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बारात जो कभी अपने घर नहीं पहुँची
उत्तर प्रदेश के देवगढ़ गाँव में एक पुरानी कहावत पीढ़ियों से चली आ रही थी।
अमावस्या की रात अगर दूर से शहनाई सुनाई दे…. तो कभी उस रास्ते पर मत जाना।
गाँव वाले कहते थे कि वह किसी शादी की शहनाई नहीं होती। बल्कि….
एक ऐसी बारात की आवाज़ होती है जो पिछले चालीस वर्षों से अपने दूल्हे का इंतज़ार कर रही है।
जो भी उस बारात के पीछे गया। सुबह तक उसका कोई निशान नहीं मिला। कुछ लोग कहते थे कि वे लोग मर गए। कुछ कहते थे कि वे पागल होकर लौटे। लेकिन जिन्होंने उन्हें लौटते देखा।
वे दावा करते थे कि उनकी आँखों में पहले जैसी ज़िंदगी नहीं बची थी।
दिल्ली में रहने वाला राघव, एक खोजी पत्रकार था। उसे ऐसी रहस्यमयी घटनाओं की सच्चाई खोजने का जुनून था। एक दिन उसके ऑफिस में एक पुराना लिफाफा पहुँचा। उसके अंदर सिर्फ़ एक पीली पड़ चुकी शादी की तस्वीर थी।
तस्वीर में एक दूल्हा घोड़ी पर बैठा मुस्कुरा रहा था। उसके पीछे पूरी बारात थी। लेकिन….
तस्वीर के पीछे लाल स्याही से सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
अगर सच जानना है…. तो अगली अमावस्या को देवगढ़ आना।
न कोई नाम….
न कोई पता….
सिर्फ़ यही संदेश।
राघव ने तुरंत तय कर लिया कि वह इस रहस्य की तह तक जाएगा।
देवगढ़ गाँव का डरावना रहस्य
अमावस्या वाले दिन शाम तक राघव देवगढ़ पहुँच गया। गाँव में अजीब-सी खामोशी थी। सूरज अभी पूरी तरह डूबा भी नहीं था। लेकिन लगभग हर घर का दरवाज़ा बंद हो चुका था। लोग जल्दी-जल्दी अपने आँगन में दीपक जलाकर दरवाज़ों पर हल्दी और सिंदूर से कुछ निशान बना रहे थे।
ऐसा लग रहा था जैसे पूरा गाँव किसी अनदेखे खतरे से बचने की तैयारी कर रहा हो। राघव ने एक बुज़ुर्ग से पूछा।
इतनी जल्दी सब घर क्यों बंद कर रहे हैं ?
बूढ़े ने उसकी ओर देखा। फिर उसकी नज़र राघव के कैमरे पर गई।
तुम बाहर से आए हो ?
हाँ।
तो अभी भी समय है। सूरज डूबने से पहले यह गाँव छोड़ दो।
राघव मुस्कुराया। मैं पत्रकार हूँ। भूत-प्रेत पर विश्वास नहीं करता।
बूढ़ा कुछ पल तक चुप रहा। फिर धीरे से बोला। यहाँ किसी को भूत से डर नहीं लगता।
फिर ?
यहाँ लोग….
दूल्हे से डरते हैं।
राघव के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। उसे लगा शायद यह भी किसी लोककथा का हिस्सा होगा। उसी समय गाँव के मंदिर की घंटी अपने आप बज उठी।
टन….
पूरा गाँव जैसे एक पल में ठहर गया। हर घर का दरवाज़ा तुरंत बंद हो गया। बच्चों की आवाज़ें अचानक गायब हो गईं। कुछ ही सेकंड में पूरा गाँव सुनसान हो चुका था। राघव अब अकेला खड़ा था।
गाँव के बाहर उसे एक जर्जर हवेली दिखाई दी। दरवाज़े पर टूटी हुई नेम प्लेट लटक रही थी।

ठाकुर प्रताप सिंह हवेली
राघव अंदर गया। पूरा आँगन धूल से भरा था। दीवारों पर मकड़ी के जाले थे।
लेकिन….
बीच आँगन में रखा एक मंडप बिल्कुल साफ़ था। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे सजाया हो।
सूखे फूलों की मालाएँ….
टूटी हुई अग्निकुंड….
और ज़मीन पर बिखरी हल्दी।
राघव ने कैमरा ऑन किया। उसी समय उसे ऊपर की मंज़िल से पायल की हल्की आवाज़ सुनाई दी।
छन…. छन…. छन….
उसने टॉर्च जलाई और लकड़ी की सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। ऊपर पहुँचते ही एक कमरा आधा खुला मिला। कमरे के अंदर एक पुरानी दुल्हन की लाल चुनरी हवा में धीरे-धीरे हिल रही थी।
जबकि….
कमरे की सारी खिड़कियाँ बंद थीं। राघव ने जैसे ही चुनरी को हाथ लगाया। उसके कानों में किसी लड़की की धीमी आवाज़ गूँजी।
उसे रोक लो…..
राघव घबरा गया।
कौन ?
कोई जवाब नहीं। सिर्फ़….
दूर कहीं से आती शहनाई की धुन जो हर सेकंड पहले से ज़्यादा साफ़ होती जा रही थी।
आधी रात को शुरू हुई भूतिया बारात
शहनाई की आवाज़ हर पल तेज़ होती जा रही थी। राघव हवेली की टूटी खिड़की तक पहुँचा और बाहर झाँका। दूर कच्चे रास्ते पर धुंध के बीच कई लालटेनें धीरे-धीरे उसकी तरफ़ बढ़ रही थीं।
पहले उसे लगा कि शायद गाँव में सचमुच किसी की शादी है। लेकिन अगले ही पल उसका दिल ज़ोर से धड़क उठा। बारात में चल रहे सभी लोग एक जैसी सफेद पोशाक पहने हुए थे। उनके हाथों में जलती मशालें थीं।
लेकिन….
उनके पैरों की कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। इतने लोगों के चलने के बावजूद धूल तक नहीं उड़ रही थी।
सबसे आगे…
एक सफेद घोड़ी पर बैठा दूल्हा था। उसने सुनहरी शेरवानी पहन रखी थी। चेहरे पर सेहरा था और उसके हाथ में लाल गुलाबों का हार। राघव ने कैमरा ज़ूम किया। कैमरे की स्क्रीन पर पूरा रास्ता खाली दिखाई दे रहा था।
न बारात….
न घोड़ी….
न दूल्हा।
उसने कैमरा नीचे किया। बारात वहीं थी। फिर कैमरा ऊपर किया। सब गायब।
उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई।
ये…. कैसे संभव है ?
उसी समय हवेली के नीचे से किसी ने पुकारा।
बारात आ गई….
आवाज़ किसी बूढ़ी औरत की थी। राघव तुरंत नीचे भागा। लेकिन पूरा आँगन खाली था। सिर्फ़ हवा चल रही थी और वही आवाज़ दोबारा आई।
दुल्हन अभी भी उसका इंतज़ार कर रही है…..
आँगन के कोने में रखी एक टूटी संदूक अचानक अपने आप खुल गई। उसके अंदर लाल कपड़े में लिपटी एक पुरानी डायरी रखी थी।
पहले पन्ने पर लिखा था।
मीरा
नीचे तारीख़
18 जुलाई 1986
राघव ने पढ़ना शुरू किया।
आज मेरी शादी है। पूरे गाँव में खुशी का माहौल है। अर्जुन मुझे लेने बारात लेकर आने वाला है।
अगला पन्ना….
शाम हो गई…. लेकिन बारात नहीं पहुँची।
फिर अगला….
रात के बारह बज गए हैं। बाहर शहनाई सुनाई दे रही है…. लेकिन कोई दरवाज़ा नहीं खोल रहा।
फिर….
आखिरी पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था।
जो बारात आई है…. वह इंसानों की नहीं है।
डायरी अचानक राघव के हाथ से गिर गई। पूरी हवेली में किसी औरत के रोने की आवाज़ गूँजने लगी।
धीरे-धीरे वह रोना हँसी में बदल गया।
दूल्हे का असली चेहरा
शहनाई अब हवेली के ठीक बाहर बज रही थी। राघव ने साहस करके मुख्य दरवाज़ा खोला। पूरी बारात हवेली के सामने खड़ी थी। सब बिल्कुल शांत। किसी की आँख भी नहीं झपक रही थी।
घोड़ी पर बैठा दूल्हा धीरे-धीरे नीचे उतरा। उसने एक-एक कदम बढ़ाते हुए हवेली के दरवाज़े तक आना शुरू किया। जैसे-जैसे वह पास आ रहा था। हवा बर्फ जैसी ठंडी होती जा रही थी।
वह दरवाज़े पर आकर रुक गया।
फिर….
उसने अपने हाथ से सेहरा उठाया। राघव की चीख निकल गई। दूल्हे का चेहरा पूरी तरह जला हुआ था। त्वचा जगह-जगह से उखड़ी हुई थी।
लेकिन उसकी आँखें….
पूरी तरह सफेद थीं। बिना पुतलियों के।
वह मुस्कुराया और पहली बार बोला।
दुल्हन कहाँ है….?
राघव कुछ बोल ही नहीं पाया। दूल्हे ने फिर पूछा।
चालीस साल हो गए…. क्या वह अभी भी मेरा इंतज़ार कर रही है ?
तभी ऊपर वाली मंज़िल से लाल दुल्हन का जोड़ा पहने एक लड़की धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरने लगी। उसका चेहरा घूँघट से ढका था। वह बिना आवाज़ किए चल रही थी। दूल्हे ने उसे देखते ही काँपती आवाज़ में कहा।
मीरा….
लड़की ने धीरे-धीरे अपना घूँघट उठाया और उसी पल…. पूरी हवेली में इतनी भयानक चीख गूँजी कि राघव के हाथ से कैमरा छूट गया।
क्योंकि उसके चेहरे पर कोई चेहरा था ही नहीं।
सिर्फ़ काला, अंतहीन अँधेरा और उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
तुम बहुत देर से आए अर्जुन….
उसी क्षण पूरी बारात एक साथ हँसने लगी और हवेली के सभी दरवाज़े अपने आप बंद हो गए।
अधूरी शादी का असली रहस्य
पूरी हवेली में गूँजती वह हँसी किसी इंसान की नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे सैकड़ों लोग एक साथ हँस रहे हों। राघव ने घबराकर पीछे हटना चाहा।
लेकिन….
मुख्य दरवाज़ा पत्थर की दीवार की तरह बंद हो चुका था। उसने पूरी ताकत से उसे धक्का दिया। कोई फायदा नहीं। उसी समय…. दूल्हे अर्जुन की नज़र उस बिना चेहरे वाली दुल्हन पर टिकी हुई थी।
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
मीरा….
मैं वापस आ गया हूँ। दुल्हन धीरे-धीरे मुस्कुराने लगी। लेकिन उसके चेहरे पर होंठ नहीं थे। फिर भी उसकी हँसी पूरे कमरे में गूँज रही थी।
तुम लौटे नहीं हो अर्जुन…. तुम्हें वापस लाया गया है।
राघव ने पहली बार देखा। बारात में खड़े सभी लोगों के चेहरे भी धीरे-धीरे बदलने लगे। किसी की आँखें गायब हो गईं। किसी का आधा चेहरा जला हुआ था। किसी का सिर टेढ़ा था। कुछ लोगों की गर्दनें अस्वाभाविक रूप से पीछे मुड़ी हुई थीं।
अब वह साफ समझ चुका था।
ये इंसान नहीं थे।
अचानक पूरी हवेली उसकी आँखों के सामने बदलने लगी। दीवारों की टूटी ईंटें नई हो गईं।
मंडप फिर से सज गया। सैकड़ों मेहमान दिखाई देने लगे। ढोल-नगाड़े बज रहे थे।
राघव समझ गया। वह अतीत देख रहा था।
शादी का दिन…
18 जुलाई 1986।
मीरा लाल जोड़े में मंडप में बैठी थी। पूरा गाँव खुशी मना रहा था।
उधर अर्जुन घोड़ी पर बारात लेकर गाँव की ओर आ रहा था। लेकिन जैसे ही बारात जंगल के मोड़ पर पहुँची। घोड़ी अचानक रुक गई। चारों तरफ़ अजीब सन्नाटा छा गया। शहनाई अपने आप बंद हो गई।
बारातियों ने देखा… रास्ते के बीचोंबीच एक काली चुनरी ओढ़े बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसने सिर्फ़ एक बात कही।
आज यह शादी नहीं होगी।
सब हँस पड़े। किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। अर्जुन ने घोड़ी आगे बढ़ा दी।
उसी क्षण…
आसमान में भयानक बिजली गिरी। घोड़ी बुरी तरह बिदक गई। पूरी बारात गहरी खाई में गिर गई। कुछ ही सेकंड में….
सब खत्म हो गया। कोई भी ज़िंदा नहीं बचा।
लेकिन….
गाँव तक यह खबर कभी नहीं पहुँची। क्योंकि उसी रात जंगल में कुछ और जाग चुका था।
हर अमावस्या को लौटने का श्राप
अतीत का दृश्य अचानक गायब हो गया। राघव फिर उसी हवेली में खड़ा था। दूल्हा उसकी तरफ़ मुड़ा। इस बार उसकी आँखों में दर्द था।
हम मर चुके थे….।
लेकिन हमें मरने नहीं दिया गया।
किसने ?
राघव ने काँपते हुए पूछा। अर्जुन ने हवेली के पीछे बने पुराने कुएँ की ओर इशारा किया।
वहाँ….
राघव धीरे-धीरे कुएँ तक पहुँचा।
अंदर झाँका।
पहले तो सिर्फ़ अंधेरा दिखाई दिया। फिर नीचे सैकड़ों लाल चूड़ियाँ चमकने लगीं। धीरे-धीरे कुएँ के अंदर से किसी औरत का हाथ बाहर निकला।
फिर दूसरा….
फिर तीसरा….
कुछ ही सेकंड में….
दर्जनों हाथ कुएँ की दीवार पकड़कर ऊपर चढ़ने लगे। उन सभी हाथों में दुल्हन की लाल चूड़ियाँ थीं। राघव पीछे हट गया। तभी कुएँ के भीतर से एक बहुत बूढ़ी आवाज़ आई।
दूल्हा मेरा है….
पूरी हवेली काँप उठी। बारात के सभी भूत एक साथ घुटनों के बल बैठ गए। अर्जुन ने सिर झुका लिया।
यही है….।
श्राप की मालकिन। उसने हमारी आत्माओं को बाँध रखा है।
हर अमावस्या वह मुझे मीरा को लेने भेजती है। लेकिन मीरा तो…..
अर्जुन ने धीरे से कहा मीरा उसी रात मेरा इंतज़ार करते-करते मर गई थी। उसकी आत्मा भी अब मुक्त नहीं हो सकती। उसी समय कुएँ से काले धुएँ का विशाल गुबार निकला। धीरे-धीरे वह एक औरत का रूप लेने लगा।
लंबे बिखरे बाल….
फटी हुई काली साड़ी….
और आँखों की जगह दो जलते हुए अंगारे।
उसने हवेली में कदम रखा। उसकी आवाज़ सुनते ही पूरी बारात काँपने लगी।
आज…
एक और दूल्हा मिलेगा उसकी जलती हुई आँखें सीधे राघव पर टिक गईं और उसने मुस्कुराते हुए कहा।
अब तेरी बारात निकलेगी…..
उसी क्षण राघव ने देखा…
उसके अपने हाथों में धीरे-धीरे सेहरे के सफेद फूल उगने लगे।
और दूर कहीं शहनाई फिर से बज उठी।
श्राप का अंत…. या एक नई शुरुआत ?
राघव के हाथों में उगते सफेद फूल धीरे-धीरे पूरे सेहरे में बदलने लगे। उसके शरीर पर अपने आप सुनहरी शेरवानी दिखाई देने लगी। उसके पैरों के नीचे गुलाब की पंखुड़ियाँ बिखर गईं।
वह घबराकर अपने कपड़े उतारने की कोशिश करने लगा। लेकिन….
शेरवानी उसकी त्वचा का हिस्सा बन चुकी थी। हवेली के बाहर खड़ी सफेद घोड़ी ज़ोर से हिनहिनाई। पूरी भूतिया बारात एक साथ बोली।
दूल्हा तैयार है….
राघव समझ चुका था। अगर उसने कुछ नहीं किया। तो अगली अमावस्या से वही इस श्राप का नया दूल्हा बन जाएगा। उसी समय अर्जुन ने धीरे से राघव का हाथ पकड़ लिया।
श्राप तोड़ने का अभी भी एक तरीका है।
क्या ?
जिसने यह श्राप दिया था…. उसी की शक्ति खत्म करनी होगी। अर्जुन ने फिर कुएँ की ओर इशारा किया। उसकी असली आत्मा अभी भी वहीं कैद है। राघव ने टॉर्च कुएँ के अंदर डाली। इस बार उसे सिर्फ़ हाथ नहीं दिखाई दिए।
नीचे….
पत्थर की दीवार पर एक पुराना तांबे का कलश रखा था। उसके चारों ओर लाल धागे लिपटे थे और कलश के ढक्कन पर राख से बना एक अजीब चिन्ह उभरा हुआ था।
अर्जुन बोला।
उस तांत्रिक ने मरने से पहले अपनी आत्मा उसी कलश में बाँध दी थी। जब तक यह कलश सुरक्षित है…. श्राप कभी खत्म नहीं होगा। लेकिन समस्या यह थी…
कलश तक पहुँचने के लिए उसी कुएँ में उतरना पड़ता। जहाँ सैकड़ों भटकती आत्माएँ कैद थीं।
राघव ने बिना देर किए कुएँ में लटकी पुरानी लोहे की ज़ंजीर पकड़ ली। धीरे-धीरे वह नीचे उतरने लगा। हर पाँच-छह फीट पर तापमान और कम होता जा रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी दूसरी दुनिया में प्रवेश कर रहा हो।
नीचे पहुँचते ही चारों ओर अजीब खामोशी थी।
अचानक….
कुएँ की दीवारों से दर्जनों हाथ बाहर निकल आए। वे उसके पैरों को पकड़ने लगे। कोई उसे नीचे खींच रहा था।
कोई पीछे।
राघव पूरी ताकत से कलश की तरफ बढ़ा।
तभी वही काली साड़ी वाली औरत कुएँ के अंदर प्रकट हुई। अब उसका चेहरा पहले से भी भयावह था।
उसने गुर्राकर कहा।
अगर कलश टूटा…. तो मैं हमेशा के लिए मिट जाऊँगी…..
राघव ने जवाब दिया।
इसीलिए तो इसे तोड़ना है और उसने पूरी ताकत से कलश उठाकर पत्थर पर दे मारा।
धड़ाम….!
कलश हज़ारों टुकड़ों में बिखर गया। अगले ही पल पूरा कुआँ तेज़ सफेद रोशनी से भर गया। काली औरत दर्द से चीखने लगी। उसकी चीख इतनी भयानक थी कि पूरी हवेली काँप उठी।
धीरे-धीरे उसका शरीर धुएँ में बदलने लगा। कुछ ही सेकंड में….
वह पूरी तरह गायब हो गई।
जब भूतिया बारात को मिली मुक्ति
जैसे ही श्राप टूटा। हवेली के बाहर खड़ी पूरी बारात चमकने लगी। एक-एक करके सभी के चेहरे सामान्य हो गए। अब वे किसी भूत की तरह नहीं। साधारण इंसानों की तरह दिखाई दे रहे थे।
अर्जुन ने पहली बार मुस्कुराकर राघव की तरफ देखा।
धन्यवाद….
उसी समय लाल जोड़े में खड़ी मीरा उसके पास आई। अब उसके चेहरे पर कोई अँधेरा नहीं था। वह बिल्कुल वैसी ही थी। जैसी शादी की तस्वीर में दिखाई दे रही थी। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा।
मंदिर की घंटियों जैसी मधुर आवाज़ पूरे वातावरण में गूँजने लगी।
धीरे-धीरे….
पूरी बारात उजाले में बदलकर आसमान की ओर उठने लगी।
कुछ ही पलों में वहाँ कोई नहीं बचा। सिर्फ़ शांत हवा और खाली हवेली।
राघव ने राहत की साँस ली।
उसे लगा सब खत्म हो चुका है।
लेकिन….
असल डर अभी बाकी था।
अगली सुबह……
पूरा गाँव वर्षों बाद उस हवेली के सामने इकट्ठा हुआ। पहली बार अमावस्या के बाद कोई चीख नहीं सुनाई दी थी।
न शहनाई…..
न घोड़ी की आवाज़।
गाँव वालों ने समझ लिया कि श्राप समाप्त हो चुका है। राघव ने पूरी घटना अपनी डायरी में लिखी। उसने शादी की वह पुरानी तस्वीर भी अपने बैग में रख ली। दिल्ली लौटकर उसने इस रहस्य पर लेख प्रकाशित करने का फैसला किया।
लेकिन….
घर पहुँचने के तीन दिन बाद आधी रात को उसके दरवाज़े की घंटी बजी।
टिंग…. टॉन्ग….
उसने दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था। सिर्फ़ एक लाल रंग का शादी का निमंत्रण कार्ड पड़ा था। उस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था।
आप सादर आमंत्रित हैं….
दूल्हा – राघव
विवाह की तिथि – अगली अमावस्या
उसके हाथ काँपने लगे। उसने कार्ड पलटा। पीछे सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी।
कुछ बारातें कभी खत्म नहीं होतीं….
उसी क्षण दूर कहीं से बहुत धीमी शहनाई बजने लगी।
ताऽऽ…. ना…. ना….
राघव खिड़की की ओर भागा। सड़क पूरी तरह खाली थी।
लेकिन सामने लगी स्ट्रीट लाइट के नीचे एक सफेद घोड़ी खड़ी थी। उस पर बैठा दूल्हा धीरे-धीरे अपना सेहरा उठा रहा था। राघव की साँस रुक गई।
क्योंकि उस दूल्हे का चेहरा…. उसी का अपना चेहरा था।
अगली सुबह राघव अपने कमरे में नहीं मिला। कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था। उसकी मेज़ पर सिर्फ़ वही शादी का कार्ड रखा था और उसके नीचे एक नई तस्वीर जिसमें एक भूतिया बारात खड़ी थी।
सबसे आगे….
सफेद घोड़ी पर बैठा नया दूल्हा मुस्कुरा रहा था।
वह कोई और नहीं….
राघव था।
उस दिन के बाद से देवगढ़ गाँव में एक नई कहानी सुनाई जाने लगी। लोग कहते हैं। अगर अमावस्या की रात कहीं दूर से शहनाई सुनाई दे। तो उस आवाज़ का पीछा कभी मत करना।
क्योंकि हो सकता है….
भूतिया बारात अपने अगले दूल्हे की तलाश में निकली हो।
THE END |
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1 thought on “हर अमावस्या को दुल्हन के दरवाज़े पर कौन आता था ?, न्यू हॉरर स्टोरी इन हिंदी”
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