पुराने तालाब से हर रात कोई बाहर निकलता था (Haunted Pond daayan story)

अगर किसी गाँव में हर रात ठीक 1:13 बजे एक सूखे तालाब से पानी अपने आप भरने लगे…. और फिर उसमें से कोई बाहर निकलकर पूरे गाँव में घूमे…. तो क्या आप उस गाँव में एक रात भी रुक पाएँगे ?

मेरा नाम विवेक है। मैं पेशे से एक फ़ोटोग्राफ़र हूँ। पिछले आठ सालों से भारत के पुराने गाँवों, खंडहरों और भूली-बिसरी जगहों की तस्वीरें खींचकर उन पर डॉक्यूमेंट्री बनाता हूँ। मुझे भूत-प्रेत या डायन जैसी बातों पर कभी विश्वास नहीं था। मेरे लिए हर रहस्य के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण ज़रूर होता था।

लेकिन तीन साल पहले उत्तराखंड के पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे-से गाँव भैरवताल में जो कुछ मैंने देखा….. उसके बाद मैंने रात में किसी भी सुनसान तालाब के पास जाना हमेशा के लिए छोड़ दिया।

एक ऐसा गाँव जहाँ शाम के बाद कोई पानी के पास नहीं जाता था

भैरवताल तक पहुँचने के लिए आखिरी बीस किलोमीटर कच्ची सड़क से जाना पड़ता था। पहाड़ों के बीच बसा वह गाँव इतना शांत था कि शाम होते ही सिर्फ़ झींगुरों की आवाज़ सुनाई देती थी। मैं वहाँ पुराने पत्थर के मंदिरों और पारंपरिक घरों की तस्वीरें लेने गया था। गाँव में मेरे रुकने की व्यवस्था प्रधान देवेंद्र सिंह के घर हुई।

पहले दिन सब कुछ बिल्कुल सामान्य था। लोग हँसते थे।

बच्चे खेलते थे।

औरतें खेतों से लौट रही थीं।

लेकिन शाम के करीब छह बजे अचानक पूरा माहौल बदल गया। जिस रास्ते पर कुछ देर पहले लोग बैठे बातें कर रहे थे। वह पाँच मिनट में खाली हो गया। हर घर का दरवाज़ा बंद होने लगा। कुत्तों को रस्सी से बाँध दिया गया। गाय-भैंस तक आँगन के अंदर कर दी गईं।

मैंने प्रधान से पूछा क्या यहाँ रात को जंगली जानवर आते हैं ?

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर धीमे से बोले जानवर आते तो अच्छा था। मैंने कहा

मतलब ?

उन्होंने जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा अगर रात को पानी बहने की आवाज़ सुनो तो खिड़की मत खोलना। मुझे लगा शायद गाँव की कोई पुरानी मान्यता होगी। रात को खाना खाकर मैं अपने कमरे में आ गया।

करीब साढ़े बारह बजे तक लैपटॉप पर कैमरे की तस्वीरें देखता रहा। फिर अचानक पूरा गाँव एकदम शांत हो गया। इतना शांत कि मुझे अपनी साँसों की आवाज़ भी साफ़ सुनाई देने लगी। उसी समय….

छपाक….

जैसे किसी ने बहुत गहरे पानी में छलांग लगाई हो। मैं चौंक गया। कमरे की खिड़की तालाब की तरफ़ खुलती थी। मैंने पर्दा हटाने के लिए हाथ बढ़ाया। तभी मुझे प्रधान की बात याद आई।

पानी बहने की आवाज़ सुनो…. तो खिड़की मत खोलना।

मैं रुक गया। लेकिन जिज्ञासा डर से बड़ी थी। मैंने धीरे से पर्दा हटाया।

सूखा तालाब अचानक पानी से भर गया

दिन में जिस तालाब को मैंने देखा था। वह पूरी तरह सूखा था। उसकी फटी हुई मिट्टी में घास उगी हुई थी। लेकिन इस समय पूरा तालाब पानी से लबालब भरा हुआ था। चाँद की रोशनी उस पानी पर पड़ रही थी। लेकिन एक अजीब बात थी।

उस पानी में कोई लहर नहीं थी।

ऐसा लग रहा था जैसे वह पानी नहीं एक काला शीशा हो। मैंने तुरंत कैमरा उठाया। ज़ूम करके तालाब पर फोकस किया। तभी पानी के बिल्कुल बीच में एक गोल-सा भँवर बनने लगा। धीरे-धीरे….

वह बड़ा होने लगा और फिर उसमें से किसी का हाथ बाहर आया। वह हाथ बिल्कुल सफेद नहीं था। उस पर काली काई चिपकी हुई थी। लंबी उँगलियाँ नाखून असामान्य रूप से बड़े और उनसे लगातार पानी टपक रहा था।

मेरे हाथ काँप गए। मैंने कैमरे का रिकॉर्ड बटन दबा दिया। कुछ ही सेकंड बाद पूरा शरीर पानी से बाहर आने लगा। वह एक औरत थी। लेकिन उसकी चाल किसी इंसान जैसी नहीं थी। वह पहले दोनों हाथ ज़मीन पर रखती फिर धीरे-धीरे पूरा शरीर बाहर खींचती। जैसे वर्षों बाद किसी तंग जगह से निकल रही हो।

उसके लंबे बाल पूरे चेहरे पर चिपके हुए थे। सफेद नहीं गहरे हरे रंग की फटी हुई साड़ी उसके शरीर से लिपटी थी। वह खड़ी नहीं हुई। बस तालाब के किनारे घुटनों के बल बैठी रही। फिर….

उसने अपना सिर धीरे-धीरे ऊपर उठाया और पहली बार मुझे एहसास हुआ। उसके चेहरे पर आँखें थीं ही नहीं। जहाँ आँखें होनी चाहिए थीं। वहाँ सिर्फ़ दो गहरे काले गड्ढे थे। जिनसे लगातार पानी बह रहा था। मैंने डर के मारे कैमरा नीचे कर लिया। फिर हिम्मत करके दोबारा देखा।

तो वह वहाँ नहीं थी। तालाब बिल्कुल खाली था और दरवाज़े के बाहर किसी के गीले पैरों से चलने की आवाज़ आने लगी।

छप….

छप….

छप….

आवाज़ धीरे-धीरे मेरे कमरे के ठीक बाहर आकर रुक गई और उसी पल मेरे दरवाज़े के नीचे से तालाब का गंदा, काई भरा पानी अंदर बहने लगा।

मैं बिस्तर से उठकर पीछे हट गया। दरवाज़े के नीचे से बहता हुआ पानी धीरे-धीरे कमरे के बीच तक आ चुका था। लेकिन सबसे अजीब बात उस पानी में मिट्टी नहीं थी। उसमें छोटी-छोटी हरी काई तैर रही थी। ऐसी काई जो सिर्फ़ बहुत पुराने और रुके हुए पानी में होती है।

छप….

बाहर फिर वही आवाज़ आई। इस बार ऐसा लगा। जैसे कोई दरवाज़े के बिल्कुल सामने खड़ा होकर अपने भीगे हुए पैर घसीट रहा हो। मैंने साँस रोक ली। कुछ सेकंड तक सन्नाटा रहा। फिर

ठक….

दरवाज़े पर सिर्फ़ एक बार दस्तक हुई।

न दूसरी….

न तीसरी….

सिर्फ़ एक। फिर सब कुछ शांत। करीब दस मिनट तक मैं वहीं खड़ा रहा। जब बाहर से कोई आवाज़ नहीं आई तो मैंने धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला। बाहर पूरा बरामदा सूखा था। कहीं पानी नहीं। कहीं पैरों के निशान नहीं। जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन जब मेरी नज़र नीचे गई। तो दरवाज़े की चौखट पर एक छोटी-सी सीपी पड़ी थी।

पहाड़ के बीच बसे गाँव में समुद्र की सीपी ?

मैंने उसे उठाया। वह बर्फ़ की तरह ठंडी थी। सुबह मैंने यह बात प्रधान देवेंद्र सिंह को बताई। उन्होंने मेरी बात बीच में ही रोक दी। तुमने खिड़की खोली थी। मैं चुप रहा। उन्होंने फिर पूछा तस्वीर भी ली ?

इस बार मैं चौंक गया। आपको कैसे पता ?

उन्होंने गहरी साँस ली क्योंकि जो भी पहली बार उसे देखता है। वह तस्वीर ज़रूर लेता है। उन्होंने मेरा कैमरा माँगा। मैंने रिकॉर्डिंग चलाई। वीडियो शुरू हुआ।

तालाब….

चाँद….

भँवर….

लेकिन जहाँ मुझे वह औरत दिखाई दी थी। वहाँ वीडियो में कुछ भी नहीं था। सिर्फ़ शांत पानी। मैंने घबराकर वीडियो आगे किया। तभी अचानक वीडियो के आखिरी 10 सेकंड में कैमरा अपने आप मेरी तरफ़ घूम गया। मैंने ऐसा नहीं किया था। स्क्रीन पर मेरा चेहरा था।

लेकिन मेरे ठीक पीछे कोई खड़ा था।

लंबे गीले बाल….

हरा फटा कपड़ा….

और वही काले गड्ढों वाली आँखें। मैंने तुरंत वीडियो रोक दिया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने प्रधान की तरफ़ देखा। लेकिन उनके चेहरे पर डर नहीं था। बल्कि पछतावा था। उन्होंने धीरे से कहा

अब उसने तुम्हें देख लिया है।

भैरवताल की डायन की असली कहानी

दोपहर को प्रधान मुझे गाँव के सबसे पुराने मंदिर के पीछे बने एक छोटे-से पत्थर के कमरे में ले गए। वहाँ लगभग पचानवे साल की एक बूढ़ी औरत बैठी थी। सब लोग उसे गोमती दादी कहते थे। उन्होंने मुझे देखते ही पूछा रात को उसने सीपी छोड़ी थी ?

मैंने जेब से सीपी निकालकर उनके हाथ में रख दी। उन्होंने उसे देखते ही आँखें बंद कर लीं। कुछ देर बाद बोलीं तीन साल बाद फिर किसी के दरवाज़े पर सीपी आई है। मैंने पूछा,

वह है कौन ?

गोमती दादी ने तालाब की तरफ़ देखा। लोग उसे डायन कहते हैं। लेकिन वह पहले डायन नहीं थी। उन्होंने जो कहानी सुनाई उसे सुनकर पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। करीब डेढ़ सौ साल पहले उसी गाँव में मालती नाम की एक लड़की रहती थी। वह जड़ी-बूटियों से लोगों का इलाज करती थी। दूर-दूर के गाँवों से लोग उसके पास आते थे। लेकिन लगातार दो साल सूखा पड़ा।

फसलें बर्बाद हो गईं। गाँव में बीमारी फैल गई। लोगों को किसी पर दोष डालना था। उन्होंने मालती को ही अपशकुन मान लिया। एक रात पूरे गाँव ने उसे बाँधकर उसी तालाब में फेंक दिया। तब तालाब पानी से भरा हुआ था। कहा जाता है। मालती डूबते समय सिर्फ़ एक बात चिल्लाई थी।

जिस दिन पानी मुझे वापस लौटाएगा…. उस दिन तुम मुझे पहचान नहीं पाओगे।

उसके बाद तालाब धीरे-धीरे सूख गया। लेकिन हर रात ठीक 1:13 बजे…

वह फिर भर जाता है और मालती बाहर निकलती है। लेकिन वह किसी को मारती नहीं। मैंने राहत की साँस ली। तो फिर लोग उससे डरते क्यों हैं ?

गोमती दादी ने मेरी आँखों में देखा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी।

क्योंकि वह जिस घर के दरवाज़े पर सीपी छोड़ देती है…. उस घर का कोई एक इंसान अगली अमावस्या से पहले हमेशा के लिए उसके साथ चला जाता है।

मैंने जेब टटोली। सीपी अब भी मेरे पास नहीं थी। मैं घबराकर बोला लेकिन सीपी तो मैंने आपको दे दी थी। गोमती दादी का चेहरा अचानक सफेद पड़ गया। उन्होंने काँपते हुए अपना हाथ खोला।

उनकी हथेली खाली थी।

सीपी फिर से

मेरी शर्ट की जेब में वापस आ चुकी थी।

अमावस्या की रात…. जब पूरा गाँव जाग रहा था

मेरे शरीर में जैसे जान ही नहीं बची थी। मैंने काँपते हुए जेब से सीपी निकाली। इस बार मैं उसे दूर फेंक देना चाहता था। मैं मंदिर के पीछे खड़ी गहरी खाई तक गया और पूरी ताकत से सीपी नीचे फेंक दी। हम तीनों वहीं खड़े रहे।

लगभग दस सेकंड….

बीस सेकंड….

एक मिनट….

कुछ नहीं हुआ। मैंने राहत की साँस ली। लेकिन जैसे ही वापस मुड़ा

मेरे दाएँ जूते के ऊपर वही सीपी रखी हुई थी।

मैंने उसे फेंका था। सबने देखा था। फिर भी वह वापस मेरे पास थी। गोमती दादी ने आँखें बंद कर लीं। अब इसे फेंकना मत यह जहाँ रहना चाहती है, वहीं रहेगी।

अमावस्या में सिर्फ़ दो रातें बची थीं। गाँव में एक अजीब बेचैनी फैल गई। शाम होते ही हर घर के बाहर लोग नमक की एक पतली रेखा बना देते। कोई दरवाज़े के बाहर पानी नहीं छोड़ता था। कोई रात में अपना नाम लेकर किसी को नहीं बुलाता था।

सब जानते थे। अगर इस बार डायन ने किसी को चुना है। तो वह रात बहुत पास है। मैंने फैसला किया कि इस रहस्य का अंत देखे बिना नहीं जाऊँगा। उस रात मैं अकेला तालाब तक पहुँचा। इस बार मेरे साथ तीन कैमरे थे। एक पेड़ पर।

एक पुराने मंदिर की छत पर और एक बिल्कुल तालाब के किनारे।

मैं खुद मंदिर की टूटी दीवार के पीछे छिप गया। घड़ी ने 1:12 बजाए। पूरा गाँव अंधेरे में डूबा हुआ था। अचानक तालाब की सूखी मिट्टी में दरारें चमकने लगीं। फिर जमीन के नीचे से पानी ऊपर आने लगा। कोई बारिश नहीं थी। कोई नाला नहीं।

फिर भी कुछ ही सेकंड में पूरा तालाब भर गया। ठीक 1:13 पर पानी के बीच एक गोल लहर बनी और फिर मालती बाहर निकली। लेकिन इस बार मैंने पहली बार उसका पूरा चेहरा देखा। वह डरावना था। पर उससे ज़्यादा दुखी।

उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ एक अजीब-सी थकान। वह धीरे-धीरे गाँव की तरफ़ बढ़ने लगी। मैं उसके पीछे-पीछे चलने लगा।

डायन किसी इंसान के घर नहीं गई

मैंने सोचा था वह किसी घर के बाहर रुकेगी। लेकिन वह पूरे गाँव को पार करके तालाब के पीछे बने पुराने खंडहर तक पहुँच गई। वहाँ एक टूटा हुआ पत्थर पड़ा था। मालती उसके सामने बैठ गई और धीरे-धीरे रोने लगी।

मैं पहली बार उसकी आवाज़ सुन रहा था। वह किसी डरावने प्राणी की आवाज़ नहीं थी। वह एक ऐसी औरत की आवाज़ थी। जिससे सब कुछ छीन लिया गया हो। मैंने हिम्मत करके पूछा तुम क्या चाहती हो ?

उसने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों के काले गड्ढों में पानी भर आया। फिर उसने काँपते हुए हाथ से उस पत्थर की तरफ़ इशारा किया। मैंने टॉर्च जलाई। पत्थर के नीचे कुछ दबा हुआ था। मैंने मिट्टी हटाई। कुछ देर बाद

एक छोटा-सा लकड़ी का संदूक निकला। उसके अंदर एक लाल चुनरी….

कुछ चूड़ियाँ….

और एक नवजात बच्चे का चाँदी का कड़ा रखा था। साथ में एक मिट्टी की तख्ती थी। उस पर लिखा था।

मालती निर्दोष थी।

मेरे हाथ काँप गए। यानी पूरा गाँव डेढ़ सौ साल तक एक निर्दोष औरत को डायन समझता रहा। मैंने जैसे ही वह तख्ती उठाई। अचानक चारों तरफ़ तेज़ हवा चलने लगी। तालाब का पानी उफनने लगा। मालती धीरे-धीरे मुस्कुराई और उसका शरीर पानी की बूंदों में बदलने लगा। कुछ ही सेकंड में वह गायब हो चुकी थी।

अगली सुबह पूरा गाँव इकट्ठा हुआ। मैंने सबको संदूक और तख्ती दिखाई। गाँव वालों ने पहली बार मंदिर में मालती के नाम का दीपक जलाया। उस शाम ठीक 1:13 बजे….

मैं फिर तालाब के पास गया। तालाब सूखा था। कोई पानी नहीं।

कोई आवाज़ नहीं। मुझे लगा सब खत्म हो गया। मैं शहर लौट आया।

तीन महीने बाद….

मैं अपने स्टूडियो में बैठा था। उस रात रिकॉर्ड किए गए तीनों कैमरों की फुटेज पहली बार ध्यान से देख रहा था। पहले कैमरे में तालाब दिखाई दे रहा था।

दूसरे में मालती का चलना।

लेकिन तीसरे कैमरे की रिकॉर्डिंग देखकर मेरी साँस रुक गई। उस कैमरे का एंगल मेरी तरफ़ था। वीडियो में साफ़ दिखाई दे रहा था। मैं पूरी रात मंदिर के पीछे छिपा ही नहीं था।

रिकॉर्डिंग के अनुसार 1:13 बजे मैं खुद तालाब तक गया था।

मैंने पानी में हाथ डाला और किसी को बाहर आने में मदद की थी।

लेकिन वहाँ मालती नहीं थी। जिसे मैंने पानी से बाहर निकाला। उसका चेहरा कैमरे में कभी दिखाई ही नहीं दिया। बस दो भीगे हुए हाथ और लंबे काले बाल। वीडियो के आखिरी पाँच सेकंड में मैं कैमरे की तरफ़ मुड़ा और मुस्कुराकर सिर्फ़ एक वाक्य कहा।

आज उसने मुझे नहीं चुना…. मैंने उसे चुना है।

मुझे याद नहीं। मैंने ऐसा कभी किया था। मैंने तुरंत वीडियो बंद कर दिया। आज भी वह फुटेज मेरे लैपटॉप में मौजूद है। लेकिन मैंने उसे दोबारा कभी नहीं देखा। क्योंकि जिस रात मैंने पहली बार उसे चलाया था। अगली सुबह मेरे स्टूडियो के दरवाज़े के बाहर गीली मिट्टी पर किसी औरत के पैरों के निशान बने हुए थे और उनके पास रखी थी।

वही छोटी-सी समुद्री सीपी।

THE END |

अगर इस Horror Story in Hindi ने आपको अंत तक डर और सस्पेंस का एहसास कराया तो नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए क्या आप ऐसी रहस्यमयी दस्तक का सामना करेंगे या बिना जवाब दिए पूरी रात दरवाज़ा बंद रखेंगे ?

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Vishal is the creator behind HorrorStory, a platform dedicated to sharing chilling and mysterious horror stories. He crafts each story with suspense, fear, and unexpected twists to keep readers hooked till the very end. If you enjoy scary and ghost stories, HorrorStory by Vishal is the perfect place for you.

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