Table of Contents
ठीक 3:00 बजे पहली दस्तक
दिल्ली के बाहरी इलाके में बने एक पुराने अपार्टमेंट में अभिषेक पिछले छह महीनों से अकेला रह रहा था। वह एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और अक्सर देर रात तक काम करता था। उस रात भी कुछ ऐसा ही था।
घड़ी में 2:58 AM हो रहे थे। लैपटॉप बंद करके वह बिस्तर पर लेटा ही था कि अचानक….
ठक…. ठक…. ठक….
मुख्य दरवाज़े पर किसी ने धीरे-धीरे तीन बार दस्तक दी। अभिषेक ने मोबाइल उठाकर समय देखा।
3:00 AM
उसे लगा शायद किसी पड़ोसी को मदद चाहिए होगी। वह दरवाज़े के पास गया। डोर-आई से बाहर देखा। गलियारा पूरी तरह खाली था। सिर्फ़ टिमटिमाती हुई एक पीली लाइट जल रही थी। उसने दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था।
पूरे फ्लोर पर अजीब-सी खामोशी पसरी हुई थी। वह वापस कमरे में आ गया। शायद किसी बच्चे की शरारत होगी। उसने खुद को समझाया। लेकिन जैसे ही बिस्तर पर लेटा।
फिर वही आवाज़ आई।
ठक…. ठक…. ठक….
इस बार दस्तक पहले से ज़्यादा साफ़ थी। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वह दोबारा बाहर निकला। फिर वही नतीजा। गलियारे में कोई नहीं। लेकिन इस बार फ़र्श पर गीले पैरों के निशान बने हुए थे। ऐसे जैसे कोई बारिश में भीगकर अभी-अभी वहाँ से गुज़रा हो।
निशान सीधे उसके दरवाज़े तक आते थे। लेकिन वापस नहीं जाते थे।
सुबह उठते ही अभिषेक ने सामने वाले फ्लैट में रहने वाले बुज़ुर्ग वर्मा जी से इस बारे में पूछा। वर्मा जी कुछ पल चुप रहे। फिर बोले
कल रात फिर दस्तक हुई ?
अभिषेक चौंक गया।
आपको कैसे पता ?
वर्मा जी ने इधर-उधर देखा कि कोई सुन तो नहीं रहा। फिर धीमी आवाज़ में बोले। इस बिल्डिंग में नए आने वाले हर किरायेदार के साथ यही होता है। अभिषेक हँस पड़ा।
मतलब ?
अगर ठीक तीन बजे तीन बार दस्तक सुनाई दे। तो दरवाज़ा मत खोलना।
क्यों ?
वर्मा जी का चेहरा अचानक उतर गया। क्योंकि जिसने भी तीसरी रात दरवाज़ा खोला। वह कुछ दिनों बाद यह बिल्डिंग छोड़ गया। या…..
लोगों ने उसे फिर कभी नहीं देखा।
अभिषेक ने उनकी बात को अंधविश्वास समझा। लेकिन उस रात उसने तय किया कि चाहे कुछ भी हो। वह जागकर देखेगा कि दस्तक देता कौन है।
दूसरी रात
घड़ी में 2:59 AM हुए।
पूरा अपार्टमेंट सो चुका था। कमरे की सारी लाइटें बंद थीं। सिर्फ़ टीवी की हल्की नीली रोशनी फैल रही थी और तभी…..
ठक….
ठक….
ठक….
इस बार दस्तक के साथ एक धीमी आवाज़ भी आई।
दरवाज़ा खोलिए…..
आवाज़ किसी बूढ़े आदमी की लग रही थी। अभिषेक का गला सूख गया। उसने हिम्मत करके डोर-आई में देखा। बाहर एक आदमी खड़ा था। सफेद कुर्ता….
भीगे हुए कपड़े….
और सिर झुका हुआ। उसका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था। अभिषेक ने काँपती आवाज़ में पूछा।
कौन है ?
बाहर खड़े आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया। सिर्फ़ धीरे-धीरे अपना सिर उठाया। डोर-आई के छोटे से गोल शीशे में जो चेहरा दिखाई दिया। उसकी आँखें नहीं थीं। सिर्फ़ काले, खाली गड्ढे।
अभिषेक डरकर पीछे गिर पड़ा। जब उसने दोबारा डोर-आई में देखा। वहाँ कोई नहीं था। लेकिन दरवाज़े के नीचे से एक छोटा-सा गीला कागज़ अंदर सरकाया गया था।
उसने काँपते हाथों से उसे उठाया। उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी।
कल आख़िरी बार आऊँगा…..
उस रात अभिषेक को बिल्कुल नींद नहीं आई। उसे पहली बार एहसास हुआ कि यह किसी इंसान की शरारत नहीं थी और सबसे डरावनी बात अगले दिन सुबह जब उसने सिक्योरिटी ऑफिस में जाकर सीसीटीवी फुटेज देखनी चाही।
तो रात 2:59 AM से 3:05 AM तक की पूरी रिकॉर्डिंग अपने-आप डिलीट हो चुकी थी।
तीसरी रात – आख़िरी दस्तक
पूरे दिन अभिषेक के दिमाग़ में वही पर्ची घूमती रही।
कल आख़िरी बार आऊँगा…..
उसने तय कर लिया कि आज रात चाहे कुछ भी हो जाए, वह दरवाज़ा नहीं खोलेगा। रात के 2:55 AM पर उसने सभी खिड़कियाँ बंद कर दीं। मुख्य दरवाज़े के सामने सोफ़ा लगा दिया। मोबाइल का कैमरा ऑन करके दरवाज़े की तरफ़ रख दिया ताकि अगर कोई आए तो उसकी रिकॉर्डिंग हो जाए।
घड़ी में 3:00 AM हुए। पूरे फ्लैट में अजीब-सी ठंड फैल गई। फिर….
ठक….
ठक….
ठक….
पहले जैसी ही तीन दस्तक। लेकिन इस बार दरवाज़े के बाहर से किसी के रोने की आवाज़ भी आ रही थी। एक बूढ़ी औरत की आवाज़
बेटा…. दरवाज़ा खोल दो…. मुझे बहुत ठंड लग रही है….
अभिषेक ने आँखें बंद कर लीं। उसे वर्मा जी की बात याद थी।
दरवाज़ा मत खोलना….
कुछ सेकंड बाद आवाज़ बदल गई। अब बाहर उसकी माँ की आवाज़ थी। अभिषेक….. बेटा….. मैं हूँ….
उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा। माँ तो उस समय अपने गाँव में थीं। फिर यह आवाज़। उसने जवाब नहीं दिया। कुछ देर बाद बाहर उसके पिता की आवाज़ आई। फिर उसके बचपन के दोस्त की। फिर उसकी छोटी बहन की।
हर आवाज़ बिल्कुल असली इतनी असली कि कोई भी धोखा खा जाए। लेकिन उसने दरवाज़ा नहीं खोला। अचानक….
सारी आवाज़ें एक साथ बंद हो गईं। पूरे फ्लैट में ऐसा सन्नाटा छा गया कि अपनी साँसों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी।
सुबह होने का इंतज़ार करते-करते अभिषेक की आँख लग गई। जब सुबह सात बजे उसकी नींद खुली, तो सबसे पहले उसने मोबाइल की रिकॉर्डिंग देखी। वीडियो शुरू हुआ। पहले कुछ मिनट सब सामान्य था। फिर ठीक 3:00 AM पर
दरवाज़े के सामने धुंध जैसा कुछ दिखाई दिया। धीरे-धीरे वह धुंध इंसानी आकार लेने लगी। एक बूढ़ा आदमी भीगे हुए कपड़े और झुका हुआ सिर। वह दरवाज़े पर तीन बार दस्तक देता है। फिर अचानक….
वह सीधे कैमरे की तरफ़ देखने लगता है। हालाँकि कैमरा कमरे के अंदर था। फिर भी ऐसा लग रहा था कि उसे पता था कैमरा कहाँ रखा है।
अगले ही पल वह मुस्कुराया और धीरे-धीरे अपना हाथ उठाकर कैमरे की ओर इशारा किया। स्क्रीन अचानक काली हो गई। वीडियो वहीं खत्म हो गया। अभिषेक का खून जैसे जम गया। क्योंकि वीडियो की आख़िरी फ्रेम में…
कमरे के अंदर कैमरे के ठीक पीछे
एक और परछाई खड़ी दिखाई दे रही थी।
वर्मा जी ने जो सच बताया
डर के मारे अभिषेक तुरंत वर्मा जी के घर पहुँचा। वीडियो देखकर वर्मा जी का चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा। अब तुम्हें सच जान लेना चाहिए। करीब बीस साल पहले इसी अपार्टमेंट की जगह एक पुराना मकान था।
उस मकान में एक बुज़ुर्ग दंपति रहते थे। एक रात उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे घंटों तक दरवाज़ा खटखटाते रहे। मदद के लिए आवाज़ लगाते रहे। लेकिन किसी पड़ोसी ने दरवाज़ा नहीं खोला। सुबह दोनों की लाश दरवाज़े के बाहर मिली।
तब से….
हर साल कुछ रातों में ठीक 3:00 बजे वही दस्तक सुनाई देती है। कहते हैं। वह किसी को नुकसान पहुँचाने नहीं आते। वे सिर्फ़ यह देखना चाहते हैं कि इस बार….
क्या कोई उनका दरवाज़ा खोलेगा ?
उस घटना के बाद अभिषेक ने वह फ्लैट हमेशा के लिए छोड़ दिया।कुछ दिनों बाद उसे नई जगह नौकरी मिल गई। ज़िंदगी धीरे-धीरे सामान्य होने लगी। लेकिन….
एक रात नई बिल्डिंग में ठीक 3:00 AM पर उसे फिर वही आवाज़ सुनाई दी।
ठक….
ठक….
ठक….
उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई। उसने खुद से कहा। यह कैसे हो सकता है ? धीरे-धीरे वह डोर-आई तक गया। बाहर कोई नहीं था।
लेकिन फ़र्श पर वही गीले पैरों के निशान बने थे और दरवाज़े के नीचे एक पुराना भीगा हुआ कागज़ पड़ा था। उसने काँपते हाथों से उसे उठाया। इस बार उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी।
हमने कहा था….. आख़िरी बार नहीं होगा।
उस दिन के बाद से अभिषेक ने कभी रात 3 बजे दरवाज़े की दस्तक का जवाब नहीं दिया। लेकिन आज भी हर नई जगह….
हर नया घर….
और हर नई रात….
ठीक 3:00 बजे कोई उसके दरवाज़े पर धीरे-धीरे
तीन बार दस्तक ज़रूर देता है।
ठक….
ठक….
ठक….
THE END |
अगर ठीक रात 3 बजे आपके दरवाज़े पर लगातार तीन बार दस्तक सुनाई दे…. और डोर-आई में देखने पर बाहर कोई न दिखे, तो क्या आप हिम्मत करके दरवाज़ा खोलेंगे ?
अगर इस Horror Story in Hindi ने आपको अंत तक डर और सस्पेंस का एहसास कराया तो नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए क्या आप ऐसी रहस्यमयी दस्तक का सामना करेंगे या बिना जवाब दिए पूरी रात दरवाज़ा बंद रखेंगे ?
ऐसी ही नई Real Horror Story in Hindi, भूत-प्रेत की कहानियाँ, चुड़ैल की कहानियाँ, और सस्पेंस से भरी डरावनी कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारे ब्लॉग को Subscribe करें। हर सप्ताह हम एक नई, अनोखी और दिल दहला देने वाली हॉरर स्टोरी लेकर आते हैं।