बरसात की आखिरी रात थी।
आसमान में बादल इस तरह गरज रहे थे मानो किसी अनहोनी का ऐलान कर रहे हों। बिजली की चमक हर कुछ सेकंड बाद पूरे गाँव कालीधाम को पलभर के लिए रोशन कर देती और फिर सब कुछ पहले से भी गहरे अंधेरे में डूब जाता।
यह गाँव नक्शे पर तो मौजूद था लेकिन आसपास के लोग सूर्यास्त के बाद इसका नाम तक लेने से डरते थे। डर की वजह गाँव नहीं….
बल्कि गाँव के बाहर पहाड़ी पर बना वह सैकड़ों साल पुराना मंदिर था। एक ऐसा मंदिर जिसके विशाल लकड़ी के दरवाज़े पिछले पचास वर्षों से बंद थे। लेकिन गाँव वाले दावा करते थे कि….
हर अमावस्या की रात…. वह मंदिर अपने आप खुल जाता था।
और जो भी उस रात उसके अंदर गया। वह कभी वापस नहीं लौटा। सरकारी रिकॉर्ड में इस मंदिर का नाम था
कालेश्वर महादेव मंदिर
लेकिन गाँव में कोई उसे इस नाम से नहीं बुलाता था। सबके लिए वह सिर्फ़….
बंद मंदिर था।
दिल्ली से आया आदित्य पेशे से एक इतिहास शोधकर्ता था। उसे पुराने मंदिरों और उनसे जुड़ी लोककथाओं पर रिसर्च करने का शौक था। जब उसने इस मंदिर की कहानी सुनी तो उसे यकीन नहीं हुआ। उसने सोचा….
अगर मंदिर सच में बंद है तो हर अमावस्या को खुलने की बात सिर्फ़ अंधविश्वास होगी।
इसी सोच के साथ वह कैमरा, नोटबुक और रिकॉर्डिंग उपकरण लेकर कालीधाम पहुँच गया। गाँव में कदम रखते ही उसे पहली अजीब बात महसूस हुई। पूरा गाँव असामान्य रूप से शांत था। बच्चे कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे।
दुकानें शाम होने से पहले ही बंद हो चुकी थीं और हर घर के दरवाज़े पर काले धागे में बंधा नींबू-मिर्च लटक रहा था। जैसे पूरा गाँव किसी चीज़ से अपनी रक्षा कर रहा हो। आदित्य सीधे गाँव के सबसे बुज़ुर्ग व्यक्ति रामदयाल काका के घर पहुँचा।
सफेद दाढ़ी, झुकी हुई कमर और काँपते हाथों वाले रामदयाल काका ने जैसे ही सुना कि आदित्य मंदिर देखने आया है। उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
बेटा…. आज कौन-सी तारीख़ है ?
आदित्य ने मोबाइल देखा। आज अमावस्या है।
रामदयाल काका के हाथ से पीतल का गिलास गिर पड़ा। कुछ पल तक कमरे में सन्नाटा छाया रहा। फिर उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा।
अगर जान प्यारी है….। तो सूरज ढलने से पहले यह गाँव छोड़ दो। आदित्य मुस्कुराया। मैं सिर्फ़ मंदिर की तस्वीरें लेने आया हूँ।
बूढ़े ने सिर हिलाया। तस्वीरें तो सब लेना चाहते थे। लेकिन वापस कोई नहीं आया। उन्होंने लकड़ी की अलमारी खोली। उसमें से एक पुरानी, पीली पड़ चुकी तस्वीर निकाली। तस्वीर लगभग तीस साल पुरानी थी।
उसमें पाँच लोग मंदिर के सामने खड़े मुस्कुरा रहे थे। रामदयाल काका ने काँपती उँगली से तस्वीर दिखाई। ये पाँचों उसी रात मंदिर के अंदर गए थे।
फिर ?
आदित्य ने पूछा। बूढ़े की आँखें भर आईं। सुबह मंदिर का दरवाज़ा फिर बंद मिला। लेकिन उनमें से एक भी बाहर नहीं आया।
पुलिस ?
आई थी।
मंदिर खोला ?
खोला।
अंदर क्या मिला ?
रामदयाल काका कुछ सेकंड तक चुप रहे। फिर बेहद धीमी आवाज़ में बोले
अंदर…. कोई नहीं था।
आदित्य की जिज्ञासा और बढ़ गई। मतलब वे लोग गायब हो गए ? बूढ़े ने सिर हिलाया।
नहीं….
गायब नहीं हुए
तो ?
मंदिर ने उन्हें रख लिया। कमरे में अचानक तेज़ हवा चली। खिड़की अपने आप खुल गई। साथ ही बाहर लगे मंदिर के घंटे जैसी आवाज़ पूरे गाँव में गूँज उठी।
टन….
टन….
टन….
आदित्य खिड़की तक दौड़ा। दूर पहाड़ी पर मंदिर साफ दिखाई दे रहा था। उसके विशाल लकड़ी के दरवाज़े अब भी बंद थे।
लेकिन….
दरवाज़े के नीचे से हल्की नारंगी रोशनी बाहर निकल रही थी। रामदयाल काका की आवाज़ पीछे से आई।
सूरज डूब चुका है
उन्होंने काँपते हुए कहा।
अब वह जाग चुका है।
आदित्य ने फिर पहाड़ी की तरफ देखा। इस बार उसे साफ दिखाई दिया। मंदिर के सामने कोई खड़ा था।
सफेद धोती पहने….
नंगे पैर….
और वह बिना हिले….
सीधे उसकी तरफ देख रहा था।
आदित्य कुछ पल तक उस सफेद कपड़े पहने व्यक्ति को देखता रहा। बारिश की हल्की बूँदें लगातार गिर रही थीं।
बिजली चमकी….
और पूरा पहाड़ एक पल के लिए रोशनी से भर गया। लेकिन अगले ही सेकंड वह आदमी गायब था। जैसे वहाँ कभी कोई था ही नहीं। तुमने उसे देख लिया। रामदयाल काका की आवाज़ काँप रही थी।
किसे ?
मंदिर के पहले पुजारी को….
आदित्य ने हँसते हुए कहा। शायद कोई गाँव वाला होगा। बूढ़े ने उसकी आँखों में देखा। बेटा उस पुजारी की मौत सन् 1974 में हो चुकी थी। कमरे में फिर सन्नाटा छा गया। आदित्य ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने अपना कैमरा उठाया और मंदिर की ओर चल पड़ा। पीछे से रामदयाल काका चिल्लाते रहे। रात बारह बजे से पहले लौट आना।
बारह के बाद मंदिर इंसानों का नहीं रहता
लेकिन आदित्य रुकने वाला नहीं था।

पहाड़ी तक पहुँचने में लगभग बीस मिनट लगे। जैसे-जैसे वह ऊपर चढ़ रहा था। वैसे-वैसे अजीब बातें होने लगीं। पहले उसका मोबाइल नेटवर्क गायब हुआ। फिर GPS बंद हो गया। कुछ देर बाद
उसकी डिजिटल घड़ी रुक गई। समय वहीं अटक गया।
11:47 PM
उसने घड़ी उतारकर जेब में रख ली। नमी की वजह से होगा। उसने खुद को समझाया। मंदिर अब बिल्कुल सामने था। करीब तीस फीट ऊँचा विशाल पत्थर का प्रवेश द्वार जिस पर काई जम चुकी थी।
दीवारों पर प्राचीन मूर्तियाँ उकेरी हुई थीं।
लेकिन….
हर मूर्ति का चेहरा किसी ने जानबूझकर तोड़ दिया था। एक भी चेहरा पूरा नहीं बचा था। यह देखकर आदित्य हैरान रह गया। इतिहास में ऐसा तभी होता था। जब किसी जगह को शापित मान लिया जाता था।
उसने कैमरा ऑन किया।
दोस्तों….
मैं इस समय कालीधाम के उस मंदिर के सामने खड़ा हूँ जिसके बारे में कहा जाता है कि यह हर अमावस्या की रात अपने आप खुलता है…”
रिकॉर्डिंग जारी थी। उसी समय….
मंदिर के अंदर से घंटी बजने की आवाज़ आई।
टन….
आदित्य रुक गया। फिर दूसरी घंटी।
टन….
फिर तीसरी।
टन….
उसने दरवाज़े को ध्यान से देखा। दरवाज़ा अब भी बंद था। अंदर कोई कैसे हो सकता था।
तभी लकड़ी के दोनों विशाल दरवाज़े अपने आप काँपने लगे।
घर्ररर….
धीरे-धीरे…. सदियों पुरानी लकड़ी की चरमराहट के साथ दरवाज़े खुलने लगे। आदित्य का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने कैमरा मजबूती से पकड़ लिया। कुछ ही सेकंड में मंदिर का प्रवेश द्वार पूरी तरह खुल चुका था।
अंदर गहरा अंधेरा था। लेकिन गर्भगृह की दिशा से हल्की नीली रोशनी आ रही थी।
उसी समय…..
उसके पीछे किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
अंदर जाने से पहले….. जूते उतार दो।
आदित्य ने तुरंत पीछे देखा। वही सफेद धोती पहना बूढ़ा पुजारी उसके पीछे खड़ा था।
लंबी सफेद दाढ़ी….
झुकी कमर….
लेकिन उसके पैर ज़मीन को छू ही नहीं रहे थे। वह हवा में कुछ इंच ऊपर खड़ा था। आदित्य की साँस अटक गई। उसने कैमरा उस तरफ घुमाया।
स्क्रीन पर….
कोई नहीं था। लेकिन अपनी आँखों से वह बूढ़े को साफ देख सकता था। पुजारी मुस्कुराया।
कैमरे.. हमें नहीं देखते।
इतना कहकर वह धीरे-धीरे मंदिर के अंदर चला गया। आदित्य कुछ पल वहीं खड़ा रहा। उसे पहली बार डर महसूस हुआ। लेकिन अब लौटना उसकी आदत में नहीं था।
उसने जूते उतारे….
टॉर्च जलाई….
और मंदिर के अंदर कदम रख दिया। अंदर का दृश्य देखकर उसकी आँखें फैल गईं। मंदिर बाहर से जितना पुराना दिखता था। अंदर उतना ही साफ था। फर्श चमक रहा था। दीपक जल रहे थे।
ताज़े फूल चढ़े हुए थे। अगर कोई कहता कि यहाँ रोज़ पूजा होती है। तो वह यकीन कर लेता। लेकिन सबसे अजीब बात अभी बाकी थी। पूरे मंदिर में एक भी इंसान नहीं था।
फिर भी….
उसे साफ सुनाई दे रहा था।
ॐ नमः शिवाय…..
दर्जनों लोगों का सामूहिक मंत्रोच्चार। आवाज़ हर तरफ से आ रही थी। लेकिन कोई दिखाई नहीं दे रहा था। आदित्य धीरे-धीरे गर्भगृह की ओर बढ़ा। जैसे ही वह मुख्य शिवलिंग के सामने पहुँचा।
उसकी टॉर्च अपने आप बंद हो गई। साथ ही मंदिर के सारे दीपक एक साथ बुझ गए। पूरा मंदिर घने अंधेरे में डूब गया और उसी अंधेरे में सैकड़ों लोगों के एक साथ साँस लेने की आवाज़ गूँजने लगी।
जैसे….
वह अचानक अकेला नहीं रहा हो। उसी पल उसके कंधे पर किसी ने धीरे से हाथ रख दिया।
आदित्य के कंधे पर रखा वह हाथ बर्फ से भी ज़्यादा ठंडा था। उसका पूरा शरीर सिहर उठा। उसने धीरे-धीरे पीछे मुड़कर देखा। कोई नहीं था। लेकिन हाथ का दबाव अब भी उसके कंधे पर महसूस हो रहा था।
अचानक पूरा मंदिर फिर से हल्की नीली रोशनी से भर गया। उसने राहत की साँस ली। लेकिन जैसे ही उसकी नज़र सामने गई। उसकी साँस वहीं अटक गई। जहाँ कुछ पल पहले अकेला शिवलिंग था।
अब उसके सामने दर्जनों लोग बैठे थे। सभी सफेद धोती और गेरुए वस्त्र पहने हुए। सभी ध्यान की मुद्रा में। सभी की पीठ उसकी ओर थी। पूरा मंदिर एक साथ मंत्रों से गूँज रहा था।
ॐ नमः शिवाय…. ॐ नमः शिवाय….
आदित्य ने कैमरा उठाया और रिकॉर्डिंग शुरू कर दी। लेकिन स्क्रीन पर मंदिर फिर से खाली दिखाई दे रहा था।
न कोई साधु….
न कोई दीपक….
न कोई रोशनी।
सिर्फ़ टूटी हुई दीवारें और धूल। उसने कैमरा नीचे किया। फिर वही साधु बैठे हुए। कैमरा ऊपर किया। सब गायब।
ये…. कैसे संभव है ?
उसके मुँह से अपने आप निकला। तभी….. सभी साधुओं का मंत्रोच्चार एक साथ रुक गया। पूरा मंदिर फिर से खामोश हो गया। एक-एक करके सभी ने अपनी गर्दन उसकी ओर घुमानी शुरू की।
लेकिन….
उनके चेहरे देखकर आदित्य का खून जम गया। उनकी आँखें नहीं थीं। नाक नहीं थी।
होंठ नहीं थे।
उनके चेहरे बिल्कुल सपाट थे। जैसे किसी ने मोम से इंसान बनाकर उसका चेहरा मिटा दिया हो।
फिर भी उन्हें पता था कि आदित्य वहीं खड़ा है। एक साधु धीरे-धीरे उठा। वह बिना पैरों की आवाज़ किए उसकी तरफ आने लगा। हर कदम के साथ मंदिर की दीवारों से राख झड़ने लगी। आदित्य पीछे हटने लगा।
उसी समय उसे वही सफेद धोती वाला बूढ़ा पुजारी फिर दिखाई दिया। इस बार वह शिवलिंग के पास खड़ा था। उसने धीरे से कहा।
आँखों में मत देखना…..
आदित्य चिल्लाया ये लोग कौन हैं…….?
पुजारी की आँखों में आँसू आ गए। ये लोग कभी इस गाँव के लोग थे। फिर इनके साथ क्या हुआ। इन्होंने अमावस्या की रात मंदिर का रहस्य जानना चाहा और मंदिर ने इन्हें कभी जाने नहीं दिया।
उसी समय वह बिना चेहरे वाला साधु अब आदित्य से सिर्फ़ पाँच कदम दूर था। उसने अपना दाहिना हाथ उठाया। उसकी हथेली में एक पुरानी पीतल की घंटी थी। उसने धीरे से घंटी बजाई।
टन….
आवाज़ पूरे मंदिर में गूँज गई और उसी पल मंदिर की दीवारें बदलने लगीं। पुराने पत्थरों की जगह ताज़ा नक्काशी दिखाई देने लगी। टूटी हुई छत बिल्कुल नई हो गई। दीपकों की संख्या सैकड़ों में पहुँच गई।
अब मंदिर वीरान नहीं था। वह पूरी तरह जीवित था। चारों तरफ़ भक्त दिखाई दे रहे थे। महिलाएँ आरती कर रही थीं। बच्चे दौड़ रहे थे। पुजारी पूजा कर रहे थे। जैसे आदित्य अचानक
सैकड़ों साल पीछे पहुँच गया हो।
तभी…. मंदिर के मुख्य द्वार से एक शाही पालकी अंदर आई। उसके पीछे सैनिक थे। ढोल बज रहे थे। सब लोग झुक गए। पालकी से एक राजा उतरा। उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
वह सीधे मुख्य पुजारी के पास पहुँचा। उसे बचाने का कोई उपाय नहीं ? मुख्य पुजारी ने सिर झुका लिया।
अब बहुत देर हो चुकी है, महाराज।

अगर बलि न दी तो ? तो यह मंदिर पूरे राज्य को निगल जाएगा।
आदित्य स्तब्ध रह गया। क्या यह मंदिर किसी श्राप के कारण बंद किया गया था ? राजा ने भारी मन से सिर हिलाया। कुछ सैनिक पालकी के पीछे से एक लगभग बारह साल के लड़के को लेकर आए।
उसके हाथ बँधे हुए थे। वह रो रहा था।
मुझे मत मारो। मैंने कुछ नहीं किया। उसकी चीख सुनकर आदित्य का दिल काँप गया।
नहीं…. ये लोग बच्चे की बलि देंगे….
वह दौड़कर आगे बढ़ा। लेकिन उसका हाथ सीधे सैनिकों के आर-पार निकल गया। वह सिर्फ़ अतीत देख रहा था। उसे कोई देख नहीं सकता था।
उसी समय मुख्य पुजारी ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। पूरा मंदिर ज़ोर-ज़ोर से काँपने लगा। शिवलिंग के नीचे की ज़मीन धीरे-धीरे खुलने लगी। नीचे एक गहरा काला गड्ढा था।
इतना गहरा कि उसकी तली दिखाई नहीं दे रही थी। उस गड्ढे से अचानक सैकड़ों हाथ बाहर निकलने लगे।
सूखे हुए….
काले….
इंसानी हाथ। वे सभी उस बच्चे की तरफ़ बढ़ रहे थे। पूरा मंदिर दर्दभरी चीखों से भर गया। तभी सफेद धोती वाला बूढ़ा पुजारी पहली बार ज़ोर से चिल्लाया।
भागो….! इससे पहले कि अतीत तुम्हें भी अपना हिस्सा बना ले !
और उसी पल वह बच्चा अचानक अपनी गर्दन घुमाकर सीधे आदित्य की तरफ़ देखने लगा। उसकी आँखों में सिर्फ़ अँधेरा था। उसने मुस्कुराते हुए कहा।
तुम…. बहुत देर से आए हो….
अगले ही क्षण पूरा मंदिर ज़ोरदार धमाके के साथ काँप उठा। मुख्य दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया और बाहर से किसी ने बहुत धीरे-धीरे भारी लोहे की ज़ंजीर चढ़ानी शुरू कर दी।
लोहे की भारी ज़ंजीर की आवाज़ पूरे मंदिर में गूँजने लगी।
खर्ररर….
ठक….
ठक….
मुख्य दरवाज़ा अब बाहर से बंद किया जा चुका था। आदित्य पूरी ताकत से दौड़कर दरवाज़े तक पहुँचा। उसने दोनों हाथों से उसे धक्का दिया। दरवाज़ा ज़रा भी नहीं हिला।
कोई है….! दरवाज़ा खोलो !
उसकी आवाज़ मंदिर की दीवारों से टकराकर लौट आई। कोई जवाब नहीं। तभी पीछे से वही सफेद धोती वाला बूढ़ा पुजारी धीरे-धीरे उसके पास आया। इस बार उसके चेहरे पर डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
अब सुनो….
उसने धीमी आवाज़ में कहा। जो मैं पिछले पचास साल से किसी को नहीं बता पाया। आदित्य ने उसकी ओर देखा। यह मंदिर भगवान शिव का था। लेकिन एक राजा ने अपनी सत्ता बचाने के लिए इसे श्रापित कर दिया।
कैसे ?
बूढ़े ने गहरी साँस ली। राज्य में महामारी फैल गई थी। हज़ारों लोग मर रहे थे। राजा ने तांत्रिकों की बात मान ली।
उन्होंने कहा
अगर अमावस्या की रात एक निर्दोष बालक की बलि शिवलिंग के नीचे दी जाए। तो महामारी रुक जाएगी। आदित्य का दिल धड़क उठा। क्या उन्होंने सचमुच ऐसा किया ?
बूढ़े ने सिर झुका लिया।
हाँ….
लेकिन वह बच्चा साधारण इंसान नहीं था। वह इसी मंदिर के मुख्य पुजारी का बेटा था। आदित्य स्तब्ध रह गया। बलि के समय मुख्य पुजारी ने भगवान से प्रार्थना की कि इस पाप की सज़ा पूरे राज्य को मिले।
और उसी क्षण मंदिर फिर से काँप उठा। पूरे गर्भगृह में गहरी काली धुंध फैलने लगी। शिवलिंग के नीचे बना गड्ढा धीरे-धीरे और चौड़ा होने लगा। उसके भीतर से अब सिर्फ हाथ नहीं पूरी आकृतियाँ बाहर निकल रही थीं।
सैकड़ों लोग….
जिनके शरीर राख जैसे काले थे। उनकी आँखें खाली थीं। लेकिन उनके चेहरे दर्द से भरे हुए थे। वे धीरे-धीरे मंदिर के चारों ओर खड़े हो गए।
फिर सभी ने एक साथ कहा।
हमें मुक्त करो….
पूरे मंदिर में यह आवाज़ बार-बार गूँजने लगी।
हमें मुक्त करो….हमें मुक्त करो….
आदित्य ने काँपते हुए पूछा।
ये कौन हैं ?
बूढ़े ने जवाब दिया। ये वही लोग हैं। जो पिछले पाँच सौ वर्षों में अमावस्या की रात इस मंदिर में आए थे।
हर अमावस्या मंदिर एक नई आत्मा को अपने भीतर कैद कर लेता है। उसी समय आदित्य की जेब में रखा मोबाइल अपने आप चालू हो गया। हालाँकि उसकी बैटरी कई घंटे पहले खत्म हो चुकी थी।
स्क्रीन पर सिर्फ़ एक ही समय दिखाई दे रहा था।
12:00 AM
और उसके नीचे लिखा था।
एक नया नाम जोड़ा जा रहा है।
स्क्रीन अपने आप बदल गई। अब उस पर पत्थर की एक दीवार दिखाई दे रही थी। दीवार पर सैकड़ों नाम खुदे हुए थे।
धीरे-धीरे….. सबसे नीचे नए अक्षर उभरने लगे।
आ….
दि….
त्य….
आदित्य का नाम अपने आप पत्थर पर लिखा जा रहा था।
नहीं !
उसने मोबाइल ज़मीन पर फेंक दिया। लेकिन मोबाइल टूटने के बजाय राख बन गया। उसी समय सभी काली आकृतियाँ उसकी ओर मुड़ गईं। उनके कदमों की आवाज़ नहीं आ रही थी।
फिर भी….
वे हर सेकंड उसके और करीब पहुँच रही थीं। अचानक बूढ़े पुजारी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
मेरे पीछे आओ ! दोनों गर्भगृह के पीछे बने एक छोटे से रास्ते की ओर भागे। वह रास्ता बेहद संकरा था। दीवारों पर प्राचीन संस्कृत के श्लोक लिखे थे। अंत में एक पत्थर का छोटा कमरा था। कमरे के बीचोंबीच एक विशाल ताम्र-पत्र रखा था।
उस पर लिखा था।
जिस दिन कोई बिना लालच, बिना भय और बिना स्वार्थ इस मंदिर में प्रवेश करेगा….।
उसी दिन श्राप टूटेगा। आदित्य ने पढ़ते ही बूढ़े की ओर देखा।
क्या इसका मतलब बूढ़े की आँखों में आँसू आ गए।
हाँ….
मैं पिछले पचास वर्षों से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था। मैं मरा नहीं हूँ। मैं भी इस मंदिर का कैदी हूँ। इतना कहते ही बूढ़े का शरीर धीरे-धीरे धुएँ में बदलने लगा।
उसने काँपते हुए कहा।
श्राप तोड़ने का सिर्फ़ एक ही तरीका है।
शिवलिंग के नीचे जल रही उस शापित अग्नि को बुझाना होगा।
लेकिन जो भी उसे बुझाएगा वह कभी इस मंदिर से बाहर नहीं जा सकेगा। आदित्य कुछ पल तक चुप खड़ा रहा। फिर उसने धीरे से कहा। अगर मेरे रहने से सैकड़ों लोग आज़ाद हो सकते हैं। तो यही सही।
बूढ़े पुजारी की आँखों से आँसू बह निकले। उसी क्षण पूरा मंदिर ज़ोर-ज़ोर से काँपने लगा। शिवलिंग के नीचे से उठती काली लपटें आसमान तक पहुँचने लगीं और सैकड़ों कैद आत्माएँ एक साथ आदित्य की ओर देखने लगीं।
पूरा मंदिर भूकंप की तरह काँप रहा था। पत्थरों की दरारों से काली लपटें बाहर निकल रही थीं। शिवलिंग के चारों ओर घूमती हुई वे लपटें किसी जीवित प्राणी की तरह फुफकार रही थीं।
सैकड़ों कैद आत्माएँ एक साथ आदित्य की ओर देख रही थीं। उनकी आँखों में पहली बार डर नहीं। उम्मीद दिखाई दे रही थी। बूढ़ा पुजारी अब लगभग धुएँ में बदल चुका था।
उसने काँपती हुई आवाज़ में कहा।
याद रखना शापित अग्नि पानी से नहीं बुझेगी।
फिर कैसे ?
आदित्य ने पूछा। पुजारी मुस्कुराया।
त्याग से….
इतना कहकर वह पूरी तरह गायब हो गया। अब मंदिर में आदित्य बिल्कुल अकेला था। लेकिन अगले ही पल। शिवलिंग के नीचे बना काला गड्ढा पूरी तरह खुल गया। उसमें से वही बारह साल का लड़का बाहर आया।
जिसकी बलि सदियों पहले दी गई थी। अब उसका चेहरा शांत था। वह धीरे-धीरे आदित्य के सामने आकर खड़ा हो गया।
डरो मत…. उसने पहली बार सामान्य आवाज़ में कहा। मैं ही इस मंदिर का पहला कैदी हूँ। आदित्य ने काँपते हुए पूछा।
क्या तुम्हें मुक्त किया जा सकता है ?
लड़के ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया।
हाँ…. लेकिन उसकी कीमत बहुत बड़ी है।
क्या ?
जिसने मुझे बाँधा था। अब उसकी जगह किसी और को लेनी होगी। मंदिर में अचानक गहरी खामोशी छा गई। आदित्य समझ चुका था। अगर वह श्राप तोड़ेगा। तो खुद कभी बाहर नहीं जा पाएगा।
उसी समय उसे अपनी माँ की बातें याद आईं। उसके पिता की तस्वीर उसका अधूरा शोध……
उसके सारे सपने….
सब उसकी आँखों के सामने घूम गए। कुछ पल के लिए उसके कदम रुक गए। लेकिन फिर उसने सामने खड़ी उन सैकड़ों आत्माओं को देखा।
कुछ छोटे बच्चे थे।
कुछ बूढ़े।
कुछ महिलाएँ।
कुछ वही पाँच लोग….
जिनकी तस्वीर रामदयाल काका ने दिखाई थी। सबकी आँखों में एक ही सवाल था।
क्या आज हमें मुक्ति मिलेगी ?
आदित्य ने गहरी साँस ली। वह शिवलिंग के सामने घुटनों के बल बैठ गया। दोनों हाथ जोड़कर बोला।
अगर मेरी एक ज़िंदगी से इतने लोगों की ज़िंदगी लौट सकती है।
तो मुझे मंज़ूर है। इतना कहते ही उसने शिवलिंग के नीचे उठती काली अग्नि में अपना हाथ रख दिया। जैसे ही उसकी हथेली अग्नि से छुई। पूरे मंदिर में एक भयंकर गर्जना गूँज उठी।
आकाश में बिजली चमकी। पहाड़ी हिलने लगी। मंदिर की घंटियाँ अपने आप बजने लगीं।
टन….
टन….
टन….
काली अग्नि धीरे-धीरे नीली होने लगी।
फिर….
सफेद और अगले ही क्षण पूरी तरह बुझ गई। उसी पल सभी कैद आत्माओं के शरीर से तेज़ प्रकाश निकलने लगा। एक-एक करके वे मुस्कुराने लगे।
सैकड़ों वर्षों बाद…..
उनके चेहरों पर पहली बार शांति दिखाई दी। वह बारह साल का लड़का आदित्य के सामने आया। उसने हाथ जोड़कर कहा।
धन्यवाद…..
और अगले ही पल वह प्रकाश बनकर आकाश में विलीन हो गया। उसके बाद एक-एक करके सभी आत्माएँ मुक्त होने लगीं। पूरा मंदिर दिव्य रोशनी से भर गया। दीवारों की दरारें अपने आप भरने लगीं।
काली धुंध गायब हो गई। सदियों पुराना श्राप समाप्त हो चुका था।
लेकिन आदित्य वहीं खड़ा था। अब वह बाहर जाने के लिए मुड़ा। मुख्य दरवाज़ा खुल चुका था। पहाड़ी के बाहर सुबह की पहली किरण दिखाई दे रही थी। वह मुस्कुराया
और एक कदम बाहर रखने की कोशिश की। लेकिन उसका पैर दरवाज़े की चौखट पार ही नहीं कर पाया। जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसे रोक रही हो। उसी समय मंदिर के अंदर से एक गंभीर आवाज़ गूँजी।
वचन पूरा हुआ….श्राप समाप्त हुआ…..अब तुम इस मंदिर के नए रक्षक हो….
आदित्य ने पीछे मुड़कर देखा। मंदिर पूरी तरह बदल चुका था। अब वह वीरान नहीं था। दीपक जल रहे थे। घंटियाँ बज रही थीं। शिवलिंग से दिव्य प्रकाश निकल रहा था।
और गर्भगृह के सामने उसे अपना ही प्रतिबिंब दिखाई दिया। लेकिन वह प्रतिबिंब बूढ़ा था।
सफेद दाढ़ी….
सफेद धोती….
ठीक वैसा….
जैसा वह रहस्यमयी पुजारी था जिसने उसकी मदद की थी। तभी उसे समझ आया। वह बूढ़ा पुजारी। कभी इसी तरह किसी और को बचाने आया होगा। अब उसकी जगह आदित्य ने ले ली थी।
अगली सुबह गाँव वाले वर्षों बाद पहली बार मंदिर पहुँचे।मंदिर के विशाल दरवाज़े खुले थे। अंदर शांति थी।
न कोई काली धुंध।
न कोई अजीब आवाज़।
न कोई श्राप।
रामदयाल काका काँपते हुए गर्भगृह तक पहुँचे।
उन्होंने देखा शिवलिंग के सामने एक नई पीतल की घंटी रखी थी। उसके पास एक पुरानी डायरी पड़ी थी। पहले पन्ने पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था।
अगर यह डायरी तुम्हें मिले…. तो अमावस्या की रात इस मंदिर में कभी मत आना। श्राप खत्म हो चुका है…. लेकिन मंदिर को अब भी एक रक्षक चाहिए।
उसके नीचे हस्ताक्षर थे।
आदित्य
रामदयाल काका की आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने पूरे गाँव को बताया कि मंदिर अब श्रापित नहीं रहा। धीरे-धीरे वहाँ फिर पूजा होने लगी।
लेकिन आज भी गाँव के लोग कहते हैं। अगर किसी अमावस्या की रात आप उस मंदिर में अकेले जाएँ और गर्भगृह के सामने खड़े होकर धीरे से कहें।
आदित्य….
तो मंदिर की घंटी अपने आप एक बार बजती है और सफेद धोती पहने एक शांत पुजारी कुछ पल के लिए मुस्कुराता हुआ दिखाई देता है। वह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाता। वह सिर्फ़ यह देखता है।
कि मंदिर में आने वाला इंसान श्रद्धा लेकर आया है या लालच।
क्योंकि…. हर पवित्र स्थान की रक्षा के लिए किसी न किसी रक्षक का होना ज़रूरी है।
THE END |
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2 thoughts on “जिस मंदिर का दरवाज़ा इंसानों के लिए नहीं खुलता था”
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