हॉस्टल के कमरे नंबर 666 का रहस्य | Real Horror Story in Hindi

जिस कमरे का नंबर रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं था…..

साल 2021।

मैं पहली बार घर से दूर पढ़ाई करने जा रहा था। मेरा नाम आरव है और मुझे देहरादून के एक प्रसिद्ध इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिला था। कॉलेज शानदार था।

बड़ी-बड़ी इमारतें।

हरा-भरा कैंपस।

और लगभग दो हजार छात्र।

लेकिन उस कॉलेज की एक बात बाकी सब चीजों से अलग थी। एक ऐसा रहस्य….. जिसके बारे में कोई खुलकर बात नहीं करता था।

हॉस्टल का कमरा नंबर 666।

पहला दिन

मैं नए हॉस्टल में शिफ्ट हुआ। मुझे कमरा नंबर 318 मिला। मेरे साथ रूममेट था करण। पहले ही दिन उसने एक अजीब सवाल पूछा। भाई….. रात को अगर किसी के रोने की आवाज़ आए तो बाहर मत निकलना।

मैं हँस पड़ा। क्यों ? भूत है क्या ?

लेकिन करण नहीं हँसा। वह कुछ सेकंड चुप रहा।

फिर बोला।

यहाँ लोग मज़ाक में भी 666 का नाम नहीं लेते।

रात को मेस में बैठे हुए मैंने कुछ सीनियर छात्रों को बात करते सुना। वे धीरे-धीरे बात कर रहे थे। लेकिन एक शब्द बार-बार सुनाई दे रहा था।

666

जैसे ही मैं उनके पास पहुँचा…… वे अचानक चुप हो गए।

अगले दिन मैंने हॉस्टल वार्डन से पूछा।

सर, कमरा नंबर 666 कहाँ है ?

उनका चेहरा अचानक बदल गया। ऐसा कोई कमरा नहीं है। उन्होंने तुरंत जवाब दिया। लेकिन उनकी आँखों में घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।

हॉस्टल के पीछे एक पुरानी इमारत थी। उसे अब इस्तेमाल नहीं किया जाता था। खिड़कियाँ टूटी हुई थीं। दीवारों पर काई जमी हुई थी। छात्र उसे ओल्ड ब्लॉक कहते थे। उसी रात करण ने बताया।

666 वहीं है।

गायब छात्र

करीब 12 साल पहले…..

एक छात्र रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया था। उसका नाम निखिल था। लोगों का कहना था कि उसे आखिरी बार ओल्ड ब्लॉक में जाते देखा गया था। लेकिन उसका शव कभी नहीं मिला।

न कोई सुराग।

न कोई सबूत।

बस गायब।

उस रात करीब 2 बजे मेरी नींद खुल गई। कॉरिडोर से किसी के चलने की आवाज़ आ रही थी। धीरे-धीरे…..

ठक…..

ठक…..

ठक…..

जैसे कोई भारी जूते पहनकर चल रहा हो। मैंने दरवाज़ा खोला। कॉरिडोर खाली था। लेकिन आवाज़ अब भी आ रही थी। ऊपर वाली मंजिल से।

अगले दिन मैंने हॉस्टल के सिक्योरिटी गार्ड से दोस्ती कर ली। काफी मनाने के बाद उसने मुझे रात की CCTV फुटेज दिखाई और जो मैंने देखा….. उसने मेरी रीढ़ जमा दी।

रात 2:07 पर…..

कॉरिडोर में एक लड़का चलता दिखाई दिया। लेकिन उसका चेहरा धुंधला था। जैसे कैमरा उसे रिकॉर्ड नहीं कर पा रहा हो। वह लड़का सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर गया। लेकिन ऊपर वाले कैमरे में दिखाई ही नहीं दिया।

जैसे हवा में गायब हो गया हो।

पुरानी फाइल

मेरी जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। कॉलेज लाइब्रेरी में मुझे पुराने रिकॉर्ड मिले। वहाँ 2009 की एक फाइल थी। उसमें हॉस्टल का नक्शा बना हुआ था और पहली बार मैंने वह नंबर देखा।

Room 666

लेकिन….

अजीब बात यह थी कि मौजूदा नक्शे में वह कमरा मौजूद नहीं था। जैसे उसे मिटा दिया गया हो।

उस रात मैं अकेला ओल्ड ब्लॉक गया। तीसरी मंजिल पर पहुँचते ही ठंडी हवा महसूस हुई। कॉरिडोर में सारे कमरों के नंबर लिखे थे।

651…..

652…..

653…..

फिर सीधे 667। 666 गायब था।

मैंने दीवार को ध्यान से देखा। जहाँ 666 होना चाहिए था। वहाँ प्लास्टर बाकी जगहों से नया था। जैसे किसी ने दरवाज़ा बंद करके दीवार बना दी हो।

टॉर्च की रोशनी में मैंने कुछ देखा। दीवार पर खरोंचें थीं। बहुत सारी खरोंचें और बीच में लिखा था।

इसे मत खोलना।

अचानक….. दीवार के दूसरी तरफ से आवाज़ आई।

ठक…..

ठक…..

ठक…..

मैं जम गया। क्योंकि आवाज़ अंदर से आ रही थी।

कोई ज़िंदा था ?

मैंने हिम्मत करके पूछा।

कौन है ?

कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा। फिर बहुत धीमी आवाज़ आई।

मुझे बाहर निकालो……

मेरे पूरे शरीर में डर दौड़ गया। मैं तुरंत वहाँ से भागा। लेकिन सीढ़ियों तक पहुँचते-पहुँचते….. मुझे लगा कोई मेरे पीछे दौड़ रहा है। भारी कदम।

तेज़ साँसें।

और फुसफुसाहट

आरव…..

मैं रुक गया। उस जगह कोई मुझे जानता नहीं था। फिर आवाज़ को मेरा नाम कैसे पता था?

अगली सुबह मैंने खुद को समझाया कि शायद भ्रम था। लेकिन सुबह मेरे बिस्तर पर एक कागज़ पड़ा मिला। उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी।

कमरा 666 खुल चुका है।

उस रात 2:07 बजे…..

मेरे फोन पर एक फोटो आई। अज्ञात नंबर से। फोटो में मैं खुद दिखाई दे रहा था। मैं हॉस्टल की तीसरी मंजिल पर खड़ा था। दीवार टूट चुकी थी और उसके पीछे….

कमरा नंबर 666 का दरवाज़ा खुला हुआ था। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी….. कि फोटो उसी समय ली गई थी….. जब मैं अपने कमरे में सो रहा था।

दरवाज़ा जो कभी खुलना नहीं चाहिए था…..

तो फिर फोटो में दिखाई देने वाला वह इंसान कौन था ?

यही सवाल पूरी रात मेरे दिमाग में घूमता रहा।

अगली सुबह मेरी नींद देर से खुली। करण पहले से जाग रहा था। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था। क्या हुआ ?

मैंने पूछा। उसने बिना कुछ बोले अपना मोबाइल मेरी तरफ बढ़ा दिया। कॉलेज के एक छात्र का मैसेज था।

फर्स्ट ईयर का छात्र रोहित कल रात से लापता है।

मेरे हाथ काँप गए। रोहित उसी फ्लोर पर रहता था जहाँ मैं रहता था।

सिक्योरिटी ऑफिस में पूरी भीड़ जमा थी। CCTV फुटेज देखी जा रही थी। रात 2:06 बजे रोहित अपने कमरे से निकलता दिखाई दिया। वह जैसे किसी को फॉलो कर रहा था। उसके चेहरे पर अजीब सा भाव था।

जैसे वह किसी सम्मोहन में हो। 2:07 बजे वह कैमरे से बाहर चला गया। और फिर….. कभी वापस दिखाई नहीं दिया।

मुझे अचानक याद आया। 12 साल पहले गायब हुए छात्र निखिल की फाइल में भी यही समय लिखा था।

2:07 AM

और अब रोहित भी….. उसी समय गायब हुआ था।

उस रात मैंने फैसला कर लिया। अब चाहे कुछ भी हो जाए….. मैं सच जानकर रहूँगा। रात के ठीक 1:45 बजे मैं ओल्ड ब्लॉक पहुँचा। कॉरिडोर पहले से भी ज्यादा सुनसान था। लेकिन इस बार कुछ अलग था।

कमरा 666 की तरफ

जहाँ पहले सिर्फ दीवार थी…..

वहाँ अब सचमुच एक दरवाज़ा दिखाई दे रहा था। काले रंग का पुराना दरवाज़ा। जिस पर धुंधले अक्षरों में लिखा था।

666……

मेरी धड़कन इतनी तेज़ हो चुकी थी कि उसकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। मैंने काँपते हाथों से हैंडल पकड़ा और दरवाज़ा खोल दिया। अंदर घुप्प अंधेरा था।

लेकिन जैसे ही मैं अंदर गया….. मुझे महसूस हुआ कि मैं किसी सामान्य कमरे में नहीं हूँ। कमरा बाहर से छोटा दिखता था। लेकिन अंदर….. वह असंभव रूप से बड़ा था। दीवारें दिखाई ही नहीं दे रही थीं।

सिर्फ अंधेरा और दूर कहीं टिमटिमाती हुई रोशनी। तभी किसी ने मेरा नाम पुकारा।

आरव….

मैंने टॉर्च घुमाई। कोई नहीं था। फिर आवाज़ दोबारा आई। इस बार बिल्कुल मेरे पीछे से।

आरव…. मैंने पलटकर देखा और मेरी चीख निकल गई।

मेरे सामने एक लड़का खड़ा था।

दुबला-पतला।

बिखरे बाल।

फटे हुए कपड़े।

उसकी तस्वीर मैंने पुरानी फाइल में देखी थी। वह….

निखिल था। वही छात्र जो 12 साल पहले गायब हुआ था।

तुम…. जिंदा हो ?

मैंने काँपते हुए पूछा। उसकी आँखों में अजीब सी उदासी थी।

तुम्हारी दुनिया में नहीं। उसने जवाब दिया।

समय का जाल

निखिल ने जो बताया…..

वह किसी भी हॉरर कहानी से ज्यादा डरावना था। कमरा 666 कोई सामान्य कमरा नहीं था। यह एक तरह का समय का जाल था। जो भी इसके अंदर आता…. वह दुनिया से कट जाता।

बाहर साल गुजर जाते। लेकिन अंदर समय लगभग रुक जाता।

तभी मुझे रोने की आवाज़ सुनाई दी। अंधेरे से एक और लड़का बाहर आया। वह रोहित था। जो पिछली रात गायब हुआ था।

मुझे घर जाना है…..

वह लगातार यही कह रहा था।

मैंने टॉर्च चारों तरफ घुमाई और मेरा खून जम गया। अंधेरे में दर्जनों चेहरे दिखाई दिए।

कुछ बूढ़े।

कुछ जवान।

कुछ बच्चे।

सबकी आँखों में एक जैसी निराशा थी।

निखिल बोला।

पिछले पचास सालों में जो भी यहाँ आया… वह यहीं रह गया।

मैं बोल भी नहीं पा रहा था।

अचानक पूरे कमरे में कंपन होने लगा। जमीन हिलने लगी। अंधेरे के बीच एक विशाल आकृति दिखाई देने लगी। पहले सिर्फ परछाई। फिर धीरे-धीरे उसका आकार साफ होने लगा।

तभी मुझे एक और सच्चाई पता चली। वर्तमान वार्डन इस रहस्य को जानता था। वह वर्षों से कमरे को छिपाकर रखे हुए था। क्योंकि उसके पिता भी इस कॉलेज के वार्डन थे। और उनके पिता भी।

सौ साल पुराना समझौता

1926 में इस जगह पर एक पुराना आश्रम था। वहाँ कुछ तांत्रिक प्रयोग किए गए थे। उसी दौरान यह कमरा बना।लेकिन वह कमरा नहीं था। एक दरार थी…..

जो हमारी दुनिया और किसी दूसरी जगह के बीच खुल गई थी। अब वह परछाई पूरी तरह सामने आ चुकी थी। लगभग दस फुट लंबी।

काला शरीर।

सफेद आँखें।

और चेहरे की जगह सिर्फ अंधेरा। उसने जैसे ही मेरी तरफ देखा….. मेरे सिर में तेज दर्द शुरू हो गया। कमरे की दीवारें अचानक दिखाई देने लगीं। उन पर हजारों नाम लिखे थे और धीरे-धीरे एक नया नाम उभर रहा था।

आरव शर्मा

मेरा नाम।

निखिल बोला

यह तुम्हें चुन चुका है।

क्या मतलब ?

अब या तो तुम यहाँ रहोगे….. या कोई और।

मैं दरवाज़े की तरफ भागा। लेकिन दरवाज़ा गायब हो चुका था। हर तरफ सिर्फ अंधेरा था और वह विशाल आकृति धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ रही थी। तभी मुझे जेब में रखा वह पुराना कागज़ याद आया जो मुझे लाइब्रेरी में मिला था।

उस पर एक लाइन लिखी थी।

जिस दिन नाम मिट जाएगा, दरवाज़ा खुल जाएगा।

नाम मिटाना

मैंने दीवार पर अपना नाम देखा। वह चमक रहा था। मैं दौड़कर वहाँ पहुँचा और पत्थर से उसे खरोंचना शुरू कर दिया। जैसे ही नाम का पहला अक्षर मिटा….. पूरे कमरे में भयानक चीख गूँज उठी।

वह आकृति दर्द से तड़पने लगी।

निखिल चिल्लाया।

जारी रखो !

मैं पूरी ताकत से अपना नाम मिटाने लगा। एक-एक अक्षर।

एक-एक खरोंच।

अचानक अंधेरे में एक रोशनी दिखाई दी। वह दरवाज़ा था। असल दुनिया का दरवाज़ा।

लेकिन तभी वह विशाल आकृति मेरे सामने आ गई। उसका हाथ मेरी गर्दन तक पहुँच गया। ठंडी पकड़। साँस रुकने लगी।

उसी समय निखिल आगे आया। उसने उस आकृति को पकड़ लिया और मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया।

भागो।

लेकिन….

भागो !

मैं पूरी ताकत से दरवाज़े की तरफ दौड़ा और अगले ही पल…. मैं हॉस्टल के कॉरिडोर में था।

सुबह जब मेरी आँख खुली तो मैं हॉस्टल के बाहर पड़ा था। सूरज निकल चुका था। मेरे हाथ में वही पुराना कागज़ था। लेकिन उस पर लिखे शब्द बदल चुके थे।

अब सिर्फ एक लाइन थी।

एक और बच गया।

कॉलेज प्रशासन ने अगले महीने ओल्ड ब्लॉक को पूरी तरह गिरा दिया। कमरा 666 हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। कम से कम सबको यही लगा।

मैं कॉलेज छोड़ चुका था। एक दिन सोशल मीडिया पर एक फोटो देखी। एक नए हॉस्टल की फोटो। दूसरे शहर में। दूसरे कॉलेज में। लेकिन फोटो के पीछे एक दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

और उस पर लिखा था।

666

आज भी मुझे नहीं पता कि निखिल का क्या हुआ या वह आकृति क्या थी। लेकिन कभी-कभी रात के 2:07 बजे मेरे फोन पर एक नोटिफिकेशन आता है। जब मैं उसे खोलता हूँ…..

तो स्क्रीन पर सिर्फ एक लाइन लिखी होती है।

कमरा अभी भी मौजूद है…..

और सबसे डरावनी बात ? हर बार वह मैसेज भेजने वाले का नाम होता है।

निखिल।

THE END |

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