कब्रिस्तान के पास का किराए का घर | Real Horror Story in Hindi (Part 1)

वह घर जो रात होते ही बदल जाता था….

नोट: यह कहानी पूरी तरह कहानी-आधारित है और इसे वास्तविक घटनाओं की तरह अनुभव देने के लिए लिखा गया है।

शुरुआत

साल 2019 की बात है।

मैं, मेरा छोटा भाई राहुल और मेरी पत्नी नेहा नौकरी की वजह से एक नए शहर में शिफ्ट हुए थे। शहर हमारे लिए बिल्कुल नया था। शुरुआत में हम होटल में रुके लेकिन रोज़-रोज़ होटल का खर्च उठाना मुश्किल था। इसलिए हमने किराए का घर ढूंढना शुरू किया।

लगभग एक हफ्ते की तलाश के बाद हमें एक घर पसंद आया। घर बड़ा था साफ-सुथरा था और किराया भी बाकी घरों की तुलना में बहुत कम था। मुझे यह बात थोड़ी अजीब लगी। इतना अच्छा घर और किराया इतना कम ?

जब मैंने मकान मालिक से इसका कारण पूछा तो वह कुछ देर चुप रहा। फिर बोला….।

बस लोग यहाँ ज्यादा दिन नहीं टिकते।

क्यों….?

पता नहीं….. शायद जगह पसंद नहीं आती होगी।

उसका जवाब सुनकर मुझे अजीब लगा लेकिन मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। कॉन्ट्रैक्ट साइन हुआ और अगले ही दिन हम वहाँ रहने चले गए।

घर के पीछे का सच

शाम को सामान जमाते समय राहुल पीछे की खिड़की के पास गया। अचानक उसने आवाज़ लगाई।

भैया….भैया…. इधर आओ।

मैं उसके पास पहुँचा। खिड़की से बाहर देखा तो शरीर में सिहरन दौड़ गई। घर के पीछे लगभग पचास मीटर की दूरी पर एक बहुत बड़ा कब्रिस्तान था। सैकड़ों कब्रें। कुछ नई। कुछ टूटी हुई। कुछ इतनी पुरानी कि उन पर नाम भी मिट चुके थे।

मैंने सोचा शायद इसी वजह से लोग यहाँ नहीं रुकते होंगे। लेकिन हम पढ़े-लिखे लोग थे। भूत-प्रेत जैसी बातों पर विश्वास नहीं करते थे। इसलिए बात वहीं खत्म हो गई। पहली रात हम सब बहुत थके हुए थे।

खाना खाकर जल्दी सो गए। करीब रात के ढाई बजे मेरी आँख खुल गई। कारण समझ नहीं आया। कमरे में अजीब सी ठंडक थी। जैसे किसी ने अचानक एसी चला दिया हो। मैं पानी पीने उठा।

तभी मुझे लगा जैसे बाहर आँगन में कोई चल रहा हो।

टक…..

टक…..

टक…..

धीमे कदमों की आवाज़। मैंने खिड़की से झाँका। बाहर कोई नहीं था। मैं वापस सो गया।

अगली रात फिर वही हुआ। करीब तीन बजे। इस बार कदमों की आवाज़ थोड़ी साफ थी। जैसे कोई सूखे पत्तों पर चल रहा हो। मैंने हिम्मत करके दरवाज़ा खोला। पूरा आँगन खाली था।

लेकिन तभी मेरी नज़र मिट्टी पर गई। बारिश नहीं हुई थी। फिर भी जमीन पर गीले पैरों के निशान बने हुए थे। निशान सीधे पीछे की तरफ जा रहे थे…..।

कब्रिस्तान की दिशा में। मेरी रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।

पड़ोसी की चेतावनी

अगले दिन सामने वाले घर में रहने वाले बुज़ुर्ग से मुलाकात हुई। बातों-बातों में मैंने पूछा इस घर में पहले कौन रहता था….? उनका चेहरा बदल गया।

तुम लोग नए आए हो…..?

हाँ।

उन्होंने धीरे से कहा अगर हो सके तो जल्दी घर बदल लेना। मैं बोला

क्यों…?

उन्होंने इधर-उधर देखा। फिर फुसफुसाकर बोले

रात में खिड़की मत खोलना।

इतना कहकर वह अंदर चले गए।

उस रात नेहा पुराने सामान की फोटो निकाल रही थी। अचानक उसने एक तस्वीर दिखाई। ये देखो। तस्वीर हमारे नए घर के ड्रॉइंग रूम की थी। लेकिन फोटो में एक और चेहरा दिखाई दे रहा था। खिड़की के पास।

धुंधला।

सफेद।

जैसे कोई औरत खड़ी हो। हमने सोचा कैमरे की गलती होगी। लेकिन दिल में डर बैठ गया।

रात 3:07

तीन दिन बाद। रात 3:07 बजे। अचानक ऊपर वाले कमरे से किसी चीज़ के घसीटे जाने की आवाज़ आने लगी।

घ्रररर……

घ्रररर……

जैसे कोई भारी अलमारी खींच रहा हो। समस्या यह थी कि ऊपर का कमरा महीनों से बंद था। वहाँ कोई नहीं रहता था। मैंने टॉर्च उठाई और सीढ़ियाँ चढ़ गया। आवाज़ अचानक बंद हो गई।

दरवाज़ा खोला।

कमरा खाली था।

लेकिन धूल में किसी के पैरों के ताज़ा निशान बने हुए थे और वे निशान दीवार पर जाकर खत्म हो रहे थे। जैसे कोई व्यक्ति दीवार के अंदर चला गया हो।

अगले दिन राहुल कब्रिस्तान घूमने चला गया। वह हमेशा से ऐसी चीज़ों में दिलचस्पी रखता था। करीब आधे घंटे बाद वह घबराया हुआ लौटा।

भैया…..भैया…..

उसका चेहरा पीला पड़ चुका था।

क्या हुआ……? वहाँ एक कब्र है……

तो…..?

उस पर वही चेहरा बना है जो फोटो में दिखाई दिया था।

मेरे हाथ से पानी का गिलास गिर गया।

रहस्यमयी नाम

हम शाम को कब्रिस्तान गए। कब्र नंबर 47।

पत्थर पर लिखा था।

सुमन शर्मा
जन्म: 1988
मृत्यु: 2015

तस्वीर देखकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। वह वही चेहरा था। बिल्कुल वही। जो फोटो में दिखाई दिया था।

उस रात कोई नहीं सोया। करीब 3 बजे।

ठक…..

ठक…..

ठक…..

मुख्य दरवाज़े पर दस्तक हुई। हम सब जम गए। फिर आवाज़ आई।

दरवाज़ा खोलो…..दरवाज़ा खोलो…..

यह एक औरत की आवाज़ थी।

बहुत धीमी।

बहुत ठंडी।

नेहा रोने लगी। राहुल का चेहरा सफेद पड़ गया। आवाज़ फिर आई।

मुझे अंदर आने दो……

लेकिन जब मैंने खिड़की से बाहर देखा….. वहाँ कोई नहीं था।

खून से लिखा संदेश

सुबह दरवाज़ा खोला गया और जो दिखाई दिया….. उसने हमारी ज़िंदगी बदल दी। दरवाज़े पर लाल रंग से लिखा था।

“47”

ठीक वही नंबर….. जिस कब्र पर हम कल गए थे। लेकिन सबसे डरावनी बात अभी बाकी थी। नीचे एक और लाइन लिखी थी।

तुमने मुझे जगा दिया है…..

और तभी राहुल ने काँपते हाथों से घर की दीवार की तरफ इशारा किया। वहाँ पहली बार हमें एक पुराना बंद दरवाज़ा दिखाई दिया…..। जिसे हमने पहले कभी नहीं देखा था।

दरवाज़े पर जंग लगा ताला था और ताले के ऊपर खरोंचकर लिखा गया था।

इसे कभी मत खोलना………………………।

क्या आपको लगता है कि उस घर में सचमुच कोई आत्मा थी? अपनी राय कमेंट में बताइए

अगर आपको Part 1 डरावना लगा, तो Part 2 पढ़ने से पहले कमेंट में “Part 2” ज़रूर लिखें

Part 2 में:

  • बंद दरवाज़े के पीछे क्या था ?
  • कब्र नंबर 47 का घर से क्या संबंध था ?
  • पहले रहने वाले किरायेदार कहाँ गायब हुए ?
  • और क्यों हर रात 3:07 बजे वही औरत घर में दिखाई देती थी ?

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