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रात के ठीक 2:30 बजे मैं होटल से निकला।
मोबाइल की स्क्रीन पर आया वह अनजान मैसेज अब भी मेरे दिमाग में घूम रहा था।
अगर सच जानना है, तो आधी रात से पहले झील के बीच वाले बरगद तक पहुँच जाना… वरना बहुत देर हो जाएगी।”
भाग 1 में आपने पढ़ा गाँव की सूखी झील का काला रहस्य Part-1 | Horror Story in Hindi अब आगे………
पूरे गाँव में सन्नाटा था। हर घर का दरवाज़ा बंद। हर खिड़की पर काला कपड़ा टंगा हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा गाँव किसी एक ही चीज़ से डरता हो…. और वह चीज़ आज रात वापस आने वाली हो।
जैसे ही मैं झील के किनारे पहुँचा मुझे दूर एक लालटेन की रोशनी दिखाई दी। वहाँ सरपंच रघुबीर सिंह पहले से खड़े थे। लेकिन वह अकेले नहीं थे। उनके साथ गाँव के लगभग बारह आदमी और थे।
सबके हाथों में मिट्टी से भरे घड़े थे। मुझे देखते ही सरपंच चौंक गए।
तुम यहाँ क्यों आए ?
मैंने मोबाइल दिखाया। किसी ने बुलाया है। उन्होंने मैसेज पढ़ा। उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
यह नंबर…..
…..यह तो तीस साल पहले मर चुके मास्टर हरिनारायण का है। मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
झील जो कभी सूखी नहीं थी।
सरपंच मुझे झील के बीच ले गए। बरगद के पास पहुँचते ही उन्होंने अपने हाथ का घड़ा ज़मीन पर उलट दिया। उसमें सिर्फ़ सूखी काली मिट्टी थी। बाकी लोगों ने भी वही किया।
मैंने पूछा।
ये सब क्या कर रहे हैं ?
उन्होंने भारी आवाज़ में कहा।
हम झील को ज़िंदा होने से रोक रहे हैं।
मतलब ?
उन्होंने पहली बार पूरा सच बताया। करीब चालीस साल पहले धनपुर की यह झील पूरे इलाके की सबसे गहरी झील थी। लेकिन एक रात…..
गाँव के कुछ लोगों ने लालच में आकर झील के नीचे दबे पुराने मंदिर का खजाना निकालने की कोशिश की। उन्होंने पानी निकालने के लिए झील का रास्ता बदल दिया। तीन दिन बाद झील लगभग खाली हो गई।
लेकिन…..
खजाना कभी नहीं मिला। मिला तो सिर्फ़……
कई इंसानी कंकाल।
किसी को समझ नहीं आया कि वे वहाँ कैसे पहुँचे। गाँव वालों ने पुलिस को बुलाने के बजाय सब दबा दिया। झील को मिट्टी से भर दिया गया।
और दुनिया को बता दिया गया।
झील प्राकृतिक रूप से सूख गई।
पहला गायब होने वाला आदमी
लेकिन कहानी वहीं खत्म नहीं हुई। जिस आदमी ने सबसे पहले खुदाई शुरू की थी…..
वह अगले ही दिन गायब हो गया।
फिर एक-एक करके…..
उसी खुदाई में शामिल सभी लोग लापता होने लगे। कुछ की लाशें मिलीं….. कुछ कभी नहीं मिले। तब गाँव के एक बूढ़े पुजारी ने कहा।
जिसे तुमने जगाया है…. वह अब हर अमावस्या को अपना हिस्सा लेने आएगा।
तब से…..
हर अमावस्या की रात…..
गाँव वाले झील पर आकर काली मिट्टी डालते थे। ताकि नीचे जो है…..
वह बाहर न आ सके।
मैंने कैमरा निकाला। उसी समय कैमरा अपने-आप रिकॉर्डिंग शुरू कर देता है। स्क्रीन पर कुछ सेकंड तक कुछ नहीं दिखता।
फिर…..
बरगद के पीछे से……
वही लड़की बाहर आती है। इस बार उसका चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था। उम्र मुश्किल से बारह साल। नीली फ्रॉक पूरी तरह भीगी हुई। हाथ में मिट्टी का घड़ा। लेकिन सबसे अजीब बात……
उसकी परछाई नहीं थी। मैंने कैमरे से नज़र हटाकर सामने देखा। वहाँ कोई नहीं था। दोबारा स्क्रीन देखी….. वह अब भी रिकॉर्ड हो रही थी।
अचानक कैमरे के स्पीकर से एक आवाज़ आई।
नीचे देखो…..
मिट्टी के नीचे क्या था
मैंने टॉर्च नीचे की।
काली मिट्टी…..
धीरे-धीरे हिल रही थी। जैसे नीचे कोई साँस ले रहा हो।
फिर……
मिट्टी फटने लगी। उसमें से…..
एक हाथ बाहर निकला।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
कुछ ही सेकंड में……
दर्जनों कंकाल जैसे हाथ मिट्टी से बाहर आने लगे। गाँव वाले ज़ोर-ज़ोर से मंत्र पढ़ने लगे। सरपंच चिल्लाए………।
पीछे हटो…… !
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। बरगद की सूखी शाखाएँ अपने-आप हिलने लगीं। तेज़ हवा चलने लगी और पूरी झील में…..
बच्चों के रोने की आवाज़ गूँज उठी।
वह लड़की कौन थी ?
उसी समय मेरे सामने वही लड़की आकर खड़ी हो गई। इस बार मैंने उसे अपनी आँखों से देखा। वह कैमरे के अंदर नहीं…..
मेरे ठीक सामने थी। उसने मेरी तरफ देखकर कहा।
मैंने तुम्हें बुलाया….
क्यों ?
उसकी आँखों से काला पानी बह रहा था।
क्योंकि…..
इन लोगों ने सच छुपाया। उसने सरपंच की तरफ इशारा किया।
इनके बाप-दादा ने….
हम सबको यहीं छोड़ दिया। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था।
हम सब ?
उसने धीरे-धीरे अपना हाथ झील की तरफ घुमाया। अचानक…..
पूरी झील की मिट्टी पारदर्शी जैसी दिखाई देने लगी और उसके नीचे सैकड़ों इंसानी कंकाल पड़े थे।
छोटे….
बड़े….
औरतें….
बच्चे….
सब।
मेरा गला सूख गया। सरपंच रोने लगे। हमसे गलती हुई थी।
लड़की चीखी।
गलती नहीं….
हत्या…… !
झील का आखिरी सच
लड़की की चीख पूरे मैदान में गूँज उठी। इन लोगों ने हमें नहीं बचाया इन्होंने हमें यहीं दफना दिया।
अचानक झील की काली मिट्टी अपने-आप धँसने लगी। बरगद की जड़ों के बीच एक पत्थर का पुराना दरवाज़ा दिखाई देने लगा। ऐसा लग रहा था जैसे झील के नीचे कोई बहुत पुरानी इमारत छिपी हो।
मैंने टॉर्च उसकी तरफ डाली। दरवाज़े पर उकेरे हुए शब्द मुश्किल से पढ़े जा रहे थे।
जो भीतर जाएगा…. वह सच लेकर लौटेगा लेकिन पहले जैसा कभी नहीं रहेगा।
मैंने कैमरा चालू किया और धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगा। नीचे एक लंबा गलियारा था। दोनों तरफ टूटे हुए पत्थर के खंभे और बीच में पानी की पतली परत। हवा में अजीब-सी सड़न थी।
गलियारे के आखिर में एक बड़ा कमरा था। कमरे के बीचों-बीच लोहे की भारी जंजीरों से बंधे कई कंकाल पड़े थे। उनके पास बच्चों के खिलौने, चूड़ियाँ और मिट्टी के छोटे-छोटे घड़े रखे थे।
मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा।
तभी पीछे से सरपंच की काँपती हुई आवाज़ आई।
यही है वो जगह….. जहाँ हमने सब छिपा दिया था।
मैंने उनकी तरफ देखा।
उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
चालीस साल पहले गाँव में महामारी फैली थी। लोग मरने लगे थे। लेकिन कुछ लालची लोगों ने अफवाह फैला दी कि झील के नीचे देवी नाराज़ हैं। उन्होंने मासूम लोगों को बलि बताकर यहीं कैद कर दिया। कई लोग भूख और दम घुटने से मर गए। हमने पुलिस को सच कभी नहीं बताया। ऊपर मिट्टी डाल दी…. और झील को हमेशा के लिए बंद कर दिया।
मेरे हाथ काँपने लगे। तो यह किसी आत्मा का श्राप नहीं था…..।
यह इंसानों का अपराध था। उसी समय कमरे में तेज़ हवा चली। सभी जंजीरें अपने-आप हिलने लगीं। लड़की फिर दिखाई दी। अब उसका चेहरा डरावना नहीं था।
वह शांत थी।
उसने मेरी तरफ देखकर कहा।
सच बाहर ले जाओ…. बस यही चाहिए था।
इतना कहते ही कमरे की दीवारों में दरारें पड़ने लगीं। पूरा भूमिगत ढांचा गिरने लगा।
सरपंच चिल्लाए।
भागो !
मैं कैमरा लेकर बाहर भागा। पीछे मुड़कर देखा तो पत्थर का पूरा रास्ता मिट्टी में धँसता जा रहा था। हम जैसे-तैसे झील से बाहर निकल आए। अगले ही पल….
बरगद का विशाल पेड़ ज़ोरदार आवाज़ के साथ ज़मीन पर गिर पड़ा। पूरा मैदान धूल से भर गया। जब धूल हटी….
तो काली मिट्टी गायब थी। उसकी जगह साफ़ पानी दिखाई दे रहा था। सालों बाद….
धनपुर की झील फिर से भरने लगी थी।
तीन महीने बाद
मेरी रिपोर्ट राष्ट्रीय समाचार चैनलों पर चली। सरकार ने धनपुर की झील की खुदाई करवाई। वहाँ से दर्जनों कंकाल मिले। डीएनए जाँच से साबित हुआ कि वे उसी गाँव के लापता लोग थे।
पुराने रिकॉर्ड दोबारा खोले गए। कई परिवारों को पहली बार अपने खोए हुए रिश्तेदारों की सच्चाई पता चली। सरपंच ने अदालत में अपना अपराध स्वीकार कर लिया। धनपुर की झील अब एक स्मारक बन चुकी थी।
लोग वहाँ फूल चढ़ाने आते थे। लेकिन गाँव वाले आज भी एक नियम मानते हैं….।
सूरज ढलने के बाद कोई भी झील के किनारे नहीं जाता।
रिपोर्ट प्रसारित हुए लगभग छह महीने बीत चुके थे। एक रात मैं अपने ऑफिस में वही पुराना कैमरा देख रहा था जिससे मैंने पूरी घटना रिकॉर्ड की थी। मैंने आखिरी वीडियो फिर चलाया।
वीडियो के अंत में पहले सिर्फ़ काली स्क्रीन थी। लेकिन इस बार….
उसमें एक नया दृश्य दिखाई दिया। झील के किनारे…
एक छोटी लड़की मुस्कुरा रही थी। अब उसके कपड़े साफ़ थे। चेहरे पर कोई डर नहीं था। उसने धीरे से हाथ हिलाया और फिर धुंध में गायब हो गई। मैंने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी…..
वीडियो के बिल्कुल आखिरी फ्रेम में पानी की सतह पर एक और चेहरा दिखाई दिया। वह किसी बच्ची का नहीं था। वह एक अधेड़ आदमी का चेहरा था। आँखें पूरी तरह काली….
चेहरे पर सड़ी हुई मुस्कान….
और होंठ हिल रहे थे। मैंने आवाज़ बढ़ाई। स्पीकर से सिर्फ़ पाँच शब्द सुनाई दिए।
मैं अभी भी यहीं हूँ…..
अगले ही पल कैमरा हमेशा के लिए बंद हो गया। आज भी वह कैमरा चालू नहीं होता। लेकिन धनपुर जाने वाले कुछ लोग दावा करते हैं कि अमावस्या की रात झील के शांत पानी में कभी-कभी एक आदमी का चेहरा दिखाई देता है।
और अगर कोई उसे ज़्यादा देर तक देखता रहे। तो पानी में एक और चेहरा भी उभर आता है।
उसका अपना।
THE END |
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