अँधेरे का निमंत्रण Part-2 – Best horror story in hindi

दर्पण के उस पार

जब अद्वैत की आँख खुली, वह अपने ही बिस्तर पर था। खिड़की से सुबह की रोशनी अंदर आ रही थी।

“सपना था…” उसने राहत की साँस ली।

पर उसके हाथ पर गहरे नाखूनों के निशान थे।

वह भागकर ऊपर वाले कमरे में गया। दरवाज़ा खुला था। अंदर सब सामान्य। कुर्सी स्थिर। कोई दीपक नहीं।

“मैं पागल हो रहा हूँ,” उसने बुदबुदाया।

तभी उसकी नज़र दीवार पर टंगे पुराने दर्पण पर पड़ी। दर्पण में उसका प्रतिबिंब… मुस्कुरा रहा था।

जबकि उसके होंठ स्थिर थे।

वह जड़ हो गया।

प्रतिबिंब ने धीरे-धीरे सिर तिरछा किया।

“तुझे लगा, इतना आसान होगा?” आवाज़ सीधे उसके दिमाग में गूँजी।

अद्वैत पीछे हटना चाहता था, पर उसके पैर जैसे ज़मीन में धँस गए।

दर्पण की सतह तरल होने लगी, जैसे पानी हो। प्रतिबिंब ने हाथ बाहर निकाला—ठंडा, बर्फ जैसा।

“तेरे दादा ने मुझे बुलाया था,” वह बोला। “पर कीमत चुकाने से डर गए। अब तू देगा।”

अचानक अद्वैत को याद आया—दादा की डायरी!

वह भागकर नीचे आया और पुरानी अलमारी से डायरी निकाली। पन्ने पीले पड़ चुके थे।

एक पन्ने पर लिखा था—

“वह दर्पण में बँधा है। जब तक कोई उसका स्थान न ले, वह मुक्त नहीं होगा। यदि मेरे वंश का कोई लौटे, तो सावधान रहे।”

अद्वैत का दिल बैठ गया।

ऊपर से काँच टूटने की आवाज़ आई।

वह दौड़कर ऊपर गया।

दर्पण चटक चुका था। दरारों में काला धुआँ भर रहा था।

और उसके सामने… वही काली आँखों वाला दूसरा अद्वैत खड़ा था।

“समय पूरा,” उसने कहा।

कमरे की दीवारें काँपने लगीं। हवा में फुसफुसाहटें भर गईं—पाँच अलग-अलग आवाज़ें।

अद्वैत को अचानक समझ आया—वे पाँच लोग, जिनकी तस्वीर थी… वे मुक्त नहीं हुए थे। वे इसी दर्पण में कैद थे।

“अगर मैं खुद को न दूँ?” उसने चिल्लाकर पूछा।

दूसरा अद्वैत हँसा। “तो मैं खुद ले लूँगा।”

अचानक अद्वैत ने पूरी ताकत से डायरी उठाई और दर्पण पर दे मारी।

काँच पूरी तरह टूट गया।

एक चीख गूँजी—इतनी तीखी कि कानों से खून रिसने लगा।

काला धुआँ कमरे में फैल गया, फिर धीरे-धीरे छत की दरारों में समा गया।

सब शांत।

फर्श पर सिर्फ टूटे काँच के टुकड़े थे।

अद्वैत काँपते हुए नीचे बैठ गया। उसे लगा, सब खत्म हो गया।

पर तभी उसने महसूस किया—कुछ बदला है।

कमरे के कोने में पड़ा छोटा-सा दर्पण अब साफ था।

उसने उसमें झाँका।

प्रतिबिंब सामान्य था।

पर जैसे ही वह मुड़ा, दर्पण में उसका प्रतिबिंब खड़ा रहा।

और धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा।

नीचे से सावित्री काकी की आवाज़ आई—“अद्वैत बेटा, सब ठीक है?”

वह सीढ़ियों की ओर बढ़ा।

हर पायदान पर उसके कदमों की आवाज़ के साथ एक और कदम की आहट गूँज रही थी।

ठक… ठक… ठक…

हवेली ने एक और साँस ली।

और इस बार, वह अकेला नहीं था।

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part-1 अँधेरे का निमंत्रण Part-1

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