अगर किसी बंद फैक्ट्री में आधी रात के बाद मशीनें अपने आप चलने लगें… और सुबह वहाँ फिर से धूल की मोटी परत मिल जाए… तो क्या आप उस फैक्ट्री के अंदर जाने की हिम्मत करेंगे ?
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25 साल से बंद पड़ी फैक्ट्री
शिवनगर के बाहर लगभग पाँच एकड़ में फैली हुई शक्ति स्टील एंड केमिकल वर्क्स कभी पूरे इलाके की सबसे बड़ी फैक्ट्री थी। सैकड़ों मजदूर वहाँ काम करते थे। फिर एक रात….
अचानक सब बंद हो गया। सरकारी रिकॉर्ड में सिर्फ़ इतना लिखा था।
केमिकल रिसाव के कारण फैक्ट्री स्थायी रूप से बंद।
बस।
न कोई विस्तृत रिपोर्ट।
न कोई तस्वीर।
न कोई जाँच।
इतनी बड़ी दुर्घटना और सिर्फ़ दो लाइन का रिकॉर्ड। यही बात मुझे अजीब लगी। सरकार उस जगह को तोड़कर नया औद्योगिक पार्क बनाना चाहती थी। मेरी टीम को बिजली और मशीनों की स्थिति की रिपोर्ट बनानी थी। मैं सुबह फैक्ट्री पहुँचा। मुख्य गेट पर लगा जंग लगा बोर्ड आधा टूट चुका था।
दीवारों पर बेलें चढ़ चुकी थीं। ऊपर लगी घड़ी आज भी 2:40 पर रुकी हुई थी। मैंने सोचा शायद हादसे के समय बंद हुई होगी।
गेट के पास एक छोटा कमरा था। वहीं फैक्ट्री का बूढ़ा चौकीदार बैठा था। उसका नाम रामू काका था। उम्र लगभग सत्तर साल। मैंने अपना परिचय दिया। उन्होंने रजिस्टर में मेरा नाम लिखा। फिर बिना मेरी तरफ़ देखे बोले काम जल्दी खत्म कर लेना। मैंने पूछा
क्यों ?
उन्होंने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में अजीब डर था। मैं शाम छह बजे गेट बंद कर देता हूँ। लेकिन मुझे रात तक काम करना है। उन्होंने तुरंत सिर हिला दिया। रात में अंदर मत रहना।
क्यों ?
कुछ सेकंड चुप रहने के बाद उन्होंने धीरे से कहा।
क्योंकि छह बजे के बाद फैक्ट्री हमारी नहीं रहती।
मैं मुस्कुरा दिया। भूत-प्रेत वाली बात ?
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बस अपनी जेब से एक पुराना पंचिंग कार्ड निकाला। उस पर तारीख लिखी थी।
17 अगस्त 1998
और नीचे कर्मचारी का नाम मिट चुका था। लेकिन Punch Time साफ़ लिखा था।
02:40 AM
यह क्या है ?
मैंने पूछा।
रामू काका ने कार्ड वापस जेब में रखा। तीसरी शिफ्ट का कार्ड। मैंने कहा लेकिन रिकॉर्ड में तो सिर्फ़ दो शिफ्ट हैं। उन्होंने मेरी बात काट दी।
रिकॉर्ड में बहुत कुछ नहीं है बेटा।
अंदर सब कुछ मरा हुआ था…. फिर भी कुछ ज़िंदा था
मैं अकेला फैक्ट्री के अंदर चला गया।
इतनी बड़ी इमारत मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। सैकड़ों मशीनें, लंबी कन्वेयर बेल्ट, ऊँची चिमनियाँ और हर जगह धूल की मोटी परत। मैंने एक मशीन पर उँगली फेरी। कम से कम दस साल की धूल जमा थी। मतलब यहाँ लंबे समय से कोई नहीं आया था। मैं अलग-अलग सेक्शन की तस्वीरें लेने लगा। करीब दो घंटे बाद मैं फैक्ट्री के सबसे पुराने हिस्से में पहुँचा। वहाँ एक बड़ा बोर्ड लगा था।
SHIFT – A
> सुबह 6 बजे से दोपहर 2 बजे
SHIFT – B
> दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे
बस। इसके नीचे एक जगह खाली थी। ऐसा लग रहा था। जैसे कभी वहाँ तीसरा बोर्ड लगा हो। जिसे बाद में उखाड़ दिया गया। मैंने दीवार को ध्यान से देखा। पुराने स्क्रू अब भी लगे हुए थे। यानी वहाँ सचमुच कभी कुछ टँगा हुआ था। तभी दूर कहीं धातु के टकराने की आवाज़ आई।
टन्न….
मैंने सोचा शायद हवा से कोई पाइप हिला होगा। मैं आगे बढ़ गया। दो मिनट बाद फिर वही आवाज़।
टन्न…. टन्न….
इस बार लगातार। मैं आवाज़ की दिशा में गया। लेकिन वहाँ कुछ नहीं था। पूरा सेक्शन खाली था। मैं वापस मुड़ने ही वाला था कि मेरे रेडियो सेट से आवाज़ आई।
आर्यन….
मैं चौंक गया। टीम का कोई सदस्य साथ नहीं आया था।
कौन ?
रेडियो में कुछ सेकंड सिर्फ़ खरखराहट हुई। फिर बहुत धीमी आवाज़ आई।
देर मत करना…..
और रेडियो बंद हो गया। मैंने बैटरी निकाली। फिर भी स्पीकर से हल्की-हल्की मशीनों की आवाज़ आती रही।
शाम तक मेरी रिपोर्ट पूरी नहीं हुई। एक मुख्य कंट्रोल रूम अभी बाकी था। मैंने रामू काका से कहा। आज रात यहीं रुकना पड़ेगा। उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी हो।
बेटा…..
उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा रात 2:40 से पहले बाहर निकल जाना। अगर नहीं निकला तो ?
रामू काका की आँखें भर आईं। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा।
फिर वे तुम्हें नया कर्मचारी समझ लेंगे…..
मैं कुछ पूछ पाता उससे पहले वे गेट बंद करके बाहर चले गए। अब पूरी पाँच एकड़ की फैक्ट्री में मैं अकेला था।
या कम से कम मुझे यही लग रहा था। रात के 2:32 बज रहे थे। अचानक पूरी फैक्ट्री में लगी बंद घड़ियाँ एक साथ चलने लगीं।
टिक….
टिक….
टिक….
और ठीक 2:40 AM पर 25 साल से खामोश पड़ा सायरन पूरे इलाके में पहली बार गूँज उठा।
भोंऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽऽ…
उसके साथ ही अंधेरे में खड़ी सैकड़ों मशीनों की लाल बत्तियाँ एक-एक करके जलने लगीं और कंट्रोल रूम के बाहर लगा पुराना स्पीकर अचानक ज़िंदा हो उठा।
थर्ड शिफ्ट के सभी कर्मचारी…. अपनी-अपनी मशीन पर पहुँच जाएँ….
मैंने घबराकर पीछे देखा और जो दृश्य मेरे सामने था। उसने मेरी साँस रोक दी। धूल से ढकी खाली फैक्ट्री में अब सैकड़ों मजदूर खड़े थे। सबने एक जैसी जली हुई यूनिफॉर्म पहन रखी थी और उनमें से किसी का भी चेहरा साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था।
तीसरी शिफ्ट शुरू हो चुकी थी
मेरे हाथ से टॉर्च लगभग छूट गई। कुछ सेकंड पहले जहाँ पूरा हॉल खाली था। अब वहाँ सैकड़ों मजदूर अपनी-अपनी मशीनों के सामने खड़े थे। लेकिन किसी ने मेरे आने पर ध्यान नहीं दिया। कोई मेरी तरफ़ देख भी नहीं रहा था। सबके सिर झुके हुए थे। जैसे उन्हें सिर्फ़ अपने काम से मतलब हो। पूरी फैक्ट्री में एक साथ मशीनों की आवाज़ गूँजने लगी।
घरररर….
ठक…. ठक….
चूँऽऽऽ….
इतनी पुरानी मशीनें जो सालों से जंग खा चुकी थीं। अब बिल्कुल नई जैसी चल रही थीं। लेकिन सबसे डरावनी बात कोई मशीन किसी सामान का उत्पादन नहीं कर रही थी। उन पर सिर्फ़ खाली लोहे की ट्रे घूम रही थीं। मजदूर उन्हें उठाते दूसरी मशीन पर रखते फिर वापस वहीं ले आते।
एक ही काम बार-बार बिना रुके। जैसे वे किसी अंतहीन आदेश का पालन कर रहे हों। मैंने धीरे-धीरे एक मजदूर के पास जाकर कहा।
सुनिए….
उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। उसका शरीर
बर्फ़ से भी ज़्यादा ठंडा था।
उसने धीरे-धीरे अपना सिर मेरी तरफ़ घुमाया। चेहरा पूरी तरह राख से ढका हुआ था। जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं। वहाँ सिर्फ़ धुएँ जैसी काली परत घूम रही थी। उसने पहली बार मुँह खोला। लेकिन आवाज़ उसके मुँह से नहीं। पूरी फैक्ट्री में लगे स्पीकर से आई।
देर से आए हो….
मेरी रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। मैं तुरंत पीछे हट गया। तभी
टन्न….
पूरी फैक्ट्री में लगी पंचिंग मशीन अपने आप बज उठी। एक-एक करके सारे मजदूर वहाँ जाने लगे। वे लाइन बनाकर खड़े हो गए। हर कोई अपना पंच कार्ड मशीन में डालता।
टक….
मशीन समय दर्ज करती और वह मजदूर अपनी मशीन पर लौट जाता। मैंने गौर किया। उनके कार्डों पर तारीख एक ही थी।
17 अगस्त 1998
हर कार्ड उसी तारीख़ का। मैं धीरे-धीरे पीछे हटते हुए बाहर निकलना चाहता था। तभी किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। मैं घबराकर पलटा। एक बूढ़ा मजदूर खड़ा था। उसकी आधी यूनिफॉर्म जली हुई थी। चेहरे पर गहरे जलने के निशान। लेकिन उसकी आँखें बाकी लोगों जैसी नहीं थीं। उनमें दर्द था। वह बहुत धीरे बोला
भाग जाओ…..
यह पहली इंसानी आवाज़ थी जो मैंने उस रात सुनी। मैं कुछ पूछ पाता उसने काँपते हाथ से सामने रखा एक लोहे का लॉकर दिखाया। उसके खुलने से पहले यहाँ से निकल जाओ।
क्यों ?
उसने जवाब नहीं दिया। बस अपनी गर्दन झुका ली। उसी समय पूरी फैक्ट्री में फिर सायरन बजा। स्पीकर से आवाज़ आई।
नया कर्मचारी उपस्थित है…..
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। सभी मजदूर एक साथ धीरे-धीरे मेरी तरफ़ मुड़ने लगे। पहली बार उन्होंने अपना काम रोक दिया था। सैकड़ों चेहरे जो चेहरे नहीं थे। मेरी तरफ़ देख रहे थे। फिर बिना एक शब्द बोले सब मेरी ओर चलने लगे।
मैं पूरी ताकत से भागा। लंबे गलियारे, जंग लगे पाइप, टूटी खिड़कियाँ सब पीछे छूटते गए। लेकिन उनके कदमों की आवाज़ नहीं आ रही थी। जब मैंने पीछे देखा। तो पाया वे चल नहीं रहे थे। वे जहाँ थे वहीं खड़े थे। फिर भी उनके और मेरे बीच की दूरी कम होती जा रही थी। जैसे पूरी फैक्ट्री उन्हें मेरी तरफ़ खिसका रही हो।
लॉकर नंबर 309
भागते-भागते मैं उसी लॉकर के सामने पहुँचा जिसकी तरफ़ बूढ़े मजदूर ने इशारा किया था।
309
दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। अंदर एक नई यूनिफॉर्म टँगी थी। साथ में एक बिल्कुल नया पंचिंग कार्ड। उस पर नाम लिखा था।
आर्यन मेहरा
मेरी साँस रुक गई। यह मेरा नाम था। नीचे कर्मचारी संख्या भी लिखी थी और जॉइनिंग डेट आज की तारीख़। मैंने काँपते हाथों से कार्ड उठाया। पीछे लाल स्याही से सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी।
तीसरी शिफ्ट में आपका स्वागत है।
अचानक लॉकर के अंदर रखा हेलमेट अपने आप ज़मीन पर गिरा। मैंने नीचे देखा। उसके अंदर सूखी राख भरी हुई थी और राख के बीच एक इंसानी दाँत पड़ा था। उसी समय कंट्रोल रूम की तरफ़ से किसी ने ज़ोर से चिल्लाया।
सुपरवाइज़र आ रहा है…..
यह सुनते ही सैकड़ों मजदूर अचानक अपनी जगह पर सीधे खड़े हो गए। इतनी खामोशी छा गई कि मशीनों की आवाज़ भी बंद हो गई। पूरा हॉल सिर्फ़ एक आदमी के आने का इंतज़ार कर रहा था। दूर अंधेरे में धीरे-धीरे भारी जूतों की आवाज़ गूँजने लगी।
ठाक….
ठाक….
ठाक….
हर कदम के साथ फैक्ट्री की लाइटें एक-एक करके बुझने लगीं। आख़िर में सिर्फ़ कंट्रोल रूम का दरवाज़ा रोशन बचा और वहाँ एक लंबी काली आकृति खड़ी थी। उसके हाथ में
पुराना Attendance Register था।
उसने बिना मेरी तरफ़ देखे रजिस्टर खोला और कहा।
आर्यन मेहरा…. आज से तुम्हारी स्थायी नाइट ड्यूटी शुरू होती है…..
उसने अभी तक अपना चेहरा नहीं उठाया था लेकिन पूरी फैक्ट्री में मौजूद हर भूत एक साथ मेरी तरफ़ देखने लगा।
जिस रजिस्टर में मरे हुए कर्मचारियों के नाम दर्ज थे
मेरा पूरा शरीर काँप रहा था। सामने खड़ी वह काली आकृति धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ रही थी। उसके हाथ में पकड़ा Attendance Register इतना पुराना था कि उसके किनारे जल चुके थे। वह मेरे सामने आकर रुक गया। अब भी उसका चेहरा अंधेरे में था। उसने रजिस्टर मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने काँपते हुए उसकी तरफ़ देखा। पहले पन्ने पर लिखा था।
Night Shift – 17 August 1998
नीचे लगभग 186 कर्मचारियों के नाम थे। हर नाम के सामने एक लाल मुहर लगी थी।
COMPLETED
मैं पन्ने पलटता गया। अचानक आखिरी पेज पर मेरी नज़र रुक गई। सबसे नीचे ताज़ी स्याही से लिखा था।
Employee No. 187
आर्यन मेहरा
Joining Time: 02:40 AM
Status: Pending…..
मेरे हाथ सुन्न हो गए। मैंने तुरंत रजिस्टर ज़मीन पर फेंक दिया। लेकिन वह ज़मीन पर गिरा ही नहीं। हवा में रुक गया और फिर धीरे-धीरे अपने आप वापस उस आकृति के हाथों में चला गया।
अब उसने पहली बार अपना सिर उठाया। मैंने जो देखा उसे शब्दों में बताना मुश्किल है। उसका चेहरा चेहरा था ही नहीं। पूरा सिर पिघले हुए लोहे जैसा था। जैसे किसी इंसान पर उबलता हुआ स्टील डाल दिया गया हो।
आँखों की जगह दो जलते हुए नारंगी गड्ढे थे। मुँह खुला हुआ था। लेकिन उसके अंदर जीभ या दाँत नहीं थे। सिर्फ़ जलती हुई भट्ठी जैसी लाल रोशनी दिखाई दे रही थी। उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा।
शिफ्ट कभी खत्म नहीं हुई…..
उसकी आवाज़ किसी इंसान की नहीं। पूरी फैक्ट्री की हर मशीन से एक साथ निकल रही थी। मैं पीछे हटने लगा। तभी वही बूढ़ा मजदूर फिर मेरे पास आया। इस बार उसने बहुत धीरे कहा।
सुनो…. हम सब मर चुके हैं। लेकिन वह हमें जाने नहीं देता। मैंने घबराकर पूछा वह कौन है ?
उसने काँपते हुए कंट्रोल रूम की तरफ़ इशारा किया। हादसे की रात सुपरवाइज़र ने मशीनें बंद नहीं की थीं। उसने फैक्ट्री बचाने के लिए 186 मजदूरों को अंदर बंद कर दिया। दरवाज़े बाहर से लॉक कर दिए और खुद भाग गया।
मैंने पूछा लेकिन वह तो मर गया होगा ?
बूढ़ा मजदूर मुस्कुराया। वह मुस्कान इतनी दर्दनाक थी कि मेरी आँखें भर आईं।
यही तो सज़ा है…. वह भी नहीं मर पाया…..
बूढ़े ने मुझे कंट्रोल रूम की टूटी खिड़की तक ले गया। अंदर साल 1998 की वही रात फिर से शुरू हो चुकी थी। अलार्म बज रहा था। लाल लाइटें चमक रही थीं। मजदूर भाग रहे थे। कोई चिल्ला रहा था।
केमिकल टैंक फटने वाला है। दरवाज़ा खोलो।
लेकिन कंट्रोल रूम के अंदर बैठा सुपरवाइज़र हँस रहा था। उसने इंटरकॉम उठाया और कहा।
कोई बाहर नहीं जाएगा…..
अगले ही पल इतना तेज़ धमाका हुआ कि पूरा कमरा सफेद धुएँ से भर गया। मैंने आँखें बंद कर लीं। जब दोबारा देखा। तो कंट्रोल रूम फिर वैसा ही था। वीरान।
खाली और सामने वही भूत खड़े थे। बूढ़ा मजदूर बोला हम हर रात यही मरते हैं और हर रात फिर काम शुरू कर देते हैं।
मैंने घबराकर पूछा मैं यहाँ से कैसे निकलूँ। बूढ़े ने मेरी हथेली में एक पुरानी फैक्ट्री की चाबी रख दी। बॉयलर नंबर 6…. उसे बंद कर दो। जिस रात उसने हमें मारा था। वह आज भी उसी आग से ज़िंदा है। इतना कहकर वह धीरे-धीरे राख बनकर हवा में उड़ गया।
मैं अकेला रह गया। पीछे सैकड़ों भूत फिर अपनी मशीनों पर लौट चुके थे और सामने बॉयलर सेक्शन का बड़ा लोहे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया। अंदर से ऐसी गर्म हवा आई। जैसे किसी भट्ठी का मुँह खुला हो। लेकिन उस गर्म हवा के बीच मुझे साफ़ सुनाई दिया। किसी बच्चे की आवाज़..
दरवाज़ा बंद कर दो….. इस बार उसे बाहर मत आने देना…..
मैंने टॉर्च उठाई और काँपते कदमों से बॉयलर नंबर 6 की तरफ़ बढ़ गया। अंदर जो मेरा इंतज़ार कर रहा था। वह सिर्फ़ एक भूत नहीं था।
वह पूरी तीसरी शिफ्ट का असली मालिक था।
बॉयलर नंबर 6 का दरवाज़ा
लोहे का विशाल दरवाज़ा आधा खुला हुआ था। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे खोला हो। अंदर का तापमान इतना ज़्यादा था कि साँस लेना मुश्किल हो रहा था। लेकिन अजीब बात इतनी गर्मी के बावजूद मेरे मुँह से धुआँ नहीं निकल रहा था।
मानो उस कमरे की हवा ज़िंदा इंसानों के लिए बनी ही न हो। मैंने टॉर्च आगे की। बॉयलर नंबर 6 अब भी जल रहा था। पच्चीस साल से बंद पड़ी फैक्ट्री लेकिन उसकी भट्ठी आज भी लाल थी। उसके सामने एक लोहे की कुर्सी रखी थी और उस कुर्सी पर कोई बैठा हुआ था। वही सुपरवाइज़र।
इस बार उसका चेहरा साफ़ दिखाई दे रहा था। आधा चेहरा पिघले हुए लोहे में बदल चुका था। दूसरा आधा बिल्कुल सामान्य। वह मुझे देखकर मुस्कुराया।
आ गए ?
उसकी आवाज़ शांत थी। डरावनी नहीं लेकिन इतनी ठंडी कि शरीर सुन्न हो जाए। मैंने पूछा तुमने उन लोगों को क्यों मारा ?
वह कुछ देर चुप रहा। फिर बोला मैंने उन्हें नहीं मारा। मैंने फैक्ट्री बचाई थी। मैंने गुस्से से कहा 186 लोग अंदर जलकर मर गए। वह हँसने लगा। फैक्ट्री बच गई थी और मालिक खुश था।
उसने कुर्सी से उठकर बॉयलर की तरफ़ इशारा किया। देखो मैंने अंदर झाँका और मेरी चीख निकल गई। भट्ठी के अंदर कोयला नहीं जल रहा था। वहाँ सैकड़ों पंचिंग कार्ड जल रहे थे। हर कार्ड पर किसी कर्मचारी का नाम लिखा था।
जैसे-जैसे कार्ड जलते वैसे-वैसे बाहर मशीनों की आवाज़ तेज़ हो जाती। सुपरवाइज़र बोला जब तक आख़िरी कार्ड नहीं जलेगा। तीसरी शिफ्ट चलती रहेगी।
मैंने पूछा मेरा कार्ड कहाँ है ?
उसने मुस्कुराकर अपनी जेब से कार्ड निकाला।
आर्यन मेहरा Employee No. 187
उसने कार्ड आग की तरफ़ बढ़ाया। बस इसे डाल दूँ। फिर तुम भी हमेशा के लिए यहीं काम करोगे। मैंने पूरी ताकत से उसके हाथ पर लात मारी। कार्ड नीचे गिर गया। मैंने तुरंत उसे उठाया। उसी समय पूरी फैक्ट्री काँपने लगी। सायरन लगातार बजने लगा। सुपरवाइज़र पहली बार गुस्से में चिल्लाया।
वह कार्ड वापस दो।
उसकी आवाज़ के साथ सैकड़ों भूत बॉयलर रूम की तरफ़ दौड़ने लगे लेकिन वे मुझे पकड़ने नहीं आ रहे थे। वे उस सुपरवाइज़र को रोक रहे थे। पहली बार 186 भूत उसके सामने खड़े हो गए। वही बूढ़ा मजदूर सबसे आगे था। उसने मेरी तरफ़ देखकर चिल्लाया….
आग बुझा दो…..
मैंने चारों तरफ़ देखा। दीवार पर पुराना Emergency Valve लगा था। मैंने पूरी ताकत से उसे घुमाया। पहले कुछ नहीं हुआ। फिर एक ज़ोरदार धमाका हुआ। ऊपर लगी पानी की विशाल पाइपलाइन फट गई। हज़ारों लीटर पानी सीधे बॉयलर के अंदर गिरने लगा।
श्श्श्श्श…..
भाप पूरे कमरे में भर गई। भट्ठी की लाल आग धीरे-धीरे बुझने लगी और उसी के साथ सुपरवाइज़र दर्द से चीखने लगा। उसका शरीर लोहे की तरह टूटने लगा। वह चिल्ला रहा था। शिफ्ट मत रोकना मालिक आने वाला है। काम पूरा करना है। लेकिन इस बार किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।
186 आत्माएँ आज़ाद हो गईं
जैसे ही आग पूरी तरह बुझी। फैक्ट्री की सारी मशीनें एक साथ बंद हो गईं। सायरन हमेशा के लिए शांत हो गया। मेरे सामने खड़े सभी मजदूर धीरे-धीरे राख नहीं। बल्कि रोशनी में बदलने लगे। हर चेहरे से जलने के निशान गायब हो रहे थे। अब वे सामान्य इंसानों की तरह दिखाई दे रहे थे। बूढ़ा मजदूर मेरे पास आया।
उसने पहली बार मुस्कुराकर कहा आज हमारी शिफ्ट खत्म हो गई। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
धन्यवाद…..
और अगले ही पल वह हवा में घुल गया। एक-एक करके सभी 186 आत्माएँ गायब हो गईं। पूरी फैक्ट्री फिर से खाली हो गई।
छह महीने बाद…..
सरकार ने उस फैक्ट्री को पूरी तरह गिरा दिया। मैंने टीवी पर उसकी खबर देखी। मलबे की खुदाई के दौरान वहाँ से 186 कंकाल मिले। बिल्कुल उसी जगह जहाँ बॉयलर नंबर 6 था। सरकारी रिकॉर्ड बदल दिए गए। सालों पुराना सच पहली बार सामने आया।
THE END |
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