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दर्पण के उस पार
जब अद्वैत की आँख खुली वह अपने ही बिस्तर पर था। खिड़की से सुबह की रोशनी अंदर आ रही थी। सपना था….. उसने राहत की साँस ली। पर उसके हाथ पर गहरे नाखूनों के निशान थे। वह भागकर ऊपर वाले कमरे में गया। दरवाज़ा खुला था। अंदर सब सामान्य। कुर्सी स्थिर। कोई दीपक नहीं।
मैं पागल हो रहा हूँ…… उसने बुदबुदाया। तभी उसकी नज़र दीवार पर टंगे पुराने दर्पण पर पड़ी। दर्पण में उसका प्रतिबिंब…. मुस्कुरा रहा था। जबकि उसके होंठ स्थिर थे। वह जड़ हो गया। प्रतिबिंब ने धीरे-धीरे सिर तिरछा किया।
तुझे लगा इतना आसान होगा……? आवाज़ सीधे उसके दिमाग में गूँजी। अद्वैत पीछे हटना चाहता था पर उसके पैर जैसे ज़मीन में धँस गए। दर्पण की सतह तरल होने लगी जैसे पानी हो। प्रतिबिंब ने हाथ बाहर निकाला ठंडा बर्फ जैसा।
तेरे दादा ने मुझे बुलाया था वह बोला। पर कीमत चुकाने से डर गए। अब तू देगा। अचानक अद्वैत को याद आया दादा की डायरी। वह भागकर नीचे आया और पुरानी अलमारी से डायरी निकाली। पन्ने पीले पड़ चुके थे।
एक पन्ने पर लिखा था। वह दर्पण में बँधा है। जब तक कोई उसका स्थान न ले वह मुक्त नहीं होगा। यदि मेरे वंश का कोई लौटे तो सावधान रहे। अद्वैत का दिल बैठ गया। ऊपर से काँच टूटने की आवाज़ आई।
वह दौड़कर ऊपर गया। दर्पण चटक चुका था। दरारों में काला धुआँ भर रहा था और उसके सामने वही काली आँखों वाला दूसरा अद्वैत खड़ा था। समय पूरा उसने कहा। कमरे की दीवारें काँपने लगीं। हवा में फुसफुसाहटें भर गईं पाँच अलग-अलग आवाज़ें।
अद्वैत को अचानक समझ आया वे पाँच लोग जिनकी तस्वीर थी। वे मुक्त नहीं हुए थे। वे इसी दर्पण में कैद थे। अगर मैं खुद को न दूँ…..? उसने चिल्लाकर पूछा।
दूसरा अद्वैत हँसा। तो मैं खुद ले लूँगा। अचानक अद्वैत ने पूरी ताकत से डायरी उठाई और दर्पण पर दे मारी। काँच पूरी तरह टूट गया। एक चीख गूँजी इतनी तीखी कि कानों से खून रिसने लगा।
काला धुआँ कमरे में फैल गया फिर धीरे-धीरे छत की दरारों में समा गया। सब शांत। फर्श पर सिर्फ टूटे काँच के टुकड़े थे। अद्वैत काँपते हुए नीचे बैठ गया। उसे लगा सब खत्म हो गया।
पर तभी उसने महसूस किया कुछ बदला है। कमरे के कोने में पड़ा छोटा-सा दर्पण अब साफ था। उसने उसमें झाँका। प्रतिबिंब सामान्य था। पर जैसे ही वह मुड़ा दर्पण में उसका प्रतिबिंब खड़ा रहा और धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा। नीचे से सावित्री काकी की आवाज़ आई अद्वैत बेटा सब ठीक है ?
वह सीढ़ियों की ओर बढ़ा। हर पायदान पर उसके कदमों की आवाज़ के साथ एक और कदम की आहट गूँज रही थी।
ठक….. ठक….. ठक…..
हवेली ने एक और साँस ली और इस बार वह अकेला नहीं था।
अधूरी मुक्ति

सीढ़ियों से नीचे उतरते हुए अद्वैत ने तय कर लिया था। वह अब इस हवेली में एक रात भी नहीं रुकेगा।
नीचे आँगन में पहुँचते ही उसने दरवाज़ा खोला। बाहर वही तंग गली थी सुबह की धूप दीवारों से टकराकर अंदर झाँक रही थी। दूर कहीं मंदिर की घंटी बज रही थी शायद काशी विश्वनाथ मंदिर से। सावित्री काकी दरवाज़े पर खड़ी थीं।
बेटा तेरी आवाज़ आई थी ऊपर से। सब ठीक है न…….? अद्वैत ने उनकी ओर देखा। कुछ अजीब था। उनकी आँखों में हल्की-सी चमक वही काली चमक।
हाँ काकी सब ठीक है उसके मुँह से निकला। पर उसे यकीन नहीं था कि यह उसने कहा था। जैसे शब्द उसके भीतर से नहीं कहीं और से आ रहे हों। अचानक उसे लगा कि उसके पीछे कोई खड़ा है। उसने पलटकर देखा कोई नहीं। पर उसके कान के पास एक ठंडी फुसफुसाहट आई।
भागकर कहाँ जाएगा…….?
अद्वैत ने काकी को कुछ कहे बिना दरवाज़ा बंद कर दिया। वह समझ चुका था यह अब सिर्फ हवेली तक सीमित नहीं रहा। वह ऊपर गया अपना बैग उठाया और जल्दी-जल्दी कपड़े भरने लगा। तभी कमरे का तापमान गिरने लगा। साँस से धुआँ निकलने लगा।
दीवार पर टंगी घड़ी उलटी दिशा में घूमने लगी।
टिक….. टिक….. टिक…..
फिर
ठक….. ठक….. ठक…..
इस बार आवाज़ हवेली के हर कोने से आ रही थी। अद्वैत ने बैग छोड़ दिया।
तुझे क्या चाहिए………? वह चीखा।
कमरे की हवा भारी हो गई। सामने दर्पण के टूटे टुकड़े खुद-ब-खुद खिसककर एक वृत्त में जमने लगे। काँच के टुकड़े हवा में उठे घूमे और फिर एक अधूरा दर्पण बन गया। उस अधूरे दर्पण में उसका प्रतिबिंब दिखा पर अकेला नहीं।
उसके पीछे पाँच धुँधली आकृतियाँ खड़ी थीं। उन्हीं पाँच लोगों की। प्रतिबिंब ने धीरे-धीरे सिर झुकाया। तूने समझा था दर्पण तोड़ने से हम मुक्त हो जाएँगे उसकी आवाज़ अब गूँज नहीं गर्जना थी। हम दर्पण में नहीं तेरे खून में बँधे हैं।
अद्वैत के दिमाग में जैसे बिजली कौंधी। दादा की डायरी के आखिरी पन्ने की अधूरी पंक्ति। यदि वंशज स्वयं को त्याग दे तभी चक्र टूटेगा।
त्याग…….? उसने बुदबुदाया। दूसरा अद्वैत मुस्कुराया। जीवन का।
कमरे की दीवारों से काले हाथ निकलने लगे। ठंडे, बेजान, पर मजबूत। वे उसके पैरों को जकड़ने लगे। अद्वैत ने पूरी ताकत से खुद को छुड़ाने की कोशिश की। मैं तुम्हें अपना शरीर नहीं दूँगा। वह चिल्लाया।
हमें शरीर नहीं चाहिए पाँचों आवाज़ें एक साथ बोलीं। हमें प्रवेश चाहिए। अचानक उसके भीतर तेज़ जलन हुई। जैसे नसों में आग दौड़ रही हो। आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उसे लगा उसकी चेतना पीछे धकेली जा रही है जैसे कोई उसे उसके ही दिमाग के कोने में बंद कर रहा हो।
तभी उसकी नज़र फर्श पर पड़ी दादा की टूटी माला। वह किसी तरह झुका माला उठाई और अपनी कलाई में कसकर लपेट ली।
आपने गलती की थी दादा उसने दाँत भींचकर कहा पर मैं नहीं करूँगा। उसने आँखें बंद कीं और जोर से बोला।
मैं स्वेच्छा से इस श्राप को समाप्त करता हूँ। मुझे ले जाओ…….. पर किसी और को मत छूना।
कमरा अचानक शांत हो गया। काले हाथ गायब। दर्पण के टुकड़े गिरकर बिखर गए। कुछ क्षण तक सन्नाटा रहा। फिर अद्वैत की देह ज़मीन पर गिर पड़ी।
एक सप्ताह बाद…..
सावित्री काकी हवेली के बाहर खड़ी थीं। दरवाज़ा खुला था। अंदर आँगन में अद्वैत बैठा था। शांत। स्थिर।
बेटा सब ठीक है ? उन्होंने पूछा। अद्वैत ने धीरे-धीरे सिर उठाया। इस बार उसकी आँखें सामान्य थीं। चेहरा थका हुआ पर शांत। सब ठीक है काकी उसने मुस्कुराकर कहा और सचमुच हवेली में अब कोई ठक-ठक नहीं थी। न फुसफुसाहट। न ठंडा झोंका।
कुछ दिन बाद अद्वैत ने हवेली बेच दी और शहर छोड़ दिया। लोग कहते हैं हवेली अब खाली है पर कभी-कभी आधी रात को उस गली से गुजरने वाले कहते हैं। उन्हें किसी के कदमों की आहट सुनाई देती है।
ठक…. ठक…. ठक….
और हवेली की टूटी खिड़की में एक चेहरा दिखता है।
शांत। मुस्कुराता हुआ। वह अद्वैत जैसा दिखता है पर उसकी आँखें….. पूरी तरह काली होती हैं।
वापसी
हवेली बिक चुकी थी।
नए मालिक एक व्यापारी परिवार ने उसे सस्ते दाम में खरीद लिया। उनका मानना था कि भूत-वूत कुछ नहीं होता। पुरानी इमारत थी। थोड़ी मरम्मत होगी और किराए पर चढ़ जाएगी। पहली रात सब सामान्य रहा।
दूसरी रात घर की सबसे छोटी बेटी तृषा ने कहा। माँ ऊपर वाले कमरे में कोई चलता है। माँ ने हँसकर टाल दिया। पुराना घर है, लकड़ी बैठती है तो आवाज़ करती है।
तीसरी रात
ठक…. ठक….. ठक….
आवाज़ सिर्फ ऊपर से नहीं दीवारों के भीतर से आ रही थी। व्यापारी श्री अग्रवाल टॉर्च लेकर ऊपर गए। वही पुराना कमरा। वही जगह जहाँ कभी दर्पण था। दीवार अब नई पलस्तर से ढकी थी।
पर जैसे ही उन्होंने दरवाज़ा खोला टॉर्च झिलमिलाने लगी। कमरे के बीचोंबीच फर्श पर काँच का एक छोटा-सा टुकड़ा रखा था। उन्होंने झुककर उसे उठाया। उस छोटे-से टुकड़े में उन्हें अपना चेहरा दिखा। पर पीछे……
कोई और खड़ा था। उन्होंने तुरंत पलटकर देखा कमरा खाली। फिर से काँच में झाँका। अब प्रतिबिंब में उनके पीछे पाँच धुँधली आकृतियाँ थीं और बीच में….. एक युवा आदमी।शांत। मुस्कुराता हुआ।
नहीं….. उनके मुँह से निकला।
काँच का टुकड़ा अचानक उनकी उँगलियों में चुभ गया। खून की एक बूँद उस पर गिर पड़ी। और उसी क्षण कमरे की हवा जम गई। दीवार पर नई पलस्तर में दरारें उभरने लगीं। वे दरारें फैलती गईं आपस में जुड़ती गईं और कुछ ही पलों में दीवार पर फिर वही दर्पण-सा आकार बन गया।
दरारों के बीच काला अँधेरा था। उस अँधेरे से आवाज़ आई।
स्वागत है।
अग्रवाल पीछे हटे पर दरवाज़ा अपने आप बंद हो चुका था। नीचे उनकी पत्नी ने घड़ी देखी। रात के ठीक 12:12 । ऊपर से एक तीखी चीख गूँजी। फिर…….
सन्नाटा।
अगले दिन पुलिस आई। कमरा अंदर से बंद था। दरवाज़ा तोड़ा गया। कमरा खाली। फर्श पर सिर्फ काँच का एक छोटा टुकड़ा और दीवार पर उभरी पाँच हथेलियों के निशान।
अग्रवाल कभी नहीं मिले।
पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
शहर के दूसरे छोर पर…..
एक नए अपार्टमेंट की बालकनी में अद्वैत खड़ा था। हवा शांत थी। उसकी आँखें सामान्य दिखती थीं। पर जब वह भीतर आया और बाथरूम के दर्पण में देखा। प्रतिबिंब ने कुछ क्षण देर से उसकी हरकत दोहराई।
फिर प्रतिबिंब ने धीरे से फुसफुसाया।
एक गया… चार बाकी।
अद्वैत के होंठ नहीं हिले। पर उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। धीरे-धीरे। अप्राकृतिक।
उसे अब सब याद था। उस रात हवेली में उसने त्याग किया था। पर मरने का नहीं। दरवाज़ा खोलने का।
उसने खुद को नहीं दिया। उसने रास्ता दिया। अब दर्पण किसी एक जगह से बँधा नहीं था। जहाँ भी कोई काँच में झाँकता। जहाँ भी कोई अपनी परछाईं पर भरोसा करता वहाँ एक दरार बन सकती थी। और दरारों के उस पार
वे पाँच नहीं थे। वे अब छह थे।
ठक….. ठक….. ठक…..
और इस बार आवाज़ बाहर से नहीं आपके पीछे से आ रही है।
THE END |
Part -1 पढ़ें….. https://horrorstory.in/अँधेरे-का-निमंत्रण-part-1/