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उस स्कूल में हर साल एक क्लास लगती थी…. जिसमें पढ़ने वाले छात्र कभी घर नहीं लौटते थे
चेतावनी: यह कहानी कमजोर दिल वाले लोगों के लिए नहीं है। रात में अकेले पढ़ते समय आपको अपने पीछे किसी के खड़े होने का एहसास हो सकता है।
बंद पड़ा स्कूल
साल 2021।
मैं एक पत्रकार था और रहस्यमयी घटनाओं पर रिपोर्ट लिखता था। एक दिन मुझे राजस्थान के एक छोटे से कस्बे सूरजगढ़ के बारे में खबर मिली। वहाँ एक पुराना स्कूल था। सरस्वती माध्यमिक विद्यालय। लगभग 15 सालों से बंद।
लेकिन गाँव वालों का दावा था कि आज भी हर साल 13 नवंबर की रात उस स्कूल में क्लास लगती है और उस क्लास में जो भी बैठता है। वह फिर कभी वापस नहीं आता। पहले मुझे यह एक अफवाह लगी।
लेकिन जब मैंने पुराने रिकॉर्ड देखे। तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। पिछले 15 सालों में 11 लोग रहस्यमय तरीके से गायब हुए थे और आखिरी बार उन्हें उसी स्कूल के आसपास देखा गया था।
यह स्कूल 1978 में बनाया गया था। सब कुछ सामान्य चल रहा था। फिर 2006 में एक घटना हुई जिसने पूरे इलाके को हिला दिया। स्कूल के इतिहास के सबसे लोकप्रिय शिक्षक थे।
महेश शर्मा।
गणित पढ़ाते थे। सख्त लेकिन ईमानदार। छात्र उनका बहुत सम्मान करते थे। लेकिन एक दिन….. उनकी पूरी क्लास अचानक गायब हो गई। कुल 27 छात्र और महेश शर्मा भी। किसी का शव नहीं मिला। कोई सुराग नहीं मिला। बस क्लासरूम नंबर 13 में ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखा मिला।
क्लास अभी खत्म नहीं हुई……..।
उस दिन के बाद स्कूल बंद कर दिया गया।
गाँव वालों का डर
मैं गाँव पहुँचा। लोग स्कूल का नाम सुनते ही डर जाते थे। एक बूढ़े चौकीदार ने कहा। साहब दिन में जो देखना हो देख लो लेकिन रात को मत जाना। मैंने पूछा
क्यों……? उसने काँपती आवाज़ में जवाब दिया।
रात को घंटी बजती है…… जबकि स्कूल में कोई नहीं होता।
जिज्ञासा बढ़ चुकी थी। मैं कैमरा लेकर स्कूल पहुँच गया। रात के 11 बजे। स्कूल पूरी तरह सुनसान था। टूटी खिड़कियाँ। जंग लगे दरवाज़े। धूल से भरे कमरे। सब कुछ सामान्य लग रहा था।
तभी……
टन….. टन….. टन…..
स्कूल की घंटी बज उठी। मेरे हाथ से टॉर्च गिरते-गिरते बची। क्योंकि उस घंटी का तार वर्षों पहले काट दिया गया था। आवाज़ क्लासरूम नंबर 13 की तरफ से आ रही थी। मैं धीरे-धीरे अंदर गया। कमरा खाली था।
लेकिन ब्लैकबोर्ड पर कुछ लिखा हुआ था। जब मैंने टॉर्च की रोशनी डाली……..। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। बोर्ड पर ताज़ी चॉक से लिखा था।
लेट मत हो……. क्लास शुरू होने वाली है।
मैंने तुरंत फोटो ली। लेकिन जैसे ही कैमरे की स्क्रीन देखी……….। उस पर कुछ और लिखा था।
तुम भी छात्र हो।
अजीब आवाजें
रात 12 बजे के बाद स्कूल का माहौल बदलने लगा। कॉरिडोर में कदमों की आवाज़ आने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे दर्जनों बच्चे चल रहे हों।
फुसफुसाहटें….
हँसी…..
कुर्सियों के खिसकने की आवाज़…… लेकिन वहाँ कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
प्रधानाचार्य के कमरे में मुझे एक पुराना रजिस्टर मिला। उसमें 2006 की आखिरी क्लास का रिकॉर्ड था। 27 छात्रों के नाम और सबसे नीचे…….। एक नया नाम। जो बाद में लिखा गया था। वह नाम मेरा था।
आरव मिश्रा
मैं डर गया। मैं तो पहली बार वहाँ आया था। फिर मेरा नाम रजिस्टर में कैसे था ………..? अचानक पूरी बिल्डिंग में घंटी बजने लगी।
टन…. टन…. टन….
और उसी समय सारे क्लासरूम के दरवाज़े अपने आप बंद हो गए। स्कूल में ठंडी हवा भर गई। फिर….. एक आदमी की आवाज़ गूँजी।
सभी छात्र अपनी-अपनी सीट पर बैठ जाएँ।
शिक्षक की वापसी
मैंने पीछे मुड़कर देखा। कॉरिडोर में एक आदमी खड़ा था। सफेद शर्ट। काला कोट। हाथ में उपस्थिति रजिस्टर। वह महेश शर्मा थे। लेकिन उनकी आँखें पूरी तरह काली थीं।
अचानक क्लासरूम नंबर 13 रोशनी से भर गया। अंदर दर्जनों बच्चे बैठे थे। स्कूल यूनिफॉर्म में। लेकिन उनके चेहरे पीले थे और आँखें खाली। जैसे वे जीवित न हों। महेश शर्मा बोर्ड के सामने खड़े थे।
उन्होंने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराए।
आओ आरव…. तुम्हारी सीट खाली है।
मैं भागना चाहता था। लेकिन पैर हिल नहीं रहे थे। तभी एक लड़की मेरे पास आई। उसका नाम रिया था। वह उन्हीं 27 छात्रों में से एक थी। उसने धीरे से कहा।
हम मरे नहीं थे…… हमें यहाँ रोक लिया गया।
रिया ने बताया कि 13 नवंबर 2006 को महेश शर्मा ने छात्रों को एक पुरानी किताब दिखाई थी। किताब स्कूल के तहखाने से मिली थी। उसमें एक अजीब गणितीय चिन्ह बना था।
जिसे बोर्ड पर बनाते ही…..। कुछ जाग गया।
तहखाने का रहस्य

मैं स्कूल के नीचे बने तहखाने में पहुँचा। वहाँ एक पुराना कमरा था। दीवारों पर अजीब निशान बने थे। बीच में एक लकड़ी की मेज़ रखी थी और उस पर वही किताब।
जैसे ही मैंने किताब खोली….. सारे पन्ने अपने आप पलटने लगे। अचानक कमरा काँपने लगा। मेरे सामने हवा में एक दरार सी खुल गई और मैं उसमें गिर गया। जब आँख खुली…… मैं फिर उसी स्कूल में था।
लेकिन यह अलग था। आसमान लाल था। दीवारों पर खून के निशान थे और हर क्लास में मृत छात्र बैठे थे।
रिया ने बताया…….।
हम यहाँ 15 साल से फँसे हैं।
हर दिन वही क्लास।
वही घंटी।
वही उपस्थिति।
और जो भी यहाँ आता है….. वह हमेशा के लिए छात्र बन जाता है।
महेश शर्मा ने घोषणा की
आज अंतिम परीक्षा है।
सभी छात्रों के सामने प्रश्न पत्र रखे गए। लेकिन उनमें गणित के सवाल नहीं थे।हर पन्ने पर सिर्फ एक सवाल लिखा था।
तुम यहाँ से क्यों जाना चाहते हो………?
असली राक्षस
रिया ने बताया कि महेश शर्मा असली दोषी नहीं थे। तहखाने की किताब में एक दुष्ट आत्मा कैद थी। जब उन्होंने वह चिन्ह बनाया……। आत्मा मुक्त हो गई और उसने पूरी क्लास को अपनी दुनिया में कैद कर लिया।
रिया ने कहा।
अगर किताब जला दी जाए…… तो हम सब मुक्त हो सकते हैं।
लेकिन किताब दूसरी दुनिया के पुस्तकालय में रखी थी और उसकी रक्षा वही आत्मा करती थी।
मैं और रिया उस पुस्तकालय पहुँचे। हजारों पुरानी किताबें। अंधेरा और बीच में एक काली किताब। जैसे ही मैंने उसे छुआ…….। एक भयानक चीख गूँज उठी।
पूरे स्कूल की दीवारें काँपने लगीं। एक विशाल काली आकृति प्रकट हुई। उसकी आँखें लाल थीं और उसका शरीर धुएँ से बना था। वह चिल्लाई………..।
कोई यहाँ से नहीं जाएगा……….!
आखिरी क्लास
महेश शर्मा अचानक हमारे सामने आ गए। उन्होंने पहली बार सामान्य इंसान की तरह कहा।
मुझे माफ़ कर दो बच्चों………।
फिर उन्होंने किताब उठाई और उसे आग में फेंक दिया। किताब जलते ही पूरी दुनिया टूटने लगी। छात्र मुस्कुराने लगे। रिया ने मेरी तरफ देखा।
धन्यवाद…….
और फिर वह रोशनी में बदल गई। जब मेरी आँख खुली….. मैं स्कूल के मैदान में पड़ा था। सुबह हो चुकी थी। स्कूल की इमारत आधी गिर चुकी थी और सबसे अजीब बात…..
पुराने रिकॉर्ड में अब 27 छात्रों को मृत नहीं बल्कि लापता भी नहीं लिखा था। ऐसा लग रहा था जैसे वे कभी अस्तित्व में ही नहीं थे।
मैंने सोचा सब खत्म हो गया। लेकिन उसी रात….. मेरे फोन पर एक फोटो आई। एक खाली क्लासरूम की। ब्लैकबोर्ड पर चॉक से लिखा था।
कल फिर क्लास होगी……
और नीचे……
27 कुर्सियों के साथ एक नई कुर्सी भी रखी थी। जिस पर मेरा नाम लिखा था।
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