़े पर खड़ी थीं।
“बेटा, तेरी आवाज़ आई थी ऊपर से। सब ठीक है न?”
अद्वैत ने उनकी ओर देखा। कुछ अजीब था।
उनकी आँखों में हल्की-सी चमक… वही काली चमक।
“हाँ काकी, सब ठीक है,” उसके मुँह से निकला।
पर उसे यकीन नहीं था कि यह उसने कहा था।
जैसे शब्द उसके भीतर से नहीं, कहीं और से आ रहे हों।
अचानक उसे लगा कि उसके पीछे कोई खड़ा है। उसने पलटकर देखा—कोई नहीं। पर उसके कान के पास एक ठंडी फुसफुसाहट आई—
“भागकर कहाँ जाएगा?”
अद्वैत ने काकी को कुछ कहे बिना दरवाज़ा बंद कर दिया। वह समझ चुका था—यह अब सिर्फ हवेली तक सीमित नहीं रहा।
वह ऊपर गया, अपना बैग उठाया और जल्दी-जल्दी कपड़े भरने लगा। तभी कमरे का तापमान गिरने लगा। साँस से धुआँ निकलने लगा।
दीवार पर टंगी घड़ी उलटी दिशा में घूमने लगी।
टिक… टिक… टिक…
फिर—
ठक… ठक… ठक…
इस बार आवाज़ हवेली के हर कोने से आ रही थी।
अद्वैत ने बैग छोड़ दिया।
“तुझे क्या चाहिए?” वह चीखा।
कमरे की हवा भारी हो गई। सामने दर्पण के टूटे टुकड़े खुद-ब-खुद खिसककर एक वृत्त में जमने लगे। काँच के टुकड़े हवा में उठे, घूमे… और फिर एक अधूरा दर्पण बन गया।
उस अधूरे दर्पण में उसका प्रतिबिंब दिखा—पर अकेला नहीं।
उसके पीछे पाँच धुँधली आकृतियाँ खड़ी थीं।
उन्हीं पाँच लोगों की।
प्रतिबिंब ने धीरे-धीरे सिर झुकाया।
“तूने समझा था, दर्पण तोड़ने से हम मुक्त हो जाएँगे?” उसकी आवाज़ अब गूँज नहीं, गर्जना थी। “हम दर्पण में नहीं… तेरे खून में बँधे हैं।”
अद्वैत के दिमाग में जैसे बिजली कौंधी। दादा की डायरी के आखिरी पन्ने की अधूरी पंक्ति—
“यदि वंशज स्वयं को त्याग दे, तभी चक्र टूटेगा…”
“त्याग?” उसने बुदबुदाया।
दूसरा अद्वैत मुस्कुराया। “जीवन का।”
कमरे की दीवारों से काले हाथ निकलने लगे। ठंडे, बेजान, पर मजबूत। वे उसके पैरों को जकड़ने लगे।
अद्वैत ने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की।
“मैं तुम्हें अपना शरीर नहीं दूँगा!” वह चिल्लाया।
“हमें शरीर नहीं चाहिए,” पाँचों आवाज़ें एक साथ बोलीं। “हमें प्रवेश चाहिए।”
अचानक उसके भीतर तेज़ जलन हुई। जैसे नसों में आग दौड़ रही हो। आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा।
उसे लगा, उसकी चेतना पीछे धकेली जा रही है… जैसे कोई उसे उसके ही दिमाग के कोने में बंद कर रहा हो।
तभी उसकी नज़र फर्श पर पड़ी—दादा की टूटी माला।
वह किसी तरह झुका, माला उठाई और अपनी कलाई में कसकर लपेट ली।
“आपने गलती की थी दादा,” उसने दाँत भींचकर कहा, “पर मैं नहीं करूँगा।”
उसने आँखें बंद कीं और जोर से बोला—
“मैं स्वेच्छा से इस श्राप को समाप्त करता हूँ। मुझे ले जाओ… पर किसी और को मत छूना।”
कमरा अचानक शांत हो गया।
काले हाथ गायब।
दर्पण के टुकड़े गिरकर बिखर गए।
कुछ क्षण तक सन्नाटा रहा।
फिर अद्वैत की देह ज़मीन पर गिर पड़ी।
एक सप्ताह बाद…
सावित्री काकी हवेली के बाहर खड़ी थीं। दरवाज़ा खुला था।
अंदर आँगन में अद्वैत बैठा था।
शांत। स्थिर।
“बेटा, सब ठीक है?” उन्होंने पूछा।
अद्वैत ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
इस बार उसकी आँखें सामान्य थीं। चेहरा थका हुआ, पर शांत।
“सब ठीक है काकी,” उसने मुस्कुराकर कहा।
और सचमुच, हवेली में अब कोई ठक-ठक नहीं थी। न फुसफुसाहट। न ठंडा झोंका।
कुछ दिन बाद अद्वैत ने हवेली बेच दी और शहर छोड़ दिया।
लोग कहते हैं, हवेली अब खाली है।
पर कभी-कभी, आधी रात को उस गली से गुजरने वाले कहते हैं—उन्हें किसी के कदमों की आहट सुनाई देती है।
ठक… ठक… ठक…
और हवेली की टूटी खिड़की में एक चेहरा दिखता है।
शांत।
मुस्कुराता हुआ।
वह अद्वैत जैसा दिखता है।
पर उसकी आँखें… पूरी तरह काली होती हैं।
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