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अस्पताल का कमरा नंबर 307 जो 20 साल से बंद था।
नोट: यह कहानी मनोरंजन के उद्देश्य से लिखी गई एक हॉरर फिक्शन है। इसे रात में अकेले पढ़ना आपको असहज महसूस करा सकता है।
शहर के बाहर बना अस्पताल
उत्तर भारत के एक छोटे शहर के बाहरी इलाके में एक पुराना सरकारी अस्पताल था।
उसका नाम था। शांति मेमोरियल हॉस्पिटल।
आज वह पूरी तरह बंद पड़ा था। खिड़कियाँ टूटी हुई थीं। दीवारों पर काई जमी हुई थी और मुख्य गेट पर जंग लगे ताले लटक रहे थे। लेकिन इस अस्पताल को लेकर एक ऐसी कहानी मशहूर थी। जिसने उसे पूरे इलाके का सबसे डरावना स्थान बना दिया था।
कहते थे कि अस्पताल का कमरा नंबर 307 आज भी रात में खुल जाता है। जबकि उसे 20 साल पहले हमेशा के लिए बंद कर दिया गया था।
मैं बचपन से इस अ स्पताल की कहानियाँ सुनता आया था।
दादी कहती थीं….।
सूरज ढलने के बाद उस अस्पताल के पास भी मत जाना।
जब भी मैं वजह पूछता…… वह सिर्फ एक बात कहतीं……।
वहाँ कुछ मरीज आज भी छुट्टी मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं।
तब मुझे यह मज़ाक लगता था। लेकिन वर्षों बाद…… मुझे पता चला कि वह मज़ाक नहीं था।
पुराने कागज़

दादी के निधन के बाद घर की सफाई करते समय मुझे एक पुरानी फाइल मिली। उसमें अस्पताल से जुड़े कुछ दस्तावेज़ थे। एक फोटो। कुछ अखबार की कटिंग और एक चिट्ठी।फोटो में अस्पताल के डॉक्टर और नर्सें खड़ी थीं।
लेकिन एक चेहरा अजीब था। बाकी सब लोग कैमरे की तरफ देख रहे थे। लेकिन एक आदमी सीधे मेरी तरफ देख रहा था। जैसे उसे पता हो कि एक दिन मैं यह तस्वीर देखने वाला हूँ।
पुरानी कटिंग में एक खबर छपी थी।
शांति मेमोरियल अस्पताल का पूरा वार्ड रहस्यमय परिस्थितियों में खाली मिला
तारीख थी……. 14 जुलाई 2003
खबर के अनुसार एक रात अस्पताल के 17 मरीज और 3 कर्मचारी अचानक गायब हो गए थे।
कोई संघर्ष नहीं।
कोई खून नहीं।
कोई शव नहीं।
बस लोग गायब। जिज्ञासा बढ़ चुकी थी।
अगले दिन मैं अस्पताल देखने निकल पड़ा। दोपहर का समय था। मुख्य गेट टूटा हुआ था। अंदर घुसते ही एक अजीब सी बदबू महसूस हुई। ऐसा लगा जैसे पुराने दवाइयों और नमी की गंध अभी भी दीवारों में बसी हो।
रिसेप्शन पूरी तरह बर्बाद हो चुका था। पुराने रजिस्टर बिखरे पड़े थे। धूल की मोटी परत हर जगह जमा थी। लेकिन एक चीज़ अजीब थी। रिसेप्शन डेस्क पर रखा एक पेन बिल्कुल नया लग रहा था। जैसे किसी ने हाल ही में इस्तेमाल किया हो।
तीसरी मंज़िल
मैं धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। तीसरी मंज़िल पर पहुँचते ही माहौल बदल गया। नीचे की तुलना में यहाँ ज्यादा ठंड थी और अजीब बात यह थी कि….. यहीं कमरा नंबर 307 था।कमरे के बाहर लोहे की मोटी चेन लगी हुई थी और उस पर जंग लगा ताला।
ताले पर सफेद रंग से लिखा था।
खोलना मना है………..।
लेकिन नीचे….. किसी ने नाखून से एक वाक्य खरोंच रखा था।
हमें बाहर निकालो……।
मैं दरवाज़े के पास खड़ा था। तभी अंदर से किसी के खाँसने की आवाज़ आई। एकदम साफ। मैं ठिठक गया। फिर दूसरी आवाज़ आई। जैसे कोई बिस्तर से उठने की कोशिश कर रहा हो। लेकिन कमरा तो 20 साल से बंद था।
वापस लौटते समय मुझे नर्स स्टेशन में एक रजिस्टर मिला। उसमें आखिरी एंट्री थी।
13 जुलाई 2003
और सबसे नीचे लिखा था।
आज रात फिर वही आवाज़ें आईं।
डॉक्टर अरोड़ा
रजिस्टर के अनुसार उस वार्ड का प्रभारी डॉक्टर था।
डॉ. राकेश अरोड़ा
मैंने उसके बारे में जानकारी जुटानी शुरू की। पता चला घटना के बाद वह भी गायब हो गया था। उसका शव कभी नहीं मिला। शहर में एक बुजुर्ग व्यक्ति मिला। वह कभी अस्पताल का चौकीदार था। उसने मेरी बात सुनकर कहा।
कमरा 307 अस्पताल का हिस्सा नहीं था।
मैं चौंक गया। मतलब………..?
उसने कहा।
वह कमरा बाद में बना था।
उसने मुझे अस्पताल का पुराना नक्शा दिखाया और सचमुच…… मूल नक्शे में कमरा 307 था ही नहीं। जहाँ आज वह कमरा था। वहाँ खाली जगह दिखाई गई थी।
छिपा हुआ कमरा
2001 में अचानक उस हिस्से का निर्माण हुआ। लेकिन किसी सरकारी रिकॉर्ड में उसका उल्लेख नहीं था। जैसे किसी ने गुप्त रूप से उसे बनाया हो।
मैं फिर अस्पताल पहुँचा। इस बार रात में। करीब 11 बजे। पूरा भवन अंधेरे में डूबा था। लेकिन तीसरी मंज़िल की एक खिड़की में रोशनी दिखाई दे रही थी। वही कमरा 307 ।जब मैं ऊपर पहुँचा…… तो दरवाज़ा खुला हुआ था। जबकि सुबह वह बंद था।
अंदर से सफेद रोशनी आ रही थी। कमरे में 17 बिस्तर लगे हुए थे और उन पर लोग लेटे हुए थे। सफेद चादरों में। मैंने सोचा कोई मज़ाक है। लेकिन फिर…. उनमें से एक आदमी बैठ गया।
उसकी आँखें पूरी सफेद थीं।
चेहरा पीला।
और होंठ नीले।
वह धीरे से बोला।
डॉक्टर आ गया……..?
अचानक पूरा कमरा बदलने लगा। टूटी दीवारें नई हो गईं। बत्ती जल उठी। मशीनें चलने लगीं और मैं खुद को 2003 के अस्पताल में खड़ा पाया।
असली घटना
वहाँ मौजूद लोगों की बातें सुनकर मुझे सच्चाई पता चली। डॉ. अरोड़ा एक गुप्त प्रयोग कर रहा था। वह मौत के बाद चेतना को जीवित रखने की कोशिश कर रहा था। उसने गंभीर मरीजों पर एक दवा का परीक्षण शुरू किया। लेकिन प्रयोग गलत हो गया।
मरीज न जीवित रहे…… न मृत। उनकी आत्माएँ और शरीर अलग नहीं हो पाए। वे एक अजीब अवस्था में फँस गए और कमरा 307…… उनका कारागार बन गया।
कमरे में मुझे डॉ. अरोड़ा की डायरी मिली। आखिरी पन्ने पर लिखा था।
अगर कोई यह पढ़ रहा है तो कमरे को कभी मत खोलना।
अचानक फर्श पर एक काली दरार खुल गई। उसमें से ठंडी हवा निकल रही थी और सैकड़ों आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। दरार से एक आदमी बाहर आया। वह डॉ. अरोड़ा था। लेकिन अब इंसान नहीं। उसकी आँखें काली थीं।
और चेहरा सड़ चुका था।
20 साल का इंतज़ार
वह मुस्कुराया और बोला।
कोई तो आया……।
अब मैं जा सकता हूँ।
उसने कहा।
मेरी जगह किसी को रहना होगा।
मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। अचानक सारे मरीज उठ खड़े हुए। उनकी गर्दनें टेढ़ी थीं और वे धीरे-धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगे। मुझे डायरी याद आई। उसमें एक पन्ने पर लिखा था।
प्रयोग का अंत उसी मशीन से होगा जिससे शुरुआत हुई।
कमरे के कोने में एक पुरानी मशीन रखी थी। वही मशीन जिससे प्रयोग शुरू हुआ था। मैं उसकी तरफ दौड़ा।
विनाश
मैंने मशीन का मुख्य स्विच खींच दिया। अचानक पूरी इमारत हिलने लगी। रोशनी झिलमिलाने लगी और मरीज चीखने लगे। एक-एक करके मरीज गायब होने लगे। उनके चेहरों पर शांति दिखाई देने लगी। जैसे वर्षों बाद उन्हें मुक्ति मिली हो।
डॉ. अरोड़ा ने मुझे घूरा और बोला।
तुमने देर कर दी……
फिर वह धूल बनकर बिखर गया। मैं बेहोश हो गया।
अगली सुबह जब मेरी आँख खुली….. मैं अस्पताल के बाहर पड़ा था। सूरज निकल चुका था।
मैं तीसरी मंज़िल पर गया। लेकिन वहाँ कमरा 307 था ही नहीं। उसकी जगह सिर्फ एक दीवार थी। जैसे वह कभी अस्तित्व में ही नहीं था।
आज उस घटना को कई साल हो चुके हैं। अस्पताल को पूरी तरह गिरा दिया गया। लेकिन कभी-कभी….. मेरे घर के दरवाज़े पर एक पुराना अस्पताल रजिस्टर मिल जाता है। उसके आखिरी पन्ने पर हर बार एक नई लाइन लिखी होती है।
“डिस्चार्ज अभी बाकी है……।
और नीचे……. कमरा नंबर 307 का नाम फिर से दर्ज होता है।
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