कभी आपने सोचा है कि किसी पुराने कुएँ का पानी आपकी प्यास तो बुझा दे, लेकिन उसके बाद हर रात आपको एक ही डरावना सपना दिखाई देने लगे ? नरैनीपुर गाँव में एक ऐसा ही कुआँ था जिसके पानी से लोग वर्षों से दूर रहते थे। कहा जाता था कि जो भी उसका पानी पीता, उसे सपने में एक लंबा सुनसान कमरा, एक रहस्यमयी कुर्सी और उस पर बैठे एक अनजान आदमी दिखाई देता था। लेकिन किसी को नहीं पता था कि वह सपना असल में किसी दूसरी दुनिया का दरवाज़ा था।
यह कहानी सिर्फ़ एक Horror Story in Hindi नहीं, बल्कि उस कुएँ के पीछे छिपे एक ऐसे रहस्य की कहानी है, जिसे जानने के बाद शायद आप किसी अनजान कुएँ का पानी पीने से पहले दो बार ज़रूर सोचेंगे।
वह कुआँ जिसके पास दिन में भी सन्नाटा रहता था
उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में पहाड़ियों और सूखे खेतों के बीच एक छोटा-सा गाँव था नरैनीपुर। गाँव बहुत बड़ा नहीं था। करीब दो सौ घर, एक पुराना मंदिर, पंचायत भवन, प्राथमिक स्कूल और गाँव के आखिरी छोर पर एक विशाल बरगद का पेड़। लेकिन उस गाँव की सबसे पुरानी चीज़ थी।
काला कुआँ।
नाम सुनकर शायद आपको लगेगा कि कुआँ काला इसलिए होगा क्योंकि उसका पानी गंदा होगा। ऐसा नहीं था। उसका पानी इतना साफ था कि गर्मियों में जब आसपास के सारे हैंडपंप सूख जाते, तब भी उस कुएँ का पानी नीचे काले शीशे की तरह चमकता दिखाई देता था।
कुएँ की गोल पत्थर की दीवार लगभग सात फीट ऊँची थी। उस पर कोई बेल नहीं चढ़ी थी। कोई पेड़ उसके पास नहीं उगता था और सबसे अजीब बात कुएँ के आसपास की जमीन हमेशा बाकी गाँव से कुछ डिग्री ठंडी रहती थी।
गाँव के लोग उस कुएँ से पानी भरते जरूर थे, लेकिन सूर्यास्त के बाद उसके पास जाना लगभग मना था। बचपन में मुझे भी इस कुएँ के बारे में एक बात बताई गई थी। मेरी दादी कहा करती थीं।
कुएँ का पानी प्यास बुझाता है…. लेकिन जो सपना दिखाता है उससे कोई नहीं बचता।
तब मैं उनकी बात पर हँस देता था। मुझे क्या पता था कि कई साल बाद वही बात मेरी जिंदगी की सबसे डरावनी सच्चाई बनने वाली है।
मेरा नाम अमन है। मैं पिछले कई सालों से दिल्ली में रह रहा था और एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। नरैनीपुर मेरा पैतृक गाँव था। पिता की तबीयत खराब रहने लगी तो मुझे कुछ दिनों के लिए गाँव लौटना पड़ा। गाँव पहुँचते ही बचपन की सारी यादें वापस आने लगीं।
वही मिट्टी की सड़कें। वही पुराना स्कूल।
वही मंदिर।
और वही काला कुआँ। पहले दिन मैं उसके पास गया। कुएँ के पास पहुँचते ही अजीब-सी ठंडक महसूस हुई। मैंने नीचे झाँका। पानी बिल्कुल स्थिर था। इतना स्थिर कि उसमें मेरा चेहरा साफ दिखाई दे रहा था। मैंने मुस्कुराकर अपना प्रतिबिंब देखा। फिर अचानक मुझे लगा पानी में मेरे चेहरे के पीछे कोई और भी खड़ा है।
मैंने तुरंत पलटकर देखा। पीछे कोई नहीं था। मैंने फिर कुएँ में देखा। इस बार सिर्फ़ मेरा चेहरा था। मैंने खुद को समझाया थकान है और घर लौट आया।
गाँव में एक अजीब नियम
रात के खाने पर मैंने माँ से पूछा माँ, अभी भी लोग काले कुएँ का पानी पीते हैं ?
माँ कुछ सेकंड चुप रहीं। फिर बोलीं
नहीं।
क्यों ?
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। तुम्हें याद नहीं
क्या….?
तुम्हारी दादी ने मना किया था। मैं हँस पड़ा। दादी तो हर चीज़ से डराती थीं। माँ ने हँसा नहीं। उन्होंने बस इतना कहा। उस कुएँ का पानी मत पीना।
क्यों ?
क्योंकि यहाँ जिसने भी उसका पानी लगातार तीन रात पिया है। वह रुक गईं। उसने एक ही सपना देखा है। मैंने मज़ाक में पूछा
कौन सा सपना ?
माँ ने मेरी तरफ़ सीधे देखते हुए कहा एक लंबा कमरा। उस कमरे के बीच में एक कुर्सी। कुर्सी पर बैठा एक आदमी। उसका चेहरा दिखाई नहीं देता और सामने दीवार पर वह अचानक चुप हो गईं। मैंने पूछा
क्या ?
माँ ने धीरे से कहा।
तुम्हारा अपना घर बना होता है।
मैं हँसने लगा। लेकिन माँ की आँखों में डर देखकर मेरी हँसी धीरे-धीरे बंद हो गई।
पहला सपना
अगले दिन दोपहर में मुझे बहुत गर्मी लगी। घर के बाहर रखा पानी खत्म हो गया था। माँ मंदिर गई हुई थीं। मैंने बिना सोचे कुएँ से पानी निकाल लिया। पानी ठंडा था। बहुत ठंडा। मैंने एक गिलास पिया। स्वाद बिल्कुल सामान्य था।
न कोई बदबू।
न कोई अजीब स्वाद। कुछ नहीं। मैंने सोचा इतनी-सी बात पर गाँव वाले डरते हैं। उस रात करीब दो बजे मेरी आँख खुली। मैं पसीने से भीगा हुआ था। कुछ सेकंड तक मुझे समझ नहीं आया कि मैं कहाँ हूँ। फिर मुझे सपना याद आया। मैं एक लंबे कमरे में खड़ा था। कमरा इतना लंबा था कि उसका दूसरा सिरा दिखाई नहीं दे रहा था।
दीवारें बिल्कुल सफेद थीं। बीच में एक लकड़ी की कुर्सी थी। उस पर कोई आदमी बैठा था। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी। मैंने उसे पुकारा।
कौन हो…?
वह नहीं हिला। मैं आगे बढ़ा। जितना मैं उसके करीब जाता। कुर्सी उतनी ही दूर होती जाती। फिर अचानक दीवार पर लगी एक तस्वीर दिखाई दी। वह मेरे घर की तस्वीर थी। लेकिन तस्वीर में मेरा घर खाली नहीं था। दरवाज़े पर
मैं खुद खड़ा था।
मैंने सपने में उस तस्वीर को छूने के लिए हाथ बढ़ाया। तभी कुर्सी पर बैठा आदमी बोला।
तुम बहुत देर से आए हो।
मैं चौंककर जाग गया।
दूसरा दिन
सुबह उठते ही मैंने माँ से सपना बताया। उनका चेहरा बदल गया। तुमने कुएँ का पानी पिया था ?
मैं चुप हो गया। उन्होंने तुरंत कहा। आज से उसका पानी मत पीना। मैंने पूछा क्या हर कोई यही सपना देखता है ?
माँ ने जवाब नहीं दिया। मैंने गाँव के पुराने किराने वाले हरिराम चाचा से पूछा। पहले उन्होंने टालने की कोशिश की। लेकिन जब मैंने ज्यादा पूछा तो उन्होंने दुकान का शटर आधा गिरा दिया। तुम्हारी उम्र में मैंने भी वही सपना देखा था।
कितनी बार ?
पहली बार पानी पीने के बाद।
फिर ?
दूसरी रात भी।
तीसरी रात ?
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। तीसरी रात सपना बदल गया था। मैंने उत्सुक होकर पूछा
कैसे ?
उन्होंने धीरे से कहा तीसरी रात उस आदमी ने अपना चेहरा दिखाया था। कौन था ? हरिराम चाचा ने सिर हिलाया। मैंने नहीं देखा।
मतलब ?
जब उसने चेहरा उठाया वह रुक गए। मेरी आँख खुल गई।
फिर ?
फिर मैंने देखा उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
मेरे कमरे में वही आदमी खड़ा था।
मेरे हाथ से गिलास छूटते-छूटते बचा। मैंने पूछा फिर आपने क्या किया ?
मैंने आँखें बंद कर लीं।
क्यों ?
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। क्योंकि सपना खत्म हो गया था। लेकिन वह आदमी जागने के बाद भी मेरे कमरे में खड़ा था।
उस दिन मैं पंचायत भवन के पीछे रहने वाले मास्टर शिवकुमार से मिलने गया। वह गाँव के सबसे पढ़े-लिखे आदमी थे। मैंने उनसे कुएँ के बारे में पूछा। उन्होंने पुराने कागजों की एक फाइल निकाली। यह कुआँ करीब डेढ़ सौ साल पुराना है।
इसे किसने बनवाया ?
किसी जमींदार ने।
कोई हादसा हुआ था ?
उन्होंने सिर हिलाया। एक हादसा नहीं।
तो ?
बहुत सारे। उन्होंने फाइल में एक पुराना नक्शा दिखाया। कुएँ के नीचे लाल निशान बना था।
यह क्या है ?
पुराना जल-मार्ग। मैंने ध्यान से देखा। कुएँ के नीचे से एक सुरंग जैसी रेखा निकल रही थी। वह गाँव के बाहर एक सूखे टीले तक जाती थी। यह सुरंग कहाँ जाती थी ?
मास्टर जी बोले, किसी को नहीं पता।
क्या इसे कभी खोला गया ?
लगभग चालीस साल पहले।
फिर ?
उन्होंने फाइल बंद कर दी। जो लोग अंदर गए थे। वह चुप हो गए।
मैंने पूछा
क्या हुआ था ?
उन्होंने मेरी आँखों में देखा। उनमें से तीन वापस आए थे।
बाकी ?
उन्होंने कहा था। अंदर बहुत सारे कमरे हैं और हर कमरे में एक कुर्सी रखी है।
तीसरी रात
उस रात मैंने तय किया कि मैं कुएँ के पास नहीं जाऊँगा। लेकिन रात के करीब एक बजे मुझे बहुत तेज़ प्यास लगी। कमरे में रखा पानी खत्म था। मैंने सोचा रसोई से पानी ले लूँ। लेकिन जैसे ही बाहर निकला मुझे आँगन में किसी के चलने की आवाज़ सुनाई दी। धीरे-धीरे….
चप्प….
चप्प….
जैसे कोई गीले पैरों से चल रहा हो। मैंने दरवाज़े की दरार से बाहर देखा। आँगन खाली था। फिर आवाज़ आई। इस बार मेरे कमरे के ठीक बाहर।
चप्प….
चप्प….
मैंने दरवाज़ा नहीं खोला। कुछ देर बाद आवाज़ बंद हो गई। फिर किसी ने दरवाज़े पर बहुत हल्की दस्तक दी।
ठक।
बस एक बार। मैंने पूछा
कौन ?
कोई जवाब नहीं। मैंने धीरे से दरवाज़ा खोला। बाहर गीले पैरों के निशान थे। वे निशान कमरे से बाहर नहीं जा रहे थे। वे…..
सीधे मेरी चारपाई तक आकर खत्म हो रहे थे।
उस रात मुझे फिर वही सपना आया। लंबा कमरा। कुर्सी। पीठ किए बैठा आदमी। लेकिन इस बार कमरा पहले से छोटा था। मैं कुर्सी के करीब पहुँच गया। आदमी ने कहा।
अब तुम मुझे पहचानते हो।
मैंने कहा नहीं। उसने धीरे-धीरे अपना सिर घुमाया। मैं उसका चेहरा देखने ही वाला था कि मेरी आँख खुल गई। लेकिन इस बार मेरे कमरे में अंधेरा नहीं था। खिड़की से हल्की चाँदनी आ रही थी और मेरी चारपाई के सामने
एक लकड़ी की कुर्सी रखी थी।
वही कुर्सी। जो सपने में थी। मैं जम गया। कुर्सी खाली थी। मैंने धीरे-धीरे उसके पास जाकर देखा। उसकी सीट पर कुएँ की काली मिट्टी लगी थी और उसके नीचे एक छोटी-सी चीज़ पड़ी थी। एक पुरानी पीतल की चाबी।
चाबी का रहस्य
सुबह मैं चाबी लेकर मास्टर शिवकुमार के पास गया। उन्होंने चाबी देखते ही कहा।
यह कहाँ मिली ?
मेरे कमरे में।
उनका चेहरा पीला पड़ गया। तुमने कुएँ का पानी फिर पिया ?
नहीं।
उन्होंने चाबी को कपड़े में लपेट दिया। इसे हाथ मत लगाना।
क्यों ?
यह उसी सुरंग की चाबी है। मेरी धड़कन तेज़ हो गई।
आपको कैसे पता ?
उन्होंने कहा, क्योंकि यही चाबी चालीस साल पहले उन तीन लोगों में से एक के पास थी।
वह कहाँ है ?
मास्टर जी ने मेरी तरफ़ देखा। मर चुका है।
कब ?
दो दिन पहले। मैं चुप रह गया। लेकिन मैंने तारीख याद करने की कोशिश की। वह आदमी गाँव में मेरे आने से ठीक एक दिन पहले मरा था। हम दोनों शाम को कुएँ तक गए। कुएँ की दीवार के नीचे एक पुराना पत्थर था। मास्टर जी ने उसे हटाया। नीचे लोहे का छोटा-सा दरवाज़ा था। चाबी उसी में लगी। दरवाज़ा खोलते ही सड़ी हुई हवा बाहर आई।
अंदर सीढ़ियाँ थीं। हम नीचे उतरे। करीब बीस सीढ़ियों के बाद एक लंबा गलियारा शुरू हुआ। मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। गलियारा बिल्कुल वैसा ही था। जैसा मैं सपने में देखता था।
सफेद दीवारें।
लंबा रास्ता और दूर
एक कुर्सी।
मैंने मास्टर जी का हाथ पकड़ लिया। मैंने इसे देखा है। उन्होंने कुछ नहीं कहा। हम आगे बढ़े। कुर्सी के पीछे दीवार पर एक तस्वीर लगी थी। मैंने टॉर्च ऊपर की। तस्वीर देखकर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। वह….
मेरा घर था।
लेकिन तस्वीर पुरानी थी। बहुत पुरानी। मेरे घर की छत पर वही बरगद का पेड़ था जो आज भी आँगन के पीछे खड़ा था। तस्वीर के नीचे तारीख लिखी थी।
1896
मैंने फुसफुसाकर कहा। यह कैसे हो सकता है ?
मास्टर जी पीछे हट गए। अमन….
उनकी आवाज़ काँप रही थी। तस्वीर में सिर्फ़ घर नहीं है। मैंने ध्यान से देखा। खिड़की के अंदर एक आदमी खड़ा था। उसका चेहरा धुंधला था। लेकिन उसके कपड़े मेरे कपड़ों जैसे थे।
कुएँ का असली काम
गलियारे की दीवारों पर कई छोटे-छोटे कमरे थे। हर कमरे में एक कुर्सी। हर कुर्सी के सामने एक तस्वीर। अलग-अलग घरों की तस्वीरें।
मास्टर जी बोले शायद यह जगह पानी रखने के लिए नहीं थी।
फिर ?
उन्होंने दीवार पर बने निशानों को देखा। यहाँ लोग आते थे।
क्यों ?
शायद सपने देखने।
मैंने पूछा
लेकिन क्यों ?
उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। तभी पीछे से आवाज़ आई।
क्योंकि सपना हमेशा भविष्य नहीं दिखाता…..
हम दोनों एक साथ पलटे। गलियारे के आखिरी छोर पर वही आदमी खड़ा था। जिसे मैं तीन रातों से सपने में देख रहा था। इस बार उसका चेहरा दिखाई दे रहा था।लेकिन वह चेहरा किसी एक इंसान का नहीं था। उसकी त्वचा पर कई चेहरों की परतें थीं।
जैसे अलग-अलग उम्र के लोग उसके चेहरे के अंदर फँसे हों। वह मुस्कुराया।
कुछ लोग सपने में आते हैं। कुछ लोग सपने से बाहर निकलते हैं। मास्टर जी काँपते हुए पीछे हटे।
तुम कौन हो ? वह आदमी बोला।
मैं वह हूँ जिसे हर पीढ़ी किसी नए नाम से बुलाती है।
उसने मेरी तरफ़ देखा। तुम्हारे दादा भी यहाँ आए थे। मैंने कहा मेरे दादा ?
हाँ।
उन्होंने भी पानी पिया था।
फिर ?
वह मुस्कुराया। उन्होंने तीसरी रात मुझे देखा।
मैंने पूछा उन्होंने क्या किया ?
उसने कहा उन्होंने मुझे बाहर आने दिया। मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
क्या मतलब ?
वह आदमी मेरे करीब आया। तुम्हें लगता है कि तुम मुझे सपने में देख रहे थे ?
उसने मेरी आँखों में देखा।
असल में मैं तुम्हें देख रहा था।
अचानक सभी कमरे के दरवाज़े एक साथ बंद हो गए। मास्टर जी चीखने लगे। गलियारे की दीवारों पर लगी तस्वीरें हिलने लगीं और हर तस्वीर में लोगों के चेहरे बदलने लगे।
फिर एक तस्वीर में मैंने अपनी माँ को देखा। दूसरी में अपने पिता को। तीसरी में….
खुद को। मैंने पीछे हटकर कहा।
यह क्या है ?
वह आदमी बोला हर बार कुएँ का पानी पीने वाला कोई एक व्यक्ति मुझे सपने में देखता है। लेकिन वह सपना नहीं होता। वह निमंत्रण होता है।
मैंने पूछा किस चीज़ का ?
उसने मुस्कुराकर कहा।
तुम्हारे घर में रहने का।
आखिरी दरवाज़ा
मास्टर जी ने अचानक मेरा हाथ पकड़ा।
भागो !
हम गलियारे में दौड़े। पीछे से कई आवाज़ें आने लगीं। कोई रो रहा था। कोई हँस रहा था।
कोई मेरा नाम पुकार रहा था। लेकिन सबसे डरावनी आवाज़ मेरी माँ की थी।
अमन बेटा….
रुक जाओ।
मैं रुकने ही वाला था कि मास्टर जी ने मुझे जोर से खींचा। वह तुम्हारी माँ नहीं है। हम सीढ़ियों तक पहुँच गए। लेकिन वहाँ सीढ़ियाँ थीं ही नहीं। जहाँ रास्ता होना चाहिए था। वहाँ एक और कमरा था और कमरे के बीच एक कुर्सी।
कुर्सी पर….
मैं बैठा हुआ था।
मेरी ही शक्ल।
मेरे ही कपड़े।
लेकिन वह मैं…. मुस्कुरा रहा था। उसने धीरे से कहा। तुम ऊपर जाओगे तो मैं नीचे रह जाऊँगा। मैंने काँपते हुए पूछा और अगर मैं नहीं गया ?
उसने कहा।
तो तुम यहीं रहोगे। मास्टर जी ने अचानक दीवार पर हाथ मारा। एक पत्थर टूट गया। पीछे छोटा रास्ता था। हम उस रास्ते से रेंगते हुए आगे बढ़े। कुछ देर बाद ऊपर से हल्की रोशनी दिखाई दी। हम बाहर निकल आए। हम कुएँ के बिल्कुल पास थे।
अगले दिन मैंने गाँव छोड़ने का फैसला किया। माँ ने पूछा
क्या हुआ ?
मैंने कुछ नहीं बताया। मैं बस शहर वापस जाना चाहता था। बस में बैठने से पहले मैंने आखिरी बार कुएँ की तरफ़ देखा। कुआँ शांत था। पानी स्थिर था। मैंने सोचा शायद सब खत्म हो गया। लेकिन तभी कुएँ के पानी में मेरा प्रतिबिंब दिखाई दिया। मैंने अपना चेहरा देखा और मेरे पीछे एक कुर्सी थी।
उस पर वही आदमी बैठा था। मैंने तुरंत पलटकर देखा। पीछे कोई नहीं था। फिर पानी में देखा। कुर्सी गायब थी। मैं शहर लौट आया।
तीन महीने बाद
मैंने कुएँ की बात किसी से नहीं की। धीरे-धीरे सब सामान्य होने लगा। एक रात मैं अपने कमरे में सो रहा था। करीब 2:17 बजे मेरी आँख खुली। कमरे में अंधेरा था। लेकिन मेरी चारपाई के सामने एक कुर्सी रखी थी। वही पुरानी लकड़ी की कुर्सी। मैं उठकर उसके पास गया। उस पर एक गिलास रखा था। गिलास में….
कुएँ का काला पानी।
मैं पीछे हट गया। तभी मेरे मोबाइल पर माँ का फोन आया। मैंने तुरंत उठाया। उधर माँ रो रही थीं।
अमन…..
क्या हुआ ?
तुम्हारे पापा….
क्या हुआ पापा को ?
कुछ सेकंड चुप्पी रही। फिर माँ ने कहा वह रात से एक ही बात बोल रहे हैं।
क्या ?
माँ की आवाज़ काँप रही थी।
वह कह रहे हैं कि कमरे में कोई बैठा है।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
माँ उन्हें अकेला मत छोड़ना। तभी फोन पर पापा की आवाज़ आई। बहुत धीमी। अमन….
मैंने कहा, हाँ पापा ?
उन्होंने कहा
तुमने उसे बाहर क्यों आने दिया ?
कॉल कट गया।
आखिरी सपना
उस रात मुझे फिर सपना आया। मैं उसी लंबे कमरे में खड़ा था। लेकिन इस बार कमरे में सिर्फ़ एक कुर्सी नहीं थी।
सैकड़ों कुर्सियाँ थीं। हर कुर्सी पर कोई न कोई बैठा था। कुछ बूढ़े।
कुछ बच्चे।
कुछ जवान और सबसे आगे मेरे दादा बैठे थे। उन्होंने मुझे देखकर कहा। अब तुम्हारी बारी है। मैंने पीछे देखा। वही आदमी मेरे पीछे खड़ा था। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और पहली बार उसका चेहरा पूरी तरह बदल गया। वह चेहरा
मेरा था।
उसने मेरे कान के पास फुसफुसाकर कहा।
कुएँ का पानी तुमने पिया था….
लेकिन सपना..
वह मुस्कुराया।
मैंने नहीं देखा था।
मैं चीखकर जाग गया। सुबह होते ही मैंने गाँव जाने का फैसला किया। लेकिन उससे पहले मेरे कमरे की दीवार पर नज़र पड़ी। जहाँ पहले सिर्फ़ खाली दीवार थी। वहाँ अब एक पुरानी तस्वीर टंगी थी। मैंने तस्वीर उतारी। उसमें
नरैनीपुर का काला कुआँ था।
नीचे तारीख लिखी थी।
1896
और कुएँ के सामने खड़े लोगों में मेरे दादा थे।
मेरे पिता थे।
मेरी माँ थीं।
और मैं भी था। लेकिन तस्वीर के कोने में लिखी तारीख के नीचे एक और तारीख थी। 2026 मेरे हाथ से तस्वीर गिर गई। उसी समय मेरे पीछे किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा
अब तुमने मुझे देख लिया है।
मैंने पीछे मुड़ने की हिम्मत नहीं की। क्योंकि कमरे में…
किसी के पानी पीने की आवाज़ आ रही थी।
घूँट….
घूँट….
घूँट….
मैंने काँपते हुए सामने लगे आईने की तरफ़ देखा। आईने में मेरे पीछे एक आदमी बैठा था। वही कुर्सी। वही चेहरा। वही काला पानी। लेकिन इस बार उसके हाथ में एक गिलास था। उसने गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाया और मुस्कुराकर कहा
अबकी बार सपना तुम्हारा नहीं होगा…. अब सपना देखने वाला कोई और होगा।
उसके बाद मुझे याद नहीं कि मैं कितनी देर तक बेहोश रहा। जब मेरी आँख खुली मेरे कमरे में कोई नहीं था। कुर्सी भी नहीं थी। गिलास भी नहीं था। लेकिन मेरे फोन पर एक नया वीडियो रिकॉर्ड हुआ था। वीडियो में मेरा कमरा दिखाई दे रहा था। मैं सो रहा था। मेरे बिस्तर के पास वही आदमी बैठा था। उसने कैमरे की तरफ़ देखकर सिर्फ़ इतना कहा।
अगला पानी किसे पिलाना है ?
वीडियो यहीं खत्म हो जाता है और सबसे डरावनी बात उस वीडियो की रिकॉर्डिंग के समय मेरे फोन की तारीख थी कल की।
THE END |
नरैनीपुर के उस कुएँ का रहस्य शायद आज भी वहीं मौजूद हो। सवाल सिर्फ़ इतना है क्या सपने में दिखाई देने वाला वह आदमी सच में कुएँ के अंदर था, या वह किसी नए इंसान के बाहर आने का इंतज़ार कर रहा था?
अगर इस Horror Story in Hindi ने आपको अंत तक डर और सस्पेंस का एहसास कराया तो नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए क्या आप ऐसी रहस्यमयी दस्तक का सामना करेंगे या बिना जवाब दिए पूरी रात दरवाज़ा बंद रखेंगे ?
ऐसी ही नई Real Horror Story in Hindi, भूत-प्रेत की कहानियाँ, चुड़ैल की कहानियाँ, और सस्पेंस से भरी डरावनी कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारे ब्लॉग को Subscribe करें। हर सप्ताह हम एक नई, अनोखी और दिल दहला देने वाली हॉरर स्टोरी लेकर आते हैं।