यह कहानी आपको आधी रात के उस सुनसान बस स्टॉप पर ले जाएगी, जहाँ एक रहस्यमयी बस हर अमावस्या को सिर्फ़ एक ज़िंदा यात्री को अपने साथ ले जाती है। आखिर उस बस में बैठी लाल साड़ी वाली औरत कौन थी ? जानिए इस रोंगटे खड़े कर देने वाली Real Horror Story in Hindi में।
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उस बस का कोई नंबर नहीं था…. लेकिन लोग उसे पहचानते थे
उत्तराखंड के पौड़ी ज़िले में एक पहाड़ी सड़क है। दिन में उस रास्ते पर सरकारी बसें, टैक्सियाँ और स्थानीय लोग आते-जाते रहते हैं। लेकिन रात के बारह बजे के बाद वह सड़क लगभग खाली हो जाती है।कारण जंगली जानवर नहीं थे।
न ही सड़क खराब थी। लोग बस….
उस रास्ते पर रुकना नहीं चाहते थे। क्योंकि वहाँ एक पुराना बस स्टॉप था। जिस पर पिछले पच्चीस वर्षों से कोई सरकारी बस नहीं रुकी। फिर भी हर अमावस्या की रात ठीक 12:40 पर….
एक बस वहाँ ज़रूर आती थी। उस बस का कोई रूट नंबर नहीं होता। न आगे गंतव्य लिखा होता। न पीछे परिवहन विभाग का नाम। लेकिन आसपास के गाँवों में हर बच्चा उसे पहचानता था।
पुरानी लाल बस।
जिसकी हेडलाइट हमेशा हल्की पीली जलती थी और जिसकी खिड़कियों के पीछे हमेशा बैठे हुए लोग दिखाई देते थे।
जिस चेतावनी पर मैंने हँस दिया
मेरा नाम राघव मल्होत्रा है। मैं पेशे से मेडिकल रिप्रेज़ेंटेटिव हूँ। 2024 में मेरी पोस्टिंग कोटद्वार से श्रीनगर (गढ़वाल) के बीच थी। काम की वजह से देर रात सफ़र करना मेरी मजबूरी थी।
15 नवंबर की रात लगातार बारिश हो रही थी। मेरी बाइक बीच रास्ते में बंद हो गई। मोबाइल नेटवर्क नहीं था। आसपास कोई घर भी नहीं। करीब आधा किलोमीटर पैदल चलने के बाद मुझे एक पुराना बस स्टॉप दिखाई दिया। उसकी छत टूटी हुई थी।
दीवारों पर काई जमी थी और एक कोने में एक बूढ़ा आदमी कंबल ओढ़े बैठा था। मैंने पूछा।
अंकल….. यहाँ से कोई बस मिलेगी ?
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें अजीब तरह से डरी हुई थीं। समय क्या हुआ है ? मैंने मोबाइल देखा।
12:31 AM
उसने तुरंत खड़े होकर कहा। अगर ज़िंदा रहना है। तो सड़क की तरफ़ पीठ करके खड़े रहो।
मैं हँस पड़ा। क्यों ?
उसने जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा।
अगर पीछे से बस का हॉर्न सुनाई दे….. तो मुड़कर मत देखना।
बारिश और तेज़ हो गई। मैंने सोचा बूढ़ा शायद मानसिक रूप से ठीक नहीं है। तभी दूर कहीं से
पा….ऽऽऽं….
पुराने एयर हॉर्न जैसी आवाज़ आई। सड़क पर कोई रोशनी नहीं थी। लेकिन आवाज़ लगातार पास आ रही थी। बूढ़े ने दोनों कान बंद कर लिए। उसके होंठ काँप रहे थे। वह बार-बार एक ही बात बुदबुदा रहा था।
मत देखना…..
मत देखना…..
मैंने उसकी बात अनसुनी कर दी। धीरे-धीरे पीछे मुड़ा और मेरे शरीर का सारा खून जैसे जम गया।
लाल बस
घने कोहरे को चीरती हुई। एक पुरानी लाल बस मेरी तरफ़ आ रही थी। उसके इंजन की आवाज़ सामान्य नहीं थी। ऐसा लग रहा था। जैसे किसी बूढ़े आदमी की भारी साँसें चल रही हों। बस की हेडलाइट पीली नहीं।
बीमार-सी सफ़ेद थी। सामने नंबर प्लेट नहीं थी। ड्राइवर के ऊपर जहाँ रूट नंबर लिखा जाता है। वहाँ सिर्फ़ काले रंग का खाली बोर्ड था। बस धीरे-धीरे आकर मेरे सामने रुक गई। दरवाज़ा अपने-आप खुला।
छींऽऽऽ….
अंदर हल्की पीली रोशनी जल रही थी। मैंने राहत की साँस ली। कम से कम मुझे लिफ्ट तो मिल जाएगी। मैं बस में चढ़ने ही वाला था कि पीछे बैठे बूढ़े ने पूरी ताकत से चिल्लाया।
मत चढ़ो…. वह तुम्हें घर नहीं ले जाएगी !
मैंने उसकी बात नहीं सुनी। पहला कदम बस की सीढ़ी पर रखा और उसी पल मुझे महसूस हुआ।
बस के अंदर जितने भी लोग बैठे थे…. वे सभी एक साथ मेरी तरफ़ देखने लगे।
लेकिन उनमें से किसी ने भी अपनी गर्दन नहीं घुमाई थी। सिर्फ़ उनकी आँखें धीरे-धीरे मेरी तरफ़ घूमी थीं। मैं वहीं ठिठक गया। तभी अंदर से एक मीठी, लेकिन अजीब आवाज़ आई।
आ जाओ…. तुम्हारे लिए सीट खाली है….
मैंने आवाज़ की दिशा में देखा। बस की सबसे आख़िरी सीट पर लाल साड़ी में एक औरत बैठी थी। उसका घूँघट उसके चेहरे को पूरी तरह ढके हुए था। लेकिन
उसका दायाँ हाथ धीरे-धीरे मेरी तरफ़ इशारा कर रहा था।
बस के अंदर बैठे लोग…. इंसान नहीं थे
मेरे पैर जैसे अपने-आप बस की सीढ़ियाँ चढ़ गए। पीछे मुड़कर देखा। वह बूढ़ा गायब था। बस स्टॉप खाली पड़ा था। जैसे वहाँ कभी कोई बैठा ही न हो। मेरे पीछे बस का दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया।
ठाक….
इतनी ज़ोर से कि पूरा ढाँचा काँप उठा। मैंने ड्राइवर की तरफ़ देखा। उसने सिर पर पुरानी खाकी कैप पहन रखी थी। चेहरा रियर-व्यू मिरर से भी दिखाई नहीं दे रहा था। अजीब बात यह थी।

बस चल रही थी लेकिन उसके दोनों हाथ स्टीयरिंग पर नहीं थे। स्टीयरिंग अपने-आप घूम रहा था। मेरे गले में जैसे कुछ अटक गया। एक दुबला-पतला कंडक्टर मेरी तरफ़ आया। उसने पुरानी वर्दी पहन रखी थी।
जेब पर नाम लिखा था।
मोहन
उसने मेरी तरफ़ टिकट बढ़ाया। मैंने पैसे निकालने चाहे। उसने हाथ रोक दिया। धीरे से मुस्कुराया और बोला।
यहाँ किराया पैसों से नहीं लिया जाता….
मैं कुछ समझ पाता। उससे पहले उसने टिकट मेरी हथेली पर रख दिया। टिकट पूरी तरह गीला था।जैसे अभी-अभी किसी ने उसे पानी से निकाला हो। मैंने उस पर लिखा पढ़ा। ऊपर लिखा था।
यात्री संख्या: 28
नीचे वापसी: उपलब्ध नहीं।
मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। पूरी बस भरी हुई थी। हर सीट पर कोई न कोई बैठा था। लेकिन किसी की भी आँखें नहीं झपक रही थीं। कोई बात नहीं कर रहा था। कोई हिल भी नहीं रहा था।
सिर्फ़ बस का इंजन और बाहर बारिश की आवाज़। बस में एक ही सीट खाली थी।
सबसे आख़िरी।
ठीक उस लाल साड़ी वाली औरत के बगल में। मैंने दूसरी जगह बैठने की कोशिश की। लेकिन जैसे ही किसी सीट के पास जाता। वहाँ बैठा यात्री धीरे-धीरे मेरी तरफ़ अपना सिर घुमा देता।
उनके चेहरे सामान्य नहीं थे। किसी का आधा चेहरा जला हुआ था। किसी की आँखों की जगह सिर्फ़ काले गड्ढे थे। एक आदमी की गर्दन असामान्य रूप से पीछे मुड़ी हुई थी। लेकिन सबसे डरावनी बात वे मुझे देख नहीं रहे थे।
वे मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
लाल साड़ी वाली औरत
मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था। मैं आख़िरी सीट पर जाकर बैठ गया। औरत बिल्कुल स्थिर थी। घूँघट उसके घुटनों तक लटका हुआ था। उसके हाथ में पुरानी काँच की चूड़ियाँ थीं।
लेकिन एक-एक करके वे अपने-आप टूट रही थीं।
टिक….
टिक….
टिक….
हर चूड़ी टूटने पर बस के किसी यात्री के चेहरे पर एक नई दरार उभर जाती। मैंने डरते हुए पूछा।
आप….. कौन हैं ?
कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं आया। फिर घूँघट के अंदर से बहुत धीमी आवाज़ निकली।
मैं आख़िरी यात्री नहीं हूँ…..
…..मैं आख़िरी मंज़िल हूँ। मेरी साँस रुक गई। उसी समय बस की सारी लाइटें एक साथ बुझ गईं। पूरा अंदरूनी हिस्सा अंधेरे में डूब गया। लेकिन मुझे महसूस हो रहा था कि बस में बैठे सभी लोग अब मेरी तरफ़ झुक रहे हैं।
अचानक बस फिर रोशनी से भर गई। अब बाहर का रास्ता बदल चुका था। खिड़की से झाँककर देखा। सड़क गायब थी। चारों तरफ़ घना जंगल था। पेड़ इतने ऊँचे थे कि आसमान दिखाई नहीं दे रहा था। मैंने मोबाइल निकाला।
कोई नेटवर्क नहीं।
GPS बंद।
घड़ी….. 12:40 पर ही रुकी हुई थी।
मतलब बस में चढ़ने के बाद समय आगे बढ़ा ही नहीं था।तभी सामने लगी लोहे की पट्टी पर मेरी नज़र गई। पहले वह खाली थी। अब उस पर सफेद अक्षर उभर रहे थे।
धीरे-धीरे एक-एक करके जैसे किसी ने ताज़े खून से लिखा हो।
अगला पड़ाव – कालवन
मैंने घबराकर कंडक्टर से पूछा। यह कौन-सी जगह है ?
उसने पहली बार मेरी आँखों में देखा और बोला।
जहाँ से कोई लौटकर अपना नाम याद नहीं रखता।
इतना कहकर उसने बस की घंटी बजाई।
टन्न….
और उसी क्षण लाल साड़ी वाली औरत ने धीरे-धीरे अपना घूँघट उठाना शुरू कर दिया। मेरे पूरे शरीर में जैसे जान ही नहीं बची थी। लाल साड़ी वाली औरत ने दोनों हाथों से अपना घूँघट धीरे-धीरे ऊपर उठाया। मैंने नज़रें हटानी चाहीं।
लेकिन हटा नहीं पाया। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अदृश्य ताकत मेरी आँखों को उसी की तरफ़ खींच रही हो। घूँघट पूरी तरह हट गया और मेरी चीख निकल गई। उसका चेहरा था ही नहीं।
जहाँ चेहरा होना चाहिए था। वहाँ सिर्फ़ काले बालों का घना गुच्छा था। लेकिन उन बालों के बीच दर्जनों आँखें खुली हुई थीं छोटी-छोटी लाल जिंदा आँखें।
वे सभी एक साथ मुझे घूर रही थीं। फिर उन बालों के अंदर से एक लंबी, काली जीभ बाहर निकली। उसने मेरे हाथ में पकड़ा टिकट छुआ और टिकट पर लिखा।
यात्री संख्या 28 – स्वीकार किया गया।
उसी पल पूरी बस में बैठे यात्री एक साथ खड़े हो गए और बिना होंठ हिलाए। एक ही आवाज़ में बोले।
एक और आ गया…..
यह बस कब्रिस्तान नहीं….. शिकार ढूँढ़ती थी
मैं दरवाज़े की तरफ़ भागा। लेकिन बस का दरवाज़ा गायब था। जहाँ दरवाज़ा था। वहाँ अब सिर्फ़ लोहे की दीवार थी। खिड़की खोलने की कोशिश की। काँच नहीं टूटा। मैंने पूरी ताकत से लात मारी।
कुछ नहीं हुआ। अचानक ड्राइवर पहली बार बोला। उसकी आवाज़ ऐसी थी। जैसे कई लोग एक साथ बोल रहे हों।
बैठ जाओ….. मंज़िल आने वाली है…..
मैंने चिल्लाकर पूछा। तुम लोग चाहते क्या हो ?
बस में कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा। फिर लाल साड़ी वाली औरत हँसी। वह हँसी इंसानी नहीं थी। ऐसा लग रहा था। जैसे सैकड़ों औरतें एक साथ रो रही हों। उसने कहा।
हर अमावस्या को मुझे एक नया चेहरा चाहिए…. तभी मैं बाकी चेहरों को छोड़ पाती हूँ….
इतना कहते ही बस में बैठे सभी यात्रियों के चेहरे पिघलने लगे। त्वचा नीचे गिरने लगी और हर चेहरे के अंदर उसी औरत का चेहरा था। मैं पागलों की तरह चीखने लगा।
पूरी बस उसी एक डायन से भरी हुई थी। बस अचानक रुक गई। कंडक्टर ने घंटी बजाई।
कालवन आ गया…..
दरवाज़ा खुला। मैं नीचे उतरा। लेकिन बाहर सड़क नहीं थी। घना जंगल था। बीच में एक सूखा बरगद और उसकी हर डाल से लाल चुनरियाँ लटक रही थीं। उन चुनरियों के नीचे मानव खोपड़ियाँ बँधी थीं।
कुछ बिल्कुल नई। कुछ कई साल पुरानी। डायन भी बस से उतर गई। अब उसका चेहरा फिर घूँघट में छिप चुका था। वह बरगद के पास गई और एक खाली डाल की तरफ़ देखने लगी। फिर मेरी तरफ़ मुड़ी।
धीरे से बोली
यह जगह तुम्हारे लिए बचाकर रखी है….
तभी…. मुझे पीछे से वही बूढ़े की आवाज़ सुनाई दी राघव…. नीचे मत देखना। मैंने मुड़कर देखा।
वही बूढ़ा।
लेकिन इस बार उसके सीने में आर-पार लोहे की रॉड घुसी हुई थी। उसने चिल्लाकर कहा यह बस कभी गायब नहीं हुई थी। इसे किसी डायन ने रास्ते में रोक लिया था।
…..ड्राइवर…. कंडक्टर…. और सभी यात्री उसी रात मर गए थे। अब हर अमावस्या पर यह किसी एक ज़िंदा आदमी को अपने साथ जोड़ लेती है।
बूढ़े ने मेरी तरफ़ राख से भरी एक छोटी थैली फेंकी। बरगद की जड़ में फेंक। मैं पूरी ताकत से दौड़ा। डायन मेरी तरफ़ नहीं भागी। वह धीरे-धीरे चल रही थी। लेकिन हर कदम पर वह मेरे और करीब पहुँच जाती।
मैंने राख जड़ में फेंक दी। अगले ही पल पूरा बरगद आग की लपटों में घिर गया। डायन की ऐसी चीख निकली। कि पूरा जंगल काँप उठा। बस के शीशे अपने-आप टूट गए। सभी यात्री धुएँ में बदलने लगे। ड्राइवर की टोपी ज़मीन पर गिर गई।
और पहली बार उसका चेहरा दिखाई दिया। वह चेहरा नहीं। सिर्फ़ एक सफेद खोपड़ी थी। बस धीरे-धीरे राख बनने लगी। मैं भागता रहा। पीछे मुड़कर नहीं देखा।
एक साल बाद….
उस घटना के बाद मैं कभी उस रास्ते पर नहीं गया। लोगों ने कहा। वहाँ अब कोई बस नहीं आती। मैंने राहत की साँस ली। फिर ठीक एक साल बाद अमावस्या की रात मेरे घर के बाहर। पुराने एयर हॉर्न की आवाज़ सुनाई दी।
पा….ऽऽऽं….
मैंने खिड़की से बाहर झाँका। सड़क पर वही लाल बस खड़ी थी। इस बार उसके आगे रूट नंबर लिखा था।
28
ड्राइवर की सीट खाली थी। कंडक्टर भी नहीं था। बस में सिर्फ़ एक यात्री बैठा था। उसने धीरे-धीरे मेरी तरफ़ देखा। मेरे हाथ काँपने लगे। क्योंकि वह यात्री मैं ही था। उसने मुस्कुराकर बस की आख़िरी सीट की तरफ़ इशारा किया।
और उसके बगल में लाल साड़ी वाली डायन फिर से किसी नए यात्री का इंतज़ार कर रही थी। उस रात के बाद मैंने कभी आधी रात के बाद किसी बस की आवाज़ सुनकर खिड़की नहीं खोली। क्योंकि कुछ रास्ते मंज़िल तक नहीं पहुँचाते।
वे सीधे किसी और की दुनिया में ले जाते हैं।
THE END |
कहानी कैसी लगी ?
अगर वह बस जो आधी रात के बाद सिर्फ़ एक ही यात्री को ले जाती थी ने आपको अंत तक डर और सस्पेंस में बाँधे रखा, तो नीचे कमेंट करके अपनी राय ज़रूर बताइए।
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