जिसने उस पुरानी घड़ी को घर लाया, उसकी उलटी गिनती शुरू हो गई

हर पुरानी चीज़ की अपनी एक कहानी होती है। कुछ कहानियाँ इतिहास बन जाती हैं।

कुछ रहस्य।

और कुछ…..

अभिशाप।

मैं कभी भूत-प्रेत जैसी बातों पर विश्वास नहीं करता था। लेकिन 2022 में हुई एक घटना ने मेरी पूरी सोच बदल दी। यह कहानी एक ऐसी घड़ी की है…..।

जो समय नहीं बताती थी। वह बताती थी कि कौन मरने वाला है….. और कब।

पुरानी वस्तुओं का शौक

मेरा नाम विवेक है।

मैं जयपुर में रहता हूँ और पुरानी एंटीक चीज़ें खरीदने-बेचने का काम करता हूँ। एक दिन मुझे शहर के बाहर एक पुराने राजघराने की नीलामी की खबर मिली। वहाँ कई दुर्लभ वस्तुएँ बिक रही थीं।

पुराने फर्नीचर।

तलवारें।

चित्र।

और एक अजीब सी दीवार घड़ी।

घड़ी बाकी चीज़ों से अलग थी। काले रंग की लकड़ी। पीतल की नक्काशी और डायल पर सिर्फ 1 से 11 तक अंक बने थे। 12 नंबर गायब था।

जब मैंने घड़ी खरीदनी चाही तो वहाँ खड़े एक बूढ़े आदमी ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखों में डर था।

वह बोला।

इसे मत खरीदो।

क्यों ?

मैंने हँसते हुए पूछा।

उसने धीरे से कहा।

क्योंकि यह समय नहीं…. मौत बताती है।

मैंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और घड़ी खरीदकर घर ले आया। उस रात मैंने उसे अपने ड्राइंग रूम की दीवार पर टांग दिया।

पहली अजीब बात

रात लगभग 1 बजे मेरी नींद खुल गई। घर में अजीब टिक-टिक की आवाज़ गूँज रही थी। मैंने ड्राइंग रूम में जाकर देखा। घड़ी चल रही थी। लेकिन उसकी सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं।

सुबह जब मैं उठा तो सब सामान्य था। घड़ी भी सामान्य चल रही थी।मैंने सोचा शायद सपना देखा होगा।

तीन दिन बाद कुछ अजीब हुआ। घड़ी के नीचे धूल में किसी ने उँगली से एक नाम लिखा था।

महेश

मैं अकेला रहता था। वह नाम वहाँ किसने लिखा ?

उसी दोपहर मेरे दोस्त महेश का फोन आया।

वह हँसते हुए बोला।

भाई, आज शाम मिलते हैं।

सब कुछ सामान्य था।

लेकिन उसी रात…..

महेश का एक्सीडेंट हो गया और उसकी मौत हो गई।

मैंने खुद को समझाया। यह सिर्फ एक संयोग था। लेकिन अंदर कहीं डर पैदा हो चुका था। दो दिन बाद घड़ी के शीशे पर धुंध जमी हुई थी और उस धुंध पर एक नाम उभरा

रश्मि

मेरी छोटी बहन।

मैंने तुरंत उसे फोन किया। वह बिल्कुल ठीक थी। मैंने कुछ नहीं बताया। लेकिन अगले दिन…..

उसे अचानक ब्रेन हेमरेज हुआ और अस्पताल पहुँचने से पहले उसकी मौत हो गई।

दो मौतें।

दो नाम।

और दोनों पहले घड़ी पर दिखाई दिए थे। अब इसे संयोग नहीं कहा जा सकता था।

घड़ी का रहस्य

मैंने उस बूढ़े आदमी को ढूँढना शुरू किया। कई दिनों की तलाश के बाद वह मिल गया। उसने बताया कि यह घड़ी लगभग 150 साल पुरानी थी। एक घड़ीसाज़ ने इसे अपनी पत्नी की मौत के बाद बनाया था।

कहा जाता है कि वह अपनी पत्नी को बचा नहीं पाया और पागलपन में उसने ऐसी घड़ी बनाने की कोशिश की जो मौत का समय बता सके।

लेकिन….

कुछ गलत हो गया। बहुत गलत।

कहानी के अनुसार उसने किसी अज्ञात शक्ति की मदद ली और घड़ी बन गई। लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी। घड़ी अब मौत को देख सकती थी।

बूढ़े आदमी ने कहा।

जो भी इस घड़ी का मालिक बनता है…..

वह अगली मौतों को देख सकता है।

लेकिन अंत में घड़ी उसका नाम भी दिखाती है।

मैंने पूछा।

क्या किसी ने इससे बचने की कोशिश नहीं की ?

बूढ़ा आदमी मुस्कुराया।

सबने की।

फिर ?

कोई नहीं बचा।

उस रात मैं घड़ी के सामने बैठा रहा।

रात ठीक 3:03 बजे….. घड़ी की सुइयाँ रुक गईं और डायल पर खून जैसा लाल रंग उभरने लगा।

धीरे-धीरे अक्षर बनने लगे।

मैंने देखा और मेरे हाथ काँपने लगे।

वहाँ लिखा था।

विवेक

मौत का समय

घड़ी की छोटी सुई 11 पर थी। बड़ी सुई 17 पर।

यानी….

11:17

घड़ी के नीचे एक और शब्द उभरा।

तीन दिन

मैंने घड़ी तोड़ने की कोशिश की। हथौड़ा मारा। लेकिन शीशे पर एक खरोंच तक नहीं आई।

मैंने उसे जलाने की कोशिश की। कुछ नहीं हुआ। घड़ी वैसी की वैसी रही।

मैं उसे नदी में फेंक आया। अगली सुबह….. वह फिर मेरे घर की दीवार पर टंगी हुई थी। अब मेरे पास सिर्फ कुछ घंटे बचे थे। मैं घर से बाहर नहीं निकला। सारे दरवाजे बंद कर दिए।

फोन बंद कर दिया। सब कुछ बंद।

मैं घड़ी को घूर रहा था। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि साँस लेना मुश्किल हो रहा था। 11:16 PM

कुछ नहीं हुआ। मैंने राहत की साँस ली। शायद यह सब भ्रम था।

अचानक पूरी बिजली चली गई। घर अंधेरे में डूब गया और घड़ी की टिक-टिक पहले से सौ गुना तेज़ सुनाई देने लगी।

अंधेरे में किसी ने फुसफुसाकर कहा।

समय पूरा हुआ…..

मुख्य दरवाज़ा अपने आप खुल गया। जबकि मैंने उसे अंदर से बंद किया था।

कौन था वहाँ ?

बाहर कोई खड़ा था। लेकिन उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। सिर्फ एक काली परछाई। वह धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ी और उसी क्षण मुझे एहसास हुआ…..

घड़ी मौत का समय नहीं बताती थी। वह मौत को बुलाती थी।

जैसे ही परछाई मेरे सामने पहुँची….. घड़ी का शीशा पहली बार टूट गया। पूरा कमरा सफेद रोशनी से भर गया।

सुबह जब मेरी आँख खुली मैं अस्पताल में था। डॉक्टरों ने बताया कि रात मुझे घर के बाहर बेहोश पाया गया था। मैंने सबसे पहला सवाल यही पूछा।

हाँ…

वह बोला।

लेकिन एक अजीब बात है।

क्या ?

डॉक्टर ने एक पुराना पैकेट मेरी तरफ बढ़ाया। उसके अंदर वही घड़ी थी।

मैंने काँपते हाथों से घड़ी खोली। इस बार डायल पर सिर्फ एक नाम लिखा था।

कोई समय नहीं।

कोई तारीख नहीं।

सिर्फ एक नाम।

डॉक्टर अमित।

डॉक्टर का चेहरा सफेद पड़ गया और उसी क्षण….. अस्पताल के बाहर ब्रेक फेल होने की तेज़ आवाज़ आई।

अंत

मैं उस दिन अस्पताल से भाग गया। घड़ी को वहीं छोड़ दिया। लेकिन छह महीने बाद एक एंटीक दुकान की वेबसाइट पर मैंने उसकी तस्वीर देखी।

150 साल पुरानी दुर्लभ दीवार घड़ी बिक्री हेतु उपलब्ध।

तस्वीर के नीचे एक नया रिव्यू था।

घड़ी सुंदर है…. लेकिन रात को इसके अंदर किसी की आवाज़ सुनाई देती है।

और तब मुझे समझ आया…..

घड़ी अभी भी किसी नए मालिक का इंतज़ार कर रही है।

THE END |

कहानी कैसी लगी ? कमेंट करके ज़रूर बताइए।

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