यह कहानी आपको एक ऐसी रहस्यमयी सुरंग में ले जाएगी, जहाँ से लौटने वाले इंसान की नहीं, उसकी परछाई बदल जाती थी। आखिर उस सुरंग में ऐसा क्या था ? जानिए इस खौफनाक और सस्पेंस से भरपूर Real horror story in hindi में।
Table of Contents
जिस चेतावनी को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया
पहाड़ों में काम करने वाले लोग अक्सर अजीब बातें करते हैं। कोई कहता है कि कुछ रास्ते ऐसे होते हैं जहाँ आवाज़ वापस नहीं लौटती। कोई कहता है कि कुछ घाटियों में कम्पास काम करना बंद कर देता है। लेकिन उत्तराखंड के देवकुंड बाईपास सुरंग के बारे में जो बात कही जाती थी। उसे सुनकर लोग हँस देते थे।
क्योंकि चेतावनी बहुत अजीब थी।
अगर सुरंग से निकलने के बाद तुम्हारी परछाई तुम्हारे साथ बिल्कुल एक जैसी न चले…. तो उसी दिन घर मत जाना।
किसी सरकारी बोर्ड पर यह बात नहीं लिखी थी। न किसी अख़बार में। यह चेतावनी सिर्फ़ उन लोगों के बीच ज़िंदा थी जिन्होंने कभी उस सुरंग के पास काम किया था और उनमें से ज़्यादातर अब या तो नौकरी छोड़ चुके थे या फिर इस दुनिया में नहीं थे।
मार्च 2025।
दिल्ली की एक इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी ने अपने वरिष्ठ सुरक्षा निरीक्षक विवेक अरोड़ा को देवकुंड सुरंग भेजा। विवेक का काम था। सुरंग की सुरक्षा जाँच करना। पिछले छह महीनों में वहाँ पाँच छोटे-छोटे हादसे हो चुके थे।
रिपोर्ट में हर बार एक ही बात लिखी जाती।
ड्राइवर का संतुलन अचानक बिगड़ गया।
लेकिन किसी गाड़ी के ब्रेक फेल नहीं हुए थे। सड़क बिल्कुल सही थी। सीसीटीवी में भी कुछ असामान्य नहीं दिखता था। फिर हादसे क्यों हो रहे थे। यही पता लगाना था। विवेक ऐसे मामलों में अनुभवी था।
वह अंधविश्वास पर नहीं। सबूतों पर भरोसा करता था।
देवकुंड सुरंग लगभग दो किलोमीटर लंबी थी। दोनों तरफ़ ऊँचे काले पहाड़। अंदर सफेद LED लाइटें लगी थीं। लेकिन अजीब बात यह थी। अंदर रोशनी होने के बावजूद ऐसा लगता था जैसे हर चीज़ पर हल्की-सी धूसर परत चढ़ी हो। रंग फीके दिखाई देते थे।
आवाज़ें भी सामान्य नहीं थीं। अगर कोई ज़ोर से बोलता तो गूँज वापस आने में कुछ सेकंड ज़्यादा लगते। जैसे सुरंग पहले आवाज़ को कहीं रोकती हो।
फिर वापस भेजती हो। विवेक ने इसे प्राकृतिक ध्वनि-प्रभाव समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया।
सुरंग का सबसे पुराना कर्मचारी
साइट ऑफिस में एक बुज़ुर्ग चौकीदार बैठा था।
नाम।
भीम सिंह।
उम्र लगभग सत्तर साल। वह सुरंग बनने के समय से वहीं तैनात था। विवेक ने उससे पूछा। सब लोग इस सुरंग से इतना डरते क्यों हैं ? भीम सिंह ने पहले कोई जवाब नहीं दिया। फिर उसने जेब से पुरानी घड़ी निकाली।
समय देखा और बहुत धीमी आवाज़ में बोला। दिन में कुछ नहीं होता।
रात में….?
रात में भी कुछ नहीं होता। वह कुछ पल रुका।
…….अगर तुम अपनी परछाई को न देखो। विवेक मुस्कुराया।
मतलब ?
बूढ़े ने सुरंग के दूसरे छोर की तरफ़ इशारा किया। जो पहली बार आता है। वह हमेशा हँसता है।
दूसरी बार
हँस नहीं पाता।
शाम पाँच बजे विवेक अकेले सुरंग के अंदर चला गया। वह हर पचास मीटर पर रुककर दीवारें, केबल और लाइटें जाँच रहा था। सब कुछ बिल्कुल सामान्य था। करीब एक किलोमीटर अंदर पहुँचकर उसे अचानक एहसास हुआ।
कि उसके अपने कदमों की आवाज़ कुछ अजीब लग रही है।
टप….
फिर एक सेकंड बाद
टप….
जैसे कोई दूसरा व्यक्ति ठीक उसी चाल से उसके पीछे चल रहा हो। वह रुका। आवाज़ भी रुक गई। वह फिर चला। आवाज़ फिर आई। उसने तुरंत पीछे टॉर्च मारी। सुरंग खाली थी। सिर्फ़ लंबी सफेद रोशनी और अंतहीन सन्नाटा।
उसने खुद को समझाया।
Echo है….
लेकिन अंदर कहीं न कहीं। एक हल्की-सी बेचैनी जन्म ले चुकी थी।
सुरंग से बाहर…. और पहली गलती
करीब बीस मिनट बाद विवेक सुरंग के दूसरे छोर से बाहर निकल आया। बाहर ढलता सूरज था। पहाड़ की चट्टानों पर लंबी परछाइयाँ पड़ रही थीं। विवेक ने पानी की बोतल निकाली। तभी उसकी नज़र ज़मीन पर गई।

उसकी परछाई उसके सामने थी। वह सामान्य लग रही थी। फिर उसने एक कदम आगे बढ़ाया। उसका पैर आगे गया। लेकिन परछाई ने वही कदम…..
एक पल बाद उठाया। विवेक का दिल ज़ोर से धड़का। उसने फिर चलकर देखा। वही हुआ। उसकी हर हरकत के बाद परछाई आधा सेकंड की देरी से वही हरकत दोहरा रही थी।
जैसे वह उसकी नकल कर रही हो। साथ नहीं चल रही हो। उसी क्षण उसे भीम सिंह की बात याद आई।
अगर सुरंग से निकलने के बाद तुम्हारी परछाई तुम्हारे साथ बिल्कुल एक जैसी न चले…… तो उसे दोबारा मत देखना……
लेकिन इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन उसकी जिज्ञासा होती है। विवेक धीरे-धीरे मुड़ा और पहली बार अपनी परछाई को ध्यान से देखने लगा। उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था।
कि उसने अभी ऐसी गलती की है जिसके बाद उसका लौटना तो तय था।
लेकिन पहले जैसा लौटना नहीं।
परछाई ने पहली बार मेरी तरफ देखा
विवेक सड़क के किनारे बिल्कुल स्थिर खड़ा था। शाम की धूप अब पहाड़ के पीछे उतर रही थी। उसकी परछाई लंबी होकर डामर पर फैली हुई थी। उसने धीरे-धीरे अपना दायाँ हाथ उठाया। परछाई ने भी हाथ उठाया।
लेकिन एक पल की देरी से। अब तक वह इसे आँखों का भ्रम समझ रहा था। उसने एक और हरकत की। इस बार उसने हाथ नीचे कर लिया। लेकिन परछाई का हाथ कुछ सेकंड तक हवा में ही रुका रहा।
विवेक की साँस अटक गई। उसने पलक तक नहीं झपकाई और तभी परछाई ने धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर उठाया। जबकि विवेक बिल्कुल स्थिर खड़ा था। ऐसा लग रहा था।
जैसे वह पहली बार अपने मालिक को देख रही हो।
विवेक घबराकर गाड़ी में बैठा और बिना पीछे देखे साइट ऑफिस लौट आया। भीम सिंह बाहर ही बैठा था। विवेक का चेहरा देखते ही उसकी आँखों का रंग बदल गया। तुमने देख लिया। विवेक कुछ नहीं बोला।
परछाई ने तुम्हारी तरफ देखा ?
विवेक के मुँह से सिर्फ़ एक शब्द निकला।
……हाँ।
भीम सिंह ने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया। कई सेकंड तक वह कुछ नहीं बोला। फिर धीमी आवाज़ में कहा। अब वह तुम्हें पहचान गई है।
कौन ?
बूढ़े ने पहली बार उसकी आँखों में देखा। परछाई नहीं बदलती बेटा।
जिसकी परछाई बदलती है…. वह इंसान बदलना शुरू हो जाता है।
विवेक ने इन बातों को अंधविश्वास मानकर होटल में कमरा ले लिया। उसने खुद को समझाया। मैं थका हुआ हूँ। रात करीब साढ़े ग्यारह बजे वह सो गया। लेकिन ठीक 2:41 पर उसकी आँख खुल गई।
कमरे में पूरी तरह सन्नाटा था। एसी बंद था। खिड़की बंद थी। फिर भी….. ऐसा लग रहा था जैसे कमरे में कोई बहुत धीरे-धीरे चल रहा हो।
टक….
टक….
टक….
विवेक ने मोबाइल उठाकर फ्लैशलाइट ऑन की। कमरा खाली था। लेकिन दीवार पर उसकी परछाई दिखाई दे रही थी। यह संभव ही नहीं था। क्योंकि मोबाइल की रोशनी उसके चेहरे पर थी।
उस दिशा में परछाई बन ही नहीं सकती थी।
फिर भी….. दीवार पर उसकी आकृति साफ दिखाई दे रही थी और सबसे डरावनी बात वह स्थिर नहीं थी। वह धीरे-धीरे चल रही थी। विवेक ने डरते हुए एक कदम पीछे लिया। दीवार वाली परछाई वहीं खड़ी रही।
उसने दूसरा कदम लिया। परछाई अब भी नहीं हिली। फिर कुछ सेकंड बाद उसने बिल्कुल वही कदम दोहराया। अब उसे समझ आ गया। दिन में सुरंग के बाहर जो हुआ था। वह खत्म नहीं हुआ था।
वह उसके साथ होटल तक आ चुका था। विवेक ने तुरंत कमरे की सारी लाइटें जला दीं। दीवार खाली थी। कोई परछाई नहीं। उसने राहत की साँस ली। तभी बाथरूम का दरवाज़ा अपने-आप थोड़ा-सा खुल गया। अंदर की लाइट बंद थी।
फर्श पर हल्का अँधेरा पसरा था। लेकिन उस अँधेरे में किसी की परछाई दिखाई दे रही थी। समस्या यह थी।
बाथरूम के अंदर कोई था ही नहीं।
पुरानी दुर्घटनाओं की फाइल
अगली सुबह विवेक सीधे जिला अभिलेखागार पहुँचा। उसे पिछले चालीस वर्षों की दुर्घटनाओं की रिपोर्ट चाहिए थी। कई घंटे बाद उसे एक पुरानी फाइल मिली। उसमें 1989 से लेकर आज तक की घटनाएँ दर्ज थीं। एक बात हर केस में समान थी।
सभी लोग सुरंग से ज़िंदा लौटे थे। लेकिन कुछ दिनों बाद उनके परिवार वालों ने अजीब शिकायतें दर्ज करवाई थीं।
मेरे पति पहले जैसे नहीं रहे। वह अब धूप में चलना पसंद नहीं करते। आईने के सामने खड़े नहीं होते। रात में कमरे की लाइट कभी बंद नहीं करते।”
और फिर एक-एक करके सभी लोग बिना किसी कारण लापता हो गए।
न शव मिला।
न कोई सुराग।
बस उनके घरों में एक चीज़ हमेशा मिली।
दीवार पर जली हुई एक काली आकृति।
ऐसा लगता था। जैसे किसी इंसान की परछाई। दीवार पर हमेशा के लिए चिपक गई हो। विवेक के हाथ काँपने लगे। उसी समय फाइल के बीच से एक पुरानी तस्वीर गिर पड़ी। वह सुरंग के उद्घाटन की फोटो थी।
करीब पचास मजदूर लाइन में खड़े मुस्कुरा रहे थे।
लेकिन एक मजदूर की परछाई। बाकी सबकी दिशा से उलटी तरफ़ जा रही थी। फोटो के पीछे लाल स्याही से सिर्फ़ एक वाक्य लिखा था।
पहले यह तुम्हारी चाल सीखती है…. फिर तुम्हारी जगह।
उसी पल विवेक के मोबाइल पर उसकी पत्नी नेहा का फोन आया। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
विवेक….. तुम अभी कहाँ हो ?
ऑफिस में हूँ। कुछ सेकंड चुप्पी रही।
फिर नेहा रोते हुए बोली। झूठ मत बोलो।
…..तुम तो पिछले एक घंटे से घर में खड़े हो और तब से….. एक शब्द भी नहीं बोले। विवेक के हाथ से मोबाइल छूटकर ज़मीन पर गिर गया। अगर वह यहाँ था।
तो उसके घर में कौन खड़ा था ?
घर में जो खड़ा था… वह मैं नहीं था
विवेक ने काँपते हाथों से मोबाइल फिर उठाया।
नेहा…. मेरी बात ध्यान से सुनो। घर में जो भी है। उसके पास मत जाना। उधर से कोई जवाब नहीं आया। सिर्फ़ उसकी तेज़ साँसें सुनाई दे रही थीं। कुछ पल बाद उसने फुसफुसाकर कहा।
वह अभी भी ड्रॉइंग रूम में खड़ा है। खिड़की से बाहर देख रहा है।
लेकिन…. उसकी आवाज़ अचानक रुक गई। लेकिन क्या ?
धूप दूसरी तरफ़ है। फिर भी उसकी परछाई गलत दिशा में पड़ रही है। विवेक का पूरा शरीर सुन्न पड़ गया। अगले ही क्षण फ़ोन कट गया। उसने बार-बार कॉल मिलाई। हर बार सिर्फ़ एक ही आवाज़ सुनाई दी।
जिस व्यक्ति से आप संपर्क करना चाहते हैं….. वह अभी उपलब्ध नहीं है।
लेकिन उस रिकॉर्डेड आवाज़ के पीछे बहुत धीमी फुसफुसाहट भी थी।
जल्दी मत आना…. अब यह घर हमारा है….
विवेक उसी समय वापस देवकुंड पहुँचा। इस बार भीम सिंह उसका इंतज़ार कर रहा था। विवेक ने सारी बात बता दी। बूढ़े ने बिना कुछ कहे सुरंग का पुराना नक्शा उसके सामने रख दिया। नक्शे में एक बात अजीब थी। आज की सुरंग 2 किलोमीटर लंबी थी।
लेकिन निर्माण विभाग के मूल नक्शे में उसकी लंबाई 2.4 किलोमीटर लिखी थी।
मतलब…….
चार सौ मीटर कहीं गायब थे।
ये हिस्सा कहाँ गया ? विवेक ने पूछा। भीम सिंह ने सुरंग की दीवार की तरफ़ इशारा किया। गायब नहीं हुआ। उसे बंद कर दिया गया।
क्यों ?
बूढ़े ने गहरी साँस ली। क्योंकि वहाँ से कोई आदमी नहीं लौटा। लेकिन उनकी परछाइयाँ वापस आ गई थीं।
दोनों रात होने का इंतज़ार करने लगे। करीब दस बजे वे सुरंग के बीच पहुँचे। भीम सिंह ने एक जगह दीवार पर टॉर्च मारी। बाकी दीवारों से अलग यह हिस्सा नए सीमेंट से बंद किया गया था।
विवेक ने हथौड़ा उठाया। पहला वार।
दूसरा।
तीसरा।
दीवार टूटने लगी। अंदर से बर्फ जैसी ठंडी हवा बाहर आई। लेकिन उस हवा में एक अजीब बात थी। उसमें मिट्टी या सीलन की गंध नहीं थी। बल्कि ऐसा लग रहा था जैसे किसी पुराने बंद कमरे में वर्षों से कैद सैकड़ों लोगों की साँसें एक साथ बाहर निकली हों।
कुछ देर बाद रास्ता खुल गया। अंदर पूरा अंधेरा था। टॉर्च की रोशनी भी कुछ मीटर से ज़्यादा नहीं जा रही थी। दीवारों पर सैकड़ों काले निशान थे। पहले विवेक को लगा ये धुआँ होगा।
लेकिन पास जाकर उसने देखा। वे इंसानों की परछाइयाँ थीं। जली हुई।
स्थिर।
और हर आकृति अलग थी। कोई भाग रहा था।
कोई घुटनों के बल बैठा था।
कोई दोनों हाथ जोड़कर खड़ा था।
जैसे आखिरी पल में वे दीवार पर हमेशा के लिए छप गए हों।
जो अंधेरे में चलता था
अचानक पीछे से कदमों की आवाज़ आई।
टक….
टक….
टक….
विवेक और भीम सिंह ने एक साथ पीछे टॉर्च घुमाई। कोई नहीं। फिर आवाज़ सामने से आई।
इस बार टॉर्च की रोशनी में कुछ दिखाई दिया। एक आदमी। लेकिन उसका शरीर पूरी तरह काला था। जैसे वह रोशनी से नहीं। अंधेरे से बना हो। उसका कोई चेहरा नहीं था। सिर्फ़ दो गहरे खाली गड्ढे। जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं। वह चल नहीं रहा था।
वह फिसल रहा था।
और उसके पैरों के नीचे कोई परछाई नहीं थी।
वह खुद एक परछाई था।
भीम सिंह काँपते हुए बोला।
नीचे मत देखना। इसकी आँखों में मत देखना और अगर यह तुम्हारी चाल दोहराने लगे।
…..तो भाग जाना। लेकिन देर हो चुकी थी। काली आकृति बिल्कुल विवेक के सामने आकर रुक गई। विवेक ने डर के मारे एक कदम पीछे लिया। आकृति ने कुछ नहीं किया।
फिर तीन सेकंड बाद उसने भी बिल्कुल वही कदम पीछे लिया। अब वह…
विवेक की चाल सीख रही थी।
भीम सिंह अचानक चिल्लाया भागो ! दोनों पूरी ताकत से सुरंग की तरफ़ दौड़े। पीछे से कदमों की आवाज़ नहीं आ रही थी। फिर भी ऐसा लग रहा था कि कोई उनकी हर हरकत की नकल कर रहा है। वे बाहर निकल आए। सुबह होने लगी थी। पहली धूप सड़क पर पड़ी।
विवेक ने नीचे देखने की गलती नहीं की। लेकिन भीम सिंह ने देख लिया। उसने काँपते हुए ज़मीन की ओर इशारा किया। विवेक ने भी नज़र झुका दी। ज़मीन पर
दो परछाइयाँ थीं।
एक विवेक की और दूसरी उसके बिल्कुल बराबर चल रही थी। फर्क सिर्फ़ इतना था। दूसरी परछाई का मालिक
वहाँ कोई नहीं था।
भीम सिंह धीरे-धीरे पीछे हटने लगा। उसकी आँखों में आँसू थे। अब इसे रोका नहीं जा सकता। यह तुम्हारे साथ नहीं चल रही। यह तुम्हारे घर जा रही है। विवेक ने तुरंत ऊपर देखा। लेकिन सड़क पर वह दूसरी परछाई अब नहीं थी।
जैसे वह किसी और दिशा में मुड़ चुकी हो।
THE END |
उस घटना के छह महीने बाद प्रशासन ने देवकुंड सुरंग को संरचनात्मक मरम्मत के नाम पर हमेशा के लिए बंद कर दिया। सरकारी रिकॉर्ड में आज भी सिर्फ़ इतना लिखा है।
सुरंग असुरक्षित घोषित की गई। प्रवेश वर्जित है।
लेकिन स्थानीय लोग आज भी कहते हैं। बरसात के बाद धूप निकलते ही सुरंग के बंद मुहाने के सामने कभी-कभी चलती हुई परछाइयाँ दिखाई देती हैं। उनका कोई शरीर नहीं होता और अगर किसी दिन आपकी अपनी परछाई अचानक आपसे आधा कदम पीछे चलने लगे तो उसे बार-बार देखकर यह मत जाँचिए कि वह सचमुच बदल गई है या नहीं।
क्योंकि कुछ परछाइयाँ रोशनी से नहीं बनतीं। वे सिर्फ़ एक नए इंसान का इंतज़ार करती हैं।
अगर आपको भूतिया स्थानों, सच्ची डरावनी घटनाओं, चुड़ैल, डायन और रहस्यमयी कहानियाँ पढ़ना पसंद है, तो हमारे ब्लॉग को Subscribe करना न भूलें।
हम नियमित रूप से नई Real Horror Stories, Haunted Places, Bhoot Stories, Horror story in hindi और Paranormal Experiences प्रकाशित करते हैं, जो आपकी रूह तक कंपा देंगी। डर की इस दुनिया से जुड़े रहें….. क्योंकि अगली कहानी शायद इस कहानी से भी ज्यादा खौफनाक हो।
नीचे अपना Email दर्ज करें और अभी Subscribe करें!