वह लिफ्ट जो 13वीं मंज़िल के बाद कहीं और ले जाती थी (13th Floor Horror)

नया किराए का घर

शहर में नौकरी लगने के बाद निखिल को सबसे बड़ी परेशानी नौकरी नहीं, बल्कि रहने के लिए एक ठीक-ठाक कमरा ढूँढना था। ऑफिस शहर के पुराने औद्योगिक इलाके में था और उसके आसपास किराए बहुत ज्यादा थे। कई दिनों तक कमरा देखने के बाद आखिरकार उसे शिवलोक रेजिडेंसी में एक फ्लैट पसंद आ गया।

बिल्डिंग लगभग बीस साल पुरानी थी लेकिन बाहर से काफी अच्छी दिखाई देती थी। चौदह मंज़िला इमारत थी। जिसके सामने छोटा-सा पार्क और पीछे पार्किंग थी। निखिल ने जब फ्लैट देखा तो उसे सबसे ज्यादा पसंद उसकी खिड़की आई।

सातवीं मंज़िल के उस फ्लैट से पूरा शहर दिखाई देता था। मकान मालिक ने चाबी देते हुए सिर्फ एक अजीब बात कही थी। एक बात याद रखना।

निखिल ने पूछा क्या ?

बूढ़े मकान मालिक ने लिफ्ट की तरफ देखते हुए कहा अगर कभी लिफ्ट ऊपर जाते-जाते 13 के बाद रुक जाए, तो बाहर मत निकलना।

13 के बाद ? लेकिन इस बिल्डिंग में तो 14 फ्लोर हैं।

मकान मालिक कुछ सेकंड चुप रहा। फिर बोला बस इतना याद रखना कि 13 के बाद जो भी दरवाज़ा खुले…. वहाँ तुम्हें अपना घर नहीं मिलेगा।

निखिल को लगा बूढ़ा आदमी शायद मजाक कर रहा है। उसने बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया। शिवलोक रेजिडेंसी में लिफ्ट के अंदर 1 से 14 तक सभी बटन थे। लेकिन एक अजीब बात थी।

13 नंबर के बटन पर लाल रंग की छोटी-सी पट्टी लगी थी।

उस पर लिखा था।

सेवा हेतु बंद।

निखिल ने पूछा भी था कि 13वीं मंज़िल बंद क्यों है। मकान मालिक ने जवाब दिया था। पुरानी तकनीकी समस्या है। बस। उस रात निखिल अपना सामान लेकर फ्लैट 707 में आ गया। उसे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि अगले कुछ दिनों में उसकी जिंदगी ऐसी जगह पहुँचने वाली थी। जिसका नाम उस बिल्डिंग के किसी नक्शे में भी नहीं था।

लिफ्ट में पहला अजीब अनुभव

शिवलोक रेजिडेंसी में रहने वाले लोग सामान्य थे। सुबह ऑफिस जाने वाले लोग, बच्चों को स्कूल छोड़ने वाले माता-पिता, बुजुर्ग लोग और शाम को पार्क में घूमने वाले लोग। पहले दो दिन निखिल को बिल्डिंग में कुछ भी अजीब नहीं लगा। तीसरे दिन शाम को वह ऑफिस से वापस लौटा। बारिश हो रही थी। उसके हाथ में कुछ सामान था और कपड़े भीग चुके थे। वह लॉबी में आया और लिफ्ट का बटन दबाया।

लिफ्ट नीचे आई। दरवाज़ा खुला। अंदर कोई नहीं था। निखिल ने 7 दबाया। दरवाज़ा बंद हुआ। लिफ्ट ऊपर जाने लगी। तीसरी मंज़िल….

चौथी….

पाँचवीं….

छठी….

फिर अचानक लिफ्ट रुक गई। निखिल ने सोचा शायद किसी ने दूसरी मंज़िल पर बटन दबाया होगा। लेकिन डिस्प्ले पर कोई नंबर नहीं था। सिर्फ एक छोटी-सी क्षैतिज रेखा दिखाई दे रही थी। फिर लिफ्ट बिना किसी आवाज़ के ऊपर जाने लगी।

7

निखिल ने राहत की साँस ली। लेकिन लिफ्ट रुकी नहीं। डिस्प्ले पर 8 आया।

फिर 9।

फिर 10।

निखिल ने तुरंत 7 का बटन दबाया। कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई।

11….

12….

13….

निखिल की उँगली अचानक 14 के बटन पर चली गई। उसने उसे दबाया। बटन जल उठा। लेकिन लिफ्ट 14 पर नहीं रुकी। डिस्प्ले पर कुछ सेकंड के लिए 13 चमका। फिर नंबर गायब हो गया। लिफ्ट ऊपर जाती रही। निखिल के चेहरे से मुस्कान गायब हो गई। उसने लिफ्ट के दरवाज़े के ऊपर देखा। एक हल्की-सी कंपन महसूस हो रही थी। फिर अचानक….

टिंग।

लिफ्ट रुक गई। दरवाज़े खुल गए। सामने एक लंबा गलियारा था। निखिल कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा। गलियारा बिल्कुल सामान्य दिखाई दे रहा था। सफेद दीवारें। छत पर पीली रोशनी। फर्श पर भूरे रंग की टाइलें। दीवार पर अग्निशमन यंत्र। लेकिन कुछ अजीब था। उस गलियारे में कोई फ्लैट नंबर नहीं था।

निखिल ने बाहर कदम रखने की कोशिश की। तभी उसके फोन में नेटवर्क गायब हो गया। लिफ्ट के अंदर का पंखा अचानक तेज आवाज़ करने लगा। उसे मकान मालिक की बात याद आई। 13 के बाद जो भी दरवाज़ा खुले…. वहाँ तुम्हें अपना घर नहीं मिलेगा।

निखिल तुरंत पीछे हट गया। दरवाज़ा बंद हुआ। कुछ सेकंड बाद लिफ्ट नीचे उतरने लगी। जब वह सातवीं मंज़िल पर पहुँचा तो दरवाज़ा खुलते ही निखिल तेजी से बाहर निकल गया। उसने पीछे मुड़कर लिफ्ट को देखा। डिस्प्ले पर सामान्य रूप से 7 लिखा था। जैसे कुछ हुआ ही न हो।

बंद मंज़िल का रहस्य

अगले दिन निखिल ने बिल्डिंग के सिक्योरिटी गार्ड से बात की। गार्ड का नाम महेश था। निखिल ने पूछा महेश जी, इस बिल्डिंग में 13वीं मंज़िल के बाद कोई फ्लोर है क्या ?

महेश ने उसे कुछ सेकंड देखा। क्यों ?

कल लिफ्ट ऊपर चली गई थी। महेश का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।

आप 13 से ऊपर गए थे ?

शायद।

शायद ?

निखिल ने पूरी घटना बताई। महेश चुपचाप सुनता रहा। फिर उसने धीमी आवाज़ में कहा साहब, उस मंज़िल की बात किसी से मत करना।

क्यों ?

क्योंकि वो मंज़िल है ही नहीं। निखिल हँसने की कोशिश करते हुए बोला लेकिन मैंने देखा था। महेश ने सिर हिलाया। देखना और उसका होना…. दोनों अलग बातें हैं। निखिल को यह जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया। उसने पूछा आपको इसके बारे में क्या पता है ?

महेश ने आसपास देखा। लॉबी खाली थी। फिर उसने कहा करीब आठ साल पहले बिल्डिंग में आग लगी थी। आग 13वीं मंज़िल के स्टोर एरिया से शुरू हुई थी।

फिर ?

उसके बाद 13वीं मंज़िल बंद कर दी गई। लेकिन बिल्डिंग तो 14 मंज़िला है।

महेश ने कहा, नहीं।

क्या मतलब ?

असल में 14वीं मंज़िल बाद में बनाई गई थी। निखिल चौंका।

महेश ने आगे बताया।

पहले इस बिल्डिंग की छत 13वीं मंज़िल के ऊपर थी। आग के बाद 13वीं मंज़िल का कुछ हिस्सा तोड़ दिया गया। कई कमरे बंद कर दिए गए। फिर बिल्डिंग के मालिक ने ऊपर एक नया फ्लोर बनवाया। तो 13वीं मंज़िल ?

कागज़ों में है।

असल में ?

महेश ने कोई जवाब नहीं दिया। उसी समय पीछे से किसी ने आवाज़ लगाई।

महेश।

महेश तुरंत दूसरी तरफ चला गया। निखिल वहीं खड़ा रह गया। उसके दिमाग में एक सवाल घूम रहा था।

अगर 13वीं मंज़िल बंद थी तो कल लिफ्ट मुझे उसके ऊपर कहाँ लेकर गई थी ?

कुछ दिन तक निखिल ने उस घटना को भूलने की कोशिश की। वह लिफ्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करने लगा। ऑफिस से लौटकर सीधे फ्लैट में जाता। लेकिन उस घटना के बाद उसके अंदर एक अजीब डर बैठ गया था। खासकर लिफ्ट की घंटी सुनते ही। एक रविवार को बिल्डिंग में बिजली की मरम्मत चल रही थी।

लिफ्ट बंद थी। निखिल नीचे पार्किंग में गया तो उसे महेश एक पुराने स्टोर रूम के बाहर दिखाई दिया। कमरे के अंदर पुराने कागज़ और फाइलें रखी थीं। निखिल ने पूछा ये सब क्या है ?

महेश ने कहा बिल्डिंग के पुराने रिकॉर्ड हैं।

निखिल की नजर एक मोटी फाइल पर पड़ी। उस पर लिखा था।

शिवलोक रेजिडेंसी – लिफ्ट मेंटेनेंस रिकॉर्ड

निखिल ने फाइल खोल ली। पहले कुछ पन्नों पर सामान्य सर्विस रिकॉर्ड थे। फिर उसे आठ साल पुरानी एक रिपोर्ट मिली। उसमें लिखा था कि लिफ्ट ने कई बार अनधिकृत मंज़िल पर रुकने की शिकायत की थी।

निखिल का दिल तेज धड़कने लगा। उसने आगे पढ़ा। एक कर्मचारी ने लिखा था।

लिफ्ट 13 के बाद ऊपर जाती है लेकिन किसी अतिरिक्त फ्लोर का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

दूसरी रिपोर्ट में लिखा था।

दरवाज़ा खुलने पर खाली कॉरिडोर दिखाई देता है। निरीक्षण के लिए अंदर जाना सुरक्षित नहीं।

निखिल ने महेश की तरफ देखा। आपको ये सब पता था ?

महेश चुप रहा।

निखिल ने अगला पन्ना पलटा। वहाँ कुछ नाम लिखे थे। तीन लोगों ने उस मंज़िल को देखने की बात कही थी। उनमें से दो लोगों ने बाद में बिल्डिंग छोड़ दी थी। तीसरे के नाम के आगे लिखा था।

फ्लैट खाली मिला।

निखिल का हाथ रुक गया। ये आदमी कहाँ गया ?

महेश ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा…. आज तक किसी को नहीं पता।

निखिल ने फाइल बंद कर दी। उसे पहली बार लगा कि मकान मालिक की चेतावनी कोई मजाक नहीं थी।

वह दरवाज़ा जो वहाँ नहीं होना चाहिए था

अगले कुछ दिनों तक सब सामान्य रहा। फिर एक शाम निखिल का फ्लैट लॉक नहीं हो रहा था। वह चाबी घुमाता, लेकिन ताला वापस घूम जाता। उसने मकान मालिक को फोन किया। मकान मालिक ने कहा कि अगले दिन ताला बदलवा देगा।

निखिल ने रात को दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया। सुबह उठकर देखा तो दरवाज़ा ठीक था। लेकिन बाहर निकलते ही उसके कदम रुक गए। सामने वाली दीवार पर एक छोटा-सा काला दरवाज़ा था। निखिल ने उसे पहले कभी नहीं देखा था। वह दीवार के बीचोंबीच बना था। उस पर कोई नंबर नहीं था। निखिल ने महेश को बुलाया।

महेश ने दरवाज़े को देखा और उसका चेहरा पीला पड़ गया।

इसे मत खोलना।

ये कहाँ जाता है ?

कहीं नहीं।

तो दरवाज़ा क्यों है ?

महेश ने जवाब नहीं दिया।

निखिल ने हाथ बढ़ाकर हैंडल छू लिया। तभी अंदर से हल्की आवाज़ आई।

ठक…. ठक…. ठक….

दोनों जम गए। अंदर से किसी ने दरवाज़ा नहीं खटखटाया था। आवाज़ दरवाज़े के पीछे से नहीं, बल्कि जैसे दीवार के अंदर से आई थी।

महेश पीछे हट गया।

साहब, चलिए यहाँ से।

निखिल ने पूछा, क्या है अंदर ?

महेश ने कहा। पुरानी 13वीं मंज़िल का हिस्सा।

निखिल ने दरवाज़े को देखा। लेकिन हम तो सातवीं मंज़िल पर हैं। महेश ने कोई जवाब नहीं दिया। कुछ सेकंड बाद दोनों वहाँ से चले गए। लेकिन उसी रात निखिल ने अपने फ्लैट की दीवार के अंदर से वही आवाज़ सुनी।

ठक…. ठक…. ठक….

लिफ्ट फिर ऊपर चली

निखिल ने तय किया कि वह इस बिल्डिंग से चला जाएगा। उसने अगले दिन नया कमरा देखने का फैसला किया। लेकिन जाने से पहले उसे अपना कुछ सामान लेने के लिए ऑफिस से जल्दी लौटना पड़ा। बारिश हो रही थी। लॉबी में सिर्फ निखिल था। लिफ्ट खुली हुई थी। उसने कुछ पल सोचा। फिर अंदर चला गया। उसने 7 दबाया। दरवाज़ा बंद हुआ। लिफ्ट ऊपर जाने लगी।

7 पर पहुँचकर दरवाज़ा खुला। निखिल बाहर निकलने ही वाला था कि लिफ्ट के अंदर से एक आवाज़ आई।

टिंग।

दरवाज़ा फिर बंद हो गया। निखिल ने तुरंत 7 दबाया। कुछ नहीं हुआ। लिफ्ट ऊपर जाने लगी।

8….

9….

10….

निखिल ने सारे बटन दबा दिए। कोई काम नहीं किया।

11….

12….

13….

फिर डिस्प्ले खाली हो गया। इस बार निखिल तैयार था। उसने मोबाइल की रिकॉर्डिंग चालू कर दी। लिफ्ट ऊपर गई।

टिंग।

दरवाज़े खुले। वही गलियारा। लेकिन इस बार वहाँ एक चीज़ बदल चुकी थी। गलियारे के आखिर में एक दरवाज़ा था। दरवाज़े पर लिखा था।

707

निखिल की सांस रुक गई। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ा। दरवाज़े के नीचे से रोशनी बाहर आ रही थी। उसने कान लगाया। अंदर से पंखे की आवाज़ आ रही थी। बिल्कुल उसके फ्लैट जैसी। उसने दरवाज़ा खोल दिया। अंदर उसका घर था।

वही सोफा।

वही टेबल।

वही पर्दे।

वही किताबें।

लेकिन कमरे में एक चीज़ ऐसी थी जो उसकी असली दुनिया में नहीं थी। दीवार पर एक बड़ी घड़ी लगी थी। घड़ी की सुइयाँ नहीं चल रही थीं और उसके नीचे एक कागज़ चिपका था। निखिल ने कागज़ उठाया। उस पर लिखा था।

जिस दिन तुम यह पढ़ोगे, उस दिन तुम्हारा घर खाली हो चुका होगा।

निखिल के हाथ काँपने लगे। तभी पीछे से लिफ्ट के दरवाज़े बंद होने की आवाज़ आई। वह दौड़कर गलियारे में पहुँचा। लिफ्ट गायब थी। जहाँ लिफ्ट होनी चाहिए थी वहाँ सिर्फ दीवार थी। निखिल ने घबराकर आसपास देखा। अब गलियारा पहले से लंबा था। बहुत लंबा और हर कुछ कदम बाद एक ही दरवाज़ा दिखाई दे रहा था।

707..

707..

707..

हर दरवाज़े पर वही नंबर।

13वीं मंज़िल के पीछे छिपा सच

निखिल किसी तरह गलियारे से बाहर निकलने लगा। हर दरवाज़े के पीछे से अलग-अलग आवाज़ें आ रही थीं। कहीं बर्तन गिरने की आवाज़। कहीं पानी बहने की। कहीं बच्चे के हँसने की। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि हर आवाज़ में उसे अपने घर की चीज़ें पहचान में आ रही थीं। एक दरवाज़े के पीछे उसका फोन बज रहा था।

दूसरे के पीछे उसकी माँ की आवाज़ जैसी कोई आवाज़ उसे बुला रही थी। तीसरे के पीछे उसके ऑफिस का प्रिंटर चल रहा था। निखिल ने किसी दरवाज़े को नहीं खोला। वह बस आगे चलता रहा। अचानक उसे दीवार पर एक पुराना बोर्ड दिखाई दिया।

आपातकालीन निकास

उसने दरवाज़ा खोला। सीढ़ियाँ नीचे जा रही थीं। निखिल तेजी से नीचे उतरने लगा।

एक मंज़िल….

दो मंज़िल….

तीन मंज़िल….

लेकिन सीढ़ियों पर मंज़िलों के नंबर नहीं थे। आखिरकार उसे नीचे से रोशनी दिखाई दी। वह बाहर निकला और सामने….

शिवलोक रेजिडेंसी की लॉबी थी।

महेश वहाँ बैठा था। निखिल को देखते ही वह कुर्सी से खड़ा हो गया।

आप कहाँ चले गए थे ?

निखिल ने घड़ी देखी। सिर्फ पंद्रह मिनट बीते थे। लेकिन महेश ने कहा

साहब, आपको गए हुए तीन घंटे हो गए।

निखिल ने फोन देखा।

रिकॉर्डिंग सिर्फ सात मिनट की थी। बाकी समय गायब था। उसने महेश को सब बताया। महेश ने आखिरकार सच स्वीकार कर लिया। आठ साल पहले आग लगने के बाद बिल्डिंग का लिफ्ट सिस्टम बदल दिया गया था। लेकिन पुरानी शाफ्ट पूरी तरह बंद नहीं हुई।

तो ?

लिफ्ट कभी-कभी ऐसी जगह पहुँच जाती है जो असली फ्लोर नहीं है।

वो जगह क्या है ?

महेश ने कहा।

पुरानी मंज़िल का बचा हुआ हिस्सा। निखिल ने पूछा, लेकिन वहाँ मेरे फ्लैट जैसा घर क्यों था ?

महेश ने सिर झुका लिया। क्योंकि वह जगह लोगों की चीज़ों को याद रखती है। निखिल ने उसकी तरफ देखा।

क्या मतलब ?

महेश बोला।

जो लोग वहाँ जाते हैं उनके घर की चीज़ें धीरे-धीरे वहाँ दिखाई देने लगती हैं।

और फिर ?

महेश की आवाज़ धीमी हो गई। फिर यहाँ से गायब होने लगती हैं। निखिल के चेहरे पर डर फैल गया। उसे याद आया कि पिछले कुछ दिनों में उसकी एक पुरानी फोटो अचानक गायब हो गई थी। उसकी माँ की दी हुई एक घड़ी भी नहीं मिल रही थी और उसकी डायरी….

वह भी गायब थी।

निखिल उसी दिन बिल्डिंग छोड़ना चाहता था। लेकिन जब वह फ्लैट 707 में पहुँचा तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। घर में कई चीज़ें गायब थीं। टेबल पर रखा उसका कैमरा नहीं था। बुकशेल्फ में उसकी कुछ किताबें नहीं थीं। दीवार पर लगी तस्वीर गायब थी।

यहाँ तक कि रसोई में रखा एक कप भी गायब था, जिसे वह रोज़ इस्तेमाल करता था। सबसे डरावनी बात उसके फोन की गैलरी से कुछ तस्वीरें भी गायब थीं। निखिल ने मकान मालिक को फोन किया।

मैं आज ही घर खाली कर रहा हूँ। उधर से कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई। फिर मकान मालिक बोला।

बहुत देर हो चुकी है।

क्या मतलब ?

क्या तुम्हारी कोई चीज़ गायब हुई है ?

निखिल ने जवाब नहीं दिया। मकान मालिक समझ गया।

तुम वहाँ गए थे।

हाँ।

तो अब तुम्हें वापस जाना पड़ेगा।

निखिल गुस्से में बोला। मैं कहीं नहीं जा रहा।

मकान मालिक ने कहा। अगर तुम वापस नहीं गए तो जो चीज़ें वहाँ चली गई हैं वे कभी वापस नहीं आएँगी। मुझे फर्क नहीं पड़ता।

तुम्हें पड़ेगा।

फोन कट गया।

उसी समय निखिल की नजर कमरे की दीवार पर पड़ी। वहाँ एक नया कागज़ चिपका था। उस पर लिखा था।

एक चीज़ बाकी है।

निखिल के हाथ से फोन गिर गया।

आखिरी सफर

निखिल ने तय किया कि वह इस बार लिफ्ट के पीछे छिपे रहस्य को खत्म करेगा। लेकिन अकेले नहीं। महेश उसके साथ जाने को तैयार हो गया। दोनों ने लिफ्ट में प्रवेश किया। महेश ने कहा, जो भी हो, वहाँ से कुछ उठाना मत।

क्यों ?

क्योंकि वहाँ की चीज़ यहाँ की नहीं होती। लिफ्ट ऊपर जाने लगी।

7….

8….

9….

10….

11….

12….

13….

इस बार दोनों ने 14 का बटन नहीं दबाया। लिफ्ट खुद ऊपर चली गई।

टिंग।

दरवाज़ा खुला। वही गलियारा। लेकिन इस बार वहाँ कोई दरवाज़ा नहीं था। सिर्फ अंत में एक बड़ा कमरा था। कमरे के अंदर दर्जनों सामान रखे थे।

कपड़े।

घड़ियाँ।

किताबें।

फोटो।

खिलौने।

मोबाइल।

चाबियाँ और ऐसी सैकड़ों चीज़ें जिन्हें देखकर लगता था कि वे अलग-अलग लोगों के घरों से आई हैं।

महेश ने कहा, यही है।

निखिल ने अपनी चीज़ें ढूँढनी शुरू कीं। उसे अपनी पुरानी फोटो मिल गई। फिर डायरी। फिर घड़ी। एक-एक करके उसने सब उठा लिया। लेकिन कमरे के कोने में उसे एक लकड़ी का छोटा डिब्बा दिखाई दिया। उस पर उसका नाम लिखा था।

निखिल

उसने डिब्बा खोला। अंदर उसके फ्लैट की चाबी थी। निखिल ने अपनी जेब टटोली। उसकी असली चाबी वहाँ थी। महेश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

इसे मत छूना।

लेकिन देर हो चुकी थी। डिब्बा खुलते ही पूरे कमरे की रोशनी बुझ गई। अंधेरे में लिफ्ट की घंटी सुनाई दी।

टिंग।

फिर एक आवाज़ आई। सामान ले गए….

आवाज़ किसी इंसान की नहीं थी। वह जैसे कई लोगों की आवाज़ एक साथ मिलकर बोल रही थी। लेकिन चाबी छोड़ गए।

निखिल ने डिब्बा वहीं फेंक दिया। दोनों लिफ्ट की तरफ भागे। दरवाज़ा खुला था। वे अंदर घुसे। महेश ने 7 दबाया। इस बार बटन जल उठा। लिफ्ट नीचे जाने लगी।

13….

12….

11….

10….

9…..

8….

7….

दरवाज़ा खुला। दोनों बाहर निकल आए।

वह मंज़िल जो अब भी मौजूद थी

अगले दिन निखिल ने फ्लैट खाली कर दिया। उसने अपना सामान दूसरे इलाके में शिफ्ट कर लिया। शिवलोक रेजिडेंसी को पीछे छोड़ दिया। कुछ दिनों तक सब सामान्य रहा। फिर एक सुबह उसके नए घर के दरवाज़े पर एक पैकेट पड़ा मिला। कोई नाम नहीं। कोई पता नहीं। अंदर वही लकड़ी का डिब्बा था। निखिल ने उसे देखते ही पहचान लिया।

उसने डिब्बा खोला नहीं। उसे सीधे कूड़ेदान में फेंक दिया। लेकिन अगले दिन डिब्बा फिर उसके घर के बाहर पड़ा था। इस बार उसके ऊपर एक नई पर्ची थी।

13 के बाद रास्ता बंद नहीं होता।

निखिल ने पर्ची जला दी। डिब्बा भी जला दिया। राख कूड़ेदान में फेंक दी। उसे लगा सब खत्म हो गया। करीब एक महीने बाद वह एक नए ऑफिस में काम करने लगा। ऑफिस की बिल्डिंग काफी आधुनिक थी। वहाँ कुल 12 मंज़िलें थीं। एक दिन काम खत्म करने के बाद निखिल लिफ्ट में अकेला था। उसने 12 दबाया। लिफ्ट ऊपर चली।

11….

12….

फिर अचानक डिस्प्ले पर नंबर गायब हो गया। निखिल का चेहरा सफेद पड़ गया। लिफ्ट ऊपर जाने लगी। उसने तुरंत सारे बटन दबाए। कोई बटन काम नहीं कर रहा था। फिर डिस्प्ले पर एक नंबर आया।

13…

निखिल पीछे हट गया। लिफ्ट रुकी।

टिंग।

दरवाज़े खुल गए। सामने कोई गलियारा नहीं था। सामने एक छोटा-सा कमरा था। कमरे के बीच में वही लकड़ी का डिब्बा रखा था और उसके पीछे दीवार पर एक कागज़ चिपका था। निखिल ने दूर से ही पढ़ लिया। उस पर लिखा था।

अब तुम्हें कुछ वापस नहीं करना। अब तुम्हें सिर्फ़ यहाँ रहना है।

लिफ्ट का दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद होने लगा।

निखिल ने बाहर निकलने की कोशिश की। लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए। दरवाज़ा बंद हुआ। डिस्प्ले पर 13 गायब हो गया और लिफ्ट नीचे चली गई। अगले दिन ऑफिस के कर्मचारियों ने निखिल की तलाश की। उसका फोन डेस्क पर था। उसकी बाइक पार्किंग में थी। उसकी जेब में घर की चाबी भी मिली। लेकिन निखिल कहीं नहीं था।

सीसीटीवी में सिर्फ इतना दिखाई दिया कि वह शाम को लिफ्ट में गया था। लिफ्ट 12वीं मंज़िल पर पहुँची। दरवाज़ा खुला। निखिल बाहर नहीं निकला। फिर लिफ्ट कुछ सेकंड बाद नीचे आ गई।

अंदर कोई नहीं था।

कहते हैं, उस ऑफिस की लिफ्ट की मरम्मत के दौरान तकनीशियनों ने उसके ऊपर एक अतिरिक्त खाली जगह देखी। नक्शे में वहाँ कुछ नहीं था। लेकिन लिफ्ट की शाफ्ट में ऊपर जाते हुए एक पुराना दरवाज़ा मिला। दरवाज़े पर धूल जमी थी और उसके ऊपर लाल रंग से सिर्फ एक नंबर लिखा था।

13

दरवाज़ा खोलने पर अंदर एक छोटा कमरा मिला। कमरे में कुछ भी नहीं था। सिर्फ एक लकड़ी का डिब्बा। डिब्बे के अंदर एक चाबी रखी थी और चाबी के नीचे एक कागज़। कागज़ पर कई नाम लिखे थे। सबसे नीचे नया नाम था।

निखिल शर्मा

लेकिन उसके सामने तारीख नहीं लिखी थी। उसकी जगह सिर्फ एक वाक्य था।

जब तक लिफ्ट चलती रहेगी, 13वीं मंज़िल कभी खत्म नहीं होगी।

उसके बाद उस ऑफिस की लिफ्ट को बंद कर दिया गया। लेकिन कई साल बाद भी वहाँ काम करने वाले कुछ लोगों ने एक अजीब बात बताई। कभी-कभी लिफ्ट में अकेले जाते समय डिस्प्ले पर 12 के बाद कुछ सेकंड के लिए 13 दिखाई देता था। दरवाज़ा नहीं खुलता था। लिफ्ट आगे नहीं जाती थी। बस डिस्प्ले पर 13 चमकता था और फिर नीचे एक और नंबर दिखाई देता।

7..

जैसे किसी ऐसी बिल्डिंग का रास्ता अभी भी खुला हो। जहाँ 13वीं मंज़िल के बाद एक ऐसी जगह मौजूद थी। जिसे दुनिया ने कभी बनाया ही नहीं था।

THE END |

आपको यह कहानी कैसी लगी ? कमेंट में जरूर बताइए।

More Horror कहानियां

Leave a Comment