रतनपुर गाँव में एक ऐसा कुआँ था, जिसके पास जाने की हिम्मत कोई नहीं करता था। कहते हैं आधी रात के बाद वहाँ से एक औरत की आवाज आती है। मुझे प्यास लगी है….. लेकिन वो प्यास पानी की नहीं थी। जो भी उस आवाज के पीछे गया…… वो कभी वापस नहीं लौटा। आखिर क्या राज छुपा है इस पीपल वाले कुएँ में……? एक ऐसी सच्चाई जो आपके दिल की धड़कनें बढ़ा देगी।( Horror Story in Hindi for reading ).
गाँव का नाम था रतनपुर। छोटा-सा गाँव चारों तरफ खेत बीच में कच्ची गलियाँ और उन गलियों के किनारे पुराने मिट्टी के घर। दिन में सब कुछ साधारण लगता था। बच्चों की हँसी, औरतों की चहल-पहल, बैलों की घंटियाँ लेकिन रात होते ही रतनपुर जैसे किसी और दुनिया में बदल जाता था।
गाँव के उत्तर किनारे पर एक पुराना पीपल का पेड़ था और उसके ठीक नीचे एक सूखा कुआँ। लोग उसे “ पीपल वाला कुआँ ” कहते थे। दिन में भी वहाँ कोई नहीं जाता था और रात में तो उस रास्ते से गुजरना मानो मौत को बुलावा देना था।

कहानी की शुरुआत होती है अर्जुन से शहर से आया एक नौजवान। उसे अपने दादा की जमीन देखने के लिए गाँव आना पड़ा था। अर्जुन पढ़ा-लिखा तर्कवादी लड़का था। भूत-प्रेत, चुड़ैल इन सब पर उसे हँसी आती थी। पहले ही दिन जब उसने गाँव में कदम रखा तो उसने देखा कि लोग उसे अजीब नजरों से देख रहे हैं।
बेटा रात को बाहर मत निकलना बूढ़ी काकी ने कहा। क्यों काकी अर्जुन मुस्कुराया यहाँ भी भूत-प्रेत की कहानियाँ चलती हैं क्या ?
काकी का चेहरा अचानक गंभीर हो गया। कहानी नहीं है सच्चाई है। अर्जुन हँस पड़ा लेकिन अंदर कहीं हल्की-सी बेचैनी जरूर हुई। रात को जब वह अपने दादा के पुराने घर में सो रहा था। उसे बाहर से अजीब आवाजें सुनाई दीं जैसे कोई धीरे-धीरे रो रहा हो। पहले उसने सोचा हवा होगी लेकिन आवाज साफ थी किसी औरत की सिसकियाँ।
वह उठकर खिड़की के पास गया। दूर…. बहुत दूर उसे पीपल के पेड़ के पास हल्की-सी सफेद आकृति दिखी। कोई औरत होगी उसने खुद को समझाया शायद पानी लेने आई हो।लेकिन अगले ही पल उसे याद आया कुआँ तो सूखा है। उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
अगले दिन अर्जुन ने गाँव के बुजुर्ग रामलाल से उस कुएँ के बारे में पूछा। रामलाल ने लंबी साँस ली। बीस साल पहले की बात है। एक लड़की थी मीरा। बहुत खूबसूरत लेकिन उतनी ही दुखी। क्या हुआ था उसे अर्जुन ने पूछा।
उसका पति उसे रोज मारता था। एक रात वो भागकर उसी कुएँ के पास गई और वहीं उसने अपनी जान दे दी। तो बस यही कहानी है ? अर्जुन ने हल्के अंदाज में कहा। रामलाल की आँखें गहरी हो गईं। नहीं बेटा असली कहानी उसके बाद शुरू हुई। अर्जुन चुप हो गया।
जिस रात मीरा मरी उसी रात से उस कुएँ के पास अजीब चीजें होने लगीं। जो भी वहाँ रात को गया वो कभी वापस नहीं आया। कोई गया भी क्यों होगा ? अर्जुन ने पूछा। रामलाल ने धीरे से कहा…. वो खुद बुलाती है।
अर्जुन ने यह सब सुनकर भी इसे अंधविश्वास ही समझा। लेकिन उसके अंदर जिज्ञासा बढ़ चुकी थी। उसने तय किया वो खुद जाकर देखेगा। उस रात करीब बारह बजे वह चुपचाप घर से निकला। गाँव पूरी तरह सो चुका था। सिर्फ कुत्तों के भौंकने की आवाजें और हवा की सरसराहट।

जैसे-जैसे वह पीपल के पेड़ के पास पहुँचा ठंड अचानक बढ़ने लगी और फिर उसने वही आवाज सुनी। रोने की। धीमी….. दर्द भरी….. जैसे कोई अपनी आत्मा के अंदर से रो रहा हो।
उसके कदम रुक गए। कौन है ? उसने आवाज लगाई। कोई जवाब नहीं। बस सिसकियाँ। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। अब वह कुएँ के बिल्कुल पास था। अचानक………. उसे लगा जैसे उसके पीछे कोई खड़ा है। वह तेजी से पलटा। कोई नहीं।
लेकिन जैसे ही उसने फिर कुएँ की तरफ देखा उसका खून जम गया। कुएँ के किनारे एक औरत खड़ी थी। सफेद साड़ी…. बिखरे बाल…. और उसका चेहरा पूरी तरह अंधेरे में छुपा हुआ।
कौन हो तुम ? अर्जुन की आवाज काँप गई।
औरत ने धीरे-धीरे सिर उठाया। उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं। मुझे प्यास लगी है उसने फुसफुसाया। अर्जुन पीछे हट गया। तुम….. इंसान नहीं हो। औरत मुस्कुराई। एक डरावनी अस्वाभाविक मुस्कान। तुम भी नहीं रहोगे।
अचानक उसके पैरों के नीचे की जमीन जैसे खिंचने लगी। कुएँ से ठंडी हवा का तेज झोंका आया। अर्जुन ने महसूस किया कि कोई अदृश्य ताकत उसे कुएँ की तरफ खींच रही है।
नहीं….. वह चिल्लाया।
उसने पूरी ताकत लगाई लेकिन उसका शरीर जैसे उसका साथ नहीं दे रहा था। औरत अब उसके बिलकुल सामने थी। उसका चेहरा धीरे-धीरे साफ हुआ। खून से सना हुआ आँखों से काला पानी बह रहा था। तुम भी मेरे साथ रहोगे…… उसने कहा।
अर्जुन ने आखिरी कोशिश की। उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा ताबीज निकाला जो उसकी माँ ने उसे दिया था। जैसे ही उसने ताबीज को कसकर पकड़ा। औरत अचानक पीछे हट गई। उसकी चीख पूरे जंगल में गूँज गई।
नहहहहहहहहीं……….!
अर्जुन ने मौका देखकर दौड़ लगा दी। वह बिना पीछे देखे भागता रहा तब तक जब तक वह अपने घर तक नहीं पहुँच गया। सुबह जब गाँव वालों ने उसे देखा तो वह काँप रहा था। मैंने उसे देखा….. उसने कहा।
रामलाल ने सिर झुका लिया। अब वो तुम्हें छोड़ने वाली नहीं है। अर्जुन का दिल बैठ गया। क्या मतलब……? जिसे वो देख लेती है वो उसे बार-बार दिखाई देती है जब तक कि
जब तक कि क्या…….?
रामलाल ने उसकी आँखों में देखा। जब तक कि वो उसे अपने साथ नहीं ले जाती। उस रात अर्जुन सो नहीं पाया। जैसे ही वह आँख बंद करता। उसे वही चेहरा दिखता। काली आँखें…… खून से सना चेहरा और वो आवाज मुझे…. प्यास लगी है।
तीसरी रात……. अर्जुन ने हार मान ली। वह जानता था भागकर कोई फायदा नहीं। उसे इस डर का सामना करना होगा। वह फिर से उस कुएँ के पास गया। इस बार…. वह तैयार था।मैं आ गया उसने जोर से कहा। कुछ पल तक सन्नाटा रहा।
फिर……. वही ठंडी हवा। औरत फिर से सामने आई। तुम वापस आ गए उसने मुस्कुराकर कहा। तुम चाहती क्या हो…? अर्जुन ने पूछा। औरत की आँखों में अचानक दर्द उभर आया। मुझे मुक्ति चाहिए……।
अर्जुन चौंक गया। मुक्ति…? मेरी आत्मा इस कुएँ में बंधी है जब तक कोई मुझे यहाँ से आजाद नहीं करेगा मैं ऐसे ही भटकती रहूँगी। मैं क्या कर सकता हूँ। औरत ने धीरे से कहा कुएँ में मेरी हड्डियाँ हैं……. उन्हें बाहर निकालकर ठीक से दफना दो।
अर्जुन कुछ पल के लिए चुप रहा। फिर उसने हिम्मत जुटाई। वह कुएँ के किनारे गया और अंदर झाँका। अंधेरा…. गहरा….. डरावना। लेकिन इस बार वह पीछे नहीं हटा। वह रस्सी लेकर आया और धीरे-धीरे कुएँ में उतरने लगा।
जैसे-जैसे वह नीचे जा रहा था हवा और ठंडी होती जा रही थी और फिर…. उसने देखा हड्डियों का ढेर। उसने काँपते हाथों से उन हड्डियों को इकट्ठा किया और जैसे ही वह ऊपर आया। अचानक…….औरत जोर-जोर से चीखने लगी।

नहीं…..! तुम मुझे आजाद नहीं कर सकते। अर्जुन हैरान रह गया। तुमने ही तो कहा था। औरत की आवाज बदल गई। अब वह और भी भयानक थी। मैं झूठ बोल रही थी। अर्जुन का दिल रुक गया। मुझे……. और आत्माएँ चाहिए……….।
अचानक कुएँ से काले साये निकलने लगे। अर्जुन ने महसूस किया कि वह फँस चुका है। यह कोई साधारण आत्मा नहीं थी। यह एक पिशाचिनी थी। जो लोगों को फँसाकर उनकी आत्मा निगलती थी। अर्जुन ने आखिरी बार ताबीज को कसकर पकड़ा।
और पूरी ताकत से चिल्लाया मैं तुम्हें आजाद नहीं करूँगा। ताबीज से अचानक तेज रोशनी निकली। औरत चीख उठी। काले साये पीछे हटने लगे। अर्जुन ने मौका देखकर हड्डियों को फिर से कुएँ में फेंक दिया और ऊपर से एक बड़ा पत्थर डाल दिया।
अचानक सब कुछ शांत हो गया। हवा रुक गई। आवाजें बंद हो गईं।
अगली सुबह गाँव वालों ने देखा पीपल वाला कुआँ पूरी तरह ढह चुका था और अर्जुन बेहोश पड़ा था। जब उसे होश आया सब कुछ खत्म हो चुका था।
लेकिन……….. कहानी यहीं खत्म नहीं होती। क्योंकि आज भी रतनपुर के लोग कहते हैं। कभी-कभी रात को उस ढहे हुए कुएँ के पास से एक धीमी आवाज आती है। मुझे…. प्यास लगी है…….।
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