रेलवे प्लेटफॉर्म नंबर 0 की डरावनी सच्चाई (Haunted Railway Platform)

अगर किसी रेलवे स्टेशन पर आपको एक ऐसा प्लेटफॉर्म दिखाई दे। जिसका नंबर रेलवे के किसी भी नक्शे, टिकट या रिकॉर्ड में मौजूद ही न हो…. तो क्या आप वहाँ जाने की हिम्मत करेंगे ?

अगर आपको Real Horror Story in Hindi पढ़ना पसंद है, तो यह कहानी आपको अंत तक बेचैन कर देगी। यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है, लेकिन इसे इस तरह लिखा गया है कि हर घटना बिल्कुल सच्ची लगे।

वह प्लेटफॉर्म जो मौजूद ही नहीं था

मेरा नाम अभिषेक वर्मा है। मैं पेशे से एक वीडियो डॉक्यूमेंट्री मेकर हूँ। पिछले आठ सालों से भारत की रहस्यमयी जगहों, पुराने रेलवे स्टेशनों और भूली-बिसरी कहानियों पर वीडियो बनाता आया हूँ। मेरे चैनल पर लोग सबसे ज़्यादा उन वीडियो को पसंद करते थे। जिनमें किसी जगह के पीछे छिपा ऐसा रहस्य होता था जिसे आधिकारिक तौर पर कभी स्वीकार नहीं किया गया।

करीब डेढ़ साल पहले मुझे एक ईमेल मिला। भेजने वाले का नाम नहीं था। Subject में सिर्फ़ लिखा था।

Platform No. 0 Exists.

पहले मुझे लगा कोई मज़ाक है। लेकिन जैसे ही मैंने मेल खोला मेरे चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। मेल में सिर्फ़ चार लाइनें थीं।

अगर सच दिखाने की हिम्मत है तो मध्य प्रदेश के शिवनगर जंक्शन आओ। आधी रात 12:40 पर प्लेटफॉर्म नंबर 0 खुलता है। वहाँ आने वाली ट्रेन का टिकट कभी मत लेना। अगर लौट आए….. तो दुनिया तुम्हें झूठा समझेगी।

नीचे कोई नाम नहीं था। कोई मोबाइल नंबर नहीं। बस एक पुरानी टिकट की धुंधली फोटो लगी थी। उस टिकट पर लिखा था।

Platform : 0

मैंने सोचा किसी ने फोटो एडिट की होगी। लेकिन जिज्ञासा खत्म नहीं हुई। दो दिन बाद मैं शिवनगर जंक्शन पहुँच गया। शिवनगर जंक्शन कोई बड़ा स्टेशन नहीं था। चार प्लेटफॉर्म। एक पुराना वेटिंग हॉल।

कुछ चाय की दुकानें। सब कुछ बिल्कुल सामान्य। मैंने सबसे पहले स्टेशन मास्टर से पूछा। सर, यहाँ कभी प्लेटफॉर्म नंबर 0 हुआ करता था क्या ?

उन्होंने पहले मुझे देखा फिर हँस पड़े। नहीं। यहाँ सिर्फ़ एक से चार तक प्लेटफॉर्म हैं। लेकिन अगर पहले रहा हो ?

उनका चेहरा अचानक गंभीर हो गया। उन्होंने फाइल बंद की। धीरे से बोले। ऐसे सवाल यहाँ मत पूछिए। मैंने कारण पूछा। उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बस दूसरी तरफ़ देखने लगे। मुझे पहली बार लगा। यहाँ कुछ तो ऐसा है जिसके बारे में लोग बात नहीं करना चाहते।

बूढ़ा कुली

शाम करीब छह बजे मैं स्टेशन पर शूट कर रहा था। तभी लगभग सत्तर साल का एक बूढ़ा कुली मेरे पास आया। उसकी यूनिफॉर्म इतनी पुरानी थी कि उसका रंग पहचानना मुश्किल था। उसने बिना पूछे कहा। प्लेटफॉर्म जीरो ढूँढ रहे हो।

मैं चौंक गया। मैंने कैमरा नीचे कर दिया। आपको कैसे पता ?

वह मुस्कुराया नहीं। उसकी आँखों में अजीब-सा डर था। जिसे भी वह ईमेल मिलता है….. वह यही सवाल पूछता है। मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

मतलब ?

वह धीरे से बोला। तुम पहले नहीं हो और जो पहले आए थे ?

उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस स्टेशन के आखिरी छोर की तरफ़ इशारा कर दिया। रात बारह बजे के बाद वहाँ मत जाना।

क्यों ?

उसने मेरी आँखों में देखते हुए कहा। क्योंकि जो लोग प्लेटफॉर्म नंबर 0 देख लेते हैं। वे वापस तो आ जाते हैं। लेकिन पहले जैसे नहीं रहते। यह कहकर वह भीड़ में गायब हो गया। मैंने उसे बहुत ढूँढा।

लेकिन पाँच मिनट बाद स्टेशन के सभी कुलियों से पूछने पर एक ने कहा। यहाँ ऐसा कोई बूढ़ा कुली काम ही नहीं करता। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मैंने अपने एक दोस्त की मदद से पुराने रेलवे रिकॉर्ड निकलवाए। करीब दो घंटे बाद एक स्कैन की हुई फाइल मिली।

सन 1978।

उसमें स्टेशन का नक्शा था और मैं कुछ सेकंड तक स्क्रीन को घूरता रह गया। नक्शे में साफ़ लिखा था।

Platform 0

लेकिन उसके ऊपर लाल रंग की सरकारी मुहर लगी थी।

Cancelled Record.

ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने जानबूझकर उस प्लेटफॉर्म को इतिहास से मिटा दिया हो। मैंने उसी समय उसकी कॉपी डाउनलोड कर ली। लेकिन पाँच मिनट बाद फाइल अपने आप खुलनी बंद हो गई। सिस्टम पर लिखा आया।

Record Not Found.

मैंने दोबारा खोजा। कुछ नहीं मिला। जैसे वह फाइल कभी थी ही नहीं। मैंने फैसला कर लिया था। आज जो भी होगा। रिकॉर्ड करूँगा। कैमरे की बैटरी फुल थी। दो अतिरिक्त बैटरियाँ भी रख लीं। मोबाइल, टॉर्च, माइक्रोफोन…..

सब तैयार। रात बारह बजकर अठारह मिनट(12:18) । पूरा स्टेशन लगभग खाली हो चुका था। आखिरी पैसेंजर ट्रेन निकल चुकी थी।

घोषणा बंद हो गई थी। घड़ी की टिक-टिक तक सुनाई दे रही थी। मैं स्टेशन के आखिरी छोर की तरफ़ बढ़ने लगा। जहाँ आगे सिर्फ़ अँधेरा था। अचानक मुझे लगा कि सामने दीवार खत्म हो गई है। जबकि दिन में वहीं दीवार थी। अब वहाँ एक संकरा रास्ता दिखाई दे रहा था।

जिस पर बहुत पुराना जंग लगा बोर्ड टेढ़ा लटका था। उस पर धूल जमी थी। मैंने हाथ से धूल हटाई। दिल की धड़कन अचानक तेज़ हो गई। उस बोर्ड पर धुंधले अक्षरों में लिखा था।

PLATFORM 0

मैंने तुरंत कैमरा ऑन किया। लेकिन स्क्रीन पर सिर्फ़ काली रिकॉर्डिंग दिखाई दे रही थी। जैसे कैमरा कुछ रिकॉर्ड ही नहीं कर पा रहा हो। उसी समय दूर कहीं से ट्रेन की सीटी सुनाई दी। लेकिन अजीब बात यह थी। स्टेशन के डिस्प्ले बोर्ड पर किसी ट्रेन का नाम नहीं था।

लाउडस्पीकर बिल्कुल खामोश था। फिर भी पटरी काँपने लगी और धुंध के बीच से धीरे-धीरे एक काली, बेहद पुरानी ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 0 की ओर बढ़ने लगी।

ट्रेन जो किसी समय की नहीं थी

मेरे हाथ काँप रहे थे। कैमरे की स्क्रीन अब भी पूरी तरह काली थी जबकि लाल रिकॉर्डिंग लाइट जल रही थी। ऐसा लग रहा था कि कैमरा रिकॉर्ड तो कर रहा है लेकिन सामने जो कुछ मौजूद था उसे कैद नहीं कर पा रहा था।

मैंने कैमरा नीचे किया। मेरी आँखों के सामने धुंध को चीरती हुई एक पुरानी भाप इंजन वाली ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म नंबर 0 पर आकर रुक गई। उसकी आवाज़ किसी सामान्य ट्रेन जैसी नहीं थी। ऐसा लग रहा था जैसे लोहे की कई जंग लगी चादरें एक-दूसरे से घिस रही हों।

इंजन पर कोई नंबर नहीं था। पूरा इंजन काले धुएँ से ढका हुआ था। उसकी खिड़कियाँ टूटी हुई थीं। डिब्बों पर लगी पेंट कई साल पहले उखड़ चुकी थी। लेकिन सबसे अजीब बात पूरी ट्रेन में एक भी यात्री दिखाई नहीं दे रहा था। सिर्फ़ खामोशी।

इतनी गहरी खामोशी कि मुझे अपनी साँसें भी बहुत तेज़ सुनाई दे रही थीं। तभी एक डिब्बे का दरवाज़ा अपने आप चररर…. की आवाज़ के साथ खुल गया। अंदर पूरा अँधेरा था। मैंने कैमरे की नाइट विज़न ऑन की।

स्क्रीन पर कुछ सेकंड तक हरी रोशनी दिखाई दी। फिर अचानक पूरी स्क्रीन पर सिर्फ़ एक लाइन उभर आई।

DO NOT BOARD

मैं घबरा गया। कैमरा बंद करके दोबारा चालू किया। अब सब सामान्य था। लेकिन वह चेतावनी किसने दिखाई ? मैं समझ नहीं पाया। तभी ट्रेन के तीसरे डिब्बे से कोई नीचे उतरा।पहले मुझे लगा कोई रेलवे कर्मचारी है। लेकिन जब वह रोशनी में आया।

मेरी साँस अटक गई। उसने पुराने ज़माने की सफेद टीटी वर्दी पहन रखी थी। टोपी पर रेलवे का पुराना चिन्ह बना था। उसका चेहरा असामान्य रूप से पीला था और उसकी आँखें पूरी तरह काली। सफेद हिस्सा बिल्कुल नहीं। वह धीरे-धीरे मेरी तरफ़ आया।

टिकट ?

उसकी आवाज़ बिल्कुल सपाट थी। मैंने कहा मेरे पास टिकट नहीं है। उसने बिना पलक झपकाए कहा।

अच्छा है…..

जिनके पास टिकट होता है। वे वापस नहीं आते। मैं कुछ पूछ पाता। उससे पहले वह मुड़ा और बिना किसी आवाज़ के धुंध में गायब हो गया। मैं दौड़कर वहाँ पहुँचा। लेकिन वहाँ कोई नहीं था। जमीन पर सिर्फ़ पुराने जूतों के गीले निशान थे। जो अचानक बीच में जाकर खत्म हो गए।

मैंने मोबाइल निकाला। समय देखने के लिए। स्क्रीन पर 12:40 AM लिखा था। मैंने कुछ देर रिकॉर्डिंग की। करीब दस मिनट तक ट्रेन वहीं खड़ी रही। मैंने फिर समय देखा। अब भी….

12:40 AM

मेरी धड़कन तेज़ हो गई। क्या मोबाइल खराब हो गया था ?

मैंने हाथ की घड़ी देखी। वह भी….

12:40

स्टेशन की बड़ी घड़ी वह भी….

12:40

ऐसा लग रहा था। जैसे इस प्लेटफॉर्म पर समय रुक गया हो।

आवाज़ जिसने नाम लेकर पुकारा

मैंने तय किया कि अब वापस लौटना चाहिए। जैसे ही मैं मुड़ा पीछे से किसी ने बहुत धीरे कहा।

अभिषेक….

मैं ठिठक गया। स्टेशन पर मेरा नाम कोई नहीं जानता था। मैंने पीछे देखा। कोई नहीं। फिर वही आवाज़ इस बार थोड़ा साफ़।

अभिषेक…..

एक बार इधर देखो आवाज़ ट्रेन के आखिरी डिब्बे से आ रही थी। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा। दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर घना अँधेरा।

मैंने टॉर्च जलाई। पहले कुछ दिखाई नहीं दिया। फिर…..

कोने वाली सीट पर कोई बैठा था। उसने धीरे-धीरे सिर उठाया और उसी पल मेरे हाथ से टॉर्च लगभग गिर गई। वह आदमी मैं ही था।

वही चेहरा।

वही दाढ़ी।

वही जैकेट।

वही कैमरा।

बस फर्क इतना था। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और चेहरा ऐसा लग रहा था। जैसे कई दिनों से सोया न हो। वह मुझे देखकर हल्का-सा मुस्कुराया। फिर बोला। मत चढ़ना….

मैं यही गलती कर चुका हूँ। मेरे पूरे शरीर में झुरझुरी दौड़ गई। मैंने चीखकर पूछा।

तुम कौन हो ?

उसने जवाब दिया।

अगर तुम अंदर आए….. तो बाहर मैं जाऊँगा।

कैमरे में कैद हुआ असंभव दृश्य

मैं डर के बावजूद कैमरा उठाकर रिकॉर्ड करने लगा। जैसे ही कैमरा उस आदमी की तरफ़ घुमाया। स्क्रीन पर वह आदमी गायब था। लेकिन स्क्रीन में मेरे पीछे….

करीब तीस लोग खड़े दिखाई दे रहे थे। सभी सफेद कपड़ों में। सभी मेरी तरफ़ देख रहे थे। मैंने घबराकर पीछे मुड़कर देखा। प्लेटफॉर्म पूरी तरह खाली। फिर स्क्रीन देखी। वे अब भी वहीं खड़े थे।

धीरे-धीरे सभी मुस्कुराने लगे। उनके होंठ हिल रहे थे। लेकिन आवाज़ नहीं आ रही थी। अचानक कैमरे के स्पीकर से खरखराहट हुई और फिर एक साथ कई आवाज़ें सुनाई दीं।

एक और यात्री…..

एक और नाम…..

एक और सीट भर जाएगी…..

मैंने घबराकर कैमरा बंद कर दिया।

उसी समय अचानक स्टेशन पर लाउडस्पीकर चालू हुआ। लेकिन घोषणा सामान्य नहीं थी। आवाज़ बहुत धीमी और टूटी हुई थी।

यात्रियों से अनुरोध है….
प्लेटफॉर्म नंबर शून्य पर आने वाली ट्रेन में….
कोई भी….
सवार….
न….

आखिरी शब्द अचानक टूट गया। फिर पूरे स्टेशन में तेज़ चीख जैसी आवाज़ गूँजने लगी। उसी क्षण ट्रेन की सारी खिड़कियों में एक साथ चेहरे दिखाई देने लगे।

सैकड़ों चेहरे।

कुछ बूढ़े।

कुछ बच्चे।

कुछ औरतें।

कुछ रेलवे कर्मचारी।

सबके चेहरे बिल्कुल सफेद और सभी बिना पलक झपकाए। सिर्फ़ मुझे देख रहे थे। फिर अचानक सभी ने एक साथ अपनी उँगली उठाकर ट्रेन के अंदर आने का इशारा किया। मेरे पैरों ने जैसे मेरा साथ छोड़ दिया।

लेकिन तभी मेरे पीछे किसी ने बहुत ज़ोर से मेरा कंधा पकड़ लिया। मैंने पलटकर देखा और जो चेहरा मेरे सामने था।

उसे देखकर मेरे मुँह से आवाज़ तक नहीं निकली।

जो आदमी तीस साल पहले मर चुका था

मैंने डर के मारे झटके से पीछे मुड़कर देखा। मेरे सामने वही बूढ़ा कुली खड़ा था, जिससे मेरी मुलाकात शाम को हुई थी। लेकिन इस बार उसकी हालत पहले से भी ज़्यादा डरावनी थी। उसके कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे। चेहरे पर जगह-जगह गहरे कट के निशान थे।

माथे से सूखा हुआ खून बहता हुआ गर्दन तक जम चुका था। सबसे अजीब बात उसके पैर ज़मीन को छू ही नहीं रहे थे। वह कुछ इंच ऊपर हवा में खड़ा था। मैं डर के मारे पीछे हट गया। उसने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। उसकी हथेली बर्फ से भी ज़्यादा ठंडी थी।

वह धीरे से बोला।

अगर ज़िंदा रहना है…. तो अभी पीछे मत देखना।

क्यों ?

मैंने काँपती आवाज़ में पूछा। उसने जवाब नहीं दिया। बस मुझे प्लेटफॉर्म से बाहर की ओर खींचने लगा। लेकिन तभी पूरे प्लेटफॉर्म पर एक साथ कई लोगों के हँसने की आवाज़ गूँज उठी। मैं अपने आप को रोक नहीं पाया। मैंने पीछे मुड़कर देख लिया और उसी पल मेरी सबसे बड़ी गलती हो गई।

अब ट्रेन पहले जैसी नहीं थी। सभी डिब्बों की खिड़कियाँ खुल चुकी थीं। हर सीट पर कोई न कोई बैठा था। लेकिन वे इंसान नहीं लग रहे थे। उनकी त्वचा राख जैसी सफेद थी। आँखें पूरी तरह काली। चेहरे बिल्कुल भावहीन। सभी एक साथ मेरी तरफ़ देख रहे थे। फिर धीरे-धीरे….

हर यात्री मुस्कुराने लगा। उनकी मुस्कान इंसानों जैसी नहीं थी। होंठ इतने ज़्यादा फैल गए कि कानों तक पहुँच गए और फिर एक साथ सभी ने एक ही वाक्य कहा।

अब इसे भी चढ़ना होगा…..

पूरा प्लेटफॉर्म उनकी आवाज़ से काँप उठा। मैं भागने लगा। लेकिन प्लेटफॉर्म खत्म ही नहीं हो रहा था। जितना दौड़ता उतना ही वही पुराना बोर्ड।

PLATFORM 0

बार-बार सामने आ जाता। मैंने पीछे देखा। वह ट्रेन बिना चले। मेरे बराबर-बराबर आगे बढ़ रही थी। उसके पहिए घूम भी नहीं रहे थे। फिर भी वह मेरे साथ चल रही थी। मेरी साँस फूल चुकी थी। तभी अचानक मुझे प्लेटफॉर्म के किनारे कुछ लोग खड़े दिखाई दिए।

करीब दस लोग। वे सभी मेरी तरफ़ पीठ किए खड़े थे। मैंने राहत की साँस ली। सोचा शायद स्टेशन के कर्मचारी होंगे। मैं उनकी तरफ़ दौड़ा।

बचाइए !

मेरी आवाज़ सुनकर उनमें से पहला आदमी धीरे-धीरे पलटा। उसका चेहरा ही नहीं था। जहाँ चेहरा होना चाहिए था। वहाँ सिर्फ़ काली खाली त्वचा थी। फिर बाकी नौ लोग भी पलटे। सभी बिना चेहरे के।

एक साथ उन्होंने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ा दिया। मैं पीछे हट गया और उसी पल वे सभी हवा में धुएँ की तरह गायब हो गए।

रिकॉर्ड रूम का रहस्य

किसी तरह मैं प्लेटफॉर्म से निकलकर स्टेशन की मुख्य बिल्डिंग तक पहुँचा। साँसें इतनी तेज़ चल रही थीं कि बोलना मुश्किल था। स्टेशन पूरी तरह खाली था। जैसे यहाँ कोई कभी था ही नहीं। मुझे एक कमरा खुला दिखाई दिया। दरवाज़े पर लिखा था।

पुराना रिकॉर्ड कक्ष

मैं अंदर चला गया। कमरे में धूल जमी हुई थी। ऐसा लग रहा था कि कई सालों से कोई यहाँ आया ही नहीं। दीवार पर लकड़ी की बड़ी-बड़ी अलमारियाँ थीं। उनमें पुरानी फाइलें रखी थीं। मैं एक-एक फाइल देखने लगा।

अचानक….. एक रजिस्टर मेरे हाथ में आया। उसके ऊपर लिखा था

दुर्घटना रिपोर्ट – 18 अगस्त 1986

मैंने काँपते हाथों से उसे खोला। पहले ही पन्ने पर लिखा था।

रात 12:40 बजे एक विशेष ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 0 से रवाना होने वाली थी। तकनीकी खराबी और सिग्नल फेल होने के कारण पूरी ट्रेन पटरी से उतर गई।

आगे लिखा था।

कुल मृतक – 143

मेरी साँस रुक गई। मैंने अगला पन्ना पलटा। उसमें सभी मृतकों के नाम थे। अचानक मेरी नज़र आखिरी नाम पर जाकर रुक गई।

……

कुली – रामलाल

मैं स्तब्ध रह गया। यही तो उस बूढ़े कुली का नाम था। मतलब जिस आदमी से मैं अभी तक बात कर रहा था। वह तो चालीस साल पहले मर चुका था। मैंने रजिस्टर बंद किया। लेकिन तभी उसके अंदर से एक पुरानी फोटो नीचे गिर गई।

मैंने उसे उठाया। फोटो में दुर्घटनाग्रस्त ट्रेन के सामने रेलवे कर्मचारी खड़े थे। मैं एक-एक चेहरा देखने लगा। फिर मेरे हाथ काँपने लगे। सबसे पीछे मैं खुद खड़ा था।

वही चेहरा।

वही दाढ़ी।

वही जैकेट।

बस फोटो पीली पड़ चुकी थी। नीचे तारीख लिखी थी।

18 अगस्त 1986

यह असंभव था। मेरा जन्म तो 1998 में हुआ था। फिर मैं 1986 की फोटो में कैसे हो सकता था ?

अचानक फोटो में खड़ा मेरा चेहरा धीरे-धीरे मुस्कुराने लगा। मैंने डरकर फोटो गिरा दी। लेकिन जब दोबारा उठाई। फोटो बिल्कुल सामान्य थी।

तभी रिकॉर्ड रूम की सारी लाइटें एक साथ बंद हो गईं। कमरे में घना अँधेरा छा गया। बाहर से फिर वही ट्रेन की सीटी सुनाई दी। लेकिन इस बार उसके साथ किसी की भारी आवाज़ भी आई।

अभिषेक वर्मा…. तुम्हारी सीट तैयार है….. अब लौटने का समय खत्म हो चुका है…..

दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। कमरे की दीवारों पर किसी ने नाखूनों से खरोंचना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे चारों तरफ़ से सैकड़ों हाथ दीवारों के अंदर से बाहर निकलने लगे और वे सभी मेरी तरफ़ बढ़ रहे थे।

जिस ट्रेन से उतरने वाला कभी पहले जैसा नहीं रहा

कमरे की दीवारों से निकलते वे हाथ अब मेरी गर्दन तक पहुँच चुके थे। वे इंसानी हाथ नहीं थे। कुछ के नाखून कई इंच लंबे थे। कुछ की उँगलियाँ टूटी हुई थीं। कुछ हाथों पर पुरानी रेलवे टिकटें चिपकी हुई थीं, जैसे किसी ने उन्हें त्वचा में ही सिल दिया हो।

मैं पूरी ताकत से पीछे हटने लगा। तभी वही बूढ़े कुली रामलाल की आवाज़ सुनाई दी।

रजिस्टर…. जला दो !

मैंने अंधेरे में टॉर्च घुमाई। रामलाल दरवाज़े के पास खड़ा था। इस बार उसका चेहरा शांत था। उसने मेरी तरफ़ एक पुराना लाइटर फेंका। जल्दी !

मैंने बिना सोचे रजिस्टर के आखिरी पन्ने में आग लगा दी। कुछ ही सेकंड में पूरा रजिस्टर जलने लगा और उसी पल पूरे स्टेशन में ऐसी चीख गूँजी कि मेरे कान सुन्न हो गए। ऐसा लग रहा था जैसे एक साथ सैकड़ों लोग दर्द से चिल्ला रहे हों। दीवारों से निकलते सारे हाथ अचानक पीछे खिंच गए। कमरा फिर से खाली हो गया। लेकिन राहत सिर्फ़ कुछ सेकंड की थी।

मैं रिकॉर्ड रूम से बाहर भागा। लेकिन बाहर निकलते ही मेरे कदम रुक गए। स्टेशन बदल चुका था। जहाँ कुछ देर पहले इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले लगे थे। वहाँ अब पुराने लोहे के बोर्ड लगे थे। जहाँ LED लाइटें थीं। वहाँ पीले बल्ब टिमटिमा रहे थे। टिकट खिड़की पर बैठे कर्मचारी पुराने ज़माने की वर्दी में थे।

उनके सामने लकड़ी के टिकट पंच पड़े थे। मैंने एक बोर्ड पढ़ा। उस पर तारीख लिखी थी।

18 अगस्त 1986

मेरी धड़कन रुक गई। क्या मैं सचमुच अतीत में आ गया था ?

तभी लाउडस्पीकर पर आवाज़ आई।

यात्रियों से अनुरोध है कि प्लेटफॉर्म नंबर शून्य पर आने वाली विशेष ट्रेन में बैठने वाले यात्री तुरंत अपने स्थान ग्रहण करें।

यानी वह दुर्घटना अभी हुई ही नहीं थी। वह होने वाली थी। मैं पूरी ताकत से प्लेटफॉर्म नंबर 0 की तरफ़ दौड़ा। इस बार वहाँ सैकड़ों यात्री खड़े थे। कोई परिवार के साथ था। कोई फौजी वर्दी में।

कोई अपने बच्चों का हाथ पकड़े हुए।

सभी सामान्य लोग। उन्हें नहीं पता था कि कुछ ही मिनटों बाद उनकी मौत होने वाली है। मैं ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाया।

इस ट्रेन में मत बैठो। यह ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त होने वाली है। लेकिन कोई मेरी आवाज़ सुन ही नहीं रहा था। मैं उनके बीच दौड़ रहा था। पर ऐसा लग रहा था जैसे मैं हवा हूँ।

मैं किसी को छू भी नहीं पा रहा था। मेरे हाथ लोगों के शरीर के आर-पार निकल रहे थे। तभी मुझे एहसास हुआ। मैं उनके समय का हिस्सा नहीं था। तभी मैंने देखा भीड़ के बीच एक आदमी कैमरा लेकर खड़ा था।

वह स्टेशन की वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहा था। मैं उसके पास पहुँचा और जैसे ही उसने मेरी तरफ़ देखा। मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह मैं ही था।

लेकिन इस बार वह मुस्कुराया नहीं। उसने धीरे से कहा।

मैंने भी यही कोशिश की थी…..

“तुम कौन हो ?

मैं वही हूँ। जो दस साल पहले यहाँ आया था। लेकिन यहाँ समय सीधा नहीं चलता अभिषेक। यह हर उस इंसान को बुलाता है। जो प्लेटफॉर्म नंबर 0 का सच जानना चाहता है। उसने कैमरा मेरी तरफ़ बढ़ाया।

देखो…..

मैंने कैमरे की स्क्रीन देखी। उसमें मैं नहीं था। मेरी जगह एक बूढ़ा आदमी खड़ा था। सफेद बाल।

झुका हुआ शरीर।

डरी हुई आँखें।

मैं घबरा गया। यह कौन है ? वह बोला।

अगर सूरज निकलने से पहले तुम यहाँ से नहीं निकले। तो यही तुम्हारा चेहरा होगा।

दुर्घटना

अचानक सिग्नल हरा हो गया। ट्रेन ने लंबी सीटी मारी। धीरे-धीरे आगे बढ़ी। कुछ ही सेकंड बाद ऐसा धमाका हुआ कि पूरी धरती हिल गई। पटरी टूट गई। पहला डिब्बा हवा में उछल गया। बाकी डिब्बे एक-दूसरे पर चढ़ते चले गए। हर तरफ़ आग।

धुआँ।

चीखें।

लोग खिड़कियों से बाहर कूद रहे थे।

बच्चे अपनी माँ को पुकार रहे थे।

रेलवे कर्मचारी मदद के लिए दौड़ रहे थे। मैंने अपनी आँखों के सामने 143 लोगों को मरते देखा। लेकिन डरावनी बात अभी बाकी थी। जैसे ही लोगों की साँसें रुकीं। उनके शरीर वहीं पड़े रहे और उनके पीछे से उनकी परछाइयाँ उठ खड़ी हुईं।

एक-एक करके….

सभी परछाइयाँ….

खुद चलकर….

प्लेटफॉर्म नंबर 0 पर खड़ी उसी काली ट्रेन में चढ़ने लगीं। उनमें रामलाल भी था।

टीटी भी।

बच्चे भी और उन सबके बीच मैंने खुद को भी देखा।

वही बूढ़ा कुली मेरे पास आया। इस बार उसका चेहरा पूरी तरह साफ़ था। वह बोला हर दस साल बाद यह प्लेटफॉर्म एक गवाह चुनता है। जो सच देख ले। वह फिर कभी पूरी तरह लौट नहीं पाता।

भागो !

मैं पूरी ताकत से स्टेशन के बाहर भागा। पीछे से ट्रेन की सीटी लगातार सुनाई दे रही थी। मुझे लगा कोई मेरे पीछे दौड़ रहा है। लेकिन मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। सिर्फ़ दौड़ता रहा।

दौड़ता रहा…..

और अचानक मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा गया।

प्लेटफॉर्म नंबर 0 आज भी मौजूद है

जब मेरी आँख खुली। सुबह के करीब 5:30 बज रहे थे। मैं स्टेशन के बाहर पड़े एक पुराने लोहे के बेंच पर लेटा था। सिर में तेज़ दर्द था। कपड़े धूल और राख से भरे हुए थे। पहले तो मुझे लगा। शायद यह सब कोई भयानक सपना था। लेकिन जैसे ही मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।

मेरा दिल बैठ गया। जेब में एक पुराना पीतल का रेलवे टोकन रखा था। उस पर उभरा हुआ नंबर था।

0

मैंने उसे पलटकर देखा। पीछे सिर्फ़ एक लाइन खुदी हुई थी।

यात्री क्रमांक – 144

मेरे हाथ काँपने लगे। दुर्घटना में 143 लोग मरे थे। तो फिर 144वाँ यात्री कौन था ?

कोई भी मेरी बात पर यकीन नहीं कर रहा था

मैं भागकर स्टेशन मास्टर के ऑफिस पहुँचा। साँसें तेज़ चल रही थीं। मैंने पूरी रात की घटना उन्हें बता दी। उन्होंने बिना कुछ कहे मुझे पानी दिया। फिर बोले। आप ठीक तो हैं ?

मैंने कहा।

रिकॉर्ड रूम में पुराना रजिस्टर था…. दुर्घटना की फाइल थी…. प्लेटफॉर्म नंबर 0 था….

उन्होंने मुझे रिकॉर्ड रूम तक चलने को कहा। हम दोनों वहाँ पहुँचे। कमरा खुला था। लेकिन अंदर कोई पुरानी अलमारी नहीं थी। कोई रजिस्टर नहीं। सब कुछ नया था। मैंने उसी जगह इशारा किया जहाँ रात को आग लगी थी। वहाँ चमचमाती टाइलें थीं। जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं। स्टेशन मास्टर ने कहा।

यह रिकॉर्ड रूम सिर्फ़ दो साल पहले बना है। मेरे पैरों से ताकत निकल गई। अब मेरे पास सिर्फ़ एक सबूत था।

मेरा कैमरा। मैंने तुरंत मेमोरी कार्ड निकाला। लैपटॉप में लगाया। वीडियो खुला।

पहली रिकॉर्डिंग….

सामान्य।

दूसरी….

स्टेशन।

तीसरी….

रात 12:39।

मैंने राहत की साँस ली। लेकिन जैसे ही वीडियो आगे बढ़ा। स्क्रीन पूरी तरह काली हो गई। करीब 17 मिनट तक सिर्फ़ अँधेरा था। कोई आवाज़ नहीं।

कुछ नहीं।

मैं निराश होकर वीडियो बंद करने ही वाला था कि आखिरी पाँच सेकंड में स्क्रीन अचानक चमकी। और उसमें सिर्फ़ एक फ्रेम दिखाई दिया।

प्लेटफॉर्म नंबर 0 का बोर्ड।

उसके ठीक नीचे मैं खड़ा था। लेकिन मेरे पीछे 143 लोग कतार बनाकर खड़े थे। सभी सीधे कैमरे की तरफ़ देख रहे थे। वीडियो वहीं खत्म हो गया। मैंने हार नहीं मानी। दिल्ली लौटने के बाद मैंने सूचना के अधिकार के तहत उस दुर्घटना की जानकारी माँगी।

करीब एक महीने बाद जवाब आया। लिफाफा खोला। अंदर सिर्फ़ एक कागज़ था। उस पर लिखा था।

शिवनगर जंक्शन पर कभी भी प्लेटफॉर्म नंबर 0 अस्तित्व में नहीं था। ऐसी किसी दुर्घटना का रेलवे के पास कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

बस इतना ही। कोई हस्ताक्षर नहीं। कोई अधिकारी का नाम नहीं।

फिर मिला वही ईमेल

मैंने उस घटना पर वीडियो बनाने की कोशिश की। लेकिन जब भी एडिटिंग शुरू करता। वीडियो फ़ाइल अपने आप करप्ट हो जाती। आखिरकार मैंने पूरा प्रोजेक्ट छोड़ दिया। करीब छह महीने बाद एक रात फिर मेरे ईमेल पर नया मैसेज आया। भेजने वाले का नाम फिर नहीं था। मेल में सिर्फ़ लिखा था।

तुम लौट आए…. यह हमारी गलती थी।

नीचे एक अटैचमेंट था। मैंने उसे खोला। वह एक नई रेलवे टिकट थी। उस पर लिखा था।

गंतव्य: Platform 0

Seat No.: 144

Departure Time: 12:40 AM

मेरे हाथ सुन्न पड़ गए। मैंने तुरंत मेल डिलीट कर दिया। लेकिन अगले ही पल वह फिर इनबॉक्स में वापस आ गया। मैंने इंटरनेट बंद किया। लैपटॉप शटडाउन किया। फिर भी स्क्रीन अपने आप ऑन हो गई और उसी टिकट की तस्वीर दिखाई देने लगी।

उस घटना को लगभग डेढ़ साल हो चुका है। मैंने डॉक्यूमेंट्री बनाना छोड़ दिया। रात में कभी ट्रेन से सफर नहीं करता। किसी सुनसान स्टेशन पर नहीं रुकता। लेकिन हर साल 18 अगस्त की रात ठीक 12:40 बजे मेरे मोबाइल पर बिना नंबर के एक कॉल आती है। मैं कभी उसे उठाता नहीं। फिर भी कॉल कटने के बाद हमेशा एक वॉइसमेल रिकॉर्ड हो जाता है। उसमें सिर्फ़ ट्रेन की सीटी सुनाई देती है।

फिर एक टूटी हुई घोषणा।

प्लेटफॉर्म नंबर शून्य पर आने वाली विशेष ट्रेन कुछ ही क्षणों में प्रस्थान करेगी…..

और सबसे अंत में बहुत धीमी आवाज़

यात्री क्रमांक 144…. आपकी सीट तैयार है….

THE END |

अगर किसी दिन आप किसी छोटे से रेलवे स्टेशन पर जाएँ और वहाँ आपको प्लेटफॉर्म 1 के पहले एक पुराना, जंग लगा बोर्ड दिखाई दे जिस पर धुंधले अक्षरों में लिखा हो। PLATFORM 0 तो भूलकर भी वहाँ मत जाना। क्योंकि हो सकता है। वह प्लेटफॉर्म आपका इंतज़ार कर रहा हो और अगर रात 12:40 बजे बिना किसी घोषणा के एक पुरानी काली ट्रेन आकर रुके तो उसकी ओर देखना भी मत। क्योंकि कहते हैं

उस ट्रेन में चढ़ने वाले यात्रियों की वापसी तो हो जाती है…. लेकिन उनकी ज़िंदगी कभी वापस नहीं लौटती।

अगर इस Horror Story in Hindi ने आपको अंत तक डर और सस्पेंस का एहसास कराया तो नीचे कमेंट में ज़रूर बताइए क्या आप ऐसी रहस्यमयी दस्तक का सामना करेंगे या बिना जवाब दिए पूरी रात दरवाज़ा बंद रखेंगे ?

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1 thought on “रेलवे प्लेटफॉर्म नंबर 0 की डरावनी सच्चाई (Haunted Railway Platform)”

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