गाँव की वह गली जहाँ कदमों की आवाज़ आपकी नहीं होती थी (Horror Street)

उस रात मैं सिर्फ़ पाँच मिनट का रास्ता तय करना चाहता था…. लेकिन जो कदम मेरे पीछे चल रहे थे, वे मेरे नहीं थे।

मेरा नाम आदित्य है। मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव रामपुरा में पैदा हुआ था लेकिन पिछले बारह साल से लखनऊ में रहता था। नौकरी, शहर की भागदौड़ और ज़िम्मेदारियों के बीच गाँव आना लगभग बंद ही हो गया था।

फिर एक दिन पिताजी का फोन आया। दादा का पुराना घर बेचने से पहले एक बार आ जा….. कुछ ज़रूरी कागज़ देखने हैं। मैंने दो दिन की छुट्टी ली और गाँव पहुँच गया। रामपुरा वैसा ही था जैसा बचपन में छोड़कर गया था। कच्ची गलियाँ, पुराने नीम के पेड़, शाम होते ही घरों के बाहर जलते बल्ब, और दूर खेतों से आती मिट्टी की गंध। लेकिन एक चीज़ बदल गई थी।

गाँव के लोग अब रात होने से पहले अपने दरवाज़े बंद कर लेते थे। पहले जहाँ बच्चे रात तक खेलते थे। अब सूर्यास्त के बाद पूरा गाँव असामान्य रूप से शांत हो जाता था। पहले दिन मैंने इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। रात को खाना खाते समय मैंने चाचा से पूछा। इतनी जल्दी सब लोग घरों में क्यों बंद हो जाते हैं ?

मेरे सवाल के बाद कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया। चाची ने तुरंत बात बदलने की कोशिश की। शहर में नौकरी कैसी चल रही है ?

लेकिन मैंने दोबारा वही सवाल पूछा। इस बार चाचा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर घबराहट साफ़ दिखाई दे रही थी। धीरे से बोले पुराने कुएँ वाली गली से रात के बाद कोई नहीं गुजरता।

मैं हँस पड़ा। बस इतनी-सी बात ?

उन्होंने मेरी हँसी का जवाब नहीं दिया। अगर कभी मजबूरी में उस गली से जाना पड़े। वह कुछ पल रुके। तो पीछे से कदमों की आवाज़ आए तब भी मुड़कर मत देखना। मैंने सोचा वह मज़ाक कर रहे हैं। लेकिन कमरे में मौजूद किसी भी इंसान के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।

अगले दिन मैं गाँव में घूमने निकला। दोपहर में सब सामान्य था। बच्चे खेल रहे थे। औरतें कुएँ से पानी भर रही थीं। बुज़ुर्ग चौपाल पर बैठे थे। मैं धीरे-धीरे उसी दिशा में पहुँच गया जहाँ बचपन में अक्सर खेला करता था।

वहाँ एक संकरी गली थी। दोनों तरफ़ पुराने मिट्टी के मकान। बीच में टूटी हुई ईंटों का रास्ता। गली के आखिर में एक सूखा हुआ कुआँ। मुझे याद आया। बचपन में भी लोग इस गली में कम ही आते थे। मैंने पास बैठे लगभग अस्सी साल के एक बुज़ुर्ग से पूछा।

बाबा इस गली में कोई रहता नहीं क्या ?

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। दिन में सब रहते हैं।

और रात में ?

उन्होंने बिना जवाब दिए अपनी लाठी उठाई और वहाँ से चले गए। शाम को मैं दादा के पुराने घर में रखे कागज़ देखने लगा। धूल से भरे संदूक, पुराने फोटो, ज़मीन के नक्शे…..

इन्हीं सब के बीच एक पुराना कागज़ मिला। उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी।

अगर पीछे कदम सुनाई दें…. तो यह मत समझना कि कोई तुम्हारे पीछे चल रहा है।

मैंने उसे पलटकर देखा। पीछे कुछ नहीं लिखा था। मैंने सोचा शायद दादा ने किसी अंधविश्वास के कारण लिख दिया होगा। मैंने वह कागज़ जेब में रख लिया। रात लगभग साढ़े नौ बजे बिजली चली गई।

पुराने कुएँ वाली गली का पहला सामना

चाचा के घर से फोन आया। एक ज़रूरी फाइल वहीं रह गई है। अभी लेकर आ जा। दो रास्ते थे।

पहला….

मुख्य सड़क से। लगभग बीस मिनट।

दूसरा….

पुराने कुएँ वाली गली से। सिर्फ़ पाँच मिनट। मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई और बिना ज़्यादा सोचे उसी गली की तरफ़ चल पड़ा। गाँव पूरी तरह शांत था। दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई। फिर अचानक….

वह भी बंद हो गई। जैसे पूरे गाँव ने एक साथ साँस रोक ली हो। मैं गली में दाखिल हुआ। पहले दस कदम बिल्कुल सामान्य थे।

फिर….

टक….

मैं रुक गया। आवाज़ भी रुक गई। मैंने सोचा शायद मेरी चप्पल की आवाज़ होगी। मैंने फिर कदम बढ़ाया।

टक…. टक….

और उसके ठीक आधे सेकंड बाद

टक….

इस बार साफ़ महसूस हुआ। मेरे कदमों के बाद एक और कदम पड़ा था। लेकिन वह मेरा नहीं था। मैंने खुद को समझाया कि शायद आवाज़ गली की दीवारों से टकराकर लौट रही है। लेकिन अगले ही पल मुझे अपनी ही बात पर शक होने लगा। मैंने धीरे-धीरे फिर एक कदम बढ़ाया।

टक….

और उसके तुरंत बाद

टक….

इस बार दोनों आवाज़ों में साफ़ फर्क था। मेरे कदम की आवाज़ भारी थी। दूसरी आवाज़ हल्की जैसे कोई नंगे पैर मेरे पीछे चल रहा हो। मेरी रीढ़ में एक ठंडी लहर दौड़ गई। मैंने मोबाइल की टॉर्च पीछे घुमाने के लिए हाथ उठाया। तभी चाचा की बात याद आ गई।

पीछे से कदमों की आवाज़ आए, तब भी मुड़कर मत देखना।

मैंने खुद को रोका। कोई होगा। मैंने मन ही मन कहा। शायद गाँव का ही कोई आदमी। मैंने बिना पीछे देखे ज़ोर से आवाज़ लगाई।

कौन है ?

कोई जवाब नहीं आया। लेकिन…..

टक..

एक और कदम। इस बार वह पहले से थोड़ा और पास था। अब मेरे और उस आवाज़ के बीच शायद तीन-चार कदम का ही फासला था। मैंने तेज़ चलना शुरू किया। मेरे कदम तेज़ हुए। तो पीछे वाले कदम भी उतने ही तेज़ हो गए।

टक…. टक…. टक….

अब ऐसा लग रहा था जैसे कोई मेरी चाल की नकल नहीं कर रहा। बल्कि मुझे पकड़ने की कोशिश कर रहा हो। गली के दोनों तरफ़ बने पुराने मकानों की खिड़कियाँ बंद थीं। लेकिन मुझे महसूस हो रहा था। जैसे हर बंद खिड़की के पीछे कोई मुझे देख रहा हो।

हवा बिल्कुल बंद थी। पेड़ों की पत्तियाँ तक नहीं हिल रही थीं। फिर भी मेरे कानों में किसी की धीमी साँसों जैसी आवाज़ आने लगी। मैंने मोबाइल की स्क्रीन देखी। बैटरी….

92% से सीधे 41% पर आ गई थी।

मैं रुक गया और जैसे ही मैं रुका। पीछे वाले कदम चलते रहे।

टक….

टक….

टक….

मेरे शरीर का सारा खून जैसे जम गया। अगर कोई इंसान होता। तो मेरे रुकते ही वह भी रुक जाता। लेकिन यह चलता रहा। आवाज़ बिल्कुल मेरे पीछे आकर थम गई।

इतनी पास कि मुझे लगा अगर मैं हाथ पीछे करूँ। तो किसी की उँगलियाँ मेरी हथेली से टकरा जाएँगी। मेरी साँसें इतनी तेज़ चल रही थीं कि उनकी आवाज़ मुझे खुद डराने लगी। तभी मेरे दाहिने कान के बिल्कुल पास बहुत धीमी आवाज़ आई।

चलते क्यों नहीं….?

मैं जड़ हो गया। आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की भी नहीं थी। किसी औरत की भी नहीं। किसी बच्चे की भी नहीं। ऐसा लगा जैसे कई आवाज़ें एक साथ फुसफुसाई हों।

मैंने आँखें बंद कर लीं और बिना पीछे देखे पूरी ताकत से दौड़ पड़ा। अब गली खत्म होने में मुश्किल से पचास कदम बाकी थे। लेकिन जितना मैं दौड़ रहा था। उतना ही पीछे वाले कदम तेज़ होते जा रहे थे। अब सिर्फ़ कदमों की आवाज़ नहीं थी।

ऐसा लग रहा था। जैसे कोई मेरे बिल्कुल पीछे दौड़ रहा हो। मेरी गर्दन के पीछे ठंडी हवा बार-बार टकरा रही थी। जैसे कोई बहुत पास आ चुका हो। मैंने हिम्मत नहीं की पीछे देखने की।

तभी….

जेब में रखा पुराना कागज़ अपने आप बाहर निकलकर ज़मीन पर गिर गया। मैं रुक नहीं सकता था। लेकिन न जाने क्यों। मेरी नज़र उस कागज़ पर पड़ गई। उस पर अब सिर्फ़ एक लाइन नहीं थी। अँधेरे में भी साफ़ दिखाई दे रहा था कि उसी कागज़ पर दूसरी लिखावट उभर आई थी।

जिस दिन तुम पीछे मुड़ोगे…. उस दिन कदम तुम्हारे नहीं रहेंगे।

गली के आखिर में खड़ा मेरा हमशक्ल

मेरे पैरों की रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई और तभी पहली बार मुझे एहसास हुआ। अब ज़मीन पर सिर्फ़ एक जोड़ी कदमों की आवाज़ आ रही थी। लेकिन मैं तो अभी भी दौड़ रहा था। तो

दूसरी आवाज़ कहाँ गई ?

यही सवाल मेरे दिमाग में आया और उसी पल मेरे सामने, गली के आखिर में….

कोई खड़ा दिखाई दिया। वह मेरी ही ऊँचाई का था। मेरे जैसे ही कपड़े पहने हुए और सबसे डरावनी बात मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में उसका चेहरा धीरे-धीरे साफ़ होने लगा।

वह…. मैं ही था।

मेरे हाथ से मोबाइल लगभग छूट गया। गली के आखिर में खड़ा वह आदमी….

मैं ही था।

वही चेहरा।

वही दाढ़ी।

वही नीली शर्ट।

यहाँ तक कि उसके हाथ में भी वैसा ही मोबाइल था, जिसकी टॉर्च मेरी तरफ़ जल रही थी। फ़र्क सिर्फ़ एक था।

वह मुस्कुरा रहा था।

ऐसी मुस्कान जो किसी इंसान के चेहरे पर अच्छी नहीं लगती। मैंने घबराकर अपनी आँखें मल लीं। दोबारा देखा वह अब भी वहीं था। लेकिन इस बार उसने धीरे-धीरे अपना दायाँ पैर आगे बढ़ाया।

टक….

उसी क्षण मेरे पैर ने बिना मेरी इच्छा के खुद-ब-खुद एक कदम आगे बढ़ा दिया। मैं सन्न रह गया। मैंने अपना पैर रोकने की कोशिश की। लेकिन शरीर जैसे किसी और के इशारे पर चल रहा था। सामने खड़ा मेरा हमशक्ल फिर एक कदम चला।

टक….

और मेरा दूसरा पैर भी अपने आप आगे बढ़ गया। अब मुझे समझ आ रहा था कि गाँव वाले इस गली से क्यों डरते थे। यहाँ कोई तुम्हारा पीछा नहीं करता था।

यहाँ कोई तुम्हें चलाता था।

मैंने पूरी ताकत से अपने शरीर पर नियंत्रण पाने की कोशिश की। मुट्ठियाँ भींच लीं। दाँत दबा लिए। लेकिन मेरे पैर फिर भी आगे बढ़ते रहे। ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने ही शरीर में कैद हो चुका हूँ। तभी अचानक….

सामने खड़े उस आदमी ने अपना सिर धीरे-धीरे दाईं ओर झुका दिया। इतना ज़्यादा कि उसकी गर्दन से हड्डियों के चटकने की आवाज़ आने लगी।

कड़क…. कड़क….

फिर उसने पहली बार बोलना शुरू किया। लेकिन उसके होंठ नहीं हिले। आवाज़ सीधे मेरे कानों में गूँजी।

आज…. तू पीछे से नहीं…. आगे से आएगा….

मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। मैंने घबराकर जेब टटोली। शायद कोई ताबीज़, चाबी, कुछ भी लेकिन हाथ में सिर्फ़ दादा की पुरानी चाबी आई, जो घर के संदूक की थी। बिना सोचे मैंने वह चाबी उसकी तरफ़ फेंक दी। चाबी उसके सीने से टकराई और अगले ही पल वह धुएँ की तरह हवा में घुल गया।

पूरा रास्ता फिर से खाली था। मैंने राहत की साँस ली। लेकिन राहत सिर्फ़ दो सेकंड ही रही। क्योंकि पीछे से फिर वही आवाज़ आई।

टक….

इस बार पहले से भी ज़्यादा पास। मैंने पलटकर नहीं देखा। बस पूरी ताकत से गली के बाहर की तरफ़ भागा। जैसे ही मैं गली से बाहर निकला। गाँव की सामान्य आवाज़ें वापस आने लगीं। दूर कहीं कुत्ते भौंक रहे थे। किसी घर से रेडियो बजने की आवाज़ आ रही थी।

और सबसे अजीब बात मेरे पीछे कदमों की आवाज़ अचानक बंद हो चुकी थी। मैं हाँफता हुआ सीधे चाचा के घर पहुँचा। दरवाज़ा खुलते ही उन्होंने मेरा चेहरा देखा और बिना कुछ पूछे अंदर खींच लिया।

तू उस गली से आया है ?

मैंने सिर हिला दिया। उन्होंने तुरंत दरवाज़ा बंद कर दिया। कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। फिर उन्होंने अलमारी से एक पुरानी तस्वीर निकाली। तस्वीर लगभग पचास साल पुरानी थी। उसमें पाँच आदमी खड़े थे।

मैंने ध्यान से देखा और मेरा दिल जैसे रुक गया। उन पाँच लोगों में से एक

बिल्कुल मेरी तरह दिखता था।

मैंने काँपते हुए पूछा।

ये…. कौन है ?

चाचा ने तस्वीर मेज़ पर रखी और धीमे स्वर में कहा। उसका नाम रघुवीर था। हर कोई कहता था कि एक रात उसे भी अपने पीछे कदमों की आवाज़ सुनाई दी थी। अगली सुबह वह ज़िंदा तो मिल गया। लेकिन उसके बाद उसने किसी को पहचानना बंद कर दिया। मैंने घबराकर पूछा फिर क्या हुआ ?

चाचा ने मेरी आँखों में देखते हुए कहा।

तीन दिन बाद उसने पूरे गाँव से एक ही बात कही अब मेरे कदम मेरे नहीं हैं। उसी रात वह बिना किसी निशान के गायब हो गया।

मेरे हाथ बर्फ़ जैसे ठंडे पड़ गए। मैंने धीरे से अपने जूते उतारे और तभी मेरी नज़र अपने पैरों पर गई। गीली मिट्टी लगी हुई थी। लेकिन

मिट्टी में बने निशानों में मेरी एड़ियाँ आगे थीं…. और पंजे पीछे।

जैसे मैं पूरी रात आगे नहीं। पीछे की ओर चलता रहा था और उसी क्षण घर के बाहर से फिर वही आवाज़ आई।

टक….

इस बार वह गली से नहीं आई थी।

वह मेरे दरवाज़े के ठीक बाहर से आई थी।

उस रात चाचा ने मुझे किसी भी कीमत पर बाहर नहीं जाने दिया। उन्होंने घर के सभी दरवाज़े अंदर से बंद कर दिए। खिड़कियों पर मोटे पर्दे डाल दिए और बिना कुछ कहे आँगन में रखे पुराने पीपल की तरफ़ देखते रहे।

मैं बार-बार पूछता रहा सच क्या है ?

लेकिन हर बार उनका एक ही जवाब था।

सुबह होने दे….

उस रात मुझे नींद नहीं आई। करीब दो बजे फिर वही आवाज़ सुनाई दी।

टक….

टक….

इस बार वह घर के बाहर नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई छत पर धीरे-धीरे चल रहा हो। मैंने घड़ी देखी।

02:17 AM

आवाज़ ठीक उतनी ही देर तक आती रही, जितनी देर में कोई इंसान एक कोने से दूसरे कोने तक चल सकता है। फिर अचानक सब शांत हो गया।

60 साल पुराना रहस्य जिसने सब बदल दिया

सुबह होते ही चाचा मुझे गाँव के सबसे बुज़ुर्ग आदमी गोविंद बाबा, के पास ले गए। बाबा की उम्र लगभग नब्बे साल रही होगी। मैंने पूरी घटना उन्हें बताई। उन्होंने बिना हैरान हुए मेरी बात सुनी। फिर बोले तूने उसे देख लिया।

मैंने धीरे से सिर हिलाया। उन्होंने पूछा वह तेरे जैसा दिख रहा था ?

हाँ।

बाबा ने गहरी साँस ली। हर इंसान उस गली में किसी और को नहीं।

खुद को देखता है। मैं कुछ समझ नहीं पाया। उन्होंने एक पुरानी बात बतानी शुरू की। करीब साठ साल पहले उस गली में एक आदमी रहता था। उसका काम था रात में गाँव की चौकीदारी करना। हर रात वह अकेला उसी रास्ते से गुजरता था। एक बरसाती रात उसे भी अपने पीछे कदमों की आवाज़ सुनाई दी। लोग कहते हैं कि उसने डरकर पीछे मुड़कर देखा।

अगली सुबह वह ज़िंदा मिला। लेकिन उसके बाद उसने कभी किसी से बात नहीं की। वह बस पूरे गाँव में घूमता रहता था और जहाँ भी कोई अकेला मिलता उसके पीछे-पीछे चलने लगता। एक महीने बाद वह अचानक मर गया। लेकिन उसके मरने के बाद भी कदमों की आवाज़ बंद नहीं हुई।

गोविंद बाबा ने मेरी तरफ़ देखकर कहा।

उस गली में कोई भूत नहीं रहता…. वहाँ डर रहता है।

जो जितना डरता है। उसे उतना ही साफ़ सुनाई देता है। उस शाम मैंने फैसला किया। मैं एक बार फिर उस गली में जाऊँगा। अकेला। चाचा ने बहुत रोका। लेकिन इस बार मैं भागना नहीं चाहता था। सूरज डूब चुका था। मैं उसी गली में पहुँचा। हवा फिर बिल्कुल शांत थी। मैंने पहला कदम रखा।

टक….

दूसरा..

टक….

तीसरा..

और फिर पीछे से वही आवाज़ आई।

टक….

लेकिन इस बार मैं रुका नहीं।

मैं भागा भी नहीं।

मैं बस चलता रहा। आवाज़ बराबर मेरे पीछे चलती रही। फिर मेरे कान के पास वही फुसफुसाहट आई।

पीछे देख…..

मैंने आँखें बंद कर लीं और पहली बार मैं मुस्कुरा दिया। मैंने धीरे से कहा नहीं। कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा। फिर कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होने लगी।

टक….

टक….

टक….

और फिर पूरी तरह गायब। मैं गली पार करके बाहर निकल आया। पहली बार बिना किसी आवाज़ के। अगली सुबह मैं शहर लौट आया। ज़िंदगी फिर पहले जैसी हो गई। मैंने उस घटना का ज़िक्र किसी से नहीं किया। धीरे-धीरे मुझे लगा कि शायद सब खत्म हो चुका है।

लेकिन लगभग छह महीने बाद ऑफिस में देर तक काम करने के कारण मैं रात को अकेला पार्किंग में अपनी कार की तरफ़ जा रहा था। पूरा परिसर खाली था। मैंने कार का दरवाज़ा खोला। उसी समय पीछे से एक आवाज़ आई।

टक….

मैं ठिठक गया। धीरे से मुस्कुराया और बिना पीछे देखे कार में बैठ गया। मैंने इंजन स्टार्ट किया। रियर-व्यू मिरर में देखने की आदत थी। लेकिन उस रात मैंने जानबूझकर मिरर को ऊपर मोड़ दिया। कार आगे बढ़ गई। कुछ देर बाद आवाज़ बंद हो गई।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती….

करीब एक साल बाद मैं फिर गाँव गया। पुराने घर को बेचने के लिए। गाँव में प्रवेश करते ही मेरी नज़र उसी गली पर पड़ी। अब वहाँ एक नया बिजली का खंभा लगा था। बच्चे दिन में खेल रहे थे। सब कुछ सामान्य लग रहा था। तभी लगभग दस साल का एक लड़का मेरे पास आया। उसने मासूमियत से पूछा।

भैया…. इस गली में रात को चलते समय आपके पीछे भी कोई चलता है क्या ?

मेरे होंठ सूख गए। मैंने उसकी आँखों में देखा। वह सचमुच जवाब का इंतज़ार कर रहा था। मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसका हाथ पकड़ा और उसे उस गली से दूर ले गया। उसने पीछे मुड़कर एक बार गली की तरफ़ देखा। मैंने नहीं देखा।

क्योंकि कुछ जगहों पर डर देखने से नहीं…. पीछे मुड़ने से शुरू होता है।

अगर इस Horror Story in Hindi ने आपको अंत तक डर और सस्पेंस का एहसास कराया तो नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए क्या आप ऐसी रहस्यमयी दस्तक का सामना करेंगे या बिना जवाब दिए पूरी रात दरवाज़ा बंद रखेंगे ?

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Vishal is the creator behind HorrorStory, a platform dedicated to sharing chilling and mysterious horror stories. He crafts each story with suspense, fear, and unexpected twists to keep readers hooked till the very end. If you enjoy scary and ghost stories, HorrorStory by Vishal is the perfect place for you.

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