यह कहानी आपको शुरुआत से लेकर अंत तक डर और रहस्य की ऐसी दुनिया में ले जाएगी, जहाँ पानी के नीचे दफन एक पूरा शहर आज भी ज़िंदा होने का दावा करता है। क्या सच में कुछ शहर कभी पूरी तरह नहीं मरते ? पढ़िए Horror story in hindi एक काल्पनिक लेकिन बेहद यथार्थवादी और रोंगटे खड़े कर देने वाली हॉरर स्टोरी।
Table of Contents
डैम जिसके बारे में कोई बात नहीं करता था
उत्तराखंड की पहाड़ियों के बीच बना रुद्रसागर डैम सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ़ एक जलाशय था। लेकिन आसपास के गाँवों में उसका दूसरा नाम था।
ज़िंदा झील।
लोग कहते थे कि डैम बनने से पहले वहाँ देवगढ़ नाम का एक छोटा-सा शहर हुआ करता था। सरकार ने लोगों को दूसरी जगह बसाने का दावा किया, लेकिन गाँव वालों का कहना कुछ और था।
शहर खाली नहीं हुआ था। पानी पहले छोड़ दिया गया था। सरकारी फाइलों में यह हादसा कभी दर्ज नहीं हुआ। कहते हैं कि एक रात में पूरा शहर पानी के नीचे चला गया। सैकड़ों लोग….
सैकड़ों घर….
स्कूल….
अस्पताल….
मंदिर….
सब कुछ और उसके बाद वहाँ जाना हमेशा के लिए मना कर दिया गया। कोई कारण कभी नहीं बताया गया।
डॉक्यूमेंट्री बनाने का फैसला
मैं आदित्य एक स्वतंत्र डॉक्यूमेंट्री फिल्ममेकर था। लोगों की नज़र से छिपी जगहों पर वीडियो बनाना मेरा काम था। जब पहली बार मैंने रुद्रसागर डैम का नाम सुना तो लगा यह भी किसी गाँव की अफ़वाह होगी। लेकिन इंटरनेट पर खोजने पर अजीब बात सामने आई।
डैम की तस्वीरें थीं। इंजीनियरिंग रिपोर्ट थीं। लेकिन जिस शहर पर डैम बना था। उसका नाम कहीं नहीं था। जैसे उसे इतिहास से मिटा दिया गया हो। यही बात मेरे अंदर जिज्ञासा पैदा करने लगी।
मेरे साथ इस सफर पर तीन लोग थे।
कैमरामैन रोहन….
ड्रोन ऑपरेटर मीरा….
और साउंड रिकॉर्डिस्ट समीर।
हमने तय किया कि दो दिन वहाँ रुककर पूरी डॉक्यूमेंट्री शूट करेंगे।
डैम से करीब पाँच किलोमीटर पहले एक छोटा-सा ढाबा मिला। वहाँ बैठे लगभग अस्सी साल के बूढ़े ने हमारी गाड़ी देखते ही पूछा। शूटिंग करने आए हो ?
मैंने कहा। हाँ।
उसने कुछ देर तक हमें देखा। फिर बोला। दिन में जितना देखना है देख लो। लेकिन सूरज डूबने के बाद पानी के किनारे मत जाना। मैं मुस्कुराया।
क्यों ?
बूढ़े ने जवाब देने की बजाय पूछा। तुम्हारे कैमरे में नाइट विज़न है। मैंने कहा।
हाँ।
उसने गहरी साँस ली। तो फिर जो दिखे। उसे रिकॉर्ड मत करना।। रोहन हँस पड़ा।
बाबा भूत-वूत की कहानी है क्या ?
बूढ़ा पहली बार गुस्से में दिखा। भूत होते तो डर कम लगता। वे लोग अभी भी वहीं रहते हैं। उसकी आँखें बिल्कुल स्थिर थीं और उन्हें पसंद नहीं कि कोई उन्हें देखे। हमने उसकी बात को अंधविश्वास समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया।
लेकिन जाते-जाते उसने एक आखिरी बात कही। अगर रात को शहर की लाइटें जलती दिखें तो आवाज़ देकर किसी को मत बुलाना।
शाम होने से पहले हम डैम पहुँच गए। सामने फैला विशाल पानी चारों ओर ऊँची पहाड़ियाँ और एक अजीब-सी खामोशी। हवा चल रही थी लेकिन पानी लगभग बिल्कुल स्थिर था।इतना शांत….
कि अपना चेहरा साफ दिखाई दे रहा था। मीरा ने ड्रोन उड़ाया। स्क्रीन पर ऊपर से डैम बेहद सुंदर दिख रहा था। लेकिन अचानक ड्रोन के कैमरे में कुछ आया। पानी के अंदर सीधी रेखा में बनी हुई सड़क। रोहन ने ज़ूम किया।
फिर दूसरी सड़क। फिर चौक जैसा कुछ। मैंने स्क्रीन के बिल्कुल पास जाकर देखा। पानी के नीचे स्पष्ट रूप से एक पूरा शहर दिखाई दे रहा था। इमारतों की कतारें, गलियाँ….
एक बड़ा मंदिर…. और बीच में गोल चौराहा। मीरा ने हैरानी से कहा। इतना साफ कैसे दिख रहा है ?
मैंने जवाब नहीं दिया। क्योंकि उसी समय ड्रोन कैमरे में एक सफेद आकृति सड़क पार करती दिखाई दी। हम चारों एकदम चुप हो गए। दो सेकंड बाद वह आकृति गायब हो गई। मीरा ने सोचा शायद कैमरे का ग्लिच होगा।
लेकिन रिकॉर्डिंग सेव हो चुकी थी।
रात का पहला अजीब अनुभव
हमने डैम से थोड़ा दूर टेंट लगाया। रात लगभग साढ़े दस बजे सब सोने चले गए। मुझे नींद नहीं आ रही थी। बाहर निकला तो देखा। डैम की सतह पर दूर कहीं हल्की-हल्की पीली रोशनी झिलमिला रही थी।
पहले लगा किसी नाव की लाइट होगी। लेकिन वहाँ नाव चलाना वर्षों से प्रतिबंधित था। मैंने दूरबीन उठाई और जो देखा। उसके बाद मेरे हाथ काँपने लगे। पानी के नीचे सड़क के दोनों ओर लगे पुराने स्ट्रीट लैंप एक-एक करके जल रहे थे।
जैसे नीचे कोई शहर अपनी शाम शुरू कर रहा हो। मैंने तुरंत रोहन को जगाया। वह बाहर आया और बिना कुछ बोले वहीं खड़ा रह गया। क्योंकि अब सिर्फ़ लाइटें ही नहीं पानी के भीतर धीरे-धीरे चलती हुई दर्जनों परछाइयाँ भी दिखाई देने लगी थीं।
ऐसा लग रहा था। जैसे लोग अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे हों। तभी हवा पूरी तरह रुक गई और पहली बार डैम के भीतर से एक आवाज़ आई।
टन…. टन…. टन….
किसी मंदिर की घंटी। जबकि मंदिर तो पानी के नीचे था और लगभग सौ फीट गहराई में डूबा हुआ था। रोहन ने काँपते हाथों से कैमरा ऑन किया। कैमरे की स्क्रीन में जो दिखाई दिया। वह हमारी आँखों से दिख रही चीज़ से भी ज़्यादा भयानक था।
स्क्रीन पर पानी के नीचे खड़े दर्जनों लोग एक साथ ऊपर देख रहे थे। सीधे हमारी तरफ़ और तभी उनमें से एक ने बहुत धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया। मानो हमें नीचे बुला रहा हो।
पानी के नीचे से आती पुकार
रोहन का हाथ काँप रहा था, लेकिन कैमरा अब भी रिकॉर्डिंग कर रहा था। स्क्रीन पर पानी के नीचे खड़े दर्जनों लोग बिल्कुल स्थिर थे। उनके चेहरे साफ़ दिखाई नहीं दे रहे थे लेकिन उनकी आँखें ऐसा लग रहा था जैसे सीधे कैमरे के लेंस में झाँक रही हों।
मैंने कैमरा अपने हाथ में लिया। जैसे ही ज़ूम किया। सारे लोग एक साथ गायब हो गए। स्क्रीन पर फिर सिर्फ़ खाली सड़क दिखाई दे रही थी। मैंने राहत की साँस ली ही थी कि पीछे से मीरा की चीख सुनाई दी।
आदित्य…. पीछे देखो।
हम तीनों पलटे। डैम के किनारे गीली मिट्टी पर किसी के पैरों के निशान बन रहे थे। लेकिन वहाँ कोई नहीं था। हर नया निशान ऐसे बन रहा था जैसे कोई अदृश्य इंसान पानी से निकलकर हमारी तरफ़ चल रहा हो।
छप….
छप….
छप….
गीले कदमों की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। हम सब पीछे हटने लगे। लेकिन वे निशान हमारे सामने आकर अचानक रुक गए। फिर मिट्टी पर अपने-आप एक वाक्य उभरने लगा।
हम अभी भी यहीं रहते हैं…..
अगले ही पल तेज़ हवा चली और सारे अक्षर मिट गए। समीर ने डरते हुए कहा। सुबह होते ही यहाँ से निकलते हैं। मैंने भी पहली बार महसूस किया कि शायद गाँव वाले झूठ नहीं बोल रहे थे। अगली सुबह हमने पिछली रात की रिकॉर्डिंग देखनी शुरू की।
वीडियो के शुरुआती हिस्से बिल्कुल सामान्य थे। लेकिन रात 11 बजकर 43 मिनट पर रिकॉर्डिंग अचानक बदल गई। ड्रोन अपने-आप उड़ने लगा था। किसी ने उसे कंट्रोल नहीं किया था।
वह धीरे-धीरे पानी के बिल्कुल ऊपर पहुँचा। फिर बिना किसी आदेश के नीचे झुक गया। इतना नीचे कि उसके कैमरे ने पानी के अंदर की सड़क साफ़ रिकॉर्ड कर ली। हम सब साँस रोककर स्क्रीन देखने लगे।
वहाँ लोग थे।
सैकड़ों लोग।
कोई बाज़ार में चल रहा था…..
कोई दुकान खोल रहा था……
कुछ बच्चे सड़क पर खेल रहे थे…..
एक बूढ़ा मंदिर की सीढ़ियाँ चढ़ रहा था…..
और सबसे डरावनी बात…..
उनमें से किसी को यह एहसास ही नहीं था कि वे पानी के नीचे हैं। जैसे उनके लिए वही दुनिया सामान्य हो। अचानक भीड़ में खड़ा एक आदमी रुक गया। उसने धीरे-धीरे ऊपर देखा। सीधे ड्रोन की तरफ़।
फिर उसके बाद पूरा शहर रुक गया। सैकड़ों लोग एक साथ ऊपर देखने लगे। मीरा ने घबराकर वीडियो रोक दिया। कमरे में सन्नाटा छा गया। समीर ने फुसफुसाकर कहा।
उन्होंने हमें देख लिया…..
सरकारी फाइल जिसने सब बदल दिया
डैम के पास बने पुराने निरीक्षण कार्यालय में हमें एक बंद कमरा मिला। ताला बहुत पुराना था। अंदर धूल से ढकी अलमारियाँ थीं। ज्यादातर फाइलें सड़ चुकी थीं। लेकिन एक लाल फाइल बिल्कुल सुरक्षित थी। उस पर लिखा था।
गोपनीय – देवगढ़ पुनर्वास परियोजना
मैंने काँपते हाथों से फाइल खोली। पहले कुछ पन्नों में नक्शे थे। फिर अचानक एक रिपोर्ट मिली। रिपोर्ट पढ़कर हमारे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सरकार ने शहर खाली होने का इंतज़ार ही नहीं किया था। डैम की दीवार में तकनीकी खराबी आने के बाद इंजीनियरों को डर था कि अगर तुरंत पानी नहीं छोड़ा गया तो पूरी संरचना टूट जाएगी।
हज़ारों लोगों को निकालने का समय नहीं था। रिपोर्ट में सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी।
राष्ट्रीय हित में जलाशय भरने की अनुमति दी जाती है।
नीचे तारीख़ थी और उसके नीचे लाल स्याही में लिखा था।
अनुमानित जनहानि: अज्ञात।
मीरा की आँखों में आँसू आ गए। मतलब पूरे शहर को जानबूझकर डुबो दिया गया। मैंने जवाब नहीं दिया। क्योंकि उसी समय फाइल का आखिरी पन्ना अपने-आप खुल गया। उस पर सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था।
उन्होंने मरना स्वीकार नहीं किया।
उस दिन हमने तय किया कि शाम तक सारी शूटिंग खत्म करके लौट जाएँगे। लेकिन जाने से पहले मैंने एक आखिरी ड्रोन शॉट लेने का फैसला किया। सूरज डूब रहा था। पूरा डैम नारंगी रोशनी में चमक रहा था। ड्रोन धीरे-धीरे ऊपर उठा। अचानक स्क्रीन पर पूरा पानी काला दिखाई देने लगा।
फिर…. जैसे किसी ने नीचे से सारी सतह हटा दी हो। अब कैमरा सीधे डूबे हुए शहर को दिखा रहा था। इस बार सब कुछ पहले से ज़्यादा साफ़ था। दुकानों के बोर्ड…. मंदिर का शिखर….
स्कूल की इमारत….
और बीचोंबीच खड़ा पुराना घंटाघर। घंटाघर की घड़ी अब भी चल रही थी। उसमें समय था।
6 बजकर 17 मिनट।
मैंने फाइल की तारीख़ देखी। रिपोर्ट में हादसे का समय भी यही लिखा था।
6:17 PM
उसी क्षण घंटाघर की घंटी बजने लगी।
एक….
दो….
तीन….
हर घंटी के साथ पानी की सतह काँपने लगी।
और फिर पूरा शहर धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा। ऐसा लग रहा था। जैसे पानी के नीचे दबा शहर फिर से ज़िंदा होकर सतह की ओर आ रहा हो। दूर मंदिर की सीढ़ियों पर वही बूढ़ा खड़ा था। जिसे हमने ड्रोन वीडियो में देखा था। लेकिन इस बार
उसका चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था और वह मुस्कुरा रहा था। फिर उसने बहुत धीरे से अपना हाथ उठाया और इस बार उसने इशारा हमें नहीं। हमारे पीछे खड़े किसी इंसान को किया। हम चारों एक साथ पलटे लेकिन वहाँ हम चार नहीं।
पाँच परछाइयाँ खड़ी थीं।
पाँचवीं परछाई किसकी थी ?
हम चारों कुछ सेकंड तक वहीं जमे रहे। सूरज पूरी तरह डूब चुका था। डैम के ऊपर अजीब-सी धुंध फैलने लगी थी। मैंने टॉर्च जलाकर ज़मीन पर रोशनी डाली। हमारे पैरों के पास चार नहीं।
पाँच परछाइयाँ थीं।
मैंने एक-एक करके सबकी तरफ देखा।
मैं….
रोहन….
मीरा….
समीर….
चार लोग।
लेकिन ज़मीन पर पाँचवीं परछाई बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रही थी। वह किसी लंबे आदमी की थी। जिसके कंधे झुके हुए थे। धीरे-धीरे वह परछाई हमसे अलग होने लगी। जैसे कोई इंसान अपनी जगह से उठकर चल रहा हो।
लेकिन वहाँ कोई शरीर नहीं था। सिर्फ़ परछाई। वह परछाई सीधे डैम के किनारे पहुँची और पानी में उतर गई। जैसे ही उसने पानी को छुआ। पूरा डैम गोल-गोल लहरों से भर गया।
अगले ही पल पानी के नीचे पूरे शहर की बत्तियाँ एक साथ जल उठीं।
अब हम साफ़ देख सकते थे। सड़कों पर गाड़ियाँ चल रही थीं। बाज़ार खुले हुए थे। मंदिर में आरती हो रही थी। बच्चे दौड़ रहे थे। किसी को भी यह एहसास नहीं था कि उनके ऊपर सौ फीट पानी है। मीरा रोने लगी। ये लोग…. अभी भी उसी दिन में जी रहे हैं।
मैंने ध्यान से देखा। हर घड़ी….
हर दुकान….
हर इंसान….
सबकी गतिविधियाँ एक जैसी थीं। जैसे समय आगे बढ़ा ही न हो। फिर अचानक मेरी नज़र एक दुकान पर पड़ी। बोर्ड पर लिखा था।
देवगढ़ फोटो स्टूडियो
उसके बाहर एक आदमी कैमरा लेकर खड़ा था। उसने ऊपर देख और मेरी तरफ मुस्कुरा दिया। मुझे लगा मैंने उसे पहले कहीं देखा है। फिर याद आया। वह चेहरा मेरे पिता की पुरानी तस्वीरों में था। मैंने काँपते हुए अपना बटुआ निकाला। उसमें पापा की बचपन की फोटो रखी थी।
फोटो के पीछे लिखा था।
देवगढ़ 1994
मेरे हाथ सुन्न हो गए। मेरे पिता कभी इस शहर में रह चुके थे। लेकिन उन्होंने जीवन में कभी इसका ज़िक्र नहीं किया। मैंने उसी रात पापा को फोन लगाया। कई बार घंटी जाने के बाद उन्होंने कॉल उठाई।
मैंने सिर्फ़ एक सवाल पूछा।
क्या आप देवगढ़ में रहते थे ?
दूसरी तरफ़ अचानक सन्नाटा छा गया। करीब आधा मिनट तक उन्होंने कुछ नहीं कहा। फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोले। तुम वहाँ पहुँच गए हो ?
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उन्होंने कभी नहीं पूछा कि मैं किस जगह हूँ। जैसे उन्हें पहले से पता था। मैंने कहा।
हाँ….. लेकिन यहाँ कुछ बहुत अजीब हो रहा है।
उन्होंने गहरी साँस ली। फिर बोले। तुरंत वहाँ से निकल जाओ।
लेकिन क्यों ?
क्योंकि मैं उस शहर से भागकर आया था। मेरे हाथ से फोन लगभग छूट गया। उन्होंने बताया जब डैम बनने वाला था। तब उनका परिवार देवगढ़ में रहता था। एक रात पहले उनके दादा को सपना आया था। सपने में पूरा शहर पानी में डूबा दिखाई दिया।
डरकर उन्होंने अगले ही दिन परिवार को गाँव छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया। पूरे शहर में सिर्फ़ उनका परिवार ही था। जो हादसे से पहले निकल गया। बाकी कोई नहीं बचा। फोन कटने से पहले पापा ने एक आखिरी बात कही।
अगर रात को कोई तुम्हारा नाम लेकर बुलाए। तो कभी जवाब मत देना।
आधी रात की दस्तक
उस रात हम निरीक्षण भवन के अंदर बंद हो गए। सभी खिड़कियाँ बंद थीं। दरवाज़े पर भारी अलमारी लगा दी। घड़ी में ठीक 12:17 बजे। पहली दस्तक हुई।
ठक….
ठक….
ठक….
कोई दरवाज़े के बाहर था। हमने साँस तक रोक ली। फिर बाहर से एक आवाज़ आई।
आदित्य…. मेरी रीढ़ में बिजली दौड़ गई। यह आवाज़ बिल्कुल मेरे पिता जैसी थी। बेटा दरवाज़ा खोलो। मीरा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। मत खोलना। बाहर फिर वही आवाज़ आई। इस बार माँ की।
आदित्य…. हम लेने आए हैं। मेरी आँखों में आँसू आ गए। आवाज़ इतनी असली थी कि एक पल को लगा सचमुच माँ बाहर खड़ी हैं। लेकिन तभी समीर ने खिड़की की दरार से बाहर देखा और ज़ोर से पीछे गिर पड़ा।
उसका चेहरा पूरी तरह सफेद हो चुका था। मैंने पूछा।
क्या हुआ ?
वह काँपते हुए सिर्फ़ इतना कह पाया। बाहर….. कोई इंसान नहीं है।
फिर ?
पूरा शहर खड़ा है। हमने धीरे से दरार से बाहर झाँका। जो दृश्य दिखाई दिया। उसे शायद मैं मरते दम तक नहीं भूल पाऊँगा। भवन के बाहर सैकड़ों लोग खड़े थे। सभी भीगे हुए। सभी के कपड़ों से पानी टपक रहा था। उनकी आँखें खुली थीं।
लेकिन उनमें पुतलियाँ नहीं थीं। वे सभी एक साथ हमारी तरफ देख रहे थे और फिर एक साथ मुस्कुराने लगे। भीड़ के बीच वही बूढ़ा खड़ा था। जो मंदिर की सीढ़ियों पर दिखाई दिया था। उसने अपनी उंगली होंठों पर रखी और इशारा किया।
शांत रहो…..
उसी क्षण पूरा भवन हिलने लगा। दीवारों से पानी रिसने लगा और फर्श पर पानी नहीं छोटे-छोटे पैरों के गीले निशान बनने लगे।
ऐसा लग रहा था। जैसे नीचे डूबा हुआ पूरा शहर धीरे-धीरे हमारे कमरे के अंदर प्रवेश कर रहा हो।
आख़िरी रात – जब पूरा शहर जाग गया
कमरे के भीतर पानी लगातार बढ़ रहा था। लेकिन सबसे अजीब बात यह थी कि वह पानी ठंडा नहीं था। उसका तापमान बिल्कुल सामान्य था। मानो वह किसी नदी का नहीं किसी घर के नल का पानी हो। दीवारों से टप-टप गिरती बूंदें धीरे-धीरे पूरे कमरे में फैल गईं।
फर्श पर बने गीले पैरों के निशान अब दर्जनों हो चुके थे। लेकिन उनमें से किसी के भी साथ कोई शरीर नहीं था। अचानक भवन की सारी बिजली अपने-आप बंद हो गई। चारों तरफ घना अंधेरा छा गया। सिर्फ़ बाहर डैम की दिशा से आती हल्की पीली रोशनी दिखाई दे रही थी।
मैंने खिड़की से बाहर देखा और मेरा दिल जैसे धड़कना भूल गया।
पूरा देवगढ़ शहर अब पानी के ऊपर खड़ा था।
वही सड़कें….
वही मंदिर….
वही दुकानें….
वही घंटाघर….
लेकिन अब वे पानी के भीतर नहीं थे। ऐसा लग रहा था जैसे डैम का पानी उनके आर-पार बह रहा हो और शहर फिर भी अपनी जगह मौजूद हो। घंटाघर की घड़ी अब भी 6:17 पर रुकी हुई थी। फिर….
टन….
पहली घंटी बजी। उसके साथ ही बाहर खड़े सैकड़ों लोगों ने एक साथ हमारी तरफ देखना शुरू कर दिया।
टन….
दूसरी घंटी। भवन का मुख्य दरवाज़ा अपने-आप खुल गया।
टन….
तीसरी घंटी। भीड़ धीरे-धीरे हमारी तरफ चलने लगी।
उनके कदमों की आवाज़ नहीं आ रही थी। सिर्फ़ भीगे कपड़ों से टपकते पानी की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
हम चारों पीछे हटते गए। तभी भीड़ में से वही बूढ़ा आगे आया। इस बार उसकी आवाज़ पहली बार सुनाई दी। वह धीमे से बोला। डरो मत…..।
हम तुम्हें मारने नहीं आए। मेरे मुँह से किसी तरह निकला। तो….. हमें यहाँ क्यों बुलाया।
बूढ़े ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा। क्योंकि सच को किसी ज़िंदा इंसान की ज़रूरत थी। उसने हाथ उठाया। अचानक मेरे सामने का दृश्य बदल गया। मैं अब उसी देवगढ़ शहर के बीच खड़ा था। चारों तरफ़ लोग अपने रोज़मर्रा के काम में लगे थे। बच्चे स्कूल जा रहे थे।
मंदिर में आरती हो रही थी।
महिलाएँ बाज़ार से सामान खरीद रही थीं।
फिर अचानक सायरन बजा। लाउडस्पीकर पर आवाज़ आई। तकनीकी परीक्षण किया जा रहा है। किसी को खतरे का अंदाज़ा नहीं था। लोग हँसते हुए अपने काम करते रहे और फिर पहाड़ों की तरफ़ से पानी का एक विशाल काला पहाड़ शहर की ओर बढ़ता दिखाई दिया।
लोग भागने लगे।
चीखें….
रोना….
बच्चों की आवाज़ें….
सब कुछ एक साथ। कुछ ही सेकंड में पूरा शहर पानी में डूब गया। लेकिन सबसे भयावह दृश्य उसके बाद शुरू हुआ। लोग मर नहीं रहे थे। वे वहीं खड़े रह गए। जैसे समय ने उनकी आख़िरी साँस को रोक दिया हो। बूढ़े की आवाज़ फिर सुनाई दी।
हमारे शरीर मर गए…. लेकिन हमारा आख़िरी पल कभी खत्म नहीं हुआ।
सच्चाई का सौदा
दृश्य फिर बदल गया। मैं वापस निरीक्षण भवन में था। बूढ़ा मेरे सामने खड़ा था। उसने कहा हर दस साल में कोई न कोई यहाँ आता है। हम उसे सब कुछ दिखाते हैं। लेकिन वह सच दुनिया तक पहुँचने से पहले मर जाता है।
मैंने काँपते हुए पूछा।
क्यों ?
बूढ़े की मुस्कान गायब हो गई। क्योंकि शहर किसी को जाने नहीं देता। इतना कहकर उसने मेरी हथेली पर एक पुरानी पीतल की चाबी रख दी। अगर सच को दुनिया तक पहुँचाना चाहते हो।
तो अभी भागो।
उसी पल पूरा भवन ज़ोर से हिलने लगा। छत टूटने लगी। रोहन चिल्लाया।
भागो। हम चारों बाहर की तरफ दौड़े। लेकिन बाहर निकलते ही देखा। भवन गायब था। हम सीधे देवगढ़ शहर की मुख्य सड़क पर खड़े थे। चारों तरफ़ लोग चल रहे थे। दुकानों से आवाज़ें आ रही थीं। सब कुछ बिल्कुल सामान्य। अगर किसी को न बताया जाए।
तो कोई कभी नहीं कहेगा कि यह शहर सौ फीट पानी के नीचे है। अचानक घंटाघर में 6:17 बजे और पूरा शहर एक साथ हमारी तरफ मुड़ गया।
सैकड़ों आँखें….
एक साथ….
हम पर टिक गईं।
हम जितनी तेज़ दौड़ सकते थे, दौड़ने लगे। सड़क के आखिर में डैम की दीवार दिखाई दे रही थी। उसके पार वास्तविक दुनिया थी। पीछे से हजारों लोगों के दौड़ने की आवाज़ आने लगी। मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जैसे ही हम दीवार तक पहुँचे।
मेरी जेब में रखी पीतल की चाबी तेज़ गर्म होने लगी। सामने लोहे का एक छोटा-सा बंद दरवाज़ा था। जो पहले कभी दिखाई नहीं दिया था। चाबी उसी में फिट हो गई। दरवाज़ा खुला और हम चारों बाहर गिर पड़े। अगले ही पल सब कुछ गायब हो गया।
न शहर….
न भीड़….
न घंटाघर….
सिर्फ़ शांत पानी से भरा डैम। सुबह हो चुकी थी।
छह महीने बाद
हम शहर लौट आए। कैमरे का पूरा डेटा देखने बैठे। लेकिन सारी रिकॉर्डिंग खाली थी। जहाँ-जहाँ देवगढ़ दिखाई दिया था। वहाँ सिर्फ़ काली स्क्रीन थी। सिर्फ़ एक फ़ाइल बची थी।
नाम था।
617.mp4
वीडियो खोला। सिर्फ़ पाँच सेकंड की रिकॉर्डिंग थी। स्क्रीन पर वही बूढ़ा दिखाई दिया। वह सीधे कैमरे की तरफ देखकर बोला।
अब तुमने हमें देख लिया है…. इसलिए एक दिन तुम्हें वापस आना ही होगा।
वीडियो अपने-आप बंद हो गया। उस दिन के बाद से हर साल
17 जुलाई की शाम ठीक 6 बजकर 17 मिनट पर
मेरे फोन में बिना किसी नंबर के एक कॉल आती है। मैं कभी उसे उठाता नहीं। लेकिन फोन की स्क्रीन पर हर बार एक ही नाम लिखा होता है।
देवगढ़ (Underwater City)
और सबसे डरावनी बात कुछ महीने पहले सरकार ने घोषणा की कि रुद्रसागर डैम का पानी कम किया जाएगा। कारण
नीचे किसी पुराने शहर के अवशेष मिलने की संभावना।
मैं जानता हूँ। उन्हें वहाँ सिर्फ़ खंडहर नहीं मिलेंगे। क्योंकि देवगढ़ आज भी वहीं है।
वही लोग….
वही बाज़ार….
वही मंदिर….
और वही घंटाघर….
जो अब भी 6:17 पर रुका हुआ है और किसी अगले गवाह का इंतज़ार कर रहा है।
THE END |
अगर किसी डैम का पानी अचानक हट जाए…. और उसके नीचे पूरा शहर आज भी आबाद मिले, तो क्या आप उसके अंदर कदम रखने की हिम्मत करेंगे ?
अगर इस Horror Story in Hindi ने आपको अंत तक डराए रखा, तो नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए
क्या आप देवगढ़ जैसे डूबे हुए शहर की सच्चाई जानने जाएंगे, या हमेशा उससे दूर रहेंगे ?
ऐसी ही नई Real Horror Story in Hindi, भूत-प्रेत की कहानियाँ, चुड़ैल की कहानियाँ, और सस्पेंस से भरी डरावनी कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारे ब्लॉग को Subscribe करें। हर सप्ताह हम एक नई, अनोखी और दिल दहला देने वाली हॉरर स्टोरी लेकर आते हैं।
More Horror कहानियां
- Click here हवेली के नीचे दफन सच | Horror Story in Hindi
1 thought on “पुराना डैम जहाँ पानी के नीचे पूरा शहर अब भी ज़िंदा था (Bhutiya shahar)”
Comments are closed.