जिस दुल्हन की शादी 50 साल पहले हुई थी, लेकिन वह आज भी दूल्हा ढूँढती है

कुछ गाँव ऐसे होते हैं जहाँ रात का अँधेरा सिर्फ़ सूरज के डूबने से नहीं आता….. बल्कि किसी के लौट आने से आता है।

मैंने हमेशा भूत-प्रेत की कहानियों को अंधविश्वास समझा था।

मेरा नाम विवेक शर्मा है। मैं पेशे से एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्ममेकर हूँ। पिछले दस सालों से भारत के अलग-अलग हिस्सों में जाकर लोककथाओं, रहस्यमयी घटनाओं और गाँवों की अनसुनी कहानियों पर काम कर रहा हूँ।

मेरी हर डॉक्यूमेंट्री का एक ही मकसद होता था। लोगों को सच दिखाना। लेकिन तीन साल पहले उत्तराखंड के एक छोटे-से पहाड़ी गाँव बिरथीगाँव में जो कुछ मेरे साथ हुआ…. उसके बाद मैंने ऐसी कहानियों पर फ़िल्म बनाना हमेशा के लिए छोड़ दिया।

यह कहानी मैंने कभी किसी चैनल पर नहीं दिखाई। क्योंकि कैमरे में रिकॉर्ड हुई कुछ चीज़ों का कोई जवाब आज तक नहीं मिला।

वह ईमेल जिसने सब बदल दिया

एक शाम मुझे एक अनजान ईमेल मिला। उसमें सिर्फ़ एक फोटो और एक लाइन थी।

अगर हिम्मत है तो बिरथीगाँव आओ….. यहाँ हर सातवें साल एक दुल्हन लौटती है।

फोटो में धुंध से ढका एक पहाड़ी रास्ता था। उस रास्ते पर लाल जोड़े में खड़ी एक दुल्हन दिखाई दे रही थी। लेकिन सबसे अजीब बात…..

उसके सामने कोई नहीं था। फिर भी उसकी वरमाला हवा में ऐसे उठी हुई थी जैसे वह किसी अदृश्य आदमी के गले में डाल रही हो। मैंने सोचा किसी ने एडिट की हुई फोटो भेजी होगी।

लेकिन फोटो की EXIF डिटेल देखने पर पता चला कि वह किसी मोबाइल से नहीं….

साल 2009 के एक पुराने DSLR कैमरे से ली गई थी।

और उसमें किसी भी तरह की एडिटिंग का कोई निशान नहीं था। मेरी जिज्ञासा बढ़ गई। दो दिन बाद मैं अपने कैमरे और ड्रोन के साथ बिरथीगाँव पहुँच गया।

बिरथीगाँव पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा-सा गाँव था। लगभग सत्तर घर।

पत्थर की दीवारें।

लकड़ी की छतें।

चारों तरफ़ देवदार के घने जंगल।

लेकिन पूरे गाँव में एक अजीब-सा सन्नाटा था। दोपहर के चार बजे ही लोग अपने दरवाज़े बंद करने लगे थे। एक बूढ़ी औरत जल्दी-जल्दी अपने आँगन से कपड़े समेट रही थी।

मैंने पूछा।

इतनी जल्दी सब घर क्यों बंद कर रहे हैं ?

उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में ऐसा डर था जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था।

वह धीरे से बोली।

आज शुक्रवार है….

तो ?

उसने काँपती आवाज़ में कहा…..

आज उसकी रात है।

मैंने पूछा

किसकी ?

लेकिन वह बिना जवाब दिए अंदर चली गई और दरवाज़ा बंद कर लिया।

सराय का मालिक

गाँव में सिर्फ़ एक छोटी-सी सराय थी। उसका मालिक मोहन दा करीब साठ साल का आदमी था। जब मैंने उससे उस दुल्हन के बारे में पूछा….।

तो उसके हाथ से चाय का गिलास गिर गया।

किसने बताया तुम्हें ?

मैंने ईमेल दिखाया। उसने स्क्रीन देखते ही मोबाइल बंद कर दिया।

फिर बोला।

अगर ज़िंदा वापस जाना चाहते हो…..

तो आज रात किसी भी हालत में खिड़की मत खोलना।

और…..

वह कुछ पल रुका।

…..अगर रात में कोई दुल्हन तुम्हारा नाम लेकर बुलाए…..

तो जवाब मत देना।

मैं मुस्कुरा दिया। आप भी इन बातों पर विश्वास करते हैं?”

मोहन दा ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा।

मैं विश्वास नहीं करता….

मैंने उसे देखा है। उसकी आवाज़ में ऐसा कंपन था कि पहली बार मेरे अंदर भी हल्का-सा डर पैदा हुआ।

पहली रात

रात के करीब ग्यारह बजे मैं कैमरे की बैटरी चार्ज कर रहा था। बाहर तेज़ हवा चल रही थी। बारिश शुरू हो चुकी थी।

तभी….

बहुत दूर से….

पायल की आवाज़ सुनाई दी।

छन…. छन…. छन….

पहाड़ों में आवाज़ साफ़ गूँज रही थी। मैंने सोचा शायद किसी की शादी होगी।

लेकिन तभी याद आया।

गाँव में तो शाम से ही सब घरों में बंद थे। पायल की आवाज़ धीरे-धीरे मेरी सराय के सामने आकर रुक गई।

दुल्हन बनकर आने वाली डायन | Real Horror Story in Hindi

फिर….

किसी औरत की बहुत धीमी आवाज़ आई।

विवेक….

मेरे हाथ रुक गए। मैंने किसी को अपना नाम नहीं बताया था। फिर बाहर कौन था ?

दोबारा वही आवाज़ आई।

विवेक…. दरवाज़ा खोलो….

मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। मोहन दा की बात याद आई।

अगर कोई दुल्हन तुम्हारा नाम लेकर बुलाए….। तो जवाब मत देना।

मैं चुप बैठा रहा। लगभग दो मिनट तक सन्नाटा रहा।

फिर….

दरवाज़े पर तीन हल्की दस्तक हुई।

ठक….

ठक….

ठक….

मैंने हिम्मत करके दरवाज़े के नीचे बनी छोटी-सी दरार से बाहर देखा।

और….

जो मैंने देखा उसे मैं आज तक भूल नहीं पाया। दरवाज़े के ठीक सामने लाल जोड़े में एक दुल्हन खड़ी थी। उसका घूँघट ज़मीन तक था। हाथों की मेहंदी बिल्कुल ताज़ा लग रही थी।

लेकिन…..

उसके पैरों में चप्पल नहीं थी।

और….

उसके पैर…..

उल्टे थे।

मेरी साँस वहीं अटक गई। मैंने आँखें मलकर दोबारा देखा। वह बिल्कुल स्थिर खड़ी थी। बारिश लगातार हो रही थी। लेकिन उसके लाल जोड़े पर पानी की एक भी बूंद नहीं पड़ रही थी।

जैसे बारिश उसके शरीर को छू ही नहीं रही हो। तभी उसने अपना दायाँ हाथ धीरे-धीरे उठाया। उसकी उँगलियों में लाल चूड़ियाँ थीं। हथेली मेरी तरफ थी। और उस हथेली पर मेहंदी से सिर्फ़ एक शब्द लिखा था।

आओ….

मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। उसी समय पीछे से किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं डर के मारे उछल पड़ा। मुड़कर देखा तो मोहन दा थे। उन्होंने मेरे मुँह पर हाथ रख दिया।

आवाज़ मत करना….

मैंने काँपते हुए दरवाज़े की तरफ इशारा किया। लेकिन जब दोबारा देखा। वहाँ कोई नहीं था। सिर्फ़ गीली मिट्टी में उल्टे पैरों के निशान बने हुए थे। जो सराय से निकलकर सीधे जंगल की तरफ जा रहे थे।

मोहन दा ने धीरे से कहा।

तुमने उसे देख लिया…..

कौन थी वो ?

उन्होंने जवाब नहीं दिया।

बस खिड़की बंद की और कमरे के बीच में सरसों का तेल डालकर एक छोटा-सा दीपक जला दिया।

आज रात यह दीपक नहीं बुझना चाहिए। अगर बुझ गया तो ?

उन्होंने मेरी तरफ देखा। तो वह अंदर आ जाएगी।

उस रात मुझे बिल्कुल नींद नहीं आई।

करीब तीन बजे….

मुझे लगा कोई सराय की छत पर चल रहा है।

धीरे-धीरे….

भारी कदमों की आवाज़।

ठक….

ठक….

ठक….

फिर किसी औरत के हँसने की आवाज़। ऐसी हँसी….

जो इंसान की नहीं लग रही थी।

अचानक….

दीपक की लौ काँपने लगी। कमरे का तापमान एकदम गिर गया। मेरी साँस से धुआँ निकलने लगा। मोहन दा ने आँखें बंद कर लीं। धीरे-धीरे मंत्र पढ़ने लगे।

तभी….

दरवाज़े के नीचे से….

लाल रंग का पानी अंदर आने लगा। मैंने टॉर्च की रोशनी डाली। वह पानी नहीं था।

खून था।

खून की पतली धारा धीरे-धीरे कमरे के बीच तक आई और वहीं रुक गई।

फिर….

उसके ऊपर किसी के पैरों के निशान बनने लगे। जैसे कोई अदृश्य दुल्हन…. धीरे-धीरे हमारे चारों तरफ घूम रही हो।

एक चक्कर….

दो चक्कर….

तीन चक्कर….

और अचानक सब शांत हो गया। दीपक फिर सामान्य जलने लगा। मोहन दा ने गहरी साँस ली।

आज वह सिर्फ़ देखने आई थी…..।

कल

वह लेने आएगी।

मैंने पहली बार महसूस किया….। शायद मैं बहुत बड़ी गलती कर चुका था।

सुबह पूरे गाँव में अजीब सन्नाटा था। एक घर के बाहर बहुत भीड़ लगी हुई थी। मैं वहाँ पहुँचा।

लोग रो रहे थे।

घर के अंदर करीब पच्चीस साल का एक युवक मृत पड़ा था। उसके शरीर पर एक भी चोट नहीं थी।

लेकिन….

उसके दोनों हाथों पर ताज़ी मेहंदी लगी हुई थी।

और उसकी मुट्ठी में….

लाल चुनरी का एक छोटा-सा टुकड़ा दबा हुआ था। गाँव की एक बुज़ुर्ग महिला फूट-फूटकर रो रही थी।

इसने रात को दरवाज़ा खोल दिया था….।

मैंने पूछा

क्या मतलब ?

वह बोली

उसने उसे दुल्हन समझ लिया।

….लेकिन वह दुल्हन नहीं थी।

इसी समय मैंने मृत युवक की गर्दन पर नज़र डाली। वहाँ हल्के-हल्के पाँच उँगलियों के निशान थे। जैसे किसी ने उसे बहुत प्यार से छुआ हो।

लेकिन….

उन उँगलियों के निशान इंसानी नहीं थे। वे असामान्य रूप से लंबे थे।

और नाखून….

करीब दो इंच लंबे। मैंने कैमरा उठाकर फोटो लेने की कोशिश की। जैसे ही कैमरे का व्यूफ़ाइंडर उसकी तरफ किया….। स्क्रीन पर अचानक वही लाल जोड़े वाली दुल्हन दिखाई दी।

वह मृत युवक के सिरहाने बैठी थी। उसका घूँघट अब धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा था। मैंने साँस रोक ली।

बस एक पल…. और उसका चेहरा दिखाई देने वाला था।

तभी कैमरा अपने-आप बंद हो गया। बैटरी पूरी भरी हुई थी। फिर भी स्क्रीन काली हो चुकी थी। उसी समय मेरे पीछे से किसी लड़की की बहुत धीमी आवाज़ आई।

अगर उसका चेहरा देख लिया….

….तो अगला दूल्हा तुम होगे।

मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा….

लेकिन वहाँ….

कोई नहीं था।

मैंने पूरे गाँव में उस आवाज़ के बारे में पूछा। लेकिन किसी ने कुछ नहीं बताया। सबके चेहरे पर एक ही डर था। जैसे किसी ने उन्हें सच बोलने से मना कर रखा हो। उसी शाम एक लगभग अस्सी साल की बूढ़ी औरत मेरे पास आई।

उसका नाम गोमती दादी था। उसने बिना कुछ कहे मेरी हथेली में एक पुरानी चाँदी की अंगूठी रख दी।

मैंने पूछा

ये क्यों दे रही हैं ?

वह बोली

आज रात अगर वह तुम्हारे सामने आए….

तो उसकी आँखों में मत देखना और अगर वह तुम्हें अपना चेहरा दिखा दे….

तो यह अंगूठी तुरंत जमीन पर फेंक देना।

लेकिन वह है कौन ?

दादी की आँखें भर आईं। वह पहले इंसान थी….।

फिर ?

….हम लोगों ने उसे डायन बना दिया। मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई।

पच्चीस साल पुराना श्राप

गोमती दादी ने जो कहानी सुनाई। उसे सुनकर मेरी रूह काँप गई।

करीब पच्चीस साल पहले इसी गाँव में नैना नाम की एक लड़की रहती थी। वह पूरे इलाके में अपनी खूबसूरती और अच्छे स्वभाव के लिए जानी जाती थी। उसकी शादी पास के गाँव के एक लड़के से तय हुई।

शादी वाले दिन पूरा गाँव खुश था। बारात आ चुकी थी। फेरे शुरू होने ही वाले थे कि अचानक तेज़ बारिश शुरू हो गई। उसी समय दूल्हे के कुछ रिश्तेदारों ने दहेज को लेकर झगड़ा शुरू कर दिया। झगड़ा इतना बढ़ा कि दूल्हा शादी छोड़कर चला गया।

नैना पूरे गाँव के सामने अपमानित होकर रह गई। लेकिन असली हादसा अभी बाकी था।

उस रात….

नैना अचानक गायब हो गई।

तीन दिन बाद….

उसकी लाश जंगल के बीच पुराने बरगद से लटकी मिली। उसके शरीर पर दुल्हन का वही लाल जोड़ा था।

लेकिन….

उसके दोनों पैर उल्टे मुड़े हुए थे। गाँव वालों ने इसे आत्महत्या कहा। लेकिन गोमती दादी रोते हुए बोली।

वह आत्महत्या नहीं थी….

उसे मारकर लटकाया गया था।

पहली मौत

नैना की मौत के ठीक सात दिन बाद….

उस शादी में शामिल एक आदमी जंगल में मृत मिला। उसकी गर्दन टूटी हुई थी। चेहरे पर हल्की मुस्कान थी और हाथों में ताज़ी मेहंदी।

फिर….

हर साल नहीं….

हर सातवें साल….

एक आदमी उसी तरह मरने लगा।

जिसकी मौत होती। उससे एक रात पहले लोगों ने लाल जोड़े वाली दुल्हन को गाँव में घूमते देखा होता।

मैंने फैसला कर लिया

अब मैं सिर्फ़ डॉक्यूमेंट्री बनाने नहीं आया था।

मैं जानना चाहता था। आखिर यह सब सच है या कोई इंसान लोगों को डराकर मार रहा है। मैंने कैमरे के साथ दो नाइट विज़न कैमरे भी जंगल में लगा दिए। एक बरगद के सामने। दूसरा उस पुराने कुएँ के पास….

जहाँ नैना की लाश मिलने की बात कही जाती थी। रात के ठीक 12:43 बजे…..

दोनों कैमरे एक साथ चालू हो गए। जब मैंने मोबाइल पर लाइव फुटेज देखी। तो मेरी साँस रुक गई।

बरगद के नीचे एक दुल्हन खड़ी थी।

लेकिन….

कुएँ वाले कैमरे में भी वही दुल्हन दिखाई दे रही थी। दो अलग-अलग जगह….

एक ही समय….

एक ही दुल्हन।

यह असंभव था।

मैंने तुरंत कैमरा उठाया और जंगल की तरफ दौड़ पड़ा। बारिश शुरू हो चुकी थी। हवा इतनी तेज़ थी कि पेड़ झुक रहे थे। जैसे ही मैं बरगद के पास पहुँचा। वहाँ कोई नहीं था।

लेकिन….

पेड़ के नीचे ताज़ा सिंदूर बिखरा पड़ा था और उसके बीच…. एक नया वरमाला रखा हुआ था। मैंने उसे उठाने के लिए हाथ बढ़ाया।

तभी….

पीछे से किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।

दूल्हे…. देर क्यों कर दी ?

मेरा पूरा शरीर सुन्न पड़ गया।

आवाज़….

मेरे बिल्कुल पीछे से आई थी। लेकिन मुझे महसूस हो रहा था। वह इंसान नहीं थी। मैंने धीरे-धीरे पीछे मुड़ना शुरू किया और उसी पल….

मेरे कैमरे की फ्लैशलाइट अपने-आप जल उठी। उसकी रोशनी में जो चेहरा दिखाई दिया।उसे देखकर मेरे हाथ से कैमरा छूट गया।

कैमरा मेरे हाथ से छूटकर पत्थरों पर गिर पड़ा। फ्लैशलाइट अब भी जल रही थी। उसकी रोशनी सीधे उस दुल्हन के चेहरे पर पड़ रही थी।

लेकिन….

घूँघट के नीचे कोई चेहरा नहीं था। वहाँ सिर्फ़ घना अँधेरा था। ऐसा लग रहा था जैसे घूँघट के अंदर रोशनी पहुँच ही नहीं रही। वह धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगी। उसकी पायल की आवाज़ पूरे जंगल में गूँज रही थी।

छन…. छन…. छन….

मैं पीछे हटने लगा। तभी मेरे पैर किसी पत्थर से टकराए और मैं गिर पड़ा।

दुल्हन अब मुझसे कुछ ही कदम दूर थी। उसने अपना दायाँ हाथ मेरी तरफ बढ़ाया। उसकी उँगलियाँ असामान्य रूप से लंबी थीं। उन पर लगी मेहंदी से पानी नहीं। काला रंग टपक रहा था।

उसी समय मेरी जेब में रखी गोमती दादी की दी हुई चाँदी की अंगूठी अचानक गर्म होने लगी।

इतनी गर्म कि मैं उसे पकड़ नहीं पा रहा था।

मुझे दादी की बात याद आई।

अगर वह तुम्हें अपना चेहरा दिखा दे…. तो अंगूठी ज़मीन पर फेंक देना।

मैंने काँपते हाथों से अंगूठी उसकी तरफ फेंक दी। अंगूठी ज़मीन पर गिरते ही तेज़ चमक हुई। दुल्हन एक पल के लिए वहीं रुक गई। फिर उसके आसपास की हवा काँपने लगी।

पहली बार उसकी आवाज़ साफ़ सुनाई दी।

मैं बदला लेने नहीं आई….। “मैं सच बताने आई हूँ….।”

उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था।

दर्द था।

अगले ही पल मेरे सामने एक के बाद एक दृश्य उभरने लगे। जैसे कोई पुरानी फिल्म चल रही हो।

मैंने देखा

बारिश की वही रात….

नैना मंडप से रोती हुई जंगल की तरफ भाग रही थी। लेकिन वह अकेली नहीं थी। चार आदमी उसके पीछे दौड़ रहे थे। उनमें से एक ने उसका हाथ पकड़ा। दूसरे ने उसका मुँह दबा दिया।

तीसरे ने कहा।

अगर यह ज़िंदा रही तो सबको सच बता देगी।

मैं चीख पड़ा।

नहीं !

लेकिन वह सिर्फ़ अतीत की परछाइयाँ थीं। मैं कुछ बदल नहीं सकता था।

कुछ देर बाद…. सब कुछ फिर शांत हो गया।

दुल्हन मेरे सामने खड़ी थी। उसने पहली बार अपना घूँघट थोड़ा-सा उठाया। उसका चेहरा भयावह नहीं था। बल्कि आँसुओं से भरा हुआ था।

उसने धीरे से कहा।

जिसने मुझे मारा था….।

उसका खून अब भी इसी गाँव में है। मैं कुछ पूछ पाता। उससे पहले जंगल के दूसरी तरफ से मशालों की रोशनी दिखाई दी।

गाँव के लोग….

और उनके बीच….

मोहन दा।

लेकिन उनके चेहरों पर घबराहट नहीं थी। वे मुझे देखकर नहीं।

दुल्हन को देखकर डर गए थे।

मोहन दा बुदबुदाए

इतने साल बाद….

उसने किसी बाहरी आदमी को सच दिखा दिया….।

मोहन दा ने काँपती आवाज़ में कहा।

विवेक…. अभी यहाँ से चले जाओ।

मैंने उनकी आँखों में देखा। इस बार उनमें डर के साथ-साथ अपराधबोध भी था।

मैंने पूछा।

आप लोग इतने सालों से क्या छिपा रहे हैं ?

कोई जवाब नहीं आया। तभी गोमती दादी भी भीड़ में से आगे बढ़ीं। उन्होंने ज़मीन पर बैठकर रोना शुरू कर दिया।

अब और मत छिपाओ…..।

बहुत देर हो चुकी है।

कुछ पल की ख़ामोशी के बाद मोहन दा बोले नैना की मौत हादसा नहीं थी।

उसे गाँव के चार लोगों ने मार डाला था। पूरे जंगल में सन्नाटा छा गया। उन्होंने बताया कि शादी टूटने के बाद नैना ने उन लोगों की एक पुरानी ज़मीन की धोखाधड़ी का राज़ जान लिया था। डर था कि अगर वह सच बता देगी तो सब जेल चले जाएँगे।

इसलिए उसी रात उसे जंगल ले जाकर मार दिया गया। लाश को बरगद पर लटका दिया गया ताकि सबको लगे कि उसने आत्महत्या की है।

लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।

उस घटना में शामिल चारों आदमी अगले कुछ वर्षों में एक-एक करके रहस्यमय परिस्थितियों में मर गए। गाँव वालों ने इसे “डायन का श्राप” मान लिया।

सच कभी सामने नहीं आया। मैंने कैमरे का मेमोरी कार्ड निकाला।

उसमें सब रिकॉर्ड था।

जंगल….

बरगद….

लोगों का कबूलनामा….

और वह लाल जोड़े वाली परछाई। लेकिन जब मैंने स्क्रीन पर आख़िरी क्लिप चलाई। तो उसमें एक अजीब बात थी। जहाँ मुझे दुल्हन दिखाई दी थी। वहाँ वीडियो में कोई नहीं था। कैमरे ने सिर्फ़ मुझे रिकॉर्ड किया था।

जो हवा से बातें कर रहा था। मैं अवाक रह गया। क्या मैंने जो देखा।

वह सच था या किसी अनजाने डर ने मुझे वह सब दिखाया ?

अगले दिन पुलिस आई। पुराना मामला फिर से खुला। जंगल के बरगद के पास खुदाई हुई। कुछ हड्डियाँ मिलीं। फॉरेंसिक जाँच में पता चला कि वे एक महिला की थीं। गाँव के पुराने रिकॉर्ड और लोगों के बयानों के आधार पर केस दोबारा दर्ज हुआ।

इतने वर्षों बाद पहली बार….. नैना के नाम का एक छोटा-सा स्मारक बनाया गया। बरगद का पेड़ काटा नहीं गया। उसे वैसे ही रहने दिया गया।

मैं वापस शहर लौट आया। मैंने इस घटना पर कभी डॉक्यूमेंट्री नहीं बनाई। मेमोरी कार्ड आज भी मेरे पास है। उसमें मौजूद आख़िरी वीडियो मैं कई बार देख चुका हूँ।

हर बार….

आख़िरी फ्रेम बदल जाता है। कभी खाली जंगल दिखाई देता है। कभी लाल चुनरी हवा में उड़ती दिखती है और कभी….

बरगद के पीछे कोई खड़ा दिखाई देता है। चेहरा दिखाई नहीं देता। सिर्फ़ पायल की धीमी आवाज़ सुनाई देती है।

छन…. छन…. छन….

आज भी जब किसी पहाड़ी गाँव में रात के समय दूर से पायल की आवाज़ सुनाई देती है। तो मुझे बिरथीगाँव की वह रात याद आ जाती है। मैं आज भी नहीं जानता कि मैंने जो देखा वह सच था या मेरे डर ने उसे जन्म दिया।

लेकिन एक बात मैं यक़ीन से कह सकता हूँ।

कुछ कहानियाँ खत्म हो जाती हैं और कुछ जगहें कभी आपका पीछा नहीं छोड़ती।

THE END |

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