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मेरा नाम विवेक है। मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में रहता हूँ। आज जो घटना मैं आपको बताने जा रहा हूँ, वह मेरे जीवन का सबसे डरावना अनुभव है। यह कहानी सुनाने में मुझे कई साल लग गए क्योंकि जो कुछ मेरे साथ हुआ था उसे याद करते ही आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
पहले मुझे भी भूत-प्रेत, आत्माओं और परछाइयों की कहानियों पर विश्वास नहीं था। मैं हर ऐसी बात को अंधविश्वास समझकर हँस देता था। लेकिन एक रात मेरे साथ कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरी पूरी सोच बदल दी।
यह कहानी उस समय की है जब मैं कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश में था।
नई नौकरी और पुराना बंगला
एक दिन मुझे शहर से लगभग 70 किलोमीटर दूर स्थित एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई। फैक्ट्री के पास रहने के लिए मैंने एक पुराना बंगला किराए पर ले लिया। मकान का मालिक बूढ़ा आदमी था। जब उसने मुझे चाबी दी तो अजीब नजरों से देखते हुए बोला।
बेटा, रात को पीछे वाले आंगन में मत जाना। मैं हँस पड़ा। क्यों…….? बूढ़ा कुछ क्षण चुप रहा और बोला। कुछ बातें मजाक नहीं होतीं। मुझे उसकी बात बेकार लगी और मैं बंगले में रहने लगा।
पहली दो रातें सामान्य रहीं। तीसरी रात लगभग 11 बजे बिजली चली गई। मैं मोबाइल की टॉर्च जलाकर पानी पीने उठा। तभी मेरी नजर दीवार पर पड़ी। मेरी टॉर्च की रोशनी थी।
मैं था…..
लेकिन दीवार पर मेरी परछाई नहीं थी। मैं कुछ क्षण के लिए जड़ हो गया। फिर सोचा शायद रोशनी का एंगल गलत होगा। मैंने कई बार टॉर्च घुमाई। लेकिन जहाँ मेरी परछाई दिखनी चाहिए थी वहाँ कुछ नहीं था।
अचानक बिजली वापस आ गई। अब परछाई फिर से दिख रही थी। मैंने राहत की साँस ली। शायद आँखों का भ्रम रहा होगा।
दर्पण का रहस्य

अगली सुबह मैं शेव कर रहा था। अचानक मुझे लगा कि आईने में मेरा प्रतिबिंब एक सेकंड की देरी से हिल रहा है। मैंने हाथ उठाया। आईने वाला विवेक भी हाथ उठाता दिखाई दिया…..
लेकिन थोड़ी देर बाद। मैं घबरा गया। दोबारा कोशिश की। सब सामान्य था। मैंने खुद को समझाया कि शायद नींद पूरी नहीं हुई है। उस रात करीब 2 बजे मेरी आँख खुल गई। कमरे में अजीब सन्नाटा था।
तभी मुझे लगा कोई मेरे बिस्तर के पास खड़ा है। मैंने धीरे से आँखें खोलीं। कोने में एक काला धुंधला आकार दिखाई दे रहा था। उसका चेहरा नहीं था। सिर्फ अंधेरा। मैं उठकर बैठ गया।
वह आकृति गायब हो गई। लेकिन तभी मैंने देखा….. दीवार पर मेरी परछाई अभी भी मौजूद थी। जबकि कमरे में रोशनी नहीं थी। अगले कुछ दिनों तक अजीब घटनाएँ बढ़ती गईं।कभी मेरी परछाई मुझसे अलग दिशा में दिखाई देती।
कभी वह एक सेकंड देर से हरकत करती। कभी वह बिल्कुल स्थिर खड़ी रहती जबकि मैं चल रहा होता। एक शाम मैं बाजार से लौट रहा था। सूरज ढल रहा था। सड़क पर मेरी लंबी परछाई बन रही थी।
लेकिन अचानक मैंने देखा…… मेरी परछाई रुक गई और मैं आगे चलता रहा। मेरे कदम रुक गए। परछाई वहीं खड़ी थी। फिर धीरे-धीरे उसने सिर उठाकर मेरी तरफ देखा। उस पल मेरी चीख निकल गई। आसपास कोई नहीं था। जब मैंने दोबारा देखा तो सब सामान्य था।
पड़ोसी की चेतावनी
मेरे पड़ोस में एक बुजुर्ग महिला रहती थीं।
उन्होंने एक दिन मुझसे पूछा
बेटा, तुम ठीक तो हो….? मैंने पूछा
क्यों ?
उन्होंने कहा तुम्हारा चेहरा हर दिन कमजोर होता जा रहा है। मैंने मजाक में कहा
शायद नौकरी का तनाव होगा। लेकिन वह गंभीर थीं। फिर धीरे से बोलीं
क्या तुमने कभी अपनी परछाई को गौर से देखा है……?
मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। मैंने कुछ नहीं कहा। महिला ने बताया कि कई साल पहले इसी बंगले में एक आदमी रहता था। वह काले जादू का अभ्यास करता था। लोग कहते थे कि वह इंसानों की परछाई चुरा सकता था।
एक दिन वह रहस्यमय तरीके से गायब हो गया। लेकिन उसके बाद कई किरायेदार अजीब हालात में घर छोड़कर चले गए।
परछाई का गायब होना
उस रात मैंने एक प्रयोग किया। मैंने कमरे में तेज बल्ब जलाया। दीवार पर अपनी परछाई देखने लगा। सब सामान्य था। फिर अचानक……
परछाई धीरे-धीरे धुंधली होने लगी। जैसे कोई रबर से मिटा रहा हो। मैं डर के मारे पीछे हट गया। कुछ ही सेकंड में मेरी परछाई पूरी तरह गायब हो गई। कमरे में रोशनी थी। मैं सामने खड़ा था। लेकिन परछाई नहीं थी। मेरे हाथ काँपने लगे।
अगले कुछ दिनों में मेरी हालत खराब होने लगी। भूख खत्म हो गई। शरीर कमजोर होने लगा। रात को डरावने सपने आने लगे। हर सपने में एक काली आकृति दिखाई देती।
वह कहती……….।
अब तुम अधूरे हो चुके हो।
मैं नींद से चीखते हुए उठ जाता। एक दिन ऑफिस में अचानक बेहोश हो गया। डॉक्टरों ने सारे टेस्ट किए। सब सामान्य थे।
लेकिन मेरी ऊर्जा लगातार खत्म हो रही थी।
एक शाम मैं बंगले के स्टोर रूम में गया। वहाँ धूल से ढका एक पुराना बक्सा मिला। उसके अंदर एक डायरी थी। डायरी उसी आदमी की थी जो यहाँ रहता था। उसमें लिखा था………….।
हर मनुष्य की आत्मा का सबसे कमजोर हिस्सा उसकी परछाई होती है।
यदि परछाई को शरीर से अलग कर दिया जाए तो व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी जीवन शक्ति खो देता है।
आगे एक जगह लिखा था। जिस दिन परछाई पूरी तरह स्वतंत्र हो जाएगी उस दिन वह मालिक का स्थान ले लेगी। मेरे हाथ काँपने लगे।
सीसीटीवी का सच
डर के कारण मैंने कमरे में एक कैमरा लगा दिया। अगली सुबह रिकॉर्डिंग देखी। जो मैंने देखा उसे देखकर मेरी साँसें रुक गईं। वीडियो में मैं गहरी नींद में सो रहा था। लेकिन दीवार पर मेरी परछाई धीरे-धीरे अलग हो रही थी।
वह दीवार से नीचे उतरी। फर्श पर चलने लगी और फिर मेरे बिस्तर के पास खड़ी हो गई। करीब पाँच मिनट तक वह मुझे घूरती रही। फिर वापस दीवार में समा गई। मेरे हाथों से मोबाइल गिर गया।
मैंने फैसला किया कि अगले दिन यह घर छोड़ दूँगा। लेकिन शायद बहुत देर हो चुकी थी। उस रात ठीक 3 बजे मेरी आँख खुली। कमरे में अंधेरा था। लेकिन सामने कोई खड़ा था। वह मैं था। बिल्कुल मेरी तरह।
मेरा चेहरा।
मेरी आँखें।
मेरे कपड़े।
सब कुछ वैसा ही। सिवाय एक बात के…… उसकी कोई परछाई नहीं थी। वह मुस्कुराया और बोला। तुम्हारी अब जरूरत नहीं है।
मैं डर के बावजूद भागा नहीं। मैंने पास रखा आईना उठाकर उसकी तरफ फेंका। आईना टूट गया। जैसे ही काँच बिखरा….. उसकी शक्ल बदलने लगी। चेहरा काला पड़ गया। आँखें लाल हो गईं। कमरे में भयानक चीख गूँज उठी।
दीवारों पर दर्जनों परछाइयाँ दिखाई देने लगीं। ऐसा लग रहा था जैसे सैकड़ों लोग मदद के लिए पुकार रहे हों।
अचानक मुझे डायरी की आखिरी लाइन याद आई।
जिस परछाई को दर्पण में उसका वास्तविक रूप दिखा दिया जाए वह अपने बंधन खो देती है।
मैंने कमरे के सारे आईने उसके सामने कर दिए। वह चीखने लगा। उसका शरीर धुएँ में बदलने लगा। कमरा काँपने लगा और फिर…. सब कुछ शांत हो गया।
अगली सुबह
सुबह जब मेरी आँख खुली तो सूरज की रोशनी कमरे में आ रही थी। मैंने घबराकर दीवार की तरफ देखा। मेरी परछाई मौजूद थी। पहले की तरह। मैंने राहत की साँस ली। उसी दिन वह बंगला छोड़ दिया।
कुछ महीनों बाद मैंने पुरानी सीसीटीवी रिकॉर्डिंग फिर से देखी। वीडियो के आखिरी फ्रेम में जब मैं घर छोड़ रहा था……। दीवार पर मेरी परछाई दिखाई दे रही थी। लेकिन एक सेकंड बाद। वह कैमरे की तरफ मुड़ी और मुस्कुराई।
जबकि उस समय मैं कैमरे की तरफ देख भी नहीं रहा था।
आज उस घटना को कई साल हो चुके हैं। मैं सामान्य जीवन जी रहा हूँ। लेकिन कभी-कभी रात में जब कमरे की लाइट जलती है…..। मैं अपनी परछाई को ध्यान से देखता हूँ। क्योंकि मन के किसी कोने में आज भी यह डर मौजूद है कि….. शायद उस रात मेरी असली परछाई वापस नहीं आई थी और जो मेरे साथ रहती है…..। वह कोई और है।
अगर आप रात में यह कहानी पढ़ रहे हैं, तो एक बार अपनी परछाई को ध्यान से ज़रूर देखिए….. कहीं वह आपकी हरकतों से एक पल देर से तो नहीं चल रही ?
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