जिस आदमी ने मेरा सामान लौटाया, वह तीन साल पहले मर चुका था

वह सामान जो रास्ते में गायब हो गया

मेरा नाम विवेक है। उस समय मैं नोएडा में एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था और कुछ महीनों के लिए दूसरे शहर में शिफ्ट होने वाला था। मैंने अपना ज्यादातर सामान एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के जरिए भेज दिया था। कुछ कपड़े, किताबें, एक पुराना लैपटॉप बैग, जरूरी कागज और मेरी कुछ निजी चीजें एक बड़े भूरे रंग के बैग में थीं।

सामान की डिलीवरी अगले दिन होनी थी। लेकिन जब सामान पहुँचा, तो वह बैग गायब था। ड्राइवर ने कहा कि शायद वह दूसरे वाहन में चला गया होगा। मैंने काफी फोन किए, लेकिन बैग का कोई पता नहीं चला। उसमें कोई बहुत कीमती चीज नहीं थी, इसलिए दो दिन बाद मैंने उसे खोया हुआ मान लिया।

तीसरे दिन शाम को मैं अपने नए किराए के मकान में बैठा था। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला। सामने करीब पचास-पचपन साल का एक आदमी खड़ा था। हल्की सफेद शर्ट, भूरे रंग की पैंट और हाथ में मेरा वही बैग। उसने मुस्कुराकर कहा।

ये आपका है ना ?

मैं कुछ सेकंड तक उसे देखता रह गया।

हाँ…. लेकिन आपको कहाँ मिला ?

उसने कहा। गलती से मेरे सामान के साथ आ गया था। उसने बैग मेरी तरफ बढ़ा दिया। मैंने धन्यवाद कहा। वह बिना कुछ बोले मुड़ा और सीढ़ियाँ उतरकर चला गया। मुझे तब तक बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि जिस आदमी ने मेरा सामान लौटाया था।

वह तीन साल पहले मर चुका था।

मैंने बैग खोलकर सामान देखना शुरू किया। सब कुछ लगभग वैसा ही था जैसा मैंने पैक किया था। कपड़े।

दो किताबें।

कुछ पुराने कागज।

चार्जर।

और एक छोटी डायरी। लेकिन नीचे एक चीज़ पड़ी थी जिसे देखकर मैं रुक गया। एक पुरानी लोहे की चाबी। वह मेरी नहीं थी। मैंने उसे उठाकर देखा। चाबी के साथ कागज का एक छोटा टुकड़ा बंधा था। उस पर लिखा था।

कमरा 17

मैंने सोचा शायद ट्रांसपोर्ट के दौरान गलती से किसी और का सामान मेरे बैग में आ गया होगा। मैंने चाबी अलग रख दी। फिर भी मेरे दिमाग में उस आदमी की बात घूमती रही। गलती से मेरे सामान के साथ आ गया था। अगर बैग उसके सामान के साथ गया था, तो उसे मेरा पता कैसे मिला।

मैंने यह सवाल अगले दिन उससे पूछने का फैसला किया। लेकिन उसके पास जाने की जरूरत नहीं पड़ी। क्योंकि वह आदमी मुझे दोबारा दिखाई नहीं दिया।

उस पते की तलाश

बैग पर ट्रांसपोर्ट कंपनी का पुराना स्टिकर लगा था। उस पर एक पता लिखा था। मैंने इंटरनेट पर वह पता खोजा। वह शहर के पुराने हिस्से में एक मकान का पता था। अगले रविवार मैं वहाँ चला गया। मकान काफी पुराना था। गेट पर घंटी बजाई। एक बुजुर्ग महिला ने दरवाज़ा खोला।

मैंने पूछा।

क्या यहाँ पहले एक साहब रहते थे? करीब पचास-पचपन साल के।

महिला ने पूछा।

नाम ?

मैंने बैग पर मिले पुराने कागज से नाम पढ़ा।

रमेश मेहरा।

महिला का चेहरा अचानक बदल गया। उसने कुछ सेकंड तक मुझे देखा। फिर पूछा।

आप उन्हें कैसे जानते हैं ?

मैंने कहा।

कल उन्होंने मेरा सामान लौटाया था।

महिला के हाथ से दरवाज़े की कुंडी छूटते-छूटते बची।

कल ?

मैंने सिर हिलाया।

हाँ।

महिला ने दरवाज़ा थोड़ा और खोल दिया।

अंदर आइए।

बैठक में दीवार पर कई तस्वीरें लगी थीं। महिला ने एक तस्वीर की तरफ इशारा किया। मैंने जैसे ही देखा। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

वही आदमी।

वही चेहरा।

वही सफेद शर्ट जैसा कपड़ा।

वही आँखें।

मैंने तुरंत कहा।

यही थे।

महिला कुछ नहीं बोली। उसने धीमे स्वर में कहा।

ये मेरे पति थे।

मैंने पूछा।

तो फिर…. वह मेरी बात पूरी होने से पहले ही बोली। इनकी मौत तीन साल पहले हो चुकी है। कमरे में अचानक अजीब खामोशी छा गई। मैंने सोचा शायद कोई मजाक है। लेकिन महिला के चेहरे पर मजाक का नाम तक नहीं था। उसने अलमारी से एक पुरानी फाइल निकाली। उसमें मृत्यु प्रमाणपत्र था। तारीख तीन साल पुरानी थी। मैं कुर्सी पर बैठ गया। मेरे दिमाग में वही सवाल घूम रहा था।

अगर रमेश मेहरा तीन साल पहले मर चुके थे, तो मेरा सामान मेरे घर कौन लेकर आया था ?

कमरा नंबर 17

महिला ने पूछा,

आपके पास कुछ और भी आया था ?

मैंने कुछ पल सोचा। फिर मैंने वह चाबी निकाली। महिला ने उसे देखते ही मेरी तरफ देखा। उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

ये आपको कहाँ मिली ?

मैंने कहा,

मेरे बैग में।

वह चुप रही।

फिर बोली इसे वापस कर दीजिए।

क्यों ?

क्योंकि ये मेरे पति की है। मैंने चाबी उसकी हथेली पर रख दी। लेकिन वह चाबी लेने से पहले ही पीछे हट गई।

नहीं।

आपने अभी कहा, मैंने कहा ये उनकी है। मैंने ये नहीं कहा कि इसे घर में रखना चाहिए।

मैं कुछ समझ नहीं पाया। उसने बताया कि रमेश एक पुरानी स्टोरेज बिल्डिंग में सामान रखने का काम करते थे। उस बिल्डिंग में कई छोटे कमरे थे। हर कमरे को नंबर दिया गया था। उनका पसंदीदा कमरा था।

17।

रमेश की मौत के बाद परिवार ने वह कमरा बंद करवा दिया था। लेकिन महिला ने एक बात और बताई। मौत से कुछ दिन पहले रमेश अजीब व्यवहार करने लगे थे।

कैसा ?

वह बार-बार कहते थे कि कुछ सामान गलत लोगों तक पहुँच रहा है।

मैंने पूछा।

कौन-सा सामान ?

वह बोली। उन्हें खुद नहीं पता था। घर लौटकर मैंने बैग में मिले सारे कागज फिर से देखे। इस बार मुझे एक पुरानी रसीद मिली। उस पर उसी स्टोरेज बिल्डिंग का नाम था।

कमरा नंबर 17।

रसीद पर तारीख तीन साल पुरानी थी और नीचे कई सामानों की सूची थी। एक बैग।

एक घड़ी।

कुछ कागज।

एक पुरानी चाबी और आखिरी लाइन पर लिखा था।

सामान प्राप्त करने वाला – आर. मेहरा।

मेरे हाथ काँपने लगे। रमेश के मरने से पहले की रसीद थी। लेकिन मेरे बैग में उसकी चाबी कैसे आई ?

मैंने ट्रांसपोर्ट कंपनी को फोन किया। उन्होंने बताया कि मेरा बैग जिस पुराने गोदाम में कुछ समय रखा गया था, वह वही बिल्डिंग थी। मैंने पूछा,

वहाँ कमरा नंबर 17 है ?

ऑपरेटर कुछ सेकंड चुप रहा। फिर बोला,

हाँ।

वहाँ अभी कौन है ?

कोई नहीं।

कब से बंद है ?

उसने कहा काफी समय से।

अगले दिन मैं उस बिल्डिंग में गया। एक बूढ़ा चौकीदार वहाँ बैठा था। मैंने कमरा नंबर 17 के बारे में पूछा। वह तुरंत बोला, वहाँ मत जाइए। मैंने पूछा

क्यों ?

उसने कहा कमरा बंद है।

बस इतना ?

वह मेरी तरफ देखने लगा। फिर बोला।

रमेश बाबू के बाद हमने उसे कभी नहीं खोला।

मैंने कहा, मेरे सामान के साथ उनकी चाबी आई है।

चौकीदार ने चाबी देखते ही जेब से अपना पुराना रजिस्टर निकाला। उसने एक पन्ना खोला। वहाँ कई नाम लिखे थे। कुछ नामों के सामने तारीखें थीं। कुछ के सामने सिर्फ एक शब्द

लौटाया गया।

मैंने पूछा,

ये क्या है ?

चौकीदार बोला रमेश बाबू का रिकॉर्ड।

किस चीज़ का ?

उन लोगों का सामान जो कभी खो गया था। मैंने पन्ने पलटे। कई सालों के रिकॉर्ड थे। हर कुछ महीनों में कोई न कोई सामान लौटाया गया था। लेकिन एक बात अजीब थी। जिन लोगों का सामान वापस हुआ था। उनमें से कई लोग बाद में कभी उस पते पर नहीं आए।

कमरे के अंदर

चौकीदार ने बहुत मना किया। लेकिन आखिरकार उसने ताला खोल दिया। दरवाज़ा खुलते ही एक अजीब सी गंध आई। पुराने कागज और बंद कमरे की गंध। कमरा छोटा था। चारों तरफ लोहे की अलमारियाँ थीं। अंदर दर्जनों पैकेट रखे थे। हर पैकेट पर किसी व्यक्ति का नाम लिखा था। मैंने एक पैकेट उठाया। उस पर लिखा था।

संदीप कुमार।

दूसरे पर

माया देवी।

तीसरे पर

अशोक शर्मा।

फिर मुझे एक पैकेट दिखाई दिया। उस पर मेरा नाम लिखा था।

विवेक शर्मा।

मेरी सांस रुक गई। मैंने पैकेट खोला। अंदर मेरी एक पुरानी घड़ी थी। वही घड़ी जो मैं बचपन में पहनता था और वर्षों पहले खो गई थी। मैंने उसे कभी किसी को नहीं दी थी। वह यहाँ कैसे आई ?

तभी चौकीदार ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। इसे वापस रखिए। मैंने पूछा,

रमेश बाबू ने इसे यहाँ क्यों रखा ?

चौकीदार ने कहा क्योंकि वह कहते थे कि कुछ चीज़ें अपने मालिक को खुद ढूँढ लेती हैं।

कमरे की सबसे पुरानी अलमारी में मुझे एक डायरी मिली। वह रमेश की थी। आखिरी कुछ पन्नों में उसने सामानों के बारे में लिखा था। एक जगह लिखा था।

जिस चीज़ को कोई खो देता है, वह हमेशा खोई हुई नहीं रहती।

अगली लाइन थी।

कुछ चीज़ें रास्ता बदलकर वापस आती हैं।

और आखिरी पन्ने पर सिर्फ इतना लिखा था।

अगर मेरे मरने के बाद भी सामान लौटता रहे, तो उसे रोकने की कोशिश मत करना।

उसके नीचे एक नाम था।

विवेक।

मैंने डायरी बंद कर दी। मेरे पैर जैसे जमीन से चिपक गए थे। मेरा नाम उसकी डायरी में तीन साल पहले लिखा जा चुका था। जबकि उस समय मैं रमेश को जानता तक नहीं था। मैं वह घड़ी लेकर घर वापस आ गया। उस रात मैंने उसे मेज पर रखा। घड़ी बंद थी। सुबह उठकर देखा तो घड़ी चल रही थी। मैंने उसे हाथ में लिया। पीछे एक छोटी खरोंच थी। वहीं बचपन में मैंने अपना नाम खुद लिखा था।

VIVEK

मैंने किसी को नहीं बताया कि घड़ी मुझे कहाँ मिली। कुछ दिनों तक सब सामान्य रहा। फिर एक शाम दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। नीचे वही भूरे रंग का बैग रखा था। मेरा वही बैग। जो मेरे पास पहले से था। मैंने डरते हुए उसे उठाया। अंदर सिर्फ एक चीज़ थी।

एक चाबी।

इस बार वह किसी कमरे की नहीं थी।

वह मेरे घर की चाबी थी। मेरे सामने पड़ी मेरी अपनी चाबी और उसके साथ एक छोटा कागज। मैंने उसे खोला। उस पर लिखा था।

आपका सामान वापस कर दिया है। अब मेरी बारी है।

मैं कई मिनट तक उस कागज को देखता रहा। फिर मेरी नजर दरवाज़े पर गई। मेरी असली चाबी अभी भी मेरी जेब में थी। फिर यह दूसरी चाबी किसकी थी? मैंने धीरे से उसे ताले में लगाया। चाबी घूम गई। दरवाज़ा खुल गया। लेकिन बाहर मेरा गलियारा नहीं था। वहाँ वही पुराना स्टोरेज कमरा था।

कमरा नंबर 17।

अंदर लोहे की अलमारियाँ थीं और सबसे सामने वाली मेज पर एक नया पैकेट रखा था। उस पर लिखा था।

रमेश मेहरा।

मैंने पैकेट को छुआ भी नहीं। उसी समय पीछे से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई। मैं पलटा। कमरा खाली था। लेकिन मेज पर रखी रमेश की डायरी का आखिरी पन्ना अपने आप खुला हुआ था। उस पन्ने पर अब एक नई लाइन दिखाई दे रही थी। स्याही अभी गीली थी।

लिखा था।

जिसका सामान लौट जाता है, वह सुरक्षित नहीं होता…..
सिर्फ अगली बारी तक बचा रहता है।

और उसके नीचे आज की तारीख लिखी थी। मैंने वह कमरा उसी समय छोड़ दिया। लेकिन आज भी जब कभी मेरे घर की घंटी बजती है और बाहर कोई नहीं होता… तो दरवाज़े के पास एक भूरे रंग का बैग पड़ा मिलता है। हर बार उसके अंदर कुछ अलग होता है। और हर बार उसके साथ एक ही लाइन लिखी होती है।

सामान आपका है….. लेकिन इसे वापस करने वाला कौन है, यह मत पूछना।

THE END |

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