जिस खेत में रात को कोई फसल नहीं, लाशें उगती थीं (Chudail Horror Story)

यह कहानी आपको एक ऐसे श्रापित खेत में ले जाएगी जहाँ रात होते ही मिट्टी से फसल नहीं, इंसानी लाशें उगने लगती थीं। आखिर उस खेत पर किस चुड़ैल का श्राप था, और क्यों हर अमावस्या को कोई न कोई हमेशा के लिए गायब हो जाता था ? जानिए इस रोंगटे खड़े कर देने वाली डरावनी कहानी में।

जिस रात मिट्टी ने इंसानों को जन्म देना शुरू किया

उस रात पूरे बेलवाड़ी गाँव में किसी की नींद पूरी नहीं हुई। पहले कुत्ते रोए। फिर अचानक सारे कुत्ते एक साथ चुप हो गए। उसके बाद पूरा गाँव ऐसे शांत हो गया जैसे वहाँ कभी कोई रहता ही न हो।

रात के ठीक बारह बजे गाँव के बाहर फैले उस बंजर खेत से पहली आवाज़ आई।

खर्र…. खर्र….

जैसे कोई बहुत नीचे से मिट्टी खुरच रहा हो। खेत कई सालों से वीरान था। न वहाँ कभी गेहूँ उगा….

न धान….

न सरसों….

न घास।

लेकिन उस रात सूखी ज़मीन अपने-आप हिलने लगी। पहले एक जगह। फिर दूसरी। फिर पूरा खेत साँस लेने लगा और अचानक

धड़ाम…..!

एक जगह की मिट्टी फट गई। उसमें से एक काला सड़ा हुआ हाथ बाहर निकला। उसके बाद दूसरा।

फिर तीसरा।

कुछ ही मिनटों में पूरे खेत में जगह-जगह आधे दबे इंसानी शरीर दिखाई देने लगे। कोई गर्दन तक मिट्टी में धँसा था। कोई कमर तक। कोई दोनों हाथ फैलाए जैसे बाहर निकलने की कोशिश कर रहा हो। लेकिन सबसे भयानक बात उनमें से कोई भी पूरी तरह मरा हुआ नहीं लगता था।

उनकी उँगलियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।

जिस खेत का नाम लेना भी लोग पसंद नहीं करते थे

सुबह होते ही गाँव वालों ने खेत की तरफ़ देखा। कोई भी उसके पास नहीं गया। सब दूर खड़े रहे। गाँव का सबसे बुज़ुर्ग आदमी।

रघुनाथ काका….

बस एक बार उस खेत को देखकर बोला फिर शुरू हो गया। गाँव के बच्चों को बचपन से सिखाया जाता था।

सूरज ढलने के बाद उस खेत की तरफ़ देखना भी मत….

कोई पूछता क्यों ?

तो जवाब मिलता वहाँ फसल नहीं उगती। वहाँ चुड़ैल अपनी भूख बोती है।

मेरा नाम अर्जुन है। मैं खेती से जुड़ा कृषि अधिकारी था। सरकार ने मुझे उसी इलाके में भेजा था। रिपोर्ट में लिखा था।

एक खेत पिछले सौ साल से पूरी तरह बंजर है।

मेरे लिए यह सिर्फ़ मिट्टी की जाँच का मामला था। गाँव पहुँचते ही सबने एक ही बात कही। उस खेत को मत छूना। मैं हँस पड़ा। मिट्टी किसी को मारती नहीं। रघुनाथ काका ने मेरी आँखों में देखकर कहा।

मिट्टी नहीं….. उसके नीचे सोई हुई चीज़ मारती है।

शाम को मैं अकेला उस खेत तक पहुँचा। चारों तरफ़ हरी फसलें थीं। लेकिन बीच में करीब दस बीघा ज़मीन पूरी तरह काली पड़ी थी। ऐसा लग रहा था। जैसे किसी ने आग लगाकर पूरी मिट्टी जला दी हो।

उस खेत में एक भी चिड़िया नहीं बैठती थी। एक भी कीड़ा नहीं चलता था। हवा चल रही थी। लेकिन उस खेत के ऊपर की हवा बिल्कुल स्थिर थी। मैंने मिट्टी उठाकर देखी। वह सामान्य नहीं थी।

उसमें से मिट्टी की नहीं। सड़े हुए मांस जैसी गंध आ रही थी। उसी समय मेरे पीछे किसी औरत के पायल की आवाज़ आई।

छन…. छन…. छन….

मैंने तुरंत पीछे देखा। कोई नहीं। आसपास सिर्फ़ खाली खेत। मैंने सोचा शायद भ्रम होगा। तभी आवाज़ फिर आई।

इस बार मेरे बिल्कुल कान के पास।

मेरे खेत में क्या ढूँढ़ रहे हो….

मैं पलटा। कोई नहीं।

लेकिन मेरे पैरों के पास मिट्टी पर एक औरत के नंगे पैरों के ताज़ा निशान बनते जा रहे थे। ऐसे जैसे कोई अदृश्य चीज़ मेरे चारों ओर घूम रही हो। मेरे शरीर में पहली बार डर उतरा।

पहली रात का श्राप

उस रात मैं गाँव के प्रधान के घर रुका। करीब दो बजे अचानक मेरी नींद खुली। बाहर से औरत के गाने की आवाज़ आ रही थी। आवाज़ बहुत मीठी थी। लेकिन उसमें ऐसा दर्द था कि सुनते ही शरीर काँप जाए। मैंने खिड़की से बाहर देखा।

दूर उसी खेत के बीच सफेद धुंध में एक औरत खड़ी थी। उसके घुटनों तक लंबे काले बाल थे। सफेद साड़ी पूरी मिट्टी से सनी हुई थी। उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था। वह धीरे-धीरे दोनों हाथों से मिट्टी खोद रही थी।

कुछ सेकंड बाद उसने मिट्टी से

एक इंसानी सिर बाहर निकाला।

फिर वह उसके बाल पकड़कर मुस्कुराई और धीरे-धीरे उस सिर को वापस मिट्टी के अंदर दबा दिया। मेरे मुँह से आवाज़ तक नहीं निकली। उसी पल उस औरत ने पहली बार अपना सिर उठाया। हालाँकि वह मुझसे बहुत दूर थी।

फिर भी ऐसा लगा।

वह सीधे मेरी आँखों में देख रही है।

और अगले ही पल उसकी गर्दन असामान्य तरीके से धीरे-धीरे

पूरी 180 डिग्री घूम गई।

उसके होंठ बिना हिले आवाज़ मेरे कान में आई।

अगली फसल…. तू होगा….

मेरे हाथ से खिड़की बंद करते भी नहीं बनी। उस रात मुझे पहली बार एहसास हुआ। गाँव वाले झूठ नहीं बोल रहे थे।

सुबह सूरज निकलते ही मैं बिना किसी को बताए उस खेत की तरफ़ भागा। मैं खुद को समझा रहा था।

रात का भ्रम था…. थकान थी…. बस इतना ही।

लेकिन जैसे ही मैं खेत के किनारे पहुँचा। मेरे कदम वहीं रुक गए। पूरे खेत की मिट्टी फिर फटी हुई थी। हर तरफ़ आधे दबे हुए इंसानी शरीर दिखाई दे रहे थे। लेकिन इस बार उनमें से एक शरीर पूरी तरह मिट्टी से बाहर था।

वह घुटनों के बल बैठा था। उसका सिर नीचे झुका हुआ था। मैं धीरे-धीरे उसके पास पहुँचा और जैसे ही उसका चेहरा दिखाई दिया। मेरी चीख निकल गई।

वह चेहरा मेरा था।

मेरी ही आँखें।

मेरी ही दाढ़ी।

मेरे ही कपड़े।

यहाँ तक कि मेरी कलाई पर बना बचपन का जलने का निशान भी उसी पर था। मैं पीछे हटने लगा। तभी उस लाश की बंद आँखें धीरे-धीरे खुल गईं। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुरा दी। फिर बिना होंठ हिलाए बोली।

आज पहली रात है…. तीसरी रात तक…. तू भी यहीं होगा….

अगले ही पल वह शरीर फिर मिट्टी में धँसने लगा। कुछ ही सेकंड में वहाँ सिर्फ़ सूखी ज़मीन बची थी। जैसे कुछ हुआ ही न हो।

चुड़ैल की भूख

मैं भागता हुआ गाँव पहुँचा। मेरी हालत देखकर रघुनाथ काका समझ गए। उन्होंने बिना कुछ पूछे दरवाज़ा बंद कर दिया। फिर धीमी आवाज़ में बोले। उसने तुझे देख लिया है। अब वह तेरा पीछा छोड़ेगी नहीं। मैंने काँपते हुए पूछा।

वह है कौन ?

रघुनाथ काका की आँखें भर आईं। करीब सौ साल पहले यहीं एक औरत रहती थी। नाम था गौरी

उसके पति की मौत के बाद गाँव में बच्चों की बीमारी फैली। लोगों ने बिना किसी सबूत के उसे चुड़ैल कह दिया। उसे रस्सियों से बाँधकर इसी खेत में ज़िंदा गाड़ दिया। वह आख़िरी साँस तक चीखती रही। लेकिन किसी ने उसे बाहर नहीं निकाला।

मरने से पहले उसने सिर्फ़ एक बात कही।

जिस मिट्टी में मुझे जिंदा दबाया है….. उसी मिट्टी से अब इंसानों की फसल उगेगी।

रघुनाथ काका की आवाज़ काँपने लगी। उस दिन से उस खेत ने कभी अनाज नहीं उगाया।

उस शाम पूरे गाँव ने अपने दरवाज़े बंद कर लिए। किसी घर में चूल्हा नहीं जला। किसी ने बाहर कदम नहीं रखा। रात के करीब एक बजे मेरे कमरे की छत से मिट्टी गिरने लगी।

टप….

टप….

टप….

मैंने ऊपर देखा। छत पर किसी के नंगे पैर चल रहे थे। धीरे-धीरे एक औरत की हँसी सुनाई दी। फिर नाखूनों से लकड़ी खुरचने की आवाज़।

चररर…. चररर….

कुछ ही पल बाद छत के बीचों-बीच दरार पड़ गई और उस दरार से बहुत लंबे काले बाल नीचे लटक गए। उन बालों से गीली मिट्टी टपक रही थी। मैं पीछे हट गया। फिर उन बालों के बीच से दो सफेद आँखें दिखाई दीं।

वह उल्टी लटकी हुई थी। उसका चेहरा मेरी तरफ़ था। लेकिन उसका शरीर अब भी छत के ऊपर था। उसने मुस्कुराकर कहा।

मिट्टी ने तुझे पहचान लिया है….

अचानक उसके बाल साँपों की तरह मेरी तरफ़ बढ़ने लगे। मैं दरवाज़ा खोलकर बाहर भागा। लेकिन पूरा गाँव गायब था।

न कोई घर।

न कोई सड़क।

चारों तरफ़…

सिर्फ़ वही काला खेत और बीच में सैकड़ों आधी दबी हुई लाशें। सभी की आँखें खुली हुई थीं और सभी मुझे देख रही थीं।

तीसरी रात.… जब चुड़ैल अपनी फसल काटने आई

मैं भागना चाहता था। लेकिन मेरे पैर मिट्टी में धँसने लगे। धीरे-धीरे पहले टखने

फिर घुटने….

फिर कमर तक।

ऐसा लग रहा था जैसे ज़मीन ज़िंदा हो और मुझे अपने अंदर खींच रही हो। चारों तरफ़ खड़ी आधी दबी लाशें एक साथ हिलने लगीं। उनके मुँह धीरे-धीरे खुलने लगे। लेकिन उनमें से आवाज़ नहीं निकली। आवाज़

ज़मीन के नीचे से आ रही थी।

रुक जा….

यहीं रह जा….

हमारी तरह….

मैंने पूरी ताकत लगाकर खुद को बाहर निकाला और भागने लगा। लेकिन जहाँ भी दौड़ता। वही खेत मेरे सामने आ जाता। जैसे मैं गोल-गोल उसी जगह घूम रहा था। तभी पीछे से पायल की आवाज़ आई।

छन.… छन.… छन….

मैंने मुड़ने की गलती कर दी। सिर्फ़ दस कदम पीछे वह चुड़ैल खड़ी थी। इस बार उसका घूँघट नहीं था। उसके बाल ज़मीन पर घिसट रहे थे। उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं। मुँह इतना बड़ा खुला था कि कानों तक फटा हुआ दिखाई दे रहा था।

उसके दाँत इंसानों जैसे नहीं। दरांती की धार जैसे लंबे और टेढ़े थे। लेकिन सबसे भयानक बात उसके दोनों हाथों की उँगलियाँ मिट्टी में धँसी हुई थीं और जैसे किसान फसल उखाड़ता है। वैसे ही वह मिट्टी में धँसे इंसानी शरीरों को एक-एक करके बाहर खींच रही थी।

कोई चीख नहीं रहा था। क्योंकि वे चीखने के लिए ज़िंदा नहीं थे और मरने के लिए पूरी तरह मरे भी नहीं थे। चुड़ैल ने एक लाश को बाहर निकाला। उसके बाल पकड़कर उसे मेरे सामने फेंक दिया। वह आदमी अचानक उठकर बैठ गया।

मैं उसे पहचानता था। वह गाँव का मोहन था। जो तीन साल पहले बिना किसी निशान के गायब हो गया था। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों से लगातार मिट्टी बह रही थी।

वह रोते हुए बोला।

भाग जा….

मरना मत….

मरने से भी बुरा है यहाँ उगना….

इतना कहते ही चुड़ैल ने उसके सिर पर हाथ रखा। अगले ही पल मोहन का पूरा शरीर सूखने लगा। उसकी त्वचा फट गई।

हड्डियाँ टूटने लगीं।

कुछ ही सेकंड में वह फिर से मिट्टी बन गया। चुड़ैल ने वह मिट्टी वापस खेत में बिखेर दी और मुस्कुराकर बोली।

यही मेरी खेती है.…

एक से कई….

कई से पूरा खेत….

मेरे पूरे शरीर में डर की जगह अब सिर्फ़ घबराहट नहीं दहशत भर चुकी थी।

जिसने चुड़ैल को चुनौती दी

मैंने पास पड़ा लोहे का फावड़ा उठाया और पूरी ताकत से चुड़ैल की तरफ़ दौड़ा। जैसे ही फावड़ा उसके शरीर से टकराया। वह धुएँ में बदल गई। मैंने राहत की साँस ली।

लेकिन अगले ही पल वह मेरे पीछे खड़ी थी। उसने मेरी गर्दन पकड़ ली। उसका हाथ बर्फ़ से भी ठंडा था। वह मेरे कान के पास झुककर फुसफुसाई।

इंसान मुझे नहीं मार सकता…. क्योंकि तुम सबने ही मुझे बनाया है….।

इतना कहते ही उसने मुझे हवा में उठाकर खेत के बीच फेंक दिया।मैं ज़मीन पर गिरा और मिट्टी अपने-आप मेरे ऊपर बंद होने लगी।

पहले पैर….

फिर कमर….

फिर सीना….

मैं पूरी ताकत से हाथ चला रहा था। लेकिन मिट्टी पत्थर जैसी सख्त होती जा रही थी। सिर्फ़ मेरा चेहरा बाहर रह गया। ठीक वैसे ही जैसे बाकी लाशों का था। मेरी आँखों के सामने चुड़ैल मुस्कुरा रही थी। उसने मेरे माथे पर अपनी उँगली रखी।

और बोली।

अब तू भी उगेगा…..

आज भी वह खेत खाली नहीं है….

लोग कहते हैं। अगली सुबह गाँव वालों ने खेत में एक नया चेहरा देखा। वह आधा मिट्टी में दबा था। उसकी आँखें खुली थीं और ऐसा लगता था। जैसे वह किसी से मदद माँग रहा हो।वह चेहरा मेरा था। गाँव वालों ने उसे बाहर निकालने की कोशिश नहीं की। क्योंकि जो भी उस खेत में उगी लाश को छूता था।

अगली अमावस्या तक वही उसकी जगह दिखाई देता था। कुछ महीनों बाद सरकार ने उस खेत के चारों ओर ऊँची लोहे की बाड़ लगा दी। एक बोर्ड लगा दिया गया।

यह भूमि अनुपयोगी है। प्रवेश वर्जित।

लेकिन बोर्ड पर किसी ने लाल मिट्टी से एक और लाइन लिख दी थी।

फसल अभी भी उगती है…. बस देखने वाला ज़िंदा नहीं बचता….

THE END |

आज भी बेलवाड़ी के बुज़ुर्ग एक बात ज़रूर कहते हैं। अगर कभी किसी सुनसान खेत में रात के समय तुम्हें ऐसा लगे कि मिट्टी अपने-आप साँस ले रही है या तुम्हारे पैरों के नीचे से किसी के नाखून ज़मीन खुरच रहे हैं। तो वहाँ से भाग जाना। क्योंकि हर खेत में अनाज नहीं उगता।

कुछ खेत…. अपनी चुड़ैल के लिए इंसान उगाते हैं।

अगर जिस खेत में रात को कोई फसल नहीं लाशें उगती थीं ने आपको अंत तक डर और सस्पेंस में बाँधे रखा तो नीचे कमेंट करके अपनी राय ज़रूर बताइए।

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