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बरसात की वो रात आज भी मुझे पूरी तरह याद है। इतनी साफ़, जैसे सब कुछ कल ही हुआ हो।
मेरा नाम राघव है। मैं पंजाब के एक छोटे से कस्बे नूरपुर में पला-बढ़ा हूँ। हमारा कस्बा बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसके आसपास की जगहों के बारे में ऐसी-ऐसी बातें मशहूर थीं कि शाम ढलते ही लोग घरों के दरवाज़े बंद कर लेते थे। उन्हीं जगहों में से एक था पुराना लोहे का पुल, जो कस्बे से थोड़ी दूर सूखी नदी के ऊपर बना हुआ था।
उसे लोग काली पुलिया कहते थे।
दिन में देखने पर वो बस एक टूटा-फूटा, जंग लगा पुल लगता था। जिसके नीचे कभी नदी बहती थी, लेकिन अब ज़्यादातर मौसम में वहाँ सिर्फ कीचड़, झाड़ियाँ और कुछ गहरे गड्ढे ही रह गए थे। पर रात में..… रात में वो पुल कुछ और ही बन जाता था।
लोग कहते थे कि आधी रात के बाद पुल के नीचे से किसी औरत के रोने की आवाज़ आती है। कुछ लोग कहते वो अपने बच्चे को पुकारती है…..।
कुछ कहते वो किसी को नाम लेकर बुलाती है…..।
और कुछ लोग सिर्फ इतना कहते
अगर आवाज़ सुनो, तो पीछे मत जाना।
मैं इन बातों पर कभी यकीन नहीं करता था।
लेकिन उस रात….. मुझे करना पड़ा।
शुरुआत एक फोन कॉल से हुई
यह लगभग सात साल पहले की बात है। मैं तब शहर में नौकरी करता था लेकिन त्योहारों पर अपने कस्बे आया हुआ था। उस दिन शाम से ही मौसम खराब था। तेज़ हवा, बादल, और बीच-बीच में बिजली चमक रही थी। मैं अपने पुराने दोस्त विक्रम से मिलने गया था। हम बचपन से साथ थे। लेकिन कई सालों बाद आराम से बैठकर बातें कर रहे थे।
रात के करीब साढ़े दस बजे मेरा फोन बजा। स्क्रीन पर मेरी छोटी बहन निधि का नाम था। मैंने कॉल उठाई। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
भैया…. पापा की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है। साँस लेने में दिक्कत हो रही है….. डॉक्टर ने दवा लिखी है। लेकिन मेडिकल स्टोर वाले ने कहा कि ये दवा बस हाईवे वाले 24 घंटे खुले मेडिकल पर मिलेगी…..।
मैं एकदम खड़ा हो गया। तू घबरा मत मैं अभी लाता हूँ।
हाईवे वाला मेडिकल हमारे घर से करीब आठ किलोमीटर दूर था। वहाँ पहुँचने का सबसे छोटा रास्ता उसी पुराने पुल से होकर जाता था। दूसरा रास्ता लंबा था। करीब पंद्रह किलोमीटर। बारिश और पापा की हालत देखते हुए मेरे पास सोचने का वक्त नहीं था।
विक्रम ने मेरा चेहरा देखा तो पूछ बैठा क्या हुआ ? मैंने जल्दी-जल्दी बात बताई। उसने तुरंत कहा
मैं भी चलता हूँ।
हम दोनों उसकी पुरानी बाइक पर निकल पड़े। रात गहरी होती जा रही थी। सड़कें लगभग खाली थीं। हवा में मिट्टी और बारिश की मिली-जुली गंध थी। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। जब हम कस्बे से बाहर निकले तो बिजली भी चली गई। अब रास्ते पर बस बाइक की हेडलाइट और आसमान में चमकती बिजली ही रोशनी दे रही थी।
करीब दस मिनट बाद हम काली पुलिया के पास पहुँच गए।
पुल के पास अजीब सन्नाटा

जैसे ही बाइक पुल के करीब पहुँची विक्रम ने अचानक स्पीड धीमी कर दी।
क्या हुआ ? मैंने पूछा।
उसने सामने देखते हुए कहा तुझे कुछ अजीब नहीं लग रहा ?
मैंने ध्यान से सुना। हवा चल रही थी पत्ते हिल रहे थे दूर कहीं मेंढकों की आवाज़ आ रही थी…. लेकिन उसके बीच एक और आवाज़ थी। बहुत हल्की। जैसे कोई….. सिसक रहा हो।
मैंने खुद को समझाया शायद हवा की आवाज़ होगी। हम पुल पर चढ़े ही थे कि बाइक ने अचानक झटका खाया और बंद हो गई। अबे यार ! विक्रम बड़बड़ाया। उसने दो-तीन बार किक मारी पर बाइक स्टार्ट नहीं हुई।
तभी फिर वही आवाज़ आई। इस बार साफ़।
बहुत साफ़।
एक औरत की रोने की आवाज़।
वो आवाज़ पुल के नीचे से आ रही थी। मेरे हाथों में ठंडक उतर गई। मैंने विक्रम की तरफ देखा। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।
तूने सुना ? मैंने फुसफुसाकर पूछा।
उसने बस सिर हिलाया। कुछ सेकंड तक हम दोनों चुप रहे। फिर अचानक रोने की आवाज़ बदल गई। अब वो रोना नहीं था। जैसे कोई बहुत धीमी आवाज़ में किसी को बुला रहा हो।
….राघव…..
मेरा दिल धक् से रुक गया। मैंने तुरंत पीछे मुड़कर देखा कोई नहीं था। पुल खाली था। सिर्फ हम बाइक और नीचे से आती वो आवाज़।
फिर दोबारा
इस बार और साफ़।
राघव.… नीचे आओ…..
मेरी रीढ़ में बर्फ-सी उतर गई। विक्रम ने मेरा हाथ पकड़ लिया। तू नीचे नहीं जाएगा। बिल्कुल नहीं।
लेकिन…. इसने मेरा नाम लिया…. मैंने काँपती आवाज़ में कहा। विक्रम लगभग फुसफुसाया यही तो दिक्कत है। गाँव वाले झूठ नहीं बोलते थे। ये जो भी है…. ये नाम लेकर बुलाती है।
नीचे कोई था.… या कुछ और
हमने मोबाइल की टॉर्च ऑन की और पुल की रेलिंग के पास जाकर नीचे झाँका। नीचे गीली मिट्टी, उगी हुई झाड़ियाँ, और बीच में जमा काला पानी था। पहली नज़र में कुछ नहीं दिखा। लेकिन फिर बिजली चमकी और उसी एक पल की रोशनी में मैंने उसे देखा।
पुल के ठीक नीचे पत्थरों के पास…. एक औरत खड़ी थी।
उसने सफेद नहीं बल्कि मिट्टी और कीचड़ से सनी हल्की नीली साड़ी पहन रखी थी। उसके बाल चेहरे पर चिपके हुए थे। सिर थोड़ा झुका हुआ था। और सबसे डरावनी बात उसके हाथ में एक छोटा-सा लाल रंग का बच्चे का जूता था।
बिजली गई और अंधेरा फिर लौट आया। तूने देखा ? मैंने हाँफते हुए पूछा।
विक्रम ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया। हाँ…. चल यहाँ से ! लेकिन उसी समय नीचे से एक टूटी हुई कराहती आवाज़ आई।
मेरा बच्चा….. मुझे मेरा बच्चा दे दो…..
मेरे कानों में जैसे सीटी-सी बजने लगी। मैंने फिर नीचे देखा। इस बार टॉर्च की रोशनी काँप रही थी और नीचे कुछ भी साफ़ नहीं दिख रहा था। बस वही औरत की आवाज़…. और कीचड़ में जैसे किसी के चलने की छप-छप।
विक्रम बाइक स्टार्ट करने की कोशिश कर रहा था। मैंने जेब से फोन निकाला सिग्नल नहीं और तभी…. मेरे बिल्कुल कान के पास किसी ने बहुत धीरे से कहा।
राघव..…
मैं उछल पड़ा। पीछे मुड़ा। कोई नहीं था। लेकिन अब मुझे यकीन हो गया था कि वो आवाज़ सिर्फ नीचे से नहीं आ रही थी। वो हमारे आसपास थी। पुल पर। हवा में। हमारे पीछे।
पुरानी कहानी जो सच निकली
विक्रम ने किसी तरह बाइक स्टार्ट कर दी लेकिन इंजन बहुत अजीब आवाज़ कर रहा था। हम पुल पार करके थोड़ी दूर पहुँचे ही थे कि उसने बाइक रोक दी। उसका चेहरा ऐसा था जैसे उसे कुछ याद आ गया हो।
राघव….. उसने कहा तुझे सरला की कहानी पता है ?
मैंने सिर हिलाया ….नहीं।
विक्रम बोला बहुत साल पहले इसी पुल के नीचे एक औरत की लाश मिली थी। नाम था सरला। वो पास के गाँव की थी। उसका तीन साल का बेटा भी था। कहते हैं उसका आदमी शराबी था। एक रात दोनों में झगड़ा हुआ। औरत बच्चा लेकर मायके जा रही थी। रास्ते में तूफान आया। सुबह पुल के नीचे उसकी लाश मिली….. लेकिन बच्चा कभी नहीं मिला।
मैं चुप रहा।
लोगों ने कहा कि वो पानी में बह गया होगा विक्रम बोला लेकिन सरला की माँ कहती रही कि बच्चा गायब हुआ है….. बहा नहीं। उसके बाद से जो भी रात में इस पुल से गुजरा उसे कभी औरत के रोने की कभी बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
तो लोग पुलिस के पास नहीं गए ?
गए थे। पर कुछ साबित नहीं हुआ। बस धीरे-धीरे मामला दब गया। फिर लोगों ने रात में उस रास्ते से जाना छोड़ दिया। मैंने उसकी बात बीच में काटी लेकिन उसने मेरा नाम कैसे लिया ?
इस सवाल का जवाब उसके पास भी नहीं था।
दवा लेकर लौटते वक्त असली डर शुरू हुआ
किसी तरह हम मेडिकल स्टोर पहुँचे दवा ली और तुरंत वापस लौटे। मैं जल्दी घर पहुँचना चाहता था लेकिन दिल में एक डर लगातार चिपका हुआ था वापसी में फिर उसी पुल से जाना पड़ेगा।
बारिश अब तेज़ हो चुकी थी। जब हम फिर पुल के पास पहुँचे घड़ी में करीब रात के बारह बज रहे थे। इस बार हमने तय किया कि पुल पार करते समय न नीचे देखेंगे न रुकेंगे। बस सीधे निकल जाएँगे। बाइक पुल पर चढ़ी।
पहला सेकंड…… कुछ नहीं।
दूसरा सेकंड……. हवा और तेज़।
तीसरा सेकंड……
ठक !
जैसे किसी ने बाइक के पीछे ज़ोर से हाथ मारा हो। विक्रम ने घबराकर एक्सीलेटर बढ़ाया। तभी मेरे कंधे पर किसी का हाथ महसूस हुआ। ठंडा..… गीला….. और बेहद भारी।
मैंने चीखकर पीछे देखा। बाइक की पिछली सीट पर मेरे बिलकुल पीछे कोई बैठा था। वही नीली साड़ी। वही भीगे बाल। वही झुका हुआ चेहरा।
मेरे मुँह से आवाज़ ही नहीं निकली। उसकी उंगलियाँ मेरे कंधे पर जकड़ी हुई थीं और उसके दूसरे हाथ में अब भी वही लाल जूता था। फिर उसने धीरे-धीरे अपना चेहरा उठाया। उसकी आँखें….. पूरी तरह काली थीं।
और होंठ हिले।
मेरा बच्चा….. कहाँ है ?
मैं चीखा। विक्रम ने बाइक को इतनी तेज़ दौड़ाया कि हम लगभग फिसलते-फिसलते पुल से बाहर निकले। जैसे ही पुल पीछे छूटा मेरे कंधे का भार अचानक गायब हो गया। मैंने पीछे देखा सीट खाली थी।
लेकिन मेरे कंधे पर कीचड़ भरे पाँच उँगलियों के निशान साफ़ थे।
घर पहुँचने के बाद जो हुआ उसने सब बदल दिया
मैं घर पहुँचा तो माँ और निधि दरवाज़े पर ही खड़ी थीं। मैंने दवा दी पापा को दी गई और उनकी हालत थोड़ी संभली। लेकिन मैं खुद काँप रहा था। माँ ने पूछा क्या हुआ तो मैंने पहले कुछ नहीं बताया। पर जब उन्होंने मेरे कंधे पर कीचड़ के निशान देखे तो उनका चेहरा बदल गया।
तू….. काली पुलिया से आया है ? उन्होंने धीमे से पूछा।
मैंने हाँ में सिर हिलाया। माँ तुरंत अंदर गईं और दादी की पुरानी संदूकची से एक छोटा-सा ताबीज़ निकाल लाई। उसे मेरे हाथ में रखते हुए बोलीं इसे अभी पहन।
मैंने पूछा आपको कैसे पता ?
माँ ने कहा तेरे नाना इसी पुल के बारे में बताते थे। कहते थे… वहाँ सिर्फ एक औरत की आत्मा नहीं है..… वहाँ दो अधूरी मौतें हैं। माँ और बच्चा। लेकिन बच्चा तो मिला ही नहीं था..… मैंने कहा।
माँ ने मेरी आँखों में देखते हुए जवाब दिया। यही तो बात है। जिस चीज़ को मौत भी पूरा नहीं कर पाती वो सबसे ज़्यादा भटकती है। उस रात मैं सो नहीं पाया। जैसे ही आँख लगती मुझे वही औरत दिखती। कभी पुल के नीचे खड़ी कभी घर के आँगन में कभी मेरे कमरे के बाहर और हर बार उसके हाथ में वही लाल जूता होता।
करीब रात के तीन बजे मेरी नींद अचानक खुली। कमरे में कोई था। मैंने उठकर देखा दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। बाहर अँधेरा था। लेकिन उसी अँधेरे में मुझे लगा जैसे कोई लंबी-सी आकृति खड़ी है। फिर वही आवाज़ आई।
राघव….. मेरा बच्चा…..
इस बार आवाज़ घर के बाहर से नहीं मेरे कमरे के अंदर से आई थी।
मैंने घबराकर लाइट ऑन की।
कमरा खाली था। लेकिन मेरी चारपाई के नीचे….. मिट्टी से सना वही लाल जूता पड़ा था।
सच की तलाश
सुबह होते ही मैं और विक्रम सीधे कस्बे के सबसे बुज़ुर्ग आदमी मास्टर हरनाम सिंह के पास पहुँचे। वो रिटायर्ड स्कूल टीचर थे और कस्बे के पुराने मामलों के बारे में बहुत कुछ जानते थे। हमने उन्हें सारी बात बताई आवाज़, औरत, लाल जूता, कंधे के निशान, और जूते का घर तक आ जाना।
उन्होंने बहुत देर तक कुछ नहीं कहा। फिर अलमारी से एक पुरानी फाइल निकाली। उसमें पीले पड़े अखबारों की कतरनें थीं। एक खबर पर उँगली रखते हुए बोले
ये देखो। सरला की मौत के अगले दिन की खबर।
मैंने पढ़ा।
स्थानीय पुल के नीचे महिला का शव बरामद। साथ आया बच्चा लापता। पुलिस को शक महिला की हत्या कर शव फेंका गया।
मैंने सिर उठाया। हत्या……?
मास्टरजी ने कहा हाँ। बाद में मामला दबा दिया गया। क्योंकि शक जिस आदमी पर था वो कोई और नहीं….. सरला का पति देवीलाल था। लेकिन उसके खिलाफ सबूत नहीं मिले।
फिर…..?
फिर एक और बात सामने आई मास्टरजी बोले सरला की माँ कहती थी कि उसकी बेटी घर से भागी नहीं थी। उसे जबरदस्ती ले जाया गया था और बच्चा…. बच्चा ज़िंदा था। मतलब ? विक्रम ने पूछा।
मास्टरजी की आवाज़ और धीमी हो गई। मतलब ये कि सरला मरने से पहले अपने बच्चे को बचाने की कोशिश कर रही थी। शायद उसने बच्चे को कहीं छिपाया या किसी को सौंपा….. लेकिन मर गई। इसलिए उसकी आत्मा आज तक उसी को ढूँढ रही है।
पर वो मुझे ही क्यों बुला रही है ? मैंने पूछा।
मास्टरजी ने मेरे चेहरे को गौर से देखा।
फिर बोले
क्योंकि शायद..… तुम्हारा उससे कोई रिश्ता है।
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
आख़िरी सच
मास्टरजी ने बताया कि मेरी माँ का मायका उसी गाँव में था जहाँ सरला रहती थी। सरला मेरी माँ की दूर की रिश्तेदार थी। और जिस रात उसकी मौत हुई उसने मरने से कुछ घंटे पहले मेरी नानी के घर किसी को संदेश भिजवाया था।
अगर मैं न पहुँचूँ..… तो मेरे बच्चे को बचा लेना।
लेकिन वो संदेश देर से पहुँचा। उस रात जब मैं घर लौटा माँ से सच पूछा। बहुत देर तक वो चुप रहीं फिर रोते हुए बोलीं।
हाँ सरला हमारी रिश्तेदारी में थी। उसकी मौत के बाद कुछ महीनों तक तेरी नानी यही मानती रहीं कि बच्चा ज़िंदा है। उन्होंने बहुत ढूँढा..… पर कुछ नहीं मिला। बाद में सबने बात दबा दी।
मैंने काँपते हुए पूछा तो अब ?
माँ ने कहा अगर वो तुझे बुला रही है..… तो शायद वो चाहती है कि उसका सच बाहर आए। उस रात मैं अकेला नहीं गया। मैं, विक्रम, मास्टरजी और गाँव के दो आदमी मिलकर फिर उसी पुल पर पहुँचे। मेरे हाथ में वो लाल जूता था। रात शांत थी लेकिन हवा असामान्य रूप से ठंडी।
जैसे ही हम पुल के नीचे उतरे मुझे फिर वही रोने की आवाज़ सुनाई दी।
मैंने काँपते हुए कहा अगर तुम सच में अपने बच्चे को ढूँढ रही हो..… तो हम मदद करेंगे। लेकिन हमें बताओ वो कहाँ है। कुछ सेकंड कुछ नहीं हुआ।
फिर अचानक तेज़ हवा चली। झाड़ियों के बीच से जैसे किसी ने इशारा किया हो। हम टॉर्च लेकर उधर बढ़े। वहाँ कीचड़ में आधा धँसा एक पुराना लोहे का संदूक मिला। उसे बाहर निकाला गया। ताला जंग खाया था लेकिन टूट गया।
अंदर कपड़ों का एक बंडल था और उसके बीच
एक छोटे बच्चे की हड्डियाँ।
मेरे हाथ से टॉर्च छूट गई। मास्टरजी ने काँपती आवाज़ में कहा हे भगवान…..।
संदूक में एक पुरानी चाँदी की पायल और एक कपड़े में लिपटा कागज़ भी था। कागज़ लगभग गल चुका था लेकिन कुछ शब्द पढ़े जा सकते थे।
अगर कोई इसे पाए..… मेरे बेटे को इंसाफ़ दिलाना…..
उसके नीचे नाम था।
सरला।
मुझे तभी समझ आया वो बच्चा कभी बहा नहीं था। उसे मारकर पुल के नीचे छिपा दिया गया था।
उस पुकार का अंत
अगले दिन पुलिस आई। पुराने रिकॉर्ड खुले। गाँव के कुछ बुज़ुर्गों ने बयान दिए। बहुत कुछ कानूनी तौर पर साबित तो नहीं हो पाया क्योंकि मामला बहुत पुराना था…. लेकिन कम-से-कम सरला और उसके बच्चे के अवशेषों का अंतिम संस्कार पूरे सम्मान के साथ हुआ।
मैं भी वहाँ था।
जब चिता जली, मुझे लगा जैसे हवा में कोई बहुत धीमी-सी आवाज़ तैर रही हो। रोने की नहीं.…
शुक्रिया की।
उसके बाद से काली पुलिया के बारे में वो आवाज़ें सुनाई देना बंद हो गईं। लोग कहते हैं अब वहाँ उतना डर नहीं लगता। कुछ तो रात में भी निकल जाते हैं। लेकिन मैं आज तक उस रास्ते से अकेला नहीं गया।
क्योंकि कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।
सरला और उसके बच्चे का अंतिम संस्कार होने के दो दिन बाद मैं अपने कमरे में सामान समेट रहा था। तभी मेरी नज़र अलमारी के ऊपर पड़ी। वहाँ..…
धूल के बीच.… वही लाल जूता रखा था। मैंने उसे काँपते हाथों से उठाया। इस बार वो सूखा था। साफ़ था। जैसे कभी कीचड़ में रहा ही न हो और उसके अंदर एक छोटी-सी मुड़ी हुई पर्ची थी।
मैंने उसे खोला। उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी।
अब कोई और नीचे से नहीं पुकारेगा….
उस दिन के बाद वो जूता भी गायब हो गया। मैंने बहुत ढूँढा। माँ ने भी। लेकिन वो कभी नहीं मिला। आज इतने साल बाद भी जब तेज़ बारिश होती है और रात के सन्नाटे में दूर कहीं ट्रेन या हवा की आवाज़ गूँजती है तो मुझे वही पुल याद आता है।
वही काली रात। वही कंधे पर ठंडी उँगलियाँ और वही टूटी हुई आवाज़
मेरा बच्चा.… कहाँ है ?
मैंने जिंदगी में बहुत कहानियाँ सुनी हैं। कुछ बनाई भी हैं। लेकिन ये कहानी मैं कभी बनाना नहीं चाहता था। क्योंकि कुछ आवाज़ें सिर्फ सुनी नहीं जातीं
वो इंसान के अंदर रह जाती हैं।
और अगर कभी आप किसी पुराने पुल के पास से गुजरें….. और नीचे से कोई आपको नाम लेकर पुकारे…. तो एक बात याद रखिएगा।
पीछे मुड़कर मत देखिए।
THE END |
कहानी कैसी लगी ? कमेंट करके ज़रूर बताइए।
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