रात की डरावनी कहानी पढ़ने के शौकीन हैं? तो यह कहानी आपकी नींद उड़ाने के लिए काफ़ी है। बस एक नियम याद रखिए: रात 3 बजे वह दरवाज़ा कभी मत खोलिए।
पुराने मकान में नया घर
कानपुर की एक तंग गली के आख़िरी छोर पर वह दोमंज़िला मकान खड़ा था। दीवारों का पीला रंग उखड़ चुका था, खिड़कियों के पल्ले जंग खाकर टेढ़े हो गए थे और आँगन का नीम इतना झुक आया था, मानो छत पर कुछ ढूँढ रहा हो।
“पूरा मकान सिर्फ़ छह हज़ार में,” रोहन मिश्रा ने पत्नी की ओर देखा। “आजकल इतने में एक कमरा भी नहीं मिलता, नेहा।”
“इसीलिए तो डर लग रहा है,” नेहा ने गोद में सो रही तीन साल की बेटी पीहू को सँभालते हुए कहा। नौ साल का आरव तब तक आँगन के दो चक्कर लगा चुका था।
नौकरी बदलने के बाद से रोहन का बजट वैसे ही तंग था, और मकान मालिक हरिप्रसाद शास्त्री ने पहली ही मुलाक़ात में सौदा पक्का कर दिया था।
मकान मालिक की सख़्त हिदायत
शास्त्री जी की उम्र सत्तर के पार रही होगी। सफ़ेद धोती-कुर्ता, पतली काया और आँखें ऐसी, जैसे बरसों से जागे हुए हों। पहले महीने का किराया लेकर उन्होंने रसीद पर दस्तख़त किए और चाबियों का गुच्छा रोहन को थमा दिया। तब उनकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी लगीं। मकान की चौखट के भीतर उन्होंने पैर तक नहीं रखा।
“सारे कमरे आपके हैं,” वे धीमे स्वर में बोले, “बस ऊपर गलियारे के आख़िर वाला कमरा छोड़कर।”
रोहन ने ऊपर देखा। गलियारे के अंत में काली लकड़ी का एक पुराना दरवाज़ा था। उस पर मोटा, जंग लगा ताला लटक रहा था और ताले में एक लाल धागा बँधा था।
“उस ताले की चाबी मेरे ही पास रहेगी। और एक बात गाँठ बाँध लीजिए,” शास्त्री जी ने रोहन की आँखों में सीधे देखा। “रात के ठीक तीन बजे उस कमरे का दरवाज़ा कभी मत खोलना। अंदर से चाहे कुछ भी सुनाई दे। कुछ भी।”
रोहन हँस पड़ा। “कुछ भी मतलब? भूत-प्रेत?”
बूढ़े चेहरे पर हँसी नहीं आई। उनकी नज़र पहले नेहा पर गई, फिर पीहू पर, और देर तक वहीं टिकी रही। “मतलब वही, जो मैंने कहा। वादा कीजिए।”
“वादा रहा,” रोहन ने बात टालने के लिए कह दिया।
शास्त्री जी लौट गए। गली के मोड़ तक नेहा उन्हें देखती रही। उसे लगा कि उनके चलने पर पैरों की कोई आहट नहीं आई।
पहली कुछ अजीब रातें
पहले तीन-चार दिन सामान जमाने में बीत गए। फिर भी कुछ बातें नेहा को खटकने लगीं। गलियारे के आख़िरी छोर पर सितंबर की उमस में भी ठंड रहती थी। वहाँ से कभी-कभी कच्चे दूध और पुराने कपड़ों की गंध आती थी, जैसी नवजात बच्चों के कमरे में होती है।
चौथे दिन आरव एक काग़ज़ लेकर दौड़ता आया। “मम्मी, मैंने दादाजी की तस्वीर बनाई है।”
काग़ज़ पर क्रेयॉन से सफ़ेद कपड़ों में एक लंबा बूढ़ा बना था। वह काले दरवाज़े के सामने दोनों बाँहें फैलाए खड़ा था, मानो किसी को भीतर रोक रहा हो। दरवाज़े के नीचे आरव ने दो नन्ही उँगलियाँ भी बनाई थीं।
“ये कौन हैं?” नेहा ने पूछा।
“दादाजी रोज़ रात उस दरवाज़े के आगे खड़े रहते हैं। और अंदर वाला भैया मुझसे खेलना चाहता है, पर दादाजी उसे रोक देते हैं।”
नेहा ने हँसकर बात उड़ा दी, पर उस रात उसने पीहू का पालना अपने बिस्तर के पास खिसका लिया। रोहन ने ऊपर जाकर ताला जाँचा। ताला बरसों पुराना था, पर उसमें बँधा लाल धागा बिल्कुल नया लग रहा था, जैसे कल रात ही बाँधा गया हो।
रात 3 बजे की रुलाई
दसवीं रात घड़ी में दो बजकर अट्ठावन मिनट हुए थे, जब नेहा की आँख खुली।
ऊपर की मंज़िल से रोने की आवाज़ आ रही थी। पतली, काँपती, थकी हुई रुलाई, किसी ऐसे बच्चे की, जो घंटों रोते-रोते अपनी आवाज़ खो चुका हो। नेहा ने पालने में झाँका। पीहू गहरी नींद में थी।
“रोहन, उठो! कोई बच्चा रो रहा है।”
रोहन ने करवट बदली। “बिल्ली होगी।”
“बिल्ली ‘मम्मी’ नहीं बोलती।”
घड़ी में ठीक तीन बज चुके थे। और तभी आवाज़ साफ़ हो गई: “मम्मी… मुझे ठंड लग रही है… दरवाज़ा खोलो ना…”
नेहा के भीतर कुछ टूट गया। माँ का दिल तर्क नहीं सुनता। वह नंगे पैर सीढ़ियों की ओर बढ़ी, पर रोहन ने उसकी कलाई थाम ली। “नेहा, शास्त्री जी की बात याद है?”
“वो बच्चा मर जाएगा रोहन! तुम्हें सुनाई नहीं दे रहा?”
“वहाँ कोई बच्चा कैसे हो सकता है? ताला तो बाहर से बंद है!”
तभी सीढ़ियों के पास छोटे-छोटे क़दमों की आहट हुई। वहाँ आरव खड़ा था, पसीने से तर और बेहद शांत।
“मम्मी, मत खोलना। वो भैया नहीं है। दादाजी कहते हैं, वो सिर्फ़ एक आवाज़ है।” उसने धीमे से जोड़ा, “आज दादाजी बहुत थक गए हैं।”
रोहन की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। उसी क्षण रुलाई चीख में बदल गई, इतनी तेज़ कि खिड़कियों के शीशे झनझना उठे। नेहा घुटनों के बल गिरकर बिलख पड़ी। “प्लीज़ रोहन, बस एक बार देख लो…”
रोहन ने ख़ुद को समझाया कि यह सब वहम है। कोई पाइप होगा, कोई पक्षी, या पुराने मकान की कोई चाल। उसने हथौड़ा उठाया और सीढ़ियाँ चढ़ गया। नेहा पीहू को गोद में उठाकर और आरव का हाथ थामकर पीछे-पीछे चढ़ी।
तीन बजकर ग्यारह मिनट पर हथौड़े के दो वार में ताला टूटकर फ़र्श पर जा गिरा। लाल धागा साँप की तरह ज़मीन पर पड़ा रह गया। रुलाई अचानक बंद हो गई, इतनी अचानक कि सन्नाटा कानों में चुभने लगा।
रोहन ने काँपते हाथ से दरवाज़ा धकेला। कब्ज़े चरमराए। नेहा की गोद में पीहू नींद में कुनमुनाई, जैसे किसी ने उसे नाम लेकर पुकारा हो।
कमरा खाली था। धूल से ढका फ़र्श, एक कोने में टूटा हुआ पुराना पालना, छोटी-सी बंद खिड़की और दीवारों पर भीतर से खुरचने के सैकड़ों मिटे हुए निशान। न कोई बच्चा, न कोई बिस्तर, न बाहर निकलने का दूसरा रास्ता।
“देखा?” रोहन ने हाँफते हुए हँसने की कोशिश की। “कुछ भी नहीं है। बस हमारा वहम था।”
नेहा ने राहत की साँस ली। पर आरव की नज़र कमरे पर नहीं थी। वह पीछे, गलियारे के अँधेरे में देख रहा था, जहाँ कुछ देर पहले तक कोई खड़ा था। उसने बहुत धीरे से कहा, “दादाजी चले गए।”
सुबह की सच्चाई
उस रात के बाद रोने की आवाज़ नहीं आई, पर रोहन पूरी रात सो नहीं पाया। सुबह वह रसीद पर लिखे पते पर पहुँचा। उसे शास्त्री जी को ताला टूटने की बात बतानी थी, और शायद माफ़ी भी माँगनी थी। पता पास की ही गली का निकला। दरवाज़ा एक अधेड़ आदमी ने खोला।
“मैं मनोज शास्त्री हूँ। कहिए?”
“मैं हरिप्रसाद जी से मिलना चाहता हूँ। उनके मकान का किराएदार हूँ।”
मनोज का चेहरा स्याह पड़ गया। उसने चुपचाप दीवार की ओर इशारा किया, जहाँ फूलमाला चढ़ी एक तस्वीर टँगी थी। सफ़ेद धोती-कुर्ता, पतली काया, बरसों से जागी हुई आँखें। रोहन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
“पिताजी को गुज़रे चौदह साल हो गए, भाई साहब।”
“नहीं… मैं तो दस दिन पहले ही उनसे मिला था। उन्होंने रसीद काटी थी…” रोहन ने जेब से रसीद निकाली। उस पर दस दिन पुरानी तारीख़ थी और नीचे हरिप्रसाद के दस्तख़त।
मनोज ने रसीद देखी और बहुत देर तक कुछ नहीं बोला। “ये दस्तख़त पिताजी के ही हैं।” फिर उसने धीरे से पूछा, “आपने… कमरा खोला?”
रोहन की चुप्पी ही जवाब थी। मनोज ने आँखें बंद कर लीं।
“मेरा बेटा चिंटू डेढ़ साल का था, जब वह उसी कमरे से रात तीन बजे ग़ायब हो गया। उसकी लाश तक नहीं मिली। उसकी माँ हर रात उस दरवाज़े पर बैठकर रोती थी। फिर एक रात उसे भीतर से चिंटू की आवाज़ सुनाई दी, और उसने दरवाज़ा खोल दिया।” मनोज की आवाज़ भर्रा गई। “उसके बाद वह भी कभी नहीं लौटी। पिताजी उसी रात से हर रात तीन बजे उस दरवाज़े के आगे खड़े होने लगे, और एक रात वहीं खड़े-खड़े चल बसे। पर मरने के बाद भी वे वहाँ से नहीं हटे।”
“लेकिन कमरे में तो कोई नहीं था!” रोहन चीख पड़ा।
“क्योंकि उस कमरे में चिंटू कभी था ही नहीं,” मनोज ने कहा। “जो उसमें बंद है, वह बच्चे की आवाज़ की नकल करता है, और तभी दरवाज़ा खुलवाता है जब कोई माँ-बाप टूट जाए। वह कमरे में रहना नहीं चाहता, भाई साहब। वह कमरे से बाहर निकलना चाहता है। पिताजी चौदह साल उसे वहीं रोके रहे। इसीलिए हर किराएदार से वादा लिया जाता था।”
मनोज ने रोहन की आँखों में देखा। “और दरवाज़ा खुल जाए, तो वह घर के सबसे छोटे बच्चे को चुनता है।”
रोहन को याद आया कि पहली मुलाक़ात में शास्त्री जी की नज़र किस पर टिकी थी। वह बिना कुछ कहे घर की ओर भागा।
और फिर आई वह रात
घर पहुँचकर रोहन ने सब कुछ नेहा को बताया। नेहा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने उसी वक़्त पीहू को सीने से चिपका लिया। दोपहर तक उन्होंने सामान बाँधा और उस मनहूस मकान से निकल गए। रात उन्होंने रोहन के दोस्त के फ़्लैट में बिताई, उस गली से पूरे पाँच किलोमीटर दूर।
नेहा ने पीहू को अपनी बाँहों में कस रखा था। आरव दोनों के बीच दुबका था, और रोहन खुली आँखों से दीवार घड़ी को घूरता बैठा रहा।
तीन बजे। कोई रुलाई नहीं आई। कोई आवाज़ नहीं। रोहन ने लंबी साँस छोड़ी। “देखो नेहा, हम बच गए। वह वहीं रह गया…”
तभी पीहू ने नींद में आँखें खोलीं। उसकी आँखों में न डर था, न आँसू। वह मुस्कुराई, पर उस मुस्कान में तीन साल की मासूमियत नहीं थी।
“पापा,” उसने कहा। आवाज़ भारी थी, किसी बहुत पुराने बच्चे जैसी। “अब ठंड नहीं लग रही।”
नेहा के गले से चीख निकल गई। आरव ने काँपते होंठों से कहा, “दादाजी आज नहीं आए, पापा। उन्होंने कहा था कि दरवाज़ा खुल गया तो वे उसे और नहीं रोक पाएँगे।”
पीहू, जो आज तक हमेशा “मैं पीहू हूँ” कहती आई थी, पहली बार उठकर बैठी और बोली, “अब मैं यहीं रहूँगा।”
कमरे का तापमान तेज़ी से गिरने लगा। और रोहन समझ गया कि जिस आवाज़ से वे भागे थे, वह कभी उस कमरे में क़ैद थी ही नहीं। वह तो बस इंतज़ार कर रही थी कि कोई दरवाज़ा खोले।
उस रात के बाद उस मकान से रात तीन बजे कभी कोई रुलाई सुनाई नहीं दी। क्योंकि जो रोता था, वह अब रो नहीं रहा था। वह जाग रहा था, और उस परिवार के साथ रह रहा था।
आपको यह रात की डरावनी कहानी कैसी लगी? कमेंट में ज़रूर बताइए। और अगली बार रात के तीन बजे अगर कोई बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दे, तो याद रखिए: हर रुलाई किसी बच्चे की नहीं होती।





