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एक ऐसी हवेली जहाँ जाने वाले लोग वापस तो लौटे….. लेकिन पहले जैसे कभी नहीं रहे
Disclaimer: यह कहानी राजस्थान के एक पुराने इलाके में मौजूद एक रहस्यमयी कोठी से जुड़ी लोककथाओं और डरावनी घटनाओं से प्रेरित है।
काली कोठी
राजस्थान के बाड़मेर जिले से लगभग 30 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गाँव था रतनगढ़। गाँव सामान्य था लेकिन उसकी पहचान किसी मंदिर, झील या किले से नहीं थी। उसकी पहचान थी।
काली कोठी……।
गाँव के बाहर एक ऊँची पहाड़ी पर बनी वह विशाल हवेली। काले पत्थरों से बनी हुई। दिन में भी वह किसी अंधेरे साए जैसी लगती थी। गाँव के बच्चे वहाँ जाने से डरते थे। बुजुर्ग उसका नाम सुनकर चुप हो जाते थे।
और सूरज ढलने के बाद…… कोई भी उस रास्ते की तरफ नहीं जाता था।
मैं बचपन में हर गर्मी की छुट्टियों में रतनगढ़ जाता था। एक रात मैं अपनी दादी के पास बैठा था। बिजली नहीं थी। लालटेन जल रही थी। मैंने पूछा दादी,,, काली कोठी में क्या है………?
उनके चेहरे का रंग बदल गया। उन्होंने तुरंत कहा। उस जगह का नाम भी मत लिया कर।
क्यों…….?
मैंने जिद की। कुछ देर बाद उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा।
क्योंकि वहाँ सिर्फ दीवारें नहीं रहतीं…….। वहाँ कुछ और भी रहता है।
श्राप की शुरुआत
करीब 150 साल पहले उस इलाके में ठाकुर वीरेंद्र सिंह नाम का एक जमींदार रहता था। बहुत अमीर। बहुत शक्तिशाली। लेकिन उससे भी ज्यादा निर्दयी। उसने पहाड़ी पर एक विशाल कोठी बनवाई।
लोग कहते थे कि कोठी के निर्माण में मजदूरों को ज़िंदा दीवारों में चुनवा दिया गया था। ताकि कोई उसका नक्शा चोरी न कर सके। लेकिन असली डरावनी घटना तब हुई……। जब ठाकुर को अमर होने का जुनून चढ़ गया।
एक दिन एक रहस्यमयी तांत्रिक कोठी में आया।
उसने ठाकुर से कहा।
अगर तुम मृत्यु को हराना चाहते हो……..।
तो तुम्हें बहुत बड़ी कीमत चुकानी होगी।
ठाकुर तैयार हो गया। उसके बाद कई महीनों तक हवेली में अजीब अनुष्ठान होते रहे। रात को चीखें सुनाई देती थीं। जानवर गायब होने लगे और धीरे-धीरे…… गाँव के लोग भी।
पहले एक चरवाहा गायब हुआ। फिर दो किसान। फिर एक पूरा परिवार। हर बार आखिरी बार उन्हें काली कोठी के आसपास देखा गया। गाँव में दहशत फैल गई। लेकिन ठाकुर पर किसी का बस नहीं चलता था।
अमावस्या की रात
फिर आई वह रात।
अमावस्या।
पूरा गाँव अंधेरे में डूबा हुआ था। आधी रात के समय पहाड़ी से तेज रोशनी उठी। आकाश लाल हो गया। लोगों ने कोठी से सैकड़ों चीखें सुनीं। फिर अचानक…….. सब शांत हो गया।
अगली सुबह जब गाँव वाले कोठी पहुँचे……. तो वहाँ कोई नहीं था।
न ठाकुर।
न तांत्रिक।
न नौकर।
न पहरेदार।
पूरा भवन खाली था। लेकिन सबसे अजीब चीज़ थी। मुख्य हॉल की दीवार पर खून से लिखा एक वाक्य।
जो यहाँ आएगा……।
वह कभी मुक्त नहीं होगा………।
उस दिन से उस जगह को लोग काली कोठी कहने लगे।
साल 2023।
मैं अब रहस्यमयी घटनाओं पर किताबें लिखता था। दादी का निधन हो चुका था। मैं वर्षों बाद रतनगढ़ लौटा। लेकिन इस बार एक उद्देश्य था। मैं काली कोठी का सच जानना चाहता था।
चेतावनी
गाँव पहुँचते ही मैंने लोगों से बात शुरू की। लेकिन जैसे ही मैं काली कोठी का नाम लेता…… लोग विषय बदल देते।
आखिर एक बुजुर्ग ने कहा।
बेटा, अगर ज़िंदगी प्यारी है तो उस जगह मत जाना।
मैंने पूछा। आज भी कुछ होता है वहाँ……? उन्होंने मेरी आँखों में देखा और बोले…..।
हर अमावस्या को वहाँ रोशनी जलती है।
अगले दिन मैं कैमरा लेकर निकल पड़ा। दोपहर का समय था। तेज़ धूप। लेकिन जैसे-जैसे मैं कोठी के करीब पहुँच रहा था….।
हवा ठंडी होती जा रही थी।
पक्षियों की आवाज़ें गायब थीं। पूरा इलाका अस्वाभाविक रूप से शांत था।
कोठी का विशाल दरवाज़ा आधा टूटा हुआ था। मैं अंदर गया। धूल की मोटी परत। जाले। टूटी हुई खिड़कियाँ। सब कुछ वर्षों से वीरान लग रहा था।
लेकिन फिर……
मुझे एक बात अजीब लगी। फर्श पर ताज़े पैरों के निशान थे। जैसे कोई अभी-अभी वहाँ से गुज़रा हो।
मैं उन निशानों का पीछा करते हुए मुख्य हॉल तक पहुँचा।
तभी…….
मेरे कानों में किसी के बोलने की आवाज़ आई। बहुत धीमी। जैसे कोई फुसफुसा रहा हो। मैंने पीछे देखा।
कोई नहीं।
लेकिन आवाज़ साफ थी।
वापस जाओ……..
मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।
बंद कमरा
हॉल के पीछे एक कमरा था। उस पर भारी लोहे का ताला लगा हुआ था। लेकिन ताले पर जंग नहीं थी। जैसे किसी ने हाल ही में उसे छुआ हो। काफी कोशिश के बाद मैंने दरवाज़ा खोला।
अंदर घुप अंधेरा था।
मैंने टॉर्च ऑन की टॉर्च की रोशनी में मुझे दीवार पर एक पुरानी तस्वीर दिखाई दी। वह ठाकुर वीरेंद्र सिंह की थी। लेकिन तस्वीर देखते ही मेरा दिल रुकने जैसा हो गया।
क्योंकि उसकी आँखें……..
मुझे देख रही थीं। मैं जहाँ जाता……. तस्वीर की नज़र मेरा पीछा करती।
शाम होने लगी थी। मुझे वापस लौट जाना चाहिए था।
लेकिन मेरी जिज्ञासा बढ़ चुकी थी। मैंने तय किया। आज रात यहीं रुकूँगा और यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।
रात के ठीक 12 बजे……. कोठी के अंदर कहीं से घंटी बजने की आवाज़ आई।
टन्न…….
टन्न……
टन्न…….
और उसी के साथ….. ऊपरी मंज़िल पर किसी के चलने की आवाज़ सुनाई दी।
जबकि पूरी कोठी में मेरे अलावा कोई नहीं था… मैं मुख्य हॉल में बैठा रिकॉर्डिंग कर रहा था। तभी ऊपर से कदमों की आवाज़ आने लगी।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई भारी जूते पहनकर धीरे-धीरे चल रहा हो। मैंने टॉर्च उठाई और सीढ़ियों की तरफ बढ़ा। जैसे-जैसे मैं ऊपर जा रहा था…..।
आवाज़ और साफ होती जा रही थी। लेकिन ऊपर पहुँचकर देखा वहाँ कोई नहीं था।
ऊपरी मंज़िल पर एक लंबा गलियारा था। दोनों तरफ पुराने कमरे। ज्यादातर कमरे टूट चुके थे। लेकिन आखिरी कमरे का दरवाज़ा बिल्कुल नया लग रहा था। जैसे किसी ने हाल ही में उसे बदला हो। दरवाज़े पर लाल रंग से एक अजीब चिन्ह बना था। वही चिन्ह जो तांत्रिक विद्या में इस्तेमाल होता है।
कमरा नंबर 13
मैंने दरवाज़ा खोला। अंदर एक विशाल कमरा था। कमरे के बीचों-बीच एक लकड़ी की कुर्सी रखी थी। उस पर धूल नहीं थी। जैसे कोई रोज़ वहाँ बैठता हो। दीवारों पर दर्जनों तस्वीरें टंगी थीं।
मैंने टॉर्च की रोशनी डाली और मेरा दिल धड़कना भूल गया। तस्वीरों में वही लोग थे……। जो पिछले 150 सालों में गायब हुए थे।
चरवाहा…..
किसान…..
पूरा परिवार…..
और कुछ ऐसे चेहरे जिन्हें मैं नहीं पहचानता था।
सबसे नीचे लगी तस्वीर नई थी। इतनी नई कि उसमें रंग भी साफ थे। मैंने उसे गौर से देखा और मेरे हाथ काँपने लगे। वह मेरी तस्वीर थी। मैं उसी कपड़े में था जो उस समय पहने हुए था और तस्वीर के नीचे लिखा था।
अगला निवासी…..।
तभी मेरे पीछे किसी ने धीरे से कहा।
तुम आ ही गए……..।
मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा। कमरे के कोने में एक लंबा आदमी खड़ा था।
काला चोगा।
सफेद चेहरा।
लाल आँखें और उसके होंठों पर अजीब मुस्कान थी।
वह वही तांत्रिक था।
150 साल पुराना रहस्य
तांत्रिक धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ा। उसने कहा।
ठाकुर मरना नहीं चाहता था।
उसने अपनी आत्मा बचाने के लिए सौदा किया था।
मैंने पूछा किससे……..?
उसकी मुस्कान और चौड़ी हो गई।
अंधेरे से……..।
तांत्रिक ने बताया कि अमरता पाने के लिए ठाकुर ने दर्जनों निर्दोष लोगों की बलि दी थी। उनकी आत्माएँ इस कोठी में कैद कर दी गई थीं। हर कुछ वर्षों में नई आत्मा चाहिए होती थी।
ताकि श्राप बना रहे। इसीलिए लोग गायब होते रहे। मैं तेजी से कमरे से बाहर भागा। लेकिन गलियारा बदल चुका था। जहाँ सीढ़ियाँ थीं……..
वहाँ अब दीवार थी। जहाँ खिड़की थी………
वहाँ अंधेरा था। ऐसा लग रहा था जैसे पूरी कोठी जीवित हो गई हो। तभी मुझे किसी लड़की के रोने की आवाज़ सुनाई दी। मैं आवाज़ के पीछे गया। एक छोटे कमरे में लगभग 12 साल की लड़की बैठी थी।
सफेद कपड़े पहने। चेहरे पर आँसू।
कैद आत्मा
उसने बताया कि उसका नाम गौरी था। वह 80 साल पहले गायब हुई थी। लोग समझे थे कि वह कुएँ में गिर गई।
लेकिन असल में……….
उसे कोठी ने निगल लिया था।
गौरी ने कहा।
अगर श्राप खत्म करना है तो तहखाने में जाओ।
वहीं सब शुरू हुआ था।
फिर उसने दीवार पर हाथ रखा और अचानक एक गुप्त दरवाज़ा खुल गया। नीचे जाती पत्थर की सीढ़ियाँ दिखाई दीं। सड़ांध की बदबू आ रही थी। जैसे वर्षों से कुछ सड़ रहा हो। मैं टॉर्च लेकर नीचे उतर गया।
तहखाने में एक विशाल कमरा था। बीच में पत्थर की वेदी (पत्थर के बने अनुष्ठान मंच) बनी हुई थी। चारों तरफ इंसानी कंकाल पड़े थे।
सैकड़ों।
शायद उन सभी लोगों के……. जो वर्षों से गायब हुए थे।
श्राप की किताब
वेदी पर एक काली किताब रखी थी। उसके पन्ने चमड़े जैसे लग रहे थे। जैसे इंसानी त्वचा से बने हों।
किताब के ऊपर लिखा था……….।
मृत्यु-विजय तंत्र….।
जैसे ही मैंने किताब उठाई……. पूरे तहखाने में भूकंप जैसा कंपन शुरू हो गया और मेरे सामने धुएँ से एक आकृति बनने लगी। धीरे-धीरे वह साफ होने लगी। वह ठाकुर वीरेंद्र सिंह था।
उसका चेहरा सड़ा हुआ था। आँखें काली थीं। वह गुर्राया…….
150 साल से मैं इस कोठी का मालिक हूँ।
और अब तुम भी यहीं रहोगे।
अचानक कंकाल हिलने लगे। एक-एक करके खड़े होने लगे। पूरा कमरा हड्डियों की आवाज़ से भर गया। मैं चारों तरफ घिर चुका था।
उसी समय मुझे दादी की कही बात याद आई। एक बार उन्होंने कहा था।
हर श्राप का अंत उसी चीज़ से होता है जिससे उसकी शुरुआत हुई हो।
मैंने किताब की तरफ देखा। श्राप की शुरुआत उसी से हुई थी।
मैंने जेब से लाइटर निकाला। तांत्रिक चीख उठा। ठाकुर गुर्राने लगा। सैकड़ों आत्माएँ एक साथ चिल्लाईं। लेकिन मैंने किताब में आग लगा दी।
जैसे ही किताब जली…….. पूरी कोठी काँपने लगी। दीवारों में दरारें पड़ गईं। तहखाने की जमीन टूटने लगी। चारों तरफ चीखें गूँजने लगीं।
गौरी और बाकी आत्माएँ रोशनी में बदलने लगीं। उनके चेहरे पर पहली बार शांति दिखाई दी। गौरी मुस्कुराई और बोली।
धन्यवाद…….।
तांत्रिक का अंत
तांत्रिक आग में घिर गया। वह चीखता रहा। लेकिन धीरे-धीरे धुएँ में बदल गया और फिर हमेशा के लिए गायब हो गया। ठाकुर ने मुझे पकड़ने की कोशिश की। लेकिन उसका शरीर टूटने लगा।
उसकी आँखों में पहली बार डर दिखाई दिया। कुछ ही सेकंड में वह राख बन गया।
मैं भागकर बाहर आया और जैसे ही पहाड़ी से नीचे पहुँचा……. पूरी काली कोठी भरभराकर गिर गई।
ऐसा लगा जैसे 150 साल पुराना बोझ आखिर खत्म हो गया हो।
अगली सुबह जब गाँव वाले पहुँचे…… तो वहाँ सिर्फ मलबा था। काली कोठी का कोई निशान नहीं बचा था।
मैंने सोचा सब खत्म हो गया। लेकिन कुछ दिनों बाद कैमरे की रिकॉर्डिंग देखते समय…… एक अजीब चीज़ दिखाई दी। कोठी गिरने से ठीक पहले…… ऊपरी मंज़िल की खिड़की में कोई खड़ा था।
मैंने वीडियो ज़ूम किया और मेरा खून जम गया। खिड़की में खड़ा व्यक्ति…….
मैं खुद था। वही कपड़े। वही चेहरा। लेकिन उसकी आँखें पूरी काली थीं।
आज उस घटना को तीन साल हो चुके हैं। काली कोठी अब नहीं है। गाँव में फिर कभी कोई नहीं गायब हुआ। लोग मानते हैं कि श्राप खत्म हो चुका है।
लेकिन कभी-कभी…… रात के सन्नाटे में…… मेरे फोन पर एक फोटो अपने आप आ जाती है। एक टूटी हुई खिड़की की और उसमें खड़ा होता है।
मैं।
काली आँखों के साथ और हर बार फोटो के नीचे सिर्फ एक लाइन लिखी होती है।
श्राप खत्म नहीं हुआ…… उसने नया घर ढूँढ लिया है।
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