हवेली जो साँस लेती थी Part-1

चाँदनी रात में जागती परछाइयों का अभिशाप

वापसी

बरसों बाद जब आरव ने अपने गाँव “भैरवपुर” की पगडंडी पर कदम रखा, तो उसे लगा जैसे समय ठहर गया है — लेकिन हवा बदल चुकी थी।

गाँव के बाहर, पीपल और बरगद के घने पेड़ों के पीछे छिपी वह पुरानी हवेली अब भी खड़ी थी। वही ऊँचे गुंबद, टूटी जालियाँ, जंग खाए फाटक… और अँधेरे में डूबा उसका विशाल आँगन।

लोग उसे “चौधरी हवेली” कहते थे।

और फुसफुसाकर जोड़ते थे — “वो हवेली साँस लेती है…”

आरव इस सब पर विश्वास नहीं करता था। शहर में पढ़ा-लिखा, आधुनिक सोच वाला। लेकिन आज वह यहाँ मजबूरी में लौटा था। उसके दादा, ठाकुर रघुवीर सिंह, का देहांत हो चुका था। संपत्ति के कागज़ उसी हवेली में रखे थे।

गाँव में कदम रखते ही उसे अजीब खामोशी महसूस हुई। बच्चे खेलते-खेलते रुक गए। औरतों ने घूँघट के भीतर से देखा। बूढ़े नज़रें चुराने लगे।

“तुम रात में हवेली मत जाना…” बूढ़े हरिराम ने कांपती आवाज़ में कहा।

“क्यों?” आरव हँसा।

हरिराम की आँखों में डर था। “वो अब जाग चुकी है।”

उस रात पूर्णिमा थी।


हवेली के मुख्य द्वार पर पहुँचते ही आरव के कदम रुक गए। लोहे का फाटक आधा खुला था — जैसे किसी ने अभी-अभी उसे छुआ हो।

अंदर घुसते ही धूल की गंध, सीलन, और कुछ सड़ा हुआ-सा एहसास उसकी साँसों में घुल गया।

दीवारों पर लगी पुरानी तस्वीरें उसे घूर रही थीं। उसके पूर्वजों की काली-सफेद आँखें — बिना पलक झपकाए।

सीढ़ियों के पास रखी एक बड़ी घड़ी बंद थी।

लेकिन…

टिक…
टिक…
टिक…

आवाज़ आ रही थी।

“कोई है?” उसने पुकारा।

ऊपर की मंज़िल से पायल की हल्की झंकार आई।

आरव का दिल पहली बार तेज़ धड़का।

“यह मेरा भ्रम है…” उसने खुद से कहा।

लेकिन फिर — पीछे से दरवाज़ा धड़ाम से बंद हो गया।

और हवेली के भीतर, कहीं गहराई में…
किसी ने साँस ली।

लंबी, गहरी… और भारी।

By Horrorstory

YOU MAY ALSO LIKE

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *