जब मैंने श्मशान से लौटकर पीछे मुड़कर देखा, तो होश उड़ गए

जब मैंने श्मशान से लौटकर पीछे मुड़कर देखा, तो होश उड़ गए ? एक रहस्यमयी और सस्पेंस से भरपूर Horror Story in Hindi है। एक युवक रात में श्मशान से लौटते समय महसूस करता है कि कोई अदृश्य साया उसका पीछा कर रहा है। क्या यह सिर्फ़ उसका भ्रम था या सचमुच कोई उसके साथ घर तक आ गया ? जानिए इस खौफनाक Story में, जो अंत तक आपको डर और रहस्य के एहसास से बाँधे रखेगी।

अंतिम संस्कार के बाद की वह रात

मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी अपने का अंतिम संस्कार मेरी ज़िंदगी का सबसे डरावना अनुभव बन जाएगा।

मेरा नाम अभिषेक है। मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे-से कस्बे में रहता हूँ। मेरे दादाजी का अचानक हार्ट अटैक से निधन हो गया था। पूरा परिवार शोक में था। उसी शाम उनका अंतिम संस्कार गाँव के पुराने श्मशान घाट पर किया गया।

हमारे गाँव का वह श्मशान बहुत पुराना था। चारों तरफ़ ऊँचे-ऊँचे पीपल के पेड़ गंगा की ओर जाती सुनसान पगडंडी और हवा में हमेशा जलती लकड़ियों और राख की मिली-जुली गंध। गाँव के बुज़ुर्ग हमेशा कहते थे।

सूरज ढलने के बाद श्मशान में ज़्यादा देर मत रुकना। वहाँ हर आत्मा अपने साथ किसी न किसी को ले जाना चाहती है।

मैंने हमेशा इन बातों को अंधविश्वास समझा। लेकिन उस रात……

सब कुछ बदल गया।

जब सब लोग चले गए

दादाजी की चिता जल चुकी थी। धीरे-धीरे गाँव के सभी लोग वापस लौटने लगे। मैं, मेरे चाचा और दो रिश्तेदार आख़िर तक वहीं रुके रहे। करीब रात के 9:30 बजे चिता की आग धीमी पड़ने लगी।

तभी चाचा बोले।

अभिषेक तुम बाइक लेकर घर निकलो। हम लोग पंडित जी के साथ कुछ रस्में पूरी करके आते हैं। मैंने सिर हिलाया और अकेला ही श्मशान से बाहर निकल आया। बाइक थोड़ी दूर खड़ी थी। जैसे ही मैंने हेलमेट पहना। मेरे पीछे से किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।

रुको…..

मैंने तुरंत पीछे देखा। वहाँ कोई नहीं था। मैंने सोचा शायद मेरा वहम होगा। मैं बाइक स्टार्ट करके चल पड़ा। श्मशान से गाँव तक जाने वाली सड़क लगभग तीन किलोमीटर लंबी थी। उस रास्ते पर एक भी स्ट्रीट लाइट नहीं थी।

सिर्फ़ चाँद की हल्की रोशनी और मेरी बाइक की हेडलाइट। करीब पाँच मिनट बाद मुझे महसूस हुआ कि मेरी बाइक के पीछे कोई बैठा है। पहले मुझे लगा शायद सड़क खराब होने की वजह से ऐसा लग रहा होगा।

लेकिन फिर…..

बाइक का पिछला हिस्सा अचानक नीचे दब गया। जैसे किसी भारी आदमी ने पीछे बैठकर वजन डाल दिया हो। मैंने रियर-व्यू मिरर में देखा। सीट खाली थी। मैंने राहत की साँस ली।

लेकिन अगले ही पल…..

मिरर में कुछ दिखाई दिया। मेरे पीछे सड़क पर…..

कोई सफेद कपड़ों में धीरे-धीरे चल रहा था। उसकी चाल बिल्कुल सामान्य थी। लेकिन मेरी बाइक की स्पीड लगभग 60 किलोमीटर प्रति घंटा थी। फिर भी वह उतनी ही दूरी पर बना हुआ था।

मैंने स्पीड बढ़ा दी।

70….

80….

90….

लेकिन वह आकृति अब भी वहीं थी।

न आगे….

न पीछे….

बस मेरे पीछे।

कुछ दूर जाकर मुझे सड़क किनारे एक पुरानी चाय की दुकान दिखाई दी। दिन में वहाँ हमेशा भीड़ रहती थी। लेकिन उस समय दुकान बंद थी। फिर भी….

अंदर लालटेन जल रही थी। मैंने सोचा शायद कोई होगा। जैसे ही मैं रुका लालटेन अपने आप बुझ गई। पूरा इलाका अंधेरे में डूब गया और उसी समय मेरे कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाया।

तुम अकेले नहीं लौटे…..

मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। मैंने तुरंत बाइक स्टार्ट करने की कोशिश की। लेकिन इस बार बाइक बिल्कुल स्टार्ट नहीं हुई। तभी…..

दुकान के अंदर से लकड़ी की कुर्सी घिसटने की आवाज़ आई।

घर्ररर….

फिर धीरे-धीरे किसी के नंगे पैरों की आवाज़ बाहर आने लगी।

ठक….

ठक….

ठक….

मैंने टॉर्च निकाली और दुकान की तरफ़ रोशनी डाली। दरवाज़े पर कोई खड़ा था। उसका पूरा शरीर राख से ढका हुआ था और उसकी आँखें ऐसी लग रही थीं जैसे अभी-अभी जलती चिता से निकली हों।

वह मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया। फिर धीरे से बोला।

श्मशान से लौटते समय…. कोई कभी अकेला नहीं आता….।

इतना कहते ही मेरी बाइक अपने आप स्टार्ट हो गई। लेकिन…..

इस बार इंजन की आवाज़ के साथ मुझे पीछे से किसी की धीमी हँसी भी सुनाई दे रही थी।

घर पहुँचने के बाद जो हुआ, उसने मुझे तोड़ दिया

मैंने बिना पीछे देखे बाइक पूरी रफ्तार से दौड़ा दी। हवा कानों को चीर रही थी। लेकिन उस हँसी की आवाज़ अब भी मेरे पीछे से आ रही थी। ऐसा लग रहा था। जैसे कोई मेरी बाइक के बिल्कुल पीछे बैठा हो।

करीब दस मिनट बाद मैं घर पहुँच गया। घर के बाहर पूरा परिवार बैठा था। सबने मुझे देखकर राहत की साँस ली। माँ बोलीं।

इतनी देर क्यों लगा दी ?

मैंने कुछ नहीं बताया। मैं नहीं चाहता था कि पहले ही दिन घर वाले डर जाएँ। लेकिन घर के अंदर कदम रखते ही मेरी दादी अचानक मेरे सामने आ गईं। उन्होंने मुझे देखते ही मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी आँखें फैल गईं।

अभिषेक…..

तेरे पीछे कौन खड़ा है ?

मेरे शरीर में जैसे करंट दौड़ गया। मैंने तुरंत पीछे देखा। दरवाज़ा खाली था।

क्या हुआ दादी ?

उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा। अभी यहीं था…..। राख से ढका हुआ आदमी।

तुझे घूर रहा था। इतना कहते ही

दादी ने मेरी कलाई पर काला धागा बाँध दिया।

आज रात अपने कमरे से बाहर मत निकलना।

रात 3:13 बजे की दस्तक

उस रात मुझे बिल्कुल नींद नहीं आ रही थी। घड़ी में 3:13 AM हुए।

तभी

ठक….

कमरे के दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। मैंने सोचा शायद माँ होंगी। लेकिन दूसरी दस्तक पहले से ज़्यादा ज़ोर से हुई।

ठक…. ठक…. ठक….

मैंने पूछा।

कौन ?

बाहर से पिताजी की आवाज़ आई। बेटा….. दरवाज़ा खोल।

मैंने दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाया।

तभी….

मेरे मोबाइल पर चाचा का फोन आ गया। मैंने कॉल उठाई। उधर से घबराई हुई आवाज़ आई।

अभिषेक….. तुम ठीक हो ?

हाँ…..

अंकल कहाँ हैं ? यहीं….. बाहर खड़े हैं…..।

कुछ सेकंड तक चाचा बिल्कुल चुप रहे। फिर उन्होंने धीरे से कहा।

अभी-अभी तुम्हारे पिताजी मेरे साथ श्मशान से निकले हैं। मेरे हाथ से मोबाइल लगभग गिर गया।

बाहर…..

जो आवाज़ मुझे बुला रही थी। वह मेरे पिताजी की नहीं थी। उसी समय दरवाज़े के नीचे की दरार से राख अंदर आने लगी। जैसे बाहर कोई जलती चिता की राख बिखेर रहा हो। फिर…..

एक भारी आवाज़ आई।

दरवाज़ा खोलो…..

इस बार वह आवाज़ इंसानी नहीं थी।

सुबह होते ही मैंने पूरी घटना दादी को बता दी। उन्होंने बिना कुछ कहे मुझे दादाजी की पुरानी अलमारी तक ले गईं। अंदर से एक चमड़े की पुरानी डायरी निकाली। उसके पहले पन्ने पर लिखा था।

श्मशान से कभी खाली हाथ मत लौटना….

मैंने पन्ने पलटे।

दादाजी ने लिखा था।

हर श्मशान में कुछ ऐसी आत्माएँ होती हैं जो किसी जीवित इंसान के साथ घर लौटना चाहती हैं।

अगर लौटते समय कोई पीछे से बुलाए….. या रास्ते में राख से ढका कोई व्यक्ति दिखाई दे। तो उससे कभी बात मत करना।

आखिरी पन्ने पर एक वाक्य लाल स्याही से लिखा था।

अगर वह घर तक आ जाए…. तो तीसरी रात किसी एक की जान लेकर ही जाएगा।

मेरे हाथ काँपने लगे। आज….

दूसरी रात थी और तीसरी रात…..

सिर्फ़ एक दिन दूर थी।

घर में बढ़ने लगीं अजीब घटनाएँ

उस शाम से घर का माहौल बदल गया। रसोई में रखे बर्तन अपने आप गिरने लगे। बिना हवा के खिड़कियाँ खुलने लगीं। पूरे घर में राख जैसी गंध फैल गई।

सबसे डरावनी बात….

हमारे आँगन में हर सुबह गीले पैरों के निशान मिलते। लेकिन वे घर के अंदर आते थे। बाहर नहीं जाते थे। जैसे जो भी आया था। वह अब यहीं रह रहा था।

उस रात…. मैंने तय कर लिया। अगर यह सब मेरी वजह से हुआ है। तो इसका अंत भी मुझे ही करना होगा। लेकिन मुझे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था।

कि तीसरी रात मुझे वापस उसी श्मशान जाना पड़ेगा और वहाँ मेरा इंतज़ार कोई ज़िंदा इंसान नहीं कर रहा होगा।

दादाजी की डायरी पढ़ने के बाद मेरे पास दो ही रास्ते थे या तो घर बैठकर किसी अनहोनी का इंतज़ार करता या फिर उसी श्मशान में जाकर इस रहस्य का सामना करता। मैंने दूसरा रास्ता चुना।

रात के 11:40 बजे….

मैंने दादी के दिए हुए काले धागे को कलाई पर कसकर बाँधा, दादाजी की डायरी जेब में रखी और अकेला ही बाइक लेकर निकल पड़ा। पूरे रास्ते ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरी हर हरकत पर नज़र रख रहा हो।

सड़क सुनसान थी। हवा पहले से कहीं ज़्यादा ठंडी और हर कुछ मिनट बाद मुझे पीछे से राख उड़ने की आवाज़ सुनाई देती। मैंने इस बार एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। करीब आधे घंटे बाद…..

मैं फिर उसी श्मशान के मुख्य दरवाज़े पर खड़ा था। लेकिन इस बार सब कुछ अलग था। जहाँ दो दिन पहले कई चिताएँ जल रही थीं। वहाँ अब गहरा सन्नाटा था।

सिर्फ़ एक चिता। जो अपने आप जल रही थी। आस-पास कोई इंसान नहीं था। न पंडित….

न चौकीदार….

न कोई शोक मनाने वाला।

फिर भी चिता की आग तेज़ थी। जैसे किसी का अंतिम संस्कार अभी-अभी हुआ हो।

राख से बना वह आदमी

मैं धीरे-धीरे उस चिता की तरफ़ बढ़ा। अचानक हवा का तेज़ झोंका आया। चिता की राख हवा में उड़ी और मेरी आँखों के सामने वह राख एक इंसानी आकृति का रूप लेने लगी। कुछ ही सेकंड में…..

मेरे सामने वही आदमी खड़ा था। जिसे मैंने बंद चाय की दुकान पर देखा था। उसका पूरा शरीर राख से बना हुआ था। चेहरे पर कोई भाव नहीं। लेकिन उसकी आँखें जलते हुए कोयले जैसी लाल थीं।

उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा।

तू लौट आया…..

मेरी आवाज़ काँप रही थी।

त….. तुम कौन हो ?

वह हल्का-सा मुस्कुराया। मैं वह हूँ जो कभी यहाँ से जा नहीं सका और अब तुझे भी जाने नहीं दूँगा।

इतना कहते ही पूरे श्मशान में एक साथ दर्जनों चिताएँ अपने आप जल उठीं। मैंने घबराकर चारों तरफ़ देखा। अभी कुछ पल पहले जो जगह खाली थी। अब वहाँ सैकड़ों धुंधली परछाइयाँ खड़ी थीं।

सबकी नज़रें मेरी तरफ़ थीं।

डर के मारे मेरे हाथ काँप रहे थे। तभी मेरी जेब में रखी डायरी अपने आप खुल गई। हवा के बिना ही उसके पन्ने पलटने लगे। आखिरी पन्ने पर जो शब्द पहले नहीं थे।

अब धीरे-धीरे उभरने लगे।

डरकर भागोगे…. तो वह हमेशा पीछा करेगा। लेकिन यदि उसकी अधूरी इच्छा पूरी कर दोगे…. तो वह हमेशा के लिए मुक्त हो जाएगा।

मैंने सिर उठाया। राख वाला आदमी अब बिल्कुल मेरे सामने खड़ा था। मैंने हिम्मत करके पूछा।

तुम्हारी अधूरी इच्छा क्या है ?

पहली बार उसकी आँखों में दर्द दिखाई दिया। उसने काँपती आवाज़ में कहा। मुझे…. किसी ने मुखाग्नि नहीं दी।

मेरी लाश….

यहीं कहीं….

बिना अंतिम संस्कार के दफ़ना दी गई थी।” मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। इसलिए वह वर्षों से श्मशान छोड़ नहीं पा रहा था।

सबसे खौफनाक खोज

उसने काँपते हुए हाथ से श्मशान के एक पुराने बरगद की ओर इशारा किया। मैं टॉर्च लेकर वहाँ पहुँचा। ज़मीन थोड़ी धँसी हुई थी। मैंने पास पड़ी एक लोहे की रॉड से मिट्टी हटानी शुरू की।

कुछ मिनट बाद…. रॉड किसी कठोर चीज़ से टकराई। मैंने मिट्टी साफ़ की।

और…. मेरी साँस रुक गई।

वहाँ एक इंसानी कंकाल पड़ा था। उसकी गर्दन में जंग लगी हुई चाँदी की चेन थी और उसी चेन में एक छोटा-सा लॉकेट। लॉकेट खोलते ही अंदर एक पुरानी तस्वीर थी। मैंने टॉर्च की रोशनी में उसे ध्यान से देखा।

वह आदमी….

कोई अजनबी नहीं था। वह मेरे दादाजी के बचपन के सबसे अच्छे दोस्त की तस्वीर थी। जिसके बारे में दादी ने कभी बताया था कि….. वह अचानक एक दिन गायब हो गया था।

और फिर कभी वापस नहीं लौटा। मेरे हाथ काँपने लगे। अब मुझे समझ आ गया था। दादाजी हर साल उसी श्मशान में अकेले क्यों जाया करते थे। वे अपने दोस्त से किया एक अधूरा वादा निभाने आते थे।

लेकिन उनकी मौत से पहले वह वादा पूरा नहीं हो पाया। अब उसे पूरा करना मेरी ज़िम्मेदारी थी।

मैंने काँपते हाथों से उस कंकाल को बाहर निकाला। रात के लगभग 2:45 बजे थे। पूरा श्मशान असामान्य रूप से शांत था। लेकिन जैसे ही मैंने कंकाल को सफेद कपड़े में लपेटा चारों तरफ़ खड़ी धुंधली परछाइयाँ धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ने लगीं।

उनकी आँखें नहीं थीं।

चेहरे नहीं थे।

सिर्फ़ राख से बने धुंधले शरीर जो मुझे घेरते जा रहे थे। अचानक राख वाला आदमी ज़ोर से चिल्लाया।

पीछे हट जाओ…… !

उसकी आवाज़ पूरे श्मशा न में गूँज उठी। सभी परछाइयाँ वहीं रुक गईं। मैंने पहली बार महसूस किया। वह मुझे नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता था। वह सिर्फ़ मुक्त होना चाहता था।दादाजी की डायरी के आखिरी पन्ने पर एक मंत्र और अंतिम संस्कार की पूरी विधि लिखी हुई थी।

मैंने काँपते हाथों से सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी कीं। श्मशान में रखे पुराने घड़े से पानी लाया। फिर सालों से बिना सम्मान के पड़े उस कंकाल का अंतिम संस्कार शुरू किया।

जैसे ही मैंने मुखाग्नि दी। अचानक तेज़ हवा चलने लगी। पीपल के पेड़ों की शाखाएँ ज़ोर-ज़ोर से हिलने लगीं। चारों तरफ़ उड़ती राख आकाश में घूमने लगी। लेकिन इस बार वह डरावनी नहीं लग रही थी।

ऐसा लग रहा था। जैसे कोई वर्षों बाद आज़ाद हो रहा हो। राख वाला आदमी धीरे-धीरे आग के सामने आकर खड़ा हो गया। उसकी लाल आँखों की जगह अब सामान्य आँखें थीं। उसने मुस्कुराकर मेरी तरफ़ देखा।

फिर बोला।

आज…. पचास साल बाद….. मुझे शांति मिली है।

अपने दादाजी से कहना। उन्होंने अपना वादा निभा दिया। मेरी आँखों से आँसू निकल आए। मैं कुछ पूछ पाता। उससे पहले वह धीरे-धीरे धुएँ में बदल गया।

और हवा के साथ आसमान में विलीन हो गया। उसी पल श्मशान में खड़ी बाकी सभी परछाइयाँ भी एक-एक करके गायब होने लगीं। कुछ ही सेकंड में पूरा श्मशान फिर से बिल्कुल खाली था।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…

मैंने सोचा सब कुछ खत्म हो चुका है। मैं बाइक पर बैठा और घर लौट आया। अगली सुबह घर का माहौल बिल्कुल सामान्य था। राख की गंध गायब थी। रात की दस्तक बंद हो चुकी थी।

दादी ने मुस्कुराकर कहा।

अब कोई नहीं आएगा। मैंने राहत की साँस ली। लगभग छह महीने बीत गए। मैं उस घटना को धीरे-धीरे भूलने लगा। फिर एक रात करीब 3:07 बजे मेरे मोबाइल पर एक अनजान नंबर से कॉल आया।

मैंने रिसीव किया। उधर से सिर्फ़ जलती लकड़ियों की आवाज़ आ रही थी।

चट…. चट…. चट….

फिर एक बहुत धीमी आवाज़ सुनाई दी।

धन्यवाद…..

कॉल अपने आप कट गया। मैंने तुरंत नंबर मिलाया। स्क्रीन पर लिखा आया।

This Number Does Not Exist.

मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने खुद को समझाया। शायद कोई तकनीकी गड़बड़ी होगी। लेकिन अगली सुबह जब मैं अपने आँगन में गया। तो वहाँ मिट्टी पर दो पैरों के निशान बने हुए थे। वे घर से बाहर जा रहे थे। अंदर नहीं आ रहे थे।

मैं मुस्कुरा दिया।

शायद इस बार सचमुच कोई हमेशा के लिए चला गया था।

उस घटना के लगभग एक साल बाद मैं फिर उसी श्मशान गया। सिर्फ़ दादाजी की बरसी पर दीपक जलाने। श्मशान अब पहले जैसा नहीं लगता था। सब कुछ सामान्य था। लौटते समय मेरी नज़र पुराने बरगद पर पड़ी।

वहीं जहाँ मुझे वह कंकाल मिला था। उस पेड़ के तने पर किसी ने नाखून से एक वाक्य लिखा हुआ था।

हर आत्मा बदला नहीं चाहती…. कुछ सिर्फ़ अपना आखिरी संस्कार चाहती हैं।

मैं कुछ पल वहीं खड़ा रहा। फिर चुपचाप घर लौट आया। आज भी जब कोई मुझसे पूछता है।

श्मशान से लौटते समय तुम्हारे साथ कौन आया था ?

तो मैं बस इतना कहता हूँ।

शायद…. एक अधूरी आत्मा…. जो डराने नहीं विदा लेने आई थी।

उस रात के बाद मैंने भूतों से डरना छोड़ दिया। लेकिन अधूरे वादों से आज भी डर लगता है।

कहानी कैसी लगी ? कमेंट करके ज़रूर बताइए।

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1 thought on “जब मैंने श्मशान से लौटकर पीछे मुड़कर देखा, तो होश उड़ गए”

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