पीपल वाली चिट्ठियाँ


१. पीली चिट्ठी

बेलापुर के डाकघर में सुबह की डाक हमेशा साढ़े आठ बजे आती थी। जीप का हॉर्न बजता, खाकी थैला मेज़ पर पटका जाता और रघुनाथ प्रसाद अपनी मोटे फ़्रेम वाली ऐनक नाक पर चढ़ाकर चिट्ठियाँ छाँटने बैठ जाते।

अट्ठावन साल के रघुनाथ को गाँव वाले “रघु काका” कहते थे। चालीस साल से वे इसी गाँव में डाक बाँट रहे थे। कौन-सा घर किस गली में है, किसके बेटे की चिट्ठी शहर से आती है और किसकी बेटी ससुराल से मनीऑर्डर भेजती है — सब उन्हें ज़ुबानी याद था। अगले महीने उनकी सेवानिवृत्ति थी, और वे अक्सर कहते, “बस, अब साइकिल की घंटी को आराम देना है।”

उस सोमवार को, जब बाहर होली से पहले की हल्की गर्मी फैलने लगी थी, रघु काका के हाथ एक लिफ़ाफ़े पर रुक गए।

लिफ़ाफ़ा पीला पड़ चुका था, जैसे बरसों किसी संदूक में बंद रहा हो। उस पर पुराना पच्चीस पैसे का डाक टिकट लगा था, जो अब कहीं नहीं चलता। मुहर धुँधली थी, पर तारीख़ पढ़ी जा सकती थी — १२ मार्च १९८६, कलकत्ता।

और पता? पता पढ़ते ही रघु काका की उँगलियाँ ठंडी हो गईं।

श्रीमती सावित्री देवी, पीपल वाला मकान, बेलापुर।

उन्होंने चश्मा उतारकर आँखें मलीं, फिर दोबारा पढ़ा। कोई ग़लती नहीं थी। लिखावट नीली स्याही की थी — सधी हुई, थोड़ी झुकी हुई, जैसे लिखने वाला जल्दी में हो।

“क्या हुआ काका? भूत देख लिया क्या?” डाकघर के क्लर्क मनोज ने हँसते हुए पूछा।

रघु काका ने जवाब नहीं दिया। पूरा बेलापुर जानता था कि पीपल वाला मकान अब मकान नहीं रहा। चालीस साल पहले, होली की रात, वह घर आग में जलकर राख हो गया था। उसके अंदर सावित्री देवी भी थीं। अब वहाँ सिर्फ़ काली पड़ी ईंटों का एक ढेर था और उसके ऊपर झुका हुआ एक विशाल पीपल, जिसकी जड़ें उन ईंटों को जकड़े रहती थीं।

“किसी ने मज़ाक किया होगा,” मनोज ने कंधे उचकाए। “पुरानी चिट्ठी किसी दराज़ से निकली होगी और किसी ने डिब्बे में डाल दी।”

शायद। रघु काका ने ख़ुद को यही समझाया। पर एक बात उन्हें चुभ रही थी — यह लिफ़ाफ़ा उस सीलबंद थैले में आया था जो ज़िला मुख्यालय से सीधे आता है। उसमें कोई बाहर से कुछ नहीं डाल सकता।

२. राख पर रखी चिट्ठी

दिन भर वह लिफ़ाफ़ा रघु काका के थैले में पड़ा रहा, और दिन भर उन्हें लगता रहा कि थैला बाक़ी दिनों से भारी है।

शाम को, जब सूरज खेतों के पीछे डूबने लगा, वे अपनी पुरानी साइकिल लेकर गाँव के उत्तरी छोर की ओर चल पड़े। वहाँ तक कोई पक्की सड़क नहीं जाती थी। कच्ची पगडंडी, दोनों ओर सरसों के सूखते खेत, और आख़िर में वह पीपल।

पेड़ के नीचे पहुँचकर उन्होंने साइकिल खड़ी की। हवा बिल्कुल ठहरी हुई थी, फिर भी पीपल के पत्ते धीमे-धीमे खड़खड़ा रहे थे — जैसे कोई बहुत धीरे से फुसफुसा रहा हो।

राख अब राख नहीं थी। चालीस बरसातों ने उसे मिट्टी बना दिया था। पर ईंटें अब भी काली थीं, और दरवाज़े की चौखट का एक जला हुआ टुकड़ा अब भी ज़मीन में धँसा खड़ा था।

“सावित्री भाभी…” रघु काका के मुँह से अनायास निकला। फिर वे झेंप गए। किससे बात कर रहे थे?

उन्होंने लिफ़ाफ़ा चौखट के पास एक पत्थर के नीचे दबा दिया। डाकिये का नियम है — जो चिट्ठी आई है, वह पहुँचनी चाहिए। मन ही मन उन्होंने सोचा, बस, मेरा काम ख़त्म।

लौटते समय उन्हें लगा कि पीछे से किसी ने साइकिल की घंटी बजाई। उन्होंने मुड़कर देखा। पगडंडी ख़ाली थी।

३. जवाब

अगली सुबह रघु काका ने डाकघर पहुँचकर अपना थैला खोला, और उनकी साँस अटक गई।

थैले में, उनकी पानी की बोतल और रजिस्टर के बीच, एक काग़ज़ मुड़ा हुआ रखा था। वह लिफ़ाफ़ा नहीं था — किसी पुरानी कॉपी का फटा हुआ पन्ना था, जिसके किनारे झुलसे हुए थे। उस पर पेंसिल से, गोल-गोल अक्षरों में लिखा था:

“डाकिया बाबू, चिट्ठी मिल गई। पर यह पहली है। दूसरी कहाँ है? और वह वाली कहाँ है जो आपने होली पर देनी थी?”

पन्ने से धुएँ की गंध आ रही थी। ताज़ा धुआँ, जैसे अभी-अभी किसी चूल्हे के पास से उठाया गया हो।

रघु काका कुर्सी पर बैठ गए। उनके हाथ काँप रहे थे।

वह वाली जो आपने होली पर देनी थी।

इन शब्दों ने उनके भीतर कोई बहुत पुराना, बहुत गहरा दबा हुआ दरवाज़ा खटखटा दिया था।

४. दूसरी चिट्ठी

उस दिन के थैले में फिर एक पीला लिफ़ाफ़ा था। वही लिखावट, वही पता। इस बार मुहर पर तारीख़ थी — २६ मार्च १९८६।

रघु काका ने इस बार उसे खोलने का साहस किया। डाक नियमों के ख़िलाफ़ था, पर डर नियमों से बड़ा था।

अंदर एक छोटा-सा पत्र था:

“प्रिय सावित्री, मिल में होली की छुट्टी मिल गई है। मैं होली की रात की गाड़ी से आऊँगा। पीपल के नीचे खिड़की में दीया जलाकर रखना, ताकि अँधेरे में घर दूर से दिख जाए। मुन्नी के लिए लाल चूड़ियाँ ला रहा हूँ। तुम्हारा, हरीश”

रघु काका ने पत्र वापस तह किया। उन्हें याद आया — हरीश, सावित्री भाभी के पति, कलकत्ता की किसी जूट मिल में काम करते थे। हर महीने उनकी चिट्ठी आती थी और हर महीने सावित्री भाभी दरवाज़े पर खड़ी होकर डाकिये का इंतज़ार करती थीं।

और उस समय बेलापुर का डाकिया कौन था?

अठारह साल का एक लापरवाह लड़का, जिसे अभी-अभी यह नौकरी मिली थी। रघुनाथ।

शाम को वे फिर पीपल के पास गए। चिट्ठी पत्थर के नीचे रखी। इस बार उन्होंने ध्यान दिया कि पिछली चिट्ठी वहाँ नहीं थी। पत्थर के नीचे की मिट्टी पर राख की एक पतली परत थी, जैसे किसी ने काग़ज़ को छूकर जलने दिया हो।

उस रात रघु काका सो नहीं पाए। आँख लगती तो सपने में लकड़ी चटकने की आवाज़ आती। किसी औरत की धीमी खाँसी। और एक दीया, जो खिड़की पर रखा था और हवा में काँप रहा था।

५. कमला का सवाल

“आपके थैले पर यह कालिख कैसी है?” अगली सुबह रघु काका की पत्नी कमला ने पूछा।

रघु काका ने देखा। खाकी थैले के कोने पर काली उँगलियों के निशान थे — पतली, छोटी उँगलियाँ। किसी औरत की।

थैले के अंदर फिर एक झुलसा हुआ पन्ना था:

“वे आ रहे थे? फिर मैंने दीया क्यों जलाए रखा? किसी ने मुझे बताया क्यों नहीं कि गाड़ी देर से आएगी? डाकिया बाबू, तीसरी चिट्ठी कहाँ है?”

कमला ने पन्ना पढ़ा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। “यह… यह क्या है? किसकी लिखावट है?”

रघु काका बहुत देर तक चुप रहे। फिर उठे, और घर के अंदर वाले कमरे में रखे उस पुराने लोहे के संदूक की ओर गए, जिसे उन्होंने बरसों से नहीं खोला था। कमला को भी नहीं पता था कि उसमें क्या है।

ज़ंग लगा ताला खुलते ही एक बासी गंध फैली। पुरानी वर्दी, एक टूटी घड़ी, पिता की तस्वीर। और सबसे नीचे, एक पॉलीथिन में लिपटा हुआ पीला लिफ़ाफ़ा।

सीलबंद। कभी खोला नहीं गया।

श्रीमती सावित्री देवी, पीपल वाला मकान, बेलापुर।

मुहर पर तारीख़ थी — ८ अप्रैल १९८६।

६. चालीस साल पुराना सच

उस दिन रघु काका ने पहली बार कमला को सब बताया।

“होली का दिन था,” उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। “मैं अठारह का था। सुबह डाक आई तो उसमें सावित्री भाभी के नाम की यह चिट्ठी थी। मैंने सोचा शाम को दे दूँगा। फिर दोस्त आ गए, रंग, भाँग, ढोल… मैं भूल गया। चिट्ठी थैले में ही पड़ी रह गई।”

“उस रात हरीश भैया नहीं आए। गाड़ी में कोई ख़राबी आई थी, वे दो दिन बाद पहुँचे। पर सावित्री भाभी को यह पता नहीं था। वे सारी रात खिड़की में दीया जलाए उनका इंतज़ार करती रहीं। शायद आँख लग गई। शायद हवा चली। दीया फूस की छत के पास था…”

उनकी आवाज़ टूट गई।

“सुबह तक घर राख हो चुका था। दो दिन बाद जब मैंने थैला खोला, तब यह चिट्ठी मिली। मैंने इसे खोला नहीं। मुझे पता था इसमें क्या लिखा होगा। शायद यही कि वे देर से आएँगे, कि दीया जलाकर इंतज़ार न करें। मैंने इसे छिपा दिया, कमला। चालीस साल से छिपा रखा है।”

कमला ने उनका हाथ पकड़ लिया। “और हरीश भैया?”

“वे लौटे, राख देखी, और उसी दिन गाँव छोड़कर चले गए। फिर कभी किसी ने उन्हें नहीं देखा।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। फिर दोनों ने एक साथ सुना — बाहर आँगन में किसी ने साइकिल की घंटी बजाई थी। एक बार। दो बार।

कमला ने खिड़की से झाँका। आँगन ख़ाली था। पर मिट्टी पर एक पीपल का पत्ता पड़ा था, जिसके किनारे जले हुए थे।

७. होली की रात

इस साल भी होली आ गई थी। गाँव में ढोल बज रहे थे, हवा में गुलाल और पकवानों की ख़ुशबू थी। पर रघु काका के मन में सिर्फ़ एक बात थी।

रात के ग्यारह बजे, जब होलिका की आग धीमी पड़ने लगी, उन्होंने लालटेन जलाई, वह सीलबंद चिट्ठी जेब में रखी और पीपल की ओर चल पड़े। कमला ने रोकना चाहा, पर उनकी आँखों में कुछ ऐसा था कि वह चुप रह गई।

पगडंडी पर चाँदनी फैली थी। दूर गाँव के ढोल की आवाज़ धीरे-धीरे पीछे छूटती गई, और उसकी जगह एक दूसरी आवाज़ ने ले ली — लकड़ी चटकने की आवाज़।

पीपल के पास पहुँचते ही रघु काका ठिठक गए।

जहाँ काली ईंटों का ढेर होना चाहिए था, वहाँ एक घर खड़ा था। मिट्टी की दीवारें, फूस की छत, और एक छोटी-सी खिड़की, जिसमें एक दीया जल रहा था। उसकी लौ सीधी और स्थिर थी, जबकि रघु काका की लालटेन हवा में बुरी तरह काँप रही थी।

खिड़की के पीछे कोई खड़ा था। एक औरत, सिर पर पल्लू, चेहरा धुएँ की एक पतली परत के पीछे छिपा हुआ।

“डाकिया बाबू,” आवाज़ आई। वह आवाज़ पास भी थी और बहुत दूर भी, जैसे किसी कुएँ के तले से आ रही हो। “बहुत देर कर दी आपने।”

रघु काका के घुटने काँपने लगे, पर वे आगे बढ़े। उन्होंने जेब से लिफ़ाफ़ा निकाला और खिड़की की ओर बढ़ाया।

“माफ़ कर दीजिए, भाभी,” उन्होंने कहा। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। “मैं बच्चा था। मैं भूल गया था। चालीस साल से यह चिट्ठी मेरे सीने पर पत्थर बनकर रखी है।”

एक हाथ खिड़की से बाहर आया। पतला, साँवला, कलाई पर काँच की चूड़ियाँ — और उँगलियों पर कालिख। उसने लिफ़ाफ़ा ले लिया।

रघु काका ने देखा कि लिफ़ाफ़ा उस हाथ में पहुँचते ही किनारों से धीरे-धीरे सुलगने लगा, पर जला नहीं। औरत ने उसे खोला। दीये की रोशनी में काग़ज़ चमक उठा।

बहुत देर तक कोई आवाज़ नहीं आई। पीपल के पत्ते भी चुप हो गए। फिर खिड़की के पीछे से एक लंबी, थकी हुई साँस सुनाई दी।

“तो वे आ रहे थे,” आवाज़ ने कहा। “बस थोड़ी देर से।”

अचानक हवा में गर्मी भर गई। रघु काका को लगा जैसे उनके चारों ओर आग की लपटें उठ रही हों, पर कहीं कोई आग दिखाई नहीं दे रही थी। धुएँ की गंध इतनी तेज़ हो गई कि उनकी आँखें जलने लगीं। लालटेन उनके हाथ से छूटकर गिर गई और बुझ गई।

अँधेरे में उन्होंने आख़िरी बार वह आवाज़ सुनी, इस बार बिल्कुल उनके कान के पास:

“अब दीया बुझा देती हूँ, डाकिया बाबू।”

और खिड़की का दीया बुझ गया।

८. आख़िरी चिट्ठी

सुबह कुछ किसानों ने रघु काका को पीपल के नीचे बेहोश पड़ा पाया। उनके कपड़ों से धुएँ की गंध आ रही थी, पर शरीर पर जलने का एक भी निशान नहीं था। पास में काली ईंटों का वही पुराना ढेर था — और कुछ नहीं।

उस दिन के बाद पीली चिट्ठियाँ आनी बंद हो गईं।

एक महीने बाद रघु काका की सेवानिवृत्ति का दिन आया। डाकघर में छोटी-सी विदाई हुई, मिठाई बँटी, किसी ने शॉल ओढ़ाई। शाम को जब वे आख़िरी बार अपना खाकी थैला ख़ाली कर रहे थे, उसके तले में कुछ सरसराया।

एक लिफ़ाफ़ा। पीला नहीं, बिल्कुल नया। उस पर कोई डाक टिकट नहीं था, कोई मुहर नहीं। पता सिर्फ़ इतना था:

“डाकिया बाबू, बेलापुर।”

लिखावट वही थी — नीली स्याही, सधी हुई, थोड़ी झुकी हुई। हरीश की।

अंदर एक सूखा पीपल का पत्ता था और दो पंक्तियाँ:

“चिट्ठी पहुँचाने के लिए धन्यवाद। हम दोनों अब घर पहुँच गए हैं। और हाँ — मुन्नी को चूड़ियाँ बहुत पसंद आईं।”

रघु काका देर तक उस पत्र को देखते रहे। फिर उन्होंने ध्यान दिया कि लिफ़ाफ़ा अभी भी हल्का गर्म था, जैसे किसी ने अभी-अभी उसे दीये के पास से उठाकर रखा हो।

उस रात, बरसों बाद, रघु काका चैन की नींद सोए।

पर कमला कहती है कि उसके बाद भी, हर होली की रात, गाँव के उत्तरी छोर से साइकिल की एक घंटी सुनाई देती है। एक बार। दो बार। जैसे कोई डाकिया अब भी किसी दरवाज़े पर खड़ा हो — और इस बार, समय पर।


यह कहानी HorrorStory.in के लिए लिखी गई एक मौलिक काल्पनिक रचना है। आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी राय नीचे कमेंट में ज़रूर बताएँ।


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