वह कमरा जिसे घर के नक्शे में जानबूझकर छिपाया गया था (Horror room)

वह घर जो अंदर से छोटा था

अभय को हमेशा पुराने घरों से एक अजीब लगाव रहा था। उसे नए बने फ्लैट पसंद नहीं थे। एक जैसे दरवाज़े, एक जैसी बालकनी, एक जैसी सफेद दीवारें और हर कमरे में एक जैसी टाइलें उसे यह सब बिल्कुल पसंद नहीं आता था। वह ऐसा घर चाहता था जिसमें कोई इतिहास हो।

इसी तलाश में उसे शहर के पुराने हिस्से में एक दो-मंज़िला मकान मिला। मकान लगभग तीस साल पुराना था। बाहर से देखने पर साधारण। पीली पड़ी दीवारें, लोहे का पुराना गेट, बरामदे में टूटी हुई सीमेंट की बेंच और सामने एक सूखा हुआ पेड़। लेकिन कीमत बाकी घरों से बहुत कम थी। मकान मालिक ने कहा था……

घर थोड़ा पुराना है इसलिए सस्ता दे रहा हूँ।

अभय ने घर देखा।

नीचे बैठक, रसोई, एक छोटा स्टोर और सीढ़ियाँ थीं। ऊपर तीन कमरे और एक खुली छत। सब कुछ सामान्य था। उसे घर पसंद आ गया। रजिस्ट्री के समय मकान मालिक ने उसे पुराने दस्तावेजों की एक फाइल भी दी। फाइल में बिजली के बिल, पानी के कागज और पुराने नक्शे थे।

अभय ने फाइल घर आकर खोली। एक पीला पड़ा हुआ कागज सबसे नीचे रखा था। वह घर का मूल नक्शा था। अभय ने उसे मेज पर फैलाया। पहले तो उसे कुछ खास नजर नहीं आया। फिर उसकी नजर घर के पीछे वाले हिस्से पर गई। नक्शे में बैठक से पीछे की दीवार तक की दूरी लगभग पच्चीस फीट थी। अभय ने अगले दिन वही दूरी घर के अंदर नापी।

लगभग ग्यारह फीट। वह कुछ देर चुप खड़ा रहा। उसने दोबारा नापा। फिर भी वही।

चौदह फीट का हिस्सा गायब था।

अभय ने सोचा शायद नक्शा गलत बना होगा। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। घर की बाहरी दीवार की लंबाई भी उसने नापी। बाहर से घर जितना लंबा था। अंदर से उतना लंबा नहीं था। जैसे घर के अंदर कोई हिस्सा जानबूझकर छिपा दिया गया हो। उस रात अभय ने नक्शा दोबारा देखा। इस बार उसकी नजर नक्शे के पीछे लिखी एक छोटी-सी लाइन पर गई।

पुरानी स्याही से लिखा था।

पीछे वाला कमरा किसी भी संशोधित नक्शे में शामिल न किया जाए।

अभय के हाथ वहीं रुक गए। पीछे वाला कमरा ?

कौन-सा कमरा ?

दीवार के पीछे की जगह

अगले दिन अभय ने घर की लंबाई और चौड़ाई दोबारा नापी। इस बार उसने पूरा हिसाब कागज पर लिखा। फिर उसे यकीन हो गया। घर में सचमुच एक ऐसी जगह थी जो किसी कमरे के रूप में मौजूद होनी चाहिए थी। लेकिन वहाँ कोई दरवाज़ा नहीं था। उस जगह पर सिर्फ एक मोटी दीवार थी। अभय ने दीवार पर हाथ मारा।

ठक।

आवाज़ सामान्य थी।

उसने दूसरी जगह हाथ मारा।

ठक।

फिर बीच में।

ठक…. ठक….

आवाज़ थोड़ी अलग थी। जैसे दीवार के पीछे खाली जगह हो। अभय कुछ पल चुप रहा। फिर उसने दीवार पर कान लगाया। कुछ सुनाई नहीं दिया। उसने हथेली से धीरे-धीरे पूरी दीवार पर दस्तक दी। अधिकांश हिस्से से भारी आवाज़ आई।

लेकिन एक जगह से आवाज़ हल्की थी। वहाँ लगभग एक कमरे जितनी जगह होने का अंदाजा लगाया जा सकता था। अभय ने उस हिस्से पर पेंसिल से निशान लगा दिया। फिर उसने पूरे घर की दीवारों को ध्यान से देखना शुरू किया। ऊपर वाले कमरे की एक दीवार पर पुरानी अलमारी लगी थी। अलमारी हटाने पर पीछे प्लास्टर का रंग बाकी दीवार से अलग था।

अभय ने अलमारी खिसकाई। पीछे एक पतली लकड़ी की पट्टी दिखाई दी। उस पर धूल जमी थी। उसने पट्टी खींची। वह आसानी से बाहर आ गई। पीछे एक छोटा-सा गड्ढा था और उस गड्ढे के अंदर…..

एक पुरानी चाबी रखी थी। चाबी के साथ एक कागज भी था। अभय ने कागज खोला। उस पर सिर्फ चार शब्द लिखे थे।

कमरा ढूँढना मत।

अभय कुछ सेकंड तक उस कागज को देखता रहा। फिर उसके अंदर वही पुरानी जिज्ञासा जाग उठी। जिस चीज़ को ढूँढने से मना किया गया हो। उसे ढूँढने की इच्छा और बढ़ जाती है।

अभय ने घर के पीछे वाले हिस्से को फिर से देखा। जहाँ नक्शे के हिसाब से कमरा होना चाहिए था, वहाँ कोई दरवाज़ा नहीं था। लेकिन अब उसे चाबी मिल चुकी थी। वह घर की हर दीवार, हर कोना और हर अलमारी देखने लगा। करीब एक घंटे बाद उसे सीढ़ियों के नीचे एक लकड़ी का पैनल दिखाई दिया। पैनल बाकी दीवार से थोड़ा बाहर निकला हुआ था।

उसने चाबी उसमें लगाई। चाबी घूम गई।

क्लिक।

पैनल का एक हिस्सा खुल गया। अंदर अंधेरा था। अभय ने मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाई। सामने लगभग चार फीट लंबा संकरा रास्ता था। वह धीरे-धीरे अंदर गया। कुछ कदम बाद रास्ता खत्म हो गया। सामने दीवार थी। अभय निराश होकर वापस मुड़ने लगा। तभी उसकी नजर नीचे पड़ी। फर्श पर एक पुरानी धूल की लकीर थी। जैसे किसी भारी चीज़ को हाल ही में खींचकर वहाँ से हटाया गया हो।

उसने फर्श पर हाथ लगाया। एक टाइल थोड़ी ढीली थी। उसने उसे उठाया। नीचे लोहे की छोटी-सी कुंडी थी। अभय ने कुंडी खींची। फर्श का एक हिस्सा ऊपर उठ गया। नीचे सीढ़ियाँ थीं। लेकिन ये सीढ़ियाँ नीचे नहीं जा रही थीं। वे बगल की तरफ मुड़ रही थीं।

अभय को समझ नहीं आया कि घर के अंदर ऐसी जगह कैसे हो सकती है। वह सावधानी से नीचे उतरा। लगभग दस सीढ़ियों के बाद सामने एक दरवाज़ा आया। दरवाज़े पर कोई नंबर नहीं था। उसने हैंडल दबाया। दरवाज़ा खुल गया। सामने एक कमरा था। वही कमरा। जो नक्शे में था……

लेकिन घर में नहीं था।

कमरे के अंदर

कमरा लगभग बारह फीट लंबा था। दीवारें पुरानी थीं। छत पर एक पीला बल्ब लगा था। कमरे के बीच में लकड़ी की मेज थी। मेज पर एक खाली कागज रखा था। एक तरफ कुर्सी थी। दूसरी दीवार पर पुरानी घड़ी टंगी थी। घड़ी बंद थी। कमरे में सबसे अजीब चीज़ यह थी कि वहाँ धूल बहुत कम थी।

जैसे कोई इस कमरे में आता-जाता रहा हो। अभय धीरे-धीरे आगे बढ़ा। उसने मेज पर रखा कागज उठाया। कागज बिल्कुल खाली था। वह उसे वापस रखने लगा। तभी उसकी नजर दीवार पर गई। वहाँ घर का नक्शा टंगा था। अभय उसके पास गया। नक्शा देखकर उसके पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई।

वह उसी घर का नक्शा था। लेकिन उसमें कुछ अलग था। नक्शे में वह कमरा साफ दिखाई दे रहा था और कमरे के अंदर एक छोटा-सा निशान बना था। जैसे कोई व्यक्ति कुर्सी पर बैठा हो। अभय ने नक्शे को करीब से देखा। उस निशान के नीचे नाम लिखा था।

अभय

उसका गला सूख गया। वह पीछे हट गया। ये कैसे…..

उसने तुरंत कमरे से बाहर निकलने का फैसला किया। लेकिन जैसे ही वह दरवाज़े तक पहुँचा, दरवाज़ा बंद था। उसने हैंडल घुमाया। कुछ नहीं हुआ। उसने जोर लगाया। दरवाज़ा नहीं खुला। फिर कमरे की दीवार वाली घड़ी अचानक चलने लगी।

टक…. टक…. टक….

अभय ने घड़ी की तरफ देखा। सुइयाँ उल्टी दिशा में घूम रही थीं। फिर घड़ी रुक गई। कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया और उसी सन्नाटे में उसे बहुत धीमी आवाज़ सुनाई दी।

तुमने नक्शा देख लिया ?

अभय का शरीर सुन्न हो गया। आवाज़ कमरे के किसी कोने से नहीं आई थी। ऐसा लगा जैसे पूरी दीवार बोल रही हो। उसने जवाब नहीं दिया। आवाज़ दोबारा आई।

अब घर तुम्हें पहचानता है।

पुराने नक्शों की कहानी

अभय किसी तरह उस कमरे से बाहर निकल आया। दरवाज़ा इस बार आसानी से खुल गया। वह सीधे घर से बाहर चला गया। उस रात उसने कमरे में वापस जाने की हिम्मत नहीं की। अगली सुबह उसने पुराने दस्तावेज़ देखने शुरू किए। उसे मकान के पिछले मालिक का नाम मिला।

वह शहर के पुराने हिस्से में रहने वाला वास्तुकार था। अभय ने पुराने रिकॉर्ड खंगाले। उसे पता चला कि घर लगभग पैंतीस साल पहले बनाया गया था। मूल नक्शे में वह कमरा मौजूद था।

लेकिन निर्माण पूरा होने के बाद जमा किए गए नक्शे में कमरा गायब था। अभय ने दोनों नक्शों की तुलना की। फिर उसे तीसरा नक्शा मिला। उसमें कमरा और छोटा था। चौथे नक्शे में सिर्फ दीवार दिखाई दे रही थी। जैसे कमरे को धीरे-धीरे कागज से मिटाया जा रहा हो। अभय ने मकान मालिक को फोन किया।

आपने मुझे ये बात क्यों नहीं बताई ?

कुछ सेकंड चुप्पी रही। फिर मकान मालिक ने कहा। क्योंकि मुझे लगा था तुम कभी उसे ढूँढ नहीं पाओगे। उस कमरे में क्या है ?

मुझे नहीं पता। आप वहाँ गए हैं।

हाँ।

फिर ?

मकान मालिक ने लंबी सांस ली। हर बार कमरा थोड़ा अलग होता था। अभय चुप रहा।

क्या मतलब ?

पहली बार वहाँ सिर्फ सामान था।

दूसरी बार ?

मेरी पत्नी की आवाज़ और तीसरी बार ?

उधर से कोई जवाब नहीं आया। फिर मकान मालिक बोला।

तीसरी बार मैं अंदर गया ही नहीं।

क्यों ?

क्योंकि कमरे में मेरे घर का नक्शा था।

तो ?

उस नक्शे में मेरा कमरा नहीं था। अभय के हाथ ठंडे पड़ गए। उस दिन के बाद अभय ने कमरे से दूर रहने की कोशिश की। लेकिन घर में छोटी-छोटी चीज़ें बदलने लगीं। पहले बैठक की दीवार पर लगी तस्वीर अपनी जगह से गायब मिली। फिर रसोई की खिड़की के पास रखा पौधा अचानक दूसरे कमरे में मिला।

अभय ने सोचा शायद उसने खुद जगह बदली होगी। लेकिन उसे याद था कि उसने पौधे को नहीं छुआ था। अगले दिन उसकी किताबें अलमारी में अलग क्रम में रखी मिलीं। फिर एक सुबह उसे एहसास हुआ कि सीढ़ियों की चौड़ाई पहले से थोड़ी कम लग रही थी। उसने फीते से नापा। वास्तव में सीढ़ियाँ लगभग दो इंच संकरी हो चुकी थीं। अभय घबरा गया।

उसने घर का नक्शा निकाला। अब नक्शे में भी सीढ़ियाँ पहले से अलग दिखाई दे रही थीं और सबसे डरावनी बात नक्शे में वह छिपा हुआ कमरा अब पहले से बड़ा हो गया था। उसने कमरे की लंबाई नापी। पहले वह बारह फीट था। अब नक्शे में लगभग सत्रह फीट था।

अभय ने नक्शा फाड़ने की कोशिश की। कागज नहीं फटा। उसने चाकू से काटा। कागज कट गया। लेकिन कुछ सेकंड बाद कटा हुआ हिस्सा खुद जुड़ गया और नक्शे पर कमरे की लंबाई फिर बढ़ गई।

अब कमरा घर के लगभग एक-तिहाई हिस्से जितना बड़ा दिख रहा था। अभय ने पहली बार सोचा

क्या वह कमरा घर के अंदर नहीं बढ़ रहा था ?

क्या वह घर को अपने अंदर खींच रहा था ?

कमरे का दूसरा चेहरा

अभय ने आखिरकार फैसला किया कि वह एक बार फिर उस कमरे में जाएगा। इस बार वह अपने साथ घर का मूल नक्शा लेकर गया। सीढ़ियों के नीचे का पैनल खोला। संकरा रास्ता पार किया। फिर वही दरवाज़ा आया। लेकिन इस बार दरवाज़ा पहले से बड़ा था। उसने दरवाज़ा खोला। कमरा बदल चुका था।

मेज वहीं थी। कुर्सी वहीं थी। घड़ी भी वहीं थी। लेकिन दीवारों पर अब दर्जनों नक्शे लगे थे। हर नक्शा अलग घर का था। कुछ छोटे मकान। कुछ बड़े बंगले। कुछ पुराने फ्लैट। कुछ ऐसे घर जिन्हें देखकर लगता था कि वे अब अस्तित्व में ही नहीं हैं। अभय ने एक नक्शा उठाया।

उस पर लाल स्याही से लिखा था।

घर नंबर 18

दूसरे पर

पुरानी गली, मकान 42

तीसरे पर

शिव विहार, भवन 9

हर नक्शे में एक कमरा गायब था और हर नक्शे के नीचे किसी व्यक्ति का नाम लिखा था। अभय समझ गया। यह कमरा सिर्फ उसके घर का रहस्य नहीं था। यह कमरा कई घरों से जुड़ा हुआ था। मेज पर एक मोटी डायरी पड़ी थी। अभय ने उसे खोला।

पहले पन्ने पर लिखा था।

जिस घर में यह कमरा दिखाई दे, उसे कभी पूरा मत नापना।

अगले पन्ने पर

घर की बाहरी दीवार और अंदर की दीवार में अंतर जितना बढ़ता जाए, समझो कमरा जाग रहा है।

अभय पन्ने पलटता गया। आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य था।

कमरा घर को नहीं निगलता। घर को कमरे में दर्ज करता है।

अभय ने डायरी बंद कर दी। तभी पीछे से कुर्सी खिसकने की आवाज़ आई। वह धीरे-धीरे मुड़ा। कमरे में कोई नहीं था। लेकिन कुर्सी अब मेज के सामने नहीं थी। वह दरवाज़े के पास रखी थी और उस पर एक नया नक्शा रखा था।

अभय ने नक्शा उठाया। उसमें उसका पूरा घर बना था। लेकिन उसके घर के अंदर कोई भी कमरा नहीं था। सिर्फ एक बड़ा खाली आयत था और उसके बीच लिखा था।

अब घर पूरा है।

अभय पीछे हट गया। उसने नक्शा वहीं गिरा दिया। अचानक कमरे की दीवारें बहुत धीमी गति से खिसकने लगीं। कोई आवाज़ नहीं। बस दीवारें आगे बढ़ रही थीं। कमरा छोटा नहीं हो रहा था। बल्कि बाहर का रास्ता छोटा होता जा रहा था। अभय दौड़कर दरवाज़े तक पहुँचा। उसने दरवाज़ा खोला।

सामने वही संकरा रास्ता था। वह बाहर निकल गया। जैसे ही वह सीढ़ियों तक पहुँचा, पीछे से जोरदार आवाज़ हुई।

धड़ाम…..!

दरवाज़ा बंद हो गया। अभय सीढ़ियाँ चढ़कर घर में आया। उसने राहत की सांस ली। लेकिन घर पहले जैसा नहीं था। बैठक गायब थी। रसोई की जगह दीवार थी। सीढ़ियाँ दूसरी तरफ थीं। उसका bedroom वहाँ नहीं था जहाँ होना चाहिए था। अभय घबराकर दरवाज़े तक भागा। वह बाहर निकला।

लेकिन बाहर उसका घर नहीं था। वह एक खाली गलियारे में खड़ा था। दीवार पर एक बोर्ड लगा था। उस पर लिखा था।

घर संख्या – दर्ज नहीं।

अभय ने पीछे देखा। जहाँ उसका घर होना चाहिए था। वहाँ सिर्फ एक दीवार थी और उस दीवार के बीच एक दरवाज़ा। दरवाज़े पर वही चाबी लगी थी जो उसे पहली बार मिली थी। अभय ने चाबी निकाल ली। दरवाज़ा खुल गया। सामने वही कमरा था।

मेज।

कुर्सी।

घड़ी।

नक्शे।

लेकिन इस बार मेज पर एक आखिरी कागज रखा था। अभय ने काँपते हाथों से उसे उठाया। उस पर उसके घर का नक्शा बना था। लेकिन इस बार छिपा हुआ कमरा नहीं था। उसकी जगह एक नया कमरा था। नाम लिखा था।

अभय

अभय ने पीछे देखा। कमरे में कोई नहीं था। फिर घड़ी चलने लगी।

टक…. टक…. टक….

और दीवार से वही आवाज़ आई। अब नक्शे में तुम्हारे लिए जगह है। अभय ने दरवाज़े की तरफ दौड़ लगाई। दरवाज़ा खुला। वह बाहर आया। लेकिन इस बार वह अपने घर में था। सब कुछ पहले जैसा था। बैठक।

रसोई।

सीढ़ियाँ।

उसका कमरा। सब कुछ। उसने राहत की सांस ली। फिर उसने जेब से घर का नक्शा निकाला। नक्शा अब सामान्य था। छिपा हुआ कमरा गायब था। अभय ने उसे मेज पर रखा। कुछ देर तक चुप बैठा रहा। फिर उसकी नजर नक्शे के नीचे वाले कोने पर गई। वहाँ एक छोटा-सा कमरा बना था। उस कमरे का कोई नंबर नहीं था।

सिर्फ एक नाम था।

अभय

उसने नक्शा फाड़ दिया। इस बार कागज नहीं जुड़ा। लेकिन अगले ही पल उसके घर की दीवार के अंदर से आवाज़ आई।

ठक…. ठक…. ठक….

अभय ने सिर उठाया। वही आवाज़। ठीक उसी जगह से जहाँ बाहर से देखने पर सिर्फ एक खाली दीवार थी। उसने धीरे-धीरे दीवार के पास जाकर कान लगाया। अंदर से कोई बोल रहा था। बहुत शांत आवाज़ में।

नक्शा मत फाड़ो…..

अभय पीछे हट गया। आवाज़ फिर आई।

कमरा अब तुम्हारे घर में नहीं है……

कुछ सेकंड की खामोशी। फिर

अब तुम्हारा घर उस कमरे में है।

उस रात के बाद अभय ने वह मकान छोड़ दिया। लेकिन जाते समय उसने घर का नया नक्शा बनवाया। नक्शे में सब कुछ सही था। सिर्फ एक जगह खाली छोड़ी गई थी। वही जगह जहाँ वह कमरा हुआ करता था। अभय ने सोचा था कि कहानी खत्म हो गई। लेकिन नक्शा बनवाने वाले वास्तुकार ने उसे अगले दिन फोन किया।

उसने पूछा आपके घर के नक्शे में यह खाली हिस्सा किसके लिए है ?

अभय ने कहा।

कौन-सा हिस्सा ?

वास्तुकार ने कहा। पीछे वाला कमरा। अभय कुछ नहीं बोला। वास्तुकार ने आगे कहा।

अजीब बात है मैंने तो आपके घर में कोई कमरा नहीं बनाया। फोन कट गया। अभय ने तुरंत नक्शा खोला। उस खाली हिस्से में अब कुछ लिखा हुआ था। सिर्फ एक लाइन

अगला नक्शा किसके घर का बनाना है ?

और उसके नीचे एक खाली जगह थी। जैसे किसी नए नाम का इंतजार हो रहा हो।

THE END |

आपको यह कहानी कैसी लगी ? कमेंट में जरूर बताइए।

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