जिसने जंगल की टूटी हुई गुड़िया उठाई, वह कभी घर नहीं लौटा

कई बार इंसान किसी ऐसी चीज़ को घर ले आता है जो दिखने में बस एक पुरानी वस्तु लगती है। लेकिन उसके साथ कुछ और भी चला आता है। कुछ ऐसा, जो दिखता नहीं….. पर धीरे-धीरे आपकी सांसों आपकी नींद और आपके घर के सन्नाटे में बसने लगता है।

यह कहानी मेरे दोस्त अनिरुद्ध की है। मैंने उससे ये घटना करीब दो साल पहले सुनी थी। शुरू में मुझे लगा कि वह मज़ाक कर रहा है लेकिन जब उसने मुझे उस गुड़िया की तस्वीर दिखाई….. और उसके बाद जो कुछ मेरे साथ हुआ…… तब मुझे समझ आया कि कुछ चीज़ें कहानी नहीं होतीं।

यह घटना मध्य प्रदेश के एक छोटे-से इलाके बरखेड़ा के पास की है। जहाँ घने जंगल, पुराने कच्चे रास्ते और कई सालों से वीरान पड़े खेत आज भी मौजूद हैं। अनिरुद्ध उस समय एक डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर के साथ फ्रीलांस काम कर रहा था। उनका प्रोजेक्ट था। भारत के पुराने गाँव और उनसे जुड़ी लोककथाएँ।

अनिरुद्ध का काम कैमरा संभालना और लोकल लोगों से बात करना था। वह स्वभाव से बहुत निडर था। भूत-प्रेत जैसी चीज़ों पर उसे ज़रा भी भरोसा नहीं था। बल्कि सच कहूँ तो वह ऐसे किस्सों पर हँसता था।

लेकिन बरखेड़ा के जंगल से लौटने के बाद..… उसने कभी उस तरह हँसना नहीं सीखा।

बरखेड़ा का जंगल और पहली चेतावनी

अनिरुद्ध अपनी टीम के साथ बरखेड़ा पहुँचा था। टीम में कुल चार लोग थे। अनिरुद्ध, डॉक्यूमेंट्री डायरेक्टर विनीत, साउंड रिकॉर्डिस्ट रश्मि, और लोकल ड्राइवर किशन

गाँव छोटा था और चारों तरफ घने पेड़ों से घिरा हुआ था। वहाँ पहुँचते ही अनिरुद्ध ने नोटिस किया कि गाँव के ज़्यादातर लोग शाम होने से पहले ही अपने घरों के दरवाज़े बंद करने लगते थे। बच्चे बाहर नहीं खेल रहे थे और बुज़ुर्ग भी किसी अनजान बेचैनी में जल्दी-जल्दी अपने काम समेट रहे थे।

विनीत ने हँसते हुए एक बुज़ुर्ग से पूछा क्या यहाँ रात को भूत घूमते हैं जो सब इतने जल्दी घर जा रहे हैं।

बुज़ुर्ग ने हँसा नहीं।
उसने बस गंभीर नज़रों से कहा।

जंगल के अंदर पुरानी बाड़ी की तरफ मत जाना। खासकर सूरज ढलने के बाद तो बिल्कुल नहीं।

क्यों ? अनिरुद्ध ने पूछा।

बुज़ुर्ग ने जवाब देने से पहले इधर-उधर देखा जैसे कोई सुन रहा हो।

वहाँ एक बच्ची मरी थी….. बहुत साल पहले। उसके बाद से जो भी उस तरफ गया कुछ न कुछ लेकर लौटा। कभी बुखार, कभी पागलपन…. और कभी ऐसी चीज़ जिसे घर लाने के बाद घर घर नहीं रहता।

अनिरुद्ध और विनीत ने एक-दूसरे को देखा और हल्का-सा मुस्कुरा दिए। उन्हें लगा ये भी किसी गाँव की पुरानी लोककथा होगी। लेकिन किशन का चेहरा उतर गया था। उसने धीरे से कहा।
साहब

अगर काम उधर का हो तो दिन में ही कर लीजिएगा। रात में मैं जीप लेकर वहाँ नहीं जाऊँगा।

जंगल के बीच वो खुला मैदान

अगले दिन टीम सुबह-सुबह जंगल की तरफ निकल गई। बरखेड़ा का जंगल अजीब था। बाहर से देखने पर बस साधारण पेड़-पौधे लगते थे। लेकिन अंदर जाते ही रोशनी कम होने लगती थी। ऊँचे पेड़ों की शाखाएँ इतनी घनी थीं कि दोपहर में भी रास्ता धुंधला-सा लगता था। ज़मीन पर सूखे पत्तों की मोटी परत थी और हवा में एक सड़ी हुई नमी तैर रही थी।

करीब आधे घंटे चलने के बाद वे एक पुराने खुले मैदान तक पहुँचे। मैदान के बीचों-बीच टूटे पत्थरों का एक घेरा था। जैसे कभी वहाँ कोई छोटा मंदिर या चबूतरा रहा हो। उसके पास एक सूखा कुआँ था। जिसके चारों ओर झाड़ियाँ उगी हुई थीं।

किशन ने वहीं रुकते हुए कहा। बस साहब यही पुरानी बाड़ी है। मैं यहीं तक आता हूँ।

इतना डर क्यों रहा है ? अनिरुद्ध ने हँसते हुए कहा।

किशन ने सीधे उसकी आँखों में देखा डर मैं नहीं रहा…. समझदारी कर रहा हूँ।

अनिरुद्ध को ये सब नाटकीय लग रहा था। उसने कैमरा उठाया और आसपास रिकॉर्डिंग शुरू कर दी। रश्मि ऑडियो कैप्चर कर रही थी विनीत नोट्स ले रहा था। तभी अनिरुद्ध की नज़र सूखे कुएँ के पास पड़ी एक चीज़ पर गई।

वह एक गुड़िया थी।

उसका आधा चेहरा टूटा हुआ था। एक आँख गायब थी। बाल जगह-जगह से उखड़े हुए थे। उसकी गुलाबी फ्रॉक कीचड़ और धूल से काली पड़ चुकी थी। लेकिन सबसे अजीब बात ये थी कि इतने वीरान, गंदे और जंगली माहौल में भी वह गुड़िया ऐसी लग रही थी जैसे किसी ने उसे अभी-अभी वहाँ रखा हो।

अनिरुद्ध ने झुककर उसे उठा लिया।

मत छूइए….! किशन लगभग चिल्ला पड़ा।

अनिरुद्ध हँसा….. अरे ये बस एक पुरानी डॉल है।

किशन आगे बढ़ा उसके चेहरे पर डर साफ़ दिख रहा था। साहब उसे वहीं रख दीजिए। गाँव में कहते हैं। ये मीरा की गुड़िया है।

मीरा कौन…? रश्मि ने पूछा।

किशन ने धीमी आवाज़ में कहा यहीं पास के घर में रहने वाली सात साल की बच्ची। बीस साल पहले जंगल में खो गई थी। तीन दिन बाद उसकी लाश इसी कुएँ के पास मिली थी। उसके हाथ में यही गुड़िया थी..… टूटी हुई।

कुछ पल के लिए सब चुप हो गए। हवा अचानक और ठंडी लगने लगी। विनीत ने माहौल हल्का करने के लिए कहा। लोककथा के लिए तो बढ़िया प्रॉप है। अनिरुद्ध, एक क्लोज़-अप शॉट ले ले। अनिरुद्ध ने मज़ाक में गुड़िया को कैमरे के सामने उठाया।

उसी समय रश्मि के रिकॉर्डर में एक अजीब खराश जैसी आवाज़ कैद हुई। जैसे किसी बच्चे ने बहुत पास आकर फुसफुसाया हो।

मुझे घर ले चलो…..

रश्मि का चेहरा पीला पड़ गया। तुम लोगों ने सुना…….?

किसी ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि उस वक्त…… हम सबने सुना था।

गुड़िया घर आ गई

जंगल के बीच मिली टूटी हुई गुड़िया | Real Horror Story in Hindi

शाम तक शूटिंग खत्म हुई। विनीत और रश्मि होटल वापस लौटना चाहते थे लेकिन अनिरुद्ध ने वही गुड़िया अपने बैग में डाल ली। किशन ने आखिरी बार उसे रोका।

साहब उसे वापस रख दीजिए। कुछ चीज़ें मिलें तो उन्हें वहीं छोड़ देना चाहिए। अनिरुद्ध ने हँसते हुए कहा तू बहुत फिल्में देखता है।

होटल लौटने के बाद रात को टीम ने दिनभर की फुटेज देखी। जंगल वाले हिस्से में सब कुछ सामान्य था लेकिन जैसे ही स्क्रीन पर गुड़िया का क्लोज़-अप आया वीडियो अचानक डिस्टर्ब होने लगा। फ्रेम में अजीब-सी लाइनों के बीच एक सेकंड के लिए कुछ दिखाई दिया।

गुड़िया के पीछे…… एक छोटी लड़की खड़ी थी। बाल बिखरे हुए। सिर झुका हुआ। और उसके कपड़े कीचड़ से सने हुए।

रुको !

रश्मि ने स्क्रीन पर इशारा किया। विनीत ने फुटेज पीछे की। लेकिन उस फ्रेम में अब कुछ नहीं था। ग्लिच होगा अनिरुद्ध ने कहा। लेकिन उसकी आवाज़ में पहले जैसा आत्मविश्वास नहीं था।

रात के करीब ग्यारह बजे सब अपने-अपने कमरों में चले गए। अनिरुद्ध का कमरा होटल की दूसरी मंज़िल पर था। उसने बैग एक कुर्सी पर फेंका नहाया और बिस्तर पर लेट गया। करीब आधे घंटे बाद उसे लगा जैसे कमरे में कोई धीरे-धीरे चल रहा है

उसने सोचा शायद ऊपर वाले कमरे से आवाज़ आ रही होगी। लेकिन फिर वही आवाज़ दोबारा आई। इस बार उसके बिलकुल पास से।

टक….. टक….. टक…..

जैसे छोटे-छोटे पैर टाइल्स पर चल रहे हों। अनिरुद्ध ने उठकर कमरे की लाइट ऑन की। कमरा खाली था। लेकिन कुर्सी पर रखा उसका बैग अब फर्श पर गिरा हुआ था….. और उसमें से वह टूटी हुई गुड़िया बाहर निकली पड़ी थी।

वह ठीक उसके बिस्तर की तरफ मुँह किए थी।

अनिरुद्ध कुछ सेकंड तक उसे घूरता रहा। फिर खुद को समझाते हुए हँस पड़ा बैग ठीक से रखा नहीं होगा…..। उसने गुड़िया उठाई बैग में डाली चैन बंद की और इस बार बैग को अलमारी के अंदर रख दिया।

लेकिन उस रात उसकी नींद बार-बार खुलती रही। हर बार उसे यही लगता जैसे कोई बच्ची उसके बिस्तर के पास खड़ी है और बस उसे देख रही है।

सुबह की पहली डरावनी बात

सुबह रश्मि ने नाश्ते की टेबल पर आते ही कहा। मैं आज वापस जा रही हूँ।

क्या ? विनीत ने पूछा।

रश्मि की आँखों के नीचे काले घेरे थे। उसने काँपते हुए कहा रात को मेरे कमरे में किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आई। पहले मुझे लगा सपना है लेकिन फिर मैंने साफ़-साफ़ सुना कोई दरवाज़े के बाहर बोल रहा था…..

मेरी गुड़िया दे दो…

अनिरुद्ध के हाथ से चम्मच गिरते-गिरते बचा। तुमने किसी को देखा ?

नहीं रश्मि बोली लेकिन सुबह जब मैंने दरवाज़ा खोला तो बाहर की मिट्टी पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान थे। विनीत ने उसे शांत करने की कोशिश की। हो सकता है होटल में कोई बच्चा हो।

दूसरी मंज़िल पर ? रश्मि ने तीखे स्वर में कहा और रात के ढाई बजे ?

अब अनिरुद्ध चुप था। उसने बैग की तरफ देखा। उसे पहली बार लगा कि शायद गुड़िया को वापस रख देना चाहिए। लेकिन विनीत ने कहा आज बस एक इंटरव्यू और है फिर हम निकल जाएँगे। बेवजह डरने की ज़रूरत नहीं।

मीरा की कहानी

उस दिन टीम गाँव की एक बूढ़ी औरत गोमती काकी से मिलने गई। वही मीरा के परिवार को जानती थीं। जब उनसे गुड़िया के बारे में पूछा गया तो उनका चेहरा एकदम उतर गया।

तुम लोगों ने उसे छुआ ? उन्होंने घबराकर पूछा।

अनिरुद्ध ने हाँ में सिर हिलाया। गोमती काकी ने माथे पर हाथ रख लिया।

बड़ी गलती कर दी बेटा।

उन्होंने जो कहानी बताई उसने सबकी रीढ़ में सिहरन भर दी।

करीब बीस साल पहले मीरा अपने माता-पिता के साथ गाँव के किनारे रहती थी। उसके पिता लकड़ी काटने का काम करते थे। मीरा को एक गुलाबी फ्रॉक और वही गुड़िया बहुत पसंद थी। वह उसे हर जगह साथ लेकर जाती थी। एक दिन दोपहर में वह घर के बाहर खेल रही थी। शाम तक नहीं लौटी। पूरा गाँव उसे ढूँढता रहा।

तीसरे दिन उसकी लाश जंगल के उसी सूखे कुएँ के पास मिली। चेहरे पर नाखूनों के निशान थे। शरीर पर घसीटे जाने के निशान और हाथ में उसकी गुड़िया टूटी हुई थी।

पुलिस ने क्या कहा ? विनीत ने पूछा।

गोमती काकी ने होंठ भींच लिए।
कहा जंगली जानवर का हमला होगा। मामला खत्म।

लेकिन आपको क्या लगता है ? अनिरुद्ध ने पूछा।

गोमती काकी की आँखें भर आईं। मीरा की माँ कहती थी कि उसकी बेटी अकेली नहीं मरी। मरने से पहले वह किसी से बहुत डरी हुई थी। कई दिनों से वह कहती थी कि जंगल में एक आदमी उसे घूरता है..… और कहता है कि उसकी गुड़िया बहुत सुंदर है।

अनिरुद्ध ने तुरंत पूछा उस आदमी का पता चला ?

गोमती काकी ने सिर हिलाया।
नहीं।

लेकिन मीरा की मौत के बाद उसकी माँ पागल-सी हो गई। हर रात जंगल के पास जाकर चिल्लाती मेरी बच्ची की गुड़िया लौटा दो…. उसे घर आना है.… फिर कुछ महीनों बाद उसने भी कुएँ में कूदकर जान दे दी।

हम सब चुप हो गए।

गोमती काकी ने अनिरुद्ध की तरफ देखकर कहा अगर गुड़िया तुम्हारे पास है….. तो उसे वहीं छोड़ आओ। वरना वो बच्ची उसे लेने आएगी।

होटल की रात और वो आवाज़

उस शाम रश्मि ने अपना सामान पैक किया और गाँव से निकल गई। विनीत ने भी पहली बार कहा अनिरुद्ध, मज़ाक अलग है लेकिन गुड़िया वापस रख देते हैं। अनिरुद्ध तैयार हो गया। तय हुआ कि अगली सुबह निकलने से पहले वे गुड़िया जंगल में छोड़ आएँगे।

लेकिन सुबह होने से पहले ही सब कुछ बदल गया।

रात करीब 2:17 बजे अनिरुद्ध की आँख अचानक खुली। कमरे में घुप्प अंधेरा था। बिजली चली गई थी। बाहर तेज़ हवा चल रही थी। उसने मोबाइल उठाकर टॉर्च ऑन की और उसी रोशनी में उसकी सांस रुक गई।

गुड़िया उसके तकिए के पास रखी थी।

बैग अलमारी के अंदर बंद था। फिर वो यहाँ कैसे आई ? अनिरुद्ध घबराकर पीछे हट गया। तभी कमरे के कोने से एक बहुत धीमी सिसकी सुनाई दी। वह टॉर्च घुमाकर उधर देखने लगा।

कमरे के सबसे अंधेरे कोने में..… दीवार के पास..… कोई छोटी-सी आकृति बैठी थी। घुटनों में सिर दिए। बाल चेहरे पर बिखरे हुए। वही गुलाबी फ्रॉक….. जो अब मिट्टी और खून के दागों से सनी हुई थी।

अनिरुद्ध का गला सूख गया।
क….. कौन ?

आकृति धीरे-धीरे उठी। उसका चेहरा आधा अंधेरे में था लेकिन जो हिस्सा दिख रहा था वह किसी सात साल की बच्ची का चेहरा नहीं बल्कि किसी बहुत पुरानी सड़ी हुई चीज़ जैसा था। आँखों की जगह काले गड्ढे, होंठ फटे हुए, और गाल पर तीन गहरे नाखूनों के निशान।

फिर उसने बहुत धीमी टूटी हुई आवाज़ में कहा

मेरी गुड़िया….. वापस दो…..

अनिरुद्ध चीख पड़ा। उसने दरवाज़ा खोला और बाहर भागा। होटल के कॉरिडोर में विनीत पहले से खड़ा था। घबराया हुआ पसीने में भीगा।

तुमने भी देखा ? अनिरुद्ध हाँफते हुए बोला।

विनीत ने काँपते हुए कहा मेरे कमरे के दरवाज़े पर कोई बच्ची खड़ी थी..… और बार-बार एक ही बात बोल रही थी वो मेरी है…..

दोनों उसी वक्त नीचे रिसेप्शन पर गए। होटल का बूढ़ा मैनेजर उन्हें देखकर बोला आप लोग उस जंगल से कुछ उठा लाए हैं न ?

अनिरुद्ध और विनीत ने एक-दूसरे को देखा। मैनेजर ने बिना उनके जवाब का इंतज़ार किए कहा। मैंने रात को सीढ़ियों पर मिट्टी के निशान देखे। ये पहली बार नहीं हुआ। सालों पहले भी दो लड़के वहाँ से एक पुरानी चीज़ उठाकर लाए थे।

अगले ही दिन वो दोनों भागते हुए वापस जंगल गए थे। कहते थे कमरे में बच्ची दिखती है।

गुड़िया लौटाने की कोशिश

जंगल के बीच मिली टूटी हुई गुड़िया | Real Horror Story in Hindi

सुबह होने का इंतज़ार किए बिना अँधेरे और हल्की बारिश में ही अनिरुद्ध और विनीत गुड़िया लेकर जंगल की तरफ निकल पड़े। किशन पहले तैयार नहीं था लेकिन जब उसने गुड़िया देखी तो बिना कुछ बोले जीप स्टार्ट कर दी।

रास्ते भर किसी ने बात नहीं की। जंगल पहुँचे तो अभी हल्का अंधेरा था। हवा ठंडी और भारी थी। पक्षियों की आवाज़ तक नहीं आ रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा जंगल किसी चीज़ का इंतज़ार कर रहा हो।

वे सीधे उसी सूखे कुएँ के पास पहुँचे। अनिरुद्ध ने काँपते हाथों से गुड़िया ज़मीन पर रखी और पीछे हट गया।

बस अब चलो विनीत ने कहा।

लेकिन तभी पीछे से एक आवाज़ आई।

नहीं..…

तीनों जम गए। आवाज़ एक बच्ची की थी।
धीमी..… लेकिन साफ़।

अनिरुद्ध ने मुड़कर देखा। कुएँ के दूसरी तरफ एक छोटी लड़की खड़ी थी। वही गुलाबी फ्रॉक। नंगे पैर। हाथों पर मिट्टी। और चेहरा..… इस बार चेहरा उतना भयानक नहीं था। वह बस बहुत उदास दिख रही थी।

उसने गुड़िया की तरफ इशारा किया।
इसे यहाँ नहीं..… उसके पास रखो..…

किसके पास ? अनिरुद्ध की आवाज़ मुश्किल से निकली। लड़की ने जंगल के अंदर एक पगडंडी की तरफ उंगली उठाई। फिर मुड़ी….. और धीरे-धीरे पेड़ों के बीच चलने लगी।

किशन ने अनिरुद्ध का हाथ पकड़ लिया। मत जाओ साहब ! लेकिन अनिरुद्ध के पैर जैसे अपने-आप उस बच्ची के पीछे बढ़ गए। विनीत और किशन भी मजबूरी में साथ चल पड़े। करीब पाँच मिनट बाद वे एक पुराने आधे गिरे हुए लकड़ी के शेड तक पहुँचे। उसके पीछे मिट्टी का एक छोटा-सा उभरा हुआ हिस्सा था। जैसे किसी ने बहुत पहले वहाँ कुछ दबाया हो।

बच्ची वहीं रुक गई।

यहाँ….. उसने कहा।

अनिरुद्ध ने नीचे देखा। मिट्टी थोड़ी धँसी हुई थी। विनीत ने पास पड़ी लकड़ी से खोदना शुरू किया। कुछ ही देर में लकड़ी किसी सख्त चीज़ से टकराई। वहाँ एक पुराना टिन का डिब्बा दबा हुआ था।

डिब्बा खोला गया। अंदर बच्चों के कुछ कपड़े एक छोटी चाँदी की पायल और एक पुरानी कागज़ की तह मिली। कागज़ बहुत सड़ चुका था लेकिन उस पर लिखे शब्द अभी भी पढ़े जा सकते थे।

अगर मीरा मुझे मिल जाए तो ये गुड़िया उसकी कब्र पर रख देना। उसे अँधेरे से बहुत डर लगता है।


नीचे नाम था सावित्री। शायद मीरा की माँ।

हम तीनों के शरीर में सिहरन दौड़ गई। तभी अनिरुद्ध को समझ आया मीरा की लाश कुएँ के पास मिली थी लेकिन शायद उसे दफन यहाँ किया गया था। उसकी माँ चाहती थी कि उसकी गुड़िया उसकी कब्र तक पहुँचे….. लेकिन किसी वजह से ये बात अधूरी रह गई।

अनिरुद्ध ने काँपते हाथों से गुड़िया उस मिट्टी के उभरे हिस्से पर रख दी। हवा अचानक थम गई। पेड़ों की सरसराहट बंद हो गई और उसी सन्नाटे में बहुत हल्की-सी आवाज़ सुनाई दी।

माँ……..

अनिरुद्ध ने सिर उठाया। मीरा कुछ कदम दूर खड़ी थी। इस बार उसके चेहरे पर डर नहीं था। बस एक थकी हुई-सी मुस्कान थी। उसने गुड़िया को देखा फिर अनिरुद्ध की तरफ देखा….. जैसे शुक्रिया कह रही हो।

और अगले ही पल..… वह वहाँ नहीं थी।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई

अनिरुद्ध, विनीत और किशन उसी दिन बरखेड़ा छोड़कर शहर लौट आए। रास्ते भर किसी ने ज्यादा बात नहीं की। सब बस यही मानना चाहते थे कि अब सब खत्म हो चुका है। कुछ दिनों तक सब सामान्य भी रहा। फिर एक रात अनिरुद्ध ने मुझे फोन किया। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

यार..… वो फिर दिखी।

कौन ? मैंने पूछा जबकि मैं जानता था।

मीरा नहीं….. उसने कहा वो आदमी।

मेरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई।
कौन आदमी…..?

अनिरुद्ध बोला जिसके बारे में गोमती काकी ने बताया था। कल रात मैं फुटेज देख रहा था। जंगल वाली रिकॉर्डिंग के आखिरी हिस्से में जब हम कब्र के पास थे….. पीछे पेड़ों के बीच एक आदमी खड़ा था। बहुत दुबला लंबा..… और उसका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था। लेकिन वह कैमरे की तरफ नहीं….. मीरा की कब्र की तरफ देख रहा था

मैंने कहा शायद कोई गाँव वाला होगा।

नहीं अनिरुद्ध की आवाज़ काँप गई क्योंकि जब मैंने वीडियो रोका तो उसके हाथ में कुछ था….. एक रस्सी। और उसके ठीक बाद स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन रिकॉर्ड हुई…..

क्या…..?

कुछ सेकंड तक फोन पर चुप्पी रही। फिर उसने फुसफुसाकर कहा।

गुड़िया तो लौट आई….. अब मेरी बारी है..…

उसके बाद लाइन कट गई। मैंने तुरंत उसे वापस फोन किया लेकिन उसने उठाया नहीं। अगली सुबह मैं उसके घर पहुँचा। दरवाज़ा उसकी माँ ने खोला। उनका चेहरा उड़ा हुआ था। उन्होंने बताया कि अनिरुद्ध रात से अपने कमरे में बंद है। कोई जवाब नहीं दे रहा।

जब दरवाज़ा तोड़ा गया कमरा खाली था। खिड़की अंदर से बंद थी। बालकनी भी। कमरे में बस उसकी एडिटिंग टेबल ऑन थी….. और स्क्रीन पर वही जंगल वाली फुटेज रुकी हुई थी।

टेबल पर एक कागज़ रखा था। काँपते हाथों से लिखी सिर्फ एक लाइन

वो अभी भी जंगल में है..… मीरा अकेली नहीं थी…..

अनिरुद्ध आज तक नहीं मिला।

पुलिस ने बहुत तलाश की।
किसी ने कहा— वह मानसिक तनाव में था और कहीं चला गया।
किसी ने कहा— वह अपनी डॉक्यूमेंट्री पूरी करने के लिए वापस जंगल गया होगा।
लेकिन मैं जानता हूँ बात इतनी आसान नहीं थी।

क्योंकि उसके गायब होने के दो हफ्ते बाद, मुझे एक अनजान नंबर से एक फोटो मिली।

वह फोटो धुंधली थी। शायद किसी पुराने कैमरे से ली गई थी। फोटो में एक टूटी हुई गुलाबी गुड़िया मिट्टी पर पड़ी थी। उसके पीछे पेड़ों के बीच एक आदमी खड़ा था। चेहरा अब भी साफ़ नहीं दिख रहा था।

और सबसे सामने..… मिट्टी में घुटनों के बल बैठा हुआ….. अनिरुद्ध था। उसका सिर झुका हुआ था और फोटो के नीचे सिर्फ एक लाइन लिखी थी।

जिसे तुमने घर पहुँचाया..… उसने मुझे बुला लिया।

मैंने वह फोटो कई बार देखी। हर बार मुझे लगा कि उसके पीछे खड़े आदमी का चेहरा थोड़ा और साफ़ हो रहा है।

अब मैं वह फोटो अपने फोन में नहीं रखता। डिलीट कर चुका हूँ। लेकिन कभी-कभी रात को जब अचानक मोबाइल की स्क्रीन अपने-आप ऑन होती है….. मुझे लगता है जैसे वही तस्वीर फिर सामने आ जाएगी।

और सबसे डरावनी बात ?

कुछ महीने पहले बरखेड़ा के जंगल के बारे में एक खबर आई थी। कुछ लकड़हारे जंगल के उसी हिस्से में गए थे जहाँ पुरानी बाड़ी और सूखा कुआँ है। उन्होंने वहाँ मिट्टी के पास एक कैमरा पड़ा पाया। कैमरा पुराना था लेकिन मेमोरी कार्ड सलामत था।

उसमें सिर्फ एक वीडियो था।

वीडियो रात का था। कैमरा जमीन पर रखा हुआ था। सामने मीरा की कब्र जैसी मिट्टी दिख रही थी। कुछ सेकंड बाद फ्रेम में अनिरुद्ध आया। उसका चेहरा डरा हुआ था। वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था। फिर कैमरे के बहुत पास आकर उसने फुसफुसाकर कहा

अगर ये वीडियो किसी को मिले….. तो जंगल के अंदर वाले शेड के पीछे मत आना। गुड़िया मीरा की थी….. लेकिन जो उसे यहाँ लाया था वो अभी भी यहीं है…..

इसके बाद कैमरा हिला। अनिरुद्ध ने जैसे किसी को देखा हो। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। फिर अंधेरे में पेड़ों के बीच से एक भारी आवाज़ आई

अब गुड़िया नहीं..… बच्ची चाहिए…..

वीडियो यहीं खत्म हो जाता है। उस दिन के बाद से बरखेड़ा के जंगल में कोई अकेला नहीं जाता। गाँव वाले आज भी शाम ढलने से पहले अपने दरवाज़े बंद कर लेते हैं।
और अगर कभी किसी को सूखे कुएँ के पास गुलाबी फ्रॉक की झलक दिख जाए, तो वे चुपचाप वापस लौट आते हैं।

कहते हैं, मीरा अब किसी को नुकसान नहीं पहुँचाती। वो बस अपनी गुड़िया के साथ वहीं रहती है। लेकिन जंगल में वो अकेली नहीं है।

क्योंकि असली डर कभी उस टूटी हुई गुड़िया में नहीं था..… असली डर उस इंसान में था। जिसने एक बच्ची को जंगल में दफनाया और शायद आज भी किसी नई गुड़िया का इंतज़ार कर रहा है।

THE END |

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