वापसी
हवेली बिक चुकी थी।
नए मालिक—एक व्यापारी परिवार—ने उसे सस्ते दाम में खरीद लिया। उनका मानना था कि “भूत-वूत कुछ नहीं होता।” पुरानी इमारत थी, थोड़ी मरम्मत होगी और किराए पर चढ़ जाएगी।
पहली रात सब सामान्य रहा।
दूसरी रात, घर की सबसे छोटी बेटी, तृषा, ने कहा—
“माँ, ऊपर वाले कमरे में कोई चलता है।”
माँ ने हँसकर टाल दिया। “पुराना घर है, लकड़ी बैठती है तो आवाज़ करती है।”
तीसरी रात—
ठक… ठक… ठक…
आवाज़ सिर्फ ऊपर से नहीं, दीवारों के भीतर से आ रही थी।
व्यापारी, श्री अग्रवाल, टॉर्च लेकर ऊपर गए। वही पुराना कमरा। वही जगह जहाँ कभी दर्पण था। दीवार अब नई पलस्तर से ढकी थी।
पर जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला, टॉर्च झिलमिलाने लगी।
कमरे के बीचोंबीच फर्श पर काँच का एक छोटा-सा टुकड़ा रखा था।
उन्होंने झुककर उसे उठाया।
उस छोटे-से टुकड़े में उन्हें अपना चेहरा दिखा।
पर पीछे…
कोई और खड़ा था।
उन्होंने तुरंत पलटकर देखा—कमरा खाली।
फिर से काँच में झाँका—
अब प्रतिबिंब में उनके पीछे पाँच धुँधली आकृतियाँ थीं।
और बीच में… एक युवा आदमी।
शांत। मुस्कुराता हुआ।
“नहीं…” उनके मुँह से निकला।
काँच का टुकड़ा अचानक उनकी उँगलियों में चुभ गया। खून की एक बूँद उस पर गिर पड़ी।
और उसी क्षण—
कमरे की हवा जम गई।
दीवार पर नई पलस्तर में दरारें उभरने लगीं। वे दरारें फैलती गईं, आपस में जुड़ती गईं… और कुछ ही पलों में दीवार पर फिर वही दर्पण-सा आकार बन गया।
दरारों के बीच काला अँधेरा था।
उस अँधेरे से आवाज़ आई—
“स्वागत है।”
अग्रवाल पीछे हटे, पर दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका था।
नीचे, उनकी पत्नी ने घड़ी देखी।
रात के ठीक 12:12।
ऊपर से एक तीखी चीख गूँजी।
फिर—
सन्नाटा।
अगले दिन
पुलिस आई। कमरा अंदर से बंद था।
दरवाज़ा तोड़ा गया।
कमरा खाली।
फर्श पर सिर्फ काँच का एक छोटा टुकड़ा।
और दीवार पर उभरी पाँच हथेलियों के निशान।
अग्रवाल कभी नहीं मिले।
पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
शहर के दूसरे छोर पर…
एक नए अपार्टमेंट की बालकनी में अद्वैत खड़ा था।
हवा शांत थी।
उसकी आँखें सामान्य दिखती थीं।
पर जब वह भीतर आया और बाथरूम के दर्पण में देखा—
प्रतिबिंब ने कुछ क्षण देर से उसकी हरकत दोहराई।
फिर प्रतिबिंब ने धीरे से फुसफुसाया—
“एक गया… चार बाकी।”
अद्वैत के होंठ नहीं हिले।
पर उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई।
धीरे-धीरे।
अप्राकृतिक।
उसे अब सब याद था।
उस रात हवेली में उसने त्याग किया था।
पर मरने का नहीं।
दरवाज़ा खोलने का।
उसने खुद को नहीं दिया।
उसने रास्ता दिया।
अब दर्पण किसी एक जगह से बँधा नहीं था।
जहाँ भी कोई काँच में झाँकता…
जहाँ भी कोई अपनी परछाईं पर भरोसा करता…
वहाँ एक दरार बन सकती थी।
और दरारों के उस पार—
वे पाँच नहीं थे।
वे अब छह थे।
ठक…
ठक…
ठक…
और इस बार—
आवाज़ बाहर से नहीं,
आपके पीछे से आ रही है।
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part-3 अँधेरे का निमंत्रण Part-3

