पहाड़ पर बनी आखिरी हवेली part-2 मौत का आखिरी दरवाज़ा

तहखाने के नीचे दफन वह चीज़…..

पिछले भाग में आपने पढ़ा कि मुझे पहाड़ की चोटी पर बनी एक रहस्यमयी हवेली मिली थी। वहाँ रहने वाले मेहता परिवार के सभी लोग दशकों पहले गायब हो चुके थे और उनकी बेटी आर्या की आत्मा मुझे लगातार चेतावनी दे रही थी।

तहखाना मत खोलना…..

लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। मैं उस रहस्य के इतना करीब पहुँच चुका था कि वापस लौटना संभव नहीं था।

रात 3:17

कॉरिडोर में लिखे शब्द अभी भी फर्श पर चमक रहे थे।

हम अभी भी नीचे हैं…..

मेरे हाथ काँप रहे थे। लेकिन जिज्ञासा डर से बड़ी थी। मैंने डायरी उठाई और नीचे की मंजिल की ओर बढ़ गया।

डायरी के अंतिम पन्ने पर एक नक्शा बना था। उसके अनुसार लाइब्रेरी की दीवार के पीछे तहखाने का रास्ता था। मैंने घंटों तलाश की। आखिरकार एक पुरानी अलमारी हटाने पर पत्थर की दीवार में लोहे का छल्ला दिखाई दिया।

जैसे ही मैंने उसे खींचा…. पूरी दीवार धीरे-धीरे खुलने लगी।

अंदर पत्थर की सीढ़ियाँ थीं और उनसे ऐसी ठंडी हवा आ रही थी कि जून के महीने में भी मेरे हाथ सुन्न होने लगे।

मैंने टॉर्च जलाई।

और नीचे उतरने लगा।

करीब पचास सीढ़ियाँ उतरने के बाद मैंने मोबाइल देखा। नेटवर्क नहीं था। यह सामान्य बात थी। लेकिन समय देखकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। घड़ी में 3:17 लिखा था।

ठीक वही समय…..

जो मैं ऊपर देखने से पहले देख चुका था।\

समय रुक चुका था

मैं लगभग बीस मिनट से नीचे उतर रहा था। लेकिन घड़ी अब भी 3:17 ही दिखा रही थी। सीढ़ियाँ खत्म हुईं।

और सामने जो दिखाई दिया…..

वह किसी भी हवेली के तहखाने जैसा नहीं था। वह एक विशाल भूमिगत हॉल था।

इतना बड़ा कि टॉर्च की रोशनी उसका अंत नहीं देख पा रही थी। जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ा…..

मुझे महसूस हुआ कि दीवारें अजीब हैं। मैंने टॉर्च पास ले जाकर देखा और मेरा खून जम गया। दीवारों में इंसानी चेहरे उभरे हुए थे। सैकड़ों चेहरे। जैसे किसी ने लोगों को जिंदा दीवारों में चुनवा दिया हो।

तभी हर तरफ से आवाज़ें आने लगीं।

धीमी फुसफुसाहट।

पहले एक।

फिर दस।

फिर सैकड़ों।

सभी एक ही बात कह रहे थे।

हमें याद करो…..

अचानक मेरे सामने वही लड़की दिखाई दी।

आर्या।

लेकिन इस बार वह पहले जैसी नहीं लग रही थी। उसकी आँखों में डर था। बहुत गहरा डर।

तुम्हें वापस जाना होगा।

वह बोली।

यह जगह जीवित नहीं है।

फिर क्या है ?

मेरे सवाल पर वह कुछ सेकंड चुप रही।

फिर बोली

यह यादों का कब्रिस्तान है।

1949 की घटना

आर्या ने बताया कि 1949 में उसके पिता ने पहाड़ के नीचे एक प्राचीन गुफा खोजी थी। गुफा में एक पत्थर का अजीब ढाँचा था। कोई मूर्ति नहीं।

कोई इंसान नहीं।

बस एक काला पत्थर।

जिसे देखकर हर व्यक्ति को अपने जीवन की सबसे प्रिय याद दिखाई देती थी। शुरू में लोगों को लगा कि वह कोई चमत्कार है। लेकिन धीरे-धीरे उस पत्थर की असली कीमत सामने आई।

हर बार जब वह किसी को उसकी प्रिय याद दिखाता…. बदले में उसकी कोई दूसरी याद चुरा लेता।

पहले लोगों ने छोटी बातें भूलनी शुरू कीं। पुराने दोस्त। बचपन की घटनाएँ।

स्कूल की यादें।

फिर धीरे-धीरे…..

वे अपने परिवार को भूलने लगे। आर्या के पिता उस पत्थर के प्रभाव में आ गए। वे रोज़ वहाँ जाते थे और हर दिन कुछ नया भूलकर लौटते थे।

सबसे भयानक दिन

एक सुबह वे अपनी पत्नी को पहचान नहीं पाए। अगले सप्ताह अपने बच्चों को भूल गए और एक महीने बाद…..

उन्हें अपना नाम भी याद नहीं रहा। लेकिन पत्थर सिर्फ यादें नहीं खाता था। वह इंसानों को भी अपने अंदर समाने लगा। जो लोग पूरी तरह अपनी पहचान खो देते….. वे अचानक गायब हो जाते।

जैसे दुनिया ने उन्हें कभी देखा ही नहीं।

आर्या मुझे तहखाने के बीच ले गई। वहाँ एक विशाल काला पत्थर रखा था। लगभग दस फुट ऊँचा और उसकी सतह पर अजीब चमक थी।

जैसे ही मैंने उसे देखा…..

मेरे सामने मेरी बचपन की यादें चलने लगीं। माँ की मुस्कान। स्कूल का पहला दिन।

दादाजी की आवाज़।

सब कुछ। इतना वास्तविक कि मैं रो पड़ा। तभी मुझे एहसास हुआ। पत्थर मुझे अपने पास खींच रहा था। अचानक मेरे दिमाग से एक नाम गायब हो गया।

मैंने कोशिश की।

लेकिन याद नहीं आया।

फिर दूसरा नाम।

फिर तीसरा।

मैं घबरा गया। अब मुझे अपने स्कूल का नाम याद नहीं था। अपने पहले दोस्त का नाम याद नहीं था। मुझे अचानक जेब में रखी डायरी याद आई। मैंने काँपते हाथों से अंतिम पन्ना खोला।

वहाँ लिखा था।

अगर यह पढ़ रहे हो तो पत्थर को मत देखना।

वह तुम्हें तुम्हारी सबसे प्यारी यादें दिखाकर निगल जाएगा।

मैं पहले ही उसे देख चुका था और उसका असर शुरू हो चुका था।

असली रहस्य

तुम यहाँ क्यों रुकी हो ?

मैंने आर्या से पूछा। उसकी आँखें भर आईं।

क्योंकि मैं मर नहीं पाई।

वह बोली।

उस रात मैं पत्थर को नष्ट करने आई थी।

फिर ?

उसने मेरी सारी यादें ले लीं।

सबसे डरावनी बात यह थी। आर्या कभी मरी ही नहीं थी। उसकी आत्मा नहीं थी। वह बस उस जगह में फँसी हुई एक चेतना थी।

70 सालों से।

डायरी में एक उपाय लिखा था। पत्थर को तोड़ा नहीं जा सकता था। लेकिन उसे सील किया जा सकता था। उसके लिए किसी को अपनी सारी यादें त्यागनी पड़तीं।

पूरी जिंदगी।

हर रिश्ता।

हर पहचान।

सब कुछ।

मैं समझ गया। अगर मैंने ऐसा किया….. तो मैं जीवित तो रहूँगा। लेकिन मुझे याद नहीं रहेगा कि मैं कौन हूँ।

कंपन

अचानक पूरा तहखाना हिलने लगा। पत्थर की सतह पर दरारें बनने लगीं और उनमें से सैकड़ों चेहरे बाहर निकलने लगे।

मेहता परिवार।

गायब हुए लोग।

अज्ञात चेहरे।

सभी चीख रहे थे।

आर्या मेरी तरफ देख रही थी। उसकी आँखों में उम्मीद थी। 70 सालों का इंतज़ार। मैंने डायरी में लिखा मंत्र पढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे शब्द पूरे होते गए…..। मेरे दिमाग से यादें मिटने लगीं।

सबसे पहले माँ का चेहरा धुंधला हुआ।

फिर पिता।

फिर मेरा घर।

फिर मेरा नाम। अचानक पूरा तहखाना सफेद रोशनी से भर गया।

और फिर…. सब कुछ गायब हो गया।

जब मेरी आँख खुली….. मैं अस्पताल में था।

डॉक्टरों के अनुसार मुझे पहाड़ के नीचे बेहोश पाया गया था।

लेकिन…..

उन्होंने जब मेरा नाम पूछा…. । तो मैं जवाब नहीं दे पाया।

मुझे अपना नाम नहीं पता था। मेरा घर नहीं पता था। मेरा अतीत नहीं पता था।

छह महीने बाद

धीरे-धीरे मैंने नई जिंदगी शुरू कर दी।

नई पहचान।

नया शहर।

नया जीवन।

एक दिन मुझे पुराने सामान में एक फोटो मिली। उसमें एक विशाल हवेली थी और उसके सामने मैं खड़ा था। लेकिन फोटो में कुछ और भी था। ऊपरी मंजिल की खिड़की में एक लड़की दिखाई दे रही थी।

वह मुस्कुरा रही थी। पहली बार।

फोटो के पीछे किसी ने लिखा था।

तुम सब भूल गए….. लेकिन हमने तुम्हें नहीं भुलाया।

THE END |

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