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हवेली का इतिहास
आरव ने खुद को समझाया कि यह सब उसका वहम है। हवा पुरानी थी, लकड़ी सड़ी हुई थी… और रात बहुत शांत। ऐसे में कोई भी आवाज़ डरावनी लग सकती है।
लेकिन हवेली की दीवारों में कुछ था — जैसे वे सुन रही हों।
सीढ़ियाँ चढ़ते समय हर कदम के साथ धूल उड़ी। ऊपर का गलियारा लंबा था, दोनों तरफ कमरे। अंत में एक बड़ा दरवाज़ा — दादा का कमरा।
दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर अंधेरा था, लेकिन खिड़की से आती चाँदनी में कमरे की चीज़ें साफ दिख रही थीं — पुरानी लकड़ी की मेज़, अलमारी, और एक बड़ा-सा संदूक।
मेज़ पर एक डायरी रखी थी।
आरव ने उसे उठाया। धूल की मोटी परत थी, जैसे बरसों से किसी ने छुआ न हो। डायरी खोलते ही पहली पंक्ति पढ़कर उसका गला सूख गया।
“अगर यह डायरी तुम्हारे हाथ में है, तो समझ लो कि हवेली ने तुम्हें स्वीकार कर लिया है।”
नीचे हस्ताक्षर थे — रघुवीर सिंह।
आरव का दिल धड़क उठा।
डायरी का पहला पन्ना
“यह हवेली सिर्फ ईंट और पत्थरों की नहीं है। यह जीवित है।
इसे हमने खून से सींचा है… और यह खून मांगती है।”
आरव ने पन्ना पलटा।
“सन 1890 में मेरे परदादा, ठाकुर रणविजय सिंह, ने यह हवेली बनवाई थी। कहा जाता है कि इसके निर्माण के लिए मजदूरों को कम पैसे दिए गए। एक रात, मजदूरों के मुखिया ने विद्रोह किया। अगले दिन वह और उसके पाँच साथी गायब हो गए।”
आरव की उंगलियाँ कांप गईं।
“लोग कहते हैं, उन्हें हवेली की नींव में जिंदा दफना दिया गया।”
कमरे में अचानक ठंडी हवा चली।
खिड़की बंद थी।
फिर भी परदे हिलने लगे।
दूसरा पन्ना
“उनकी औरतें रोती रहीं। उनमें से एक — रूपा — ने हवेली के बाहर खड़े होकर श्राप दिया था।
‘जिस घर की नींव खून पर रखी हो, वह घर कभी शांत नहीं रहेगा।
यह हवेली हर पीढ़ी से एक जान लेगी।’”
आरव ने घबराकर पीछे देखा।
दरवाज़े के पास…
उसे लगा जैसे कोई खड़ा हो।
सफेद साड़ी…
लंबे खुले बाल…
लेकिन पलक झपकते ही कुछ नहीं था।
“यह सब दिमाग का खेल है…” वह बुदबुदाया।
आवाज़
नीचे से अचानक किसी चीज़ के गिरने की तेज आवाज़ आई।
धड़ाम!
आरव ने टॉर्च निकाली और नीचे भागा।
आँगन में पहुँचते ही उसने देखा — दीवार पर लगी एक पुरानी तस्वीर ज़मीन पर टूटी पड़ी थी।
तस्वीर में ठाकुर रणविजय सिंह थे।
लेकिन काँच टूटने के बाद, उनके चेहरे पर खरोंचें ऐसे बनी थीं जैसे किसी ने नाखून से आँखें नोच दी हों।
आरव का गला सूख गया।
उसी समय हवेली की घड़ी, जो बरसों से बंद थी…
अचानक बज उठी।
टन…
टन…
टन…
बारह बार।
मध्यरात्रि।
और जैसे ही बारहवीं घंटी बजी — हवेली के पीछे वाले हिस्से से चीख सुनाई दी।
एक औरत की चीख।
लंबी… दर्द से भरी… और बिल्कुल पास।
आरव डरते हुए पीछे के आँगन की ओर बढ़ा।
वहाँ एक पुराना कुआँ था — जिसे गाँव वाले “रूपा का कुआँ” कहते थे।
कुएँ के पास पहुँचते ही उसे एहसास हुआ कि ज़मीन गीली है।
जैसे अभी-अभी पानी बहा हो।
लेकिन… पानी लाल था।
चाँदनी में चमकता हुआ।
आरव ने काँपते हाथों से कुएँ में झाँका।
अंधेरा।
गहरा।
लेकिन फिर…
नीचे से दो आँखें चमकीं।
और एक फुसफुसाहट आई —
“तुम लौट आए…”
आरव पीछे गिर पड़ा।
और उसी पल, हवेली की सारी खिड़कियाँ एक साथ धड़ाम से बंद हो गईं।
by horrorstory
Wait for Next Part = हवेली जो साँस लेती थी
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