आधी रात 3 बजे आई वह आवाज़.… और फिर जो हुआ, वह डरावना था

रात 3 बजे की वह आवाज़

कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जिन्हें सुनने के बाद इंसान की ज़िंदगी कभी पहले जैसी नहीं रहती। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था।

आज भी जब रात के ठीक 3:00 बजे घड़ी की सुई पहुँचती है। तो मेरी नींद अपने आप खुल जाती है। मैं पसीने से भीगा हुआ उठ बैठता हूँ और सबसे पहले अपने कमरे के पीछे की दीवार को देखता हूँ।

क्योंकि पाँच साल पहले उसी समय मैंने एक ऐसी आवाज़ सुनी थी जिसने मेरी पूरी दुनिया बदल दी।

उस रात मैं अपने दोस्त रोहित की शादी से लौट रहा था। शादी शहर से लगभग तीस किलोमीटर दूर एक छोटे-से गाँव में थी। देर रात तक कार्यक्रम चला और जब मैं अपनी बाइक लेकर वापस निकला तब घड़ी में 2:35 बजे हो चुके थे।

गाँव से शहर जाने का सबसे छोटा रास्ता एक पुराने जंगल से होकर गुजरता था। लोग कहते थे कि रात में उस रास्ते से अकेले मत जाना। लेकिन मैं ऐसी बातों पर कभी विश्वास नहीं करता था। मैंने हेलमेट पहना और बाइक स्टार्ट कर दी।

शुरुआत में सब कुछ सामान्य था। सड़क खाली थी। दूर-दूर तक कोई वाहन दिखाई नहीं दे रहा था। सिर्फ़ बाइक की हेडलाइट अंधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी। करीब पंद्रह मिनट बाद मैं जंगल के बीच पहुँच चुका था।

अचानक मेरी बाइक अपने आप बंद हो गई। मैंने दोबारा स्टार्ट करने की कोशिश की।

एक बार….

दो बार….

दस बार….

लेकिन इंजन बिल्कुल शांत था। मेरे मोबाइल में नेटवर्क नहीं था। चारों तरफ़ सिर्फ़ घना अंधेरा और पेड़ों के बीच चलती ठंडी हवा की आवाज़। मैंने सोचा शायद कुछ तकनीकी खराबी होगी।

जैसे ही मैं बाइक से उतरकर इंजन देखने झुका। पीछे से किसी औरत के रोने की बहुत धीमी आवाज़ आई।

ऊँ…. ऊँ….

मैंने तुरंत सिर उठाया। सड़क खाली थी। मुझे लगा शायद किसी जानवर की आवाज़ होगी। लेकिन कुछ सेकंड बाद वही आवाज़ फिर आई। इस बार पहले से ज़्यादा साफ़। ऐसा लगा जैसे कोई मेरे ठीक पीछे खड़ा होकर रो रहा हो।

मेरी दादी की कही एक बात अचानक याद आ गई।

वह हमेशा कहती थीं।

अगर रात 3 बजे कोई पीछे से तुम्हारा नाम लेकर बुलाए या रोने की आवाज़ सुनाई दे…. तो कभी पीछे मत देखना। चाहे कुछ भी हो जाए।

मैंने घड़ी देखी।

3:00 AM

मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। तभी मेरे पीछे से किसी ने बहुत धीमी आवाज़ में मेरा नाम लिया।

आदित्य….

मैं जम गया। आवाज़ बिल्कुल इंसानी थी। फिर दोबारा।

आदित्य…. मेरी मदद करो….

मेरे हाथ काँपने लगे।

दिल कह रहा था कि पीछे मुड़कर देखूँ। लेकिन दादी की बात बार-बार याद आ रही थी।

पीछे मत देखना….

मैंने आँखें बंद कीं और बिना पीछे देखे बाइक को धक्का देना शुरू कर दिया। तभी मेरे कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाकर कहा।

बस…. एक बार देख लो….

मेरी साँस रुक गई। वह आवाज़ अब मेरे पीछे नहीं। मेरे बिल्कुल बगल में थी। फिर भी…..

मैंने पीछे नहीं देखा। अचानक मेरी बाइक अपने आप स्टार्ट हो गई। बिना चाबी घुमाए। बिना किक मारे। इंजन ज़ोर से गरजा। मैं तुरंत बाइक पर बैठा और पूरी रफ्तार से आगे निकल गया।

करीब पाँच मिनट बाद जब मुझे लगा कि मैं जंगल से बाहर आ चुका हूँ तो मैंने राहत की साँस ली। लेकिन उसी समय बाइक के रियर-व्यू मिरर में मुझे कुछ दिखाई दिया। सड़क के बीचों-बीच….

एक सफेद साड़ी पहने औरत खड़ी थी। उसके लंबे बाल उसके चेहरे को ढक रहे थे। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी। वह सड़क पर खड़ी नहीं थी। वह….

मेरी बाइक के पीछे दौड़ रही थी।

और उसकी रफ्तार मेरी 80 किलोमीटर प्रति घंटे की बाइक से भी ज़्यादा थी।

दर्पण में दिखाई दिया असली डर

मेरी बाइक पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी। मैं बार-बार रियर-व्यू मिरर में देख रहा था। वह सफेद साड़ी वाली औरत अब भी मेरे पीछे थी। लेकिन…..

वह दौड़ नहीं रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह ज़मीन से कुछ इंच ऊपर हवा में तैर रही हो। उसके पैर दिखाई ही नहीं दे रहे थे। मेरे माथे पर ठंडा पसीना आ गया। मैंने बाइक की स्पीड और बढ़ा दी।

90….

100….

110 किलोमीटर प्रति घंटा

लेकिन उसके और मेरे बीच की दूरी बिल्कुल भी कम नहीं हो रही थी। अचानक रियर-व्यू मिरर काला पड़ गया। उसमें सड़क नहीं दिखाई दे रही थी। सिर्फ़ एक चेहरा वही औरत। इस बार उसके बाल धीरे-धीरे हटने लगे और जो चेहरा सामने आया….।

उसे देखकर मेरी चीख निकल गई। उसका पूरा चेहरा बुरी तरह जला हुआ था। त्वचा जगह-जगह से उखड़ी हुई थी। लेकिन उसकी आँखें…..

बिल्कुल सफेद थीं।

बिना पुतलियों के।

वह मुस्कुरा रही थी और उसके होंठ बिना हिले मेरे कानों में आवाज़ गूँजी।

तुमने पीछे नहीं देखा….लेकिन अब तुम मुझे देख चुके हो….

मैंने डरकर मिरर को हाथ से मोड़ दिया। अब मैं पीछे कुछ नहीं देख सकता था।

ढाबे वाले की चेतावनी

करीब दस मिनट बाद मुझे सड़क किनारे एक छोटा-सा ढाबा दिखाई दिया। अंदर सिर्फ़ एक बुज़ुर्ग आदमी बैठा था। मैं घबराया हुआ उसके पास पहुँचा।

चाचा….. मुझे पानी चाहिए।

उन्होंने बिना कुछ पूछे पानी का गिलास दिया। फिर मेरे चेहरे को ध्यान से देखने लगे। कुछ देर बाद बोले तुम उस जंगल वाले रास्ते से आए हो ?

मैंने हाँ में सिर हिलाया। उन्होंने तुरंत पूछा।

क्या रात के तीन बजे कोई आवाज़ सुनी थी ?

मेरे हाथ से गिलास छूट गया। मैंने धीरे से कहा।

हाँ…. और पीछे मुड़े थे ?

नहीं….

बूढ़े ने राहत की साँस ली। अच्छा किया।

लेकिन….

क्या तुमने उसे किसी शीशे में देखा ?

मेरे चेहरे का रंग उड़ गया। मैंने धीरे-धीरे सिर हिला दिया। बूढ़ा कुछ पल चुप रहा। फिर बोला।

तुमने सबसे बड़ी गलती कर दी।

मैंने घबराकर पूछा।

कौन थी वो ?

बूढ़े ने धीमी आवाज़ में कहा लगभग पंद्रह साल पहले उसी जंगल में एक लड़की की सड़क हादसे में मौत हुई थी। लोग कहते हैं….।

वह मरने के बाद भी रास्ता नहीं छोड़ सकी। वह किसी को सीधे देखने पर नहीं दिखाई देती। लेकिन…..

जो उसे आईने या शीशे में देख ले। वह उसका पीछा कभी नहीं छोड़ती।

पहली रात घर में

मैं किसी तरह सुबह अपने घर पहुँचा। पूरी घटना को मैंने एक बुरा सपना मानकर भुलाने की कोशिश की। पूरा दिन सामान्य बीता। लेकिन अगली रात ठीक 3:00 बजे….

मेरी नींद अचानक खुल गई। पूरा कमरा बिल्कुल शांत था। तभी मेरे कमरे के बाहर किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आई।

ठक….

ठक….

ठक….

जैसे कोई नंगे पैर फर्श पर चल रहा हो। मैंने सोचा शायद पापा होंगे। लेकिन तभी वही जली हुई आवाज़ मेरे कानों में गूँजी।

आज…. पीछे मत देखना….

मेरी साँस रुक गई। मैं बिस्तर पर बिल्कुल सीधा लेटा था और मुझे साफ़ महसूस हो रहा था। कि कोई मेरे सिर के ठीक पीछे खड़ा है। उसकी ठंडी साँसें मेरी गर्दन को छू रही थीं। मैं हिल भी नहीं पा रहा था।

कुछ सेकंड बाद मेरे कमरे के सामने रखा बड़ा आईना अपने आप काँपने लगा। उसमें पहले मेरा कमरा दिखाई दे रहा था। फिर धीरे-धीरे…..

आईने में मेरे पीछे एक धुंधली आकृति उभरने लगी। वह वही औरत थी। इस बार वह मेरे बिस्तर के बिल्कुल पीछे खड़ी थी। उसने धीरे-धीरे अपना हाथ मेरे कंधे की ओर बढ़ाया और मुस्कुराकर कहा।

अब तुम जहाँ जाओगे…. मैं तुम्हारे पीछे रहूँगी।

उसी पल कमरे की सारी लाइटें बुझ गईं और अंधेरे में किसी ने मेरे कंधे पर बर्फ जैसा ठंडा हाथ रख दिया।

जिसने पीछे देखा…. वह कभी वापस नहीं लौटा

मेरे कंधे पर रखा वह बर्फ जैसा ठंडा हाथ धीरे-धीरे दबाव बढ़ाने लगा। मैं पूरी ताकत से चीखना चाहता था। लेकिन मेरे गले से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। कमरे में चारों तरफ़ गहरा अंधेरा था। सिर्फ़ सामने रखा आईना हल्की नीली रोशनी में चमक रहा था।

उस आईने में मैं अपने बिस्तर पर लेटा हुआ दिखाई दे रहा था और मेरे पीछे वही औरत खड़ी थी। उसके जले हुए चेहरे पर अब पहले से भी ज़्यादा डरावनी मुस्कान थी। धीरे-धीरे उसने अपना सिर मेरे कान के पास झुकाया और फुसफुसाई।

अब तुम्हारी बारी है….

इतना कहते ही मेरे कमरे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।

चररर…..

बाहर गलियारे में घना अंधेरा था। लेकिन उस अंधेरे के बीच कोई खड़ा था। मैंने ध्यान से देखा। वह मेरे पिताजी थे। उन्होंने घबराई हुई आवाज़ में कहा।

आदित्य…. जल्दी बाहर आओ। मैं उठने ही वाला था कि उसी क्षण आईने में दिखाई दे रहे पिताजी मुस्कुराने लगे। लेकिन कमरे के बाहर खड़े पिताजी बिल्कुल गंभीर थे। मेरा दिल ज़ोर से धड़कने लगा।

दो-दो पिताजी….

एक असली….

एक आईने में।

तभी मुझे ढाबे वाले की बात याद आई।

जो वह दिखाए…. उस पर कभी भरोसा मत करना।

मैंने आँखें बंद कर लीं। कुछ सेकंड बाद कमरे के बाहर से पिताजी की आवाज़ बंद हो गई। जब दोबारा आँखें खोलीं। दरवाज़ा बंद था।

और आईना पूरी तरह काला हो चुका था।

पंद्रह साल पुरानी डायरी

अगली सुबह मैं फिर उसी ढाबे पर पहुँचा। बूढ़ा मेरा इंतज़ार करता हुआ लगा। मुझे देखते ही वह अंदर गया और एक पुरानी डायरी लेकर आया। उसकी जिल्द फटी हुई थी। पहले पन्ने पर लिखा था।

आरव – 2011

बूढ़ा बोला यह लड़का भी तुम्हारी तरह उस औरत से बचकर आया था। लेकिन सिर्फ़ तीन दिन तक मैंने काँपते हाथों से डायरी खोली। उसमें लिखा था।

पहली रात वह पीछे खड़ी रहती है।

दूसरी रात वह आईने में दिखाई देती है।

तीसरी रात वह तुम्हारी आवाज़ में तुम्हें पीछे मुड़ने के लिए मजबूर करती है।

आखिरी पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी।

अगर मैंने पीछे नहीं देखा होता…. तो शायद मैं आज ज़िंदा होता।

मैंने तुरंत बूढ़े से पूछा। वह लड़का कहाँ है ?

बूढ़े ने बिना कुछ कहे ढाबे की दीवार पर टंगी एक तस्वीर की ओर इशारा किया। तस्वीर पर फूलों की माला चढ़ी हुई थी।

नीचे लिखा था।

आरव (1990–2011)

तीसरी रात का डर

उस दिन मैंने तय कर लिया कि रात भर जागूँगा। कमरे की सारी लाइटें जला दीं। आईने पर सफेद चादर डाल दी। घड़ी में 2:58 AM हुए। कमरे का तापमान अचानक गिरने लगा।

2:59….

मेरी साँसें तेज़ हो गईं।

3:00….

पूरे घर की बिजली एक साथ चली गई। अंधेरा इतना गहरा कि अपना हाथ भी दिखाई नहीं दे रहा था। तभी मेरे पीछे से मेरी ही आवाज़ आई।

आदित्य….

मैं काँप उठा। वह बिल्कुल मेरी आवाज़ थी फिर दूसरी बार

पीछे देखो….

फिर

तीसरी बार

बस एक बार….

मेरे कानों में तेज़ सीटी जैसी आवाज़ गूँजने लगी। मैंने पूरी ताकत से अपनी आँखें बंद कर लीं। लेकिन तभी आईने पर डाली हुई चादर अपने आप नीचे गिर गई और बिना बिजली के भी आईना चमकने लगा।

मैंने गलती से उसकी तरफ़ देखा।

आईने में मैं अकेला नहीं था। मेरे पीछे वह औरत खड़ी नहीं थी।

बल्कि….

सैकड़ों जली हुई आकृतियाँ खड़ी थीं।

सबकी सफेद आँखें मेरी तरफ़ थीं और वे सब एक साथ मुस्कुराकर बोले।

अब तुम हमें देख चुके हो…..

अचानक मेरे कमरे की सारी खिड़कियाँ एक साथ खुल गईं। बर्फ जैसी ठंडी हवा अंदर आई और किसी ने मेरे कान के बिल्कुल पास आकर आखिरी बार कहा।

अब…. पीछे देखो….

मैंने अपनी पूरी ताकत लगा दी। लेकिन मेरी गर्दन धीरे-धीरे अपने आप पीछे घूमने लगी।

आखिरी बार मैंने पीछे देखा….

मैं पूरी ताकत से उसे रोकने की कोशिश कर रहा था। लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे मेरे शरीर पर मेरा कोई नियंत्रण ही नहीं बचा हो। एक-एक इंच…..

धीरे-धीरे मेरा चेहरा पीछे की ओर मुड़ गया और फिर मैंने उसे देख लिया। वह औरत मेरे ठीक पीछे खड़ी थी। हमारे बीच मुश्किल से एक फुट का फासला था। उसके जले हुए चेहरे से धुआँ निकल रहा था।

लेकिन अब उसकी सफेद आँखों की जगह दो गहरे काले गड्ढे थे। वह मुस्कुराई।

फिर बोली।

आख़िर तुमने पीछे देख ही लिया….

इतना कहते ही पूरा कमरा गायब हो गया। मैं अचानक उसी जंगल की सड़क पर खड़ा था। चारों तरफ़ घना कोहरा। दूर तक फैला अंधेरा और सड़क के दोनों ओर सैकड़ों लोग खड़े थे।

लेकिन वे इंसान नहीं थे। उनके चेहरे नहीं थे।

सिर्फ़ काली परछाइयाँ। सभी एक साथ मेरी तरफ़ देख रही थीं।

तभी…..

वह औरत बोली इन सबने भी एक दिन पीछे देखा था। अब ये कभी अपने घर नहीं लौट सकते। मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने उन परछाइयों को ध्यान से देखा। उनमें ढाबे वाला आरव था। वह पुलिसवाला भी था जिसकी गुमशुदगी की खबर मैंने अखबार में पढ़ी थी।

एक स्कूल की लड़की….

एक ट्रक ड्राइवर…..

एक साधु…..

और न जाने कितने चेहरे……

जो अब इंसान नहीं रह गए थे। मैं समझ गया। यह कोई साधारण आत्मा नहीं थी। यह एक श्राप था। जो हर उस इंसान को अपना बना लेता था। जो रात 3 बजे उसकी आवाज़ सुनकर पीछे मुड़ जाता था।

श्राप से बचने का आखिरी मौका

अचानक मुझे अपनी दादी की आवाज़ सुनाई दी। आदित्य….

डर पर विश्वास मत करना डर को पहचानना सीख। उनकी आवाज़ सुनते ही मेरे हाथ में कुछ महसूस हुआ। मैंने नीचे देखा। मेरी जेब में उनका दिया हुआ छोटा-सा रुद्राक्ष था। जो मैं वर्षों से सिर्फ़ यादगार के रूप में रखे हुए था।

जैसे ही मैंने उसे कसकर पकड़ा। चारों ओर फैला अंधेरा काँपने लगा। वह औरत पहली बार घबराई। उसने चीखते हुए कहा।

नहीं….

यह तुम्हारे पास कैसे है ?

मैंने पूरी ताकत से रुद्राक्ष उसकी ओर बढ़ा दिया। एक तेज़ सफेद रोशनी पूरे जंगल में फैल गई। सभी परछाइयाँ एक-एक करके धुएँ में बदलने लगीं। उनके चेहरों पर पहली बार शांति दिखाई दी। उन्होंने मेरी ओर देखा और धीरे-धीरे अंधेरे में विलीन हो गए।

वह औरत दर्द से चीख रही थी। उसकी आवाज़ पूरे जंगल में गूँज रही थी। कुछ ही सेकंड बाद…. सब कुछ शांत हो गया।

जब मेरी आँख खुली मैं अपने कमरे में था। सुबह के सात बज चुके थे। पिताजी मेरे सामने खड़े थे। उन्होंने घबराकर पूछा।

क्या हुआ था ?

तुम पूरी रात बेहोश पड़े थे। मैंने चारों तरफ़ देखा। कमरा बिल्कुल सामान्य था। आईना अपनी जगह लगा हुआ था। लेकिन उसके एक कोने पर उँगली से लिखा हुआ एक वाक्य साफ़ दिखाई दे रहा था।

अगली बार किसी और को मत बचाना…..

मैंने उसी दिन वह घर छोड़ दिया। आज उस घटना को पाँच साल हो चुके हैं। मैं कभी रात में सुनसान रास्ते से नहीं गुजरता और अगर कहीं जाना भी पड़े। तो रात 3 बजे के बाद कभी पीछे मुड़कर नहीं देखता।

लेकिन…..

कुछ महीने पहले मेरे ब्लॉग पर एक अनजान व्यक्ति का कमेंट आया। उसने सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी।

कल रात 3 बजे किसी ने मेरा नाम लेकर बुलाया था…. क्या मुझे पीछे देखना चाहिए था ?

मैंने तुरंत जवाब टाइप किया।

नहीं…. कभी नहीं।

लेकिन जब मैंने Send बटन दबाया। स्क्रीन पर लिखा आया।

Comment Deleted by User.

अगले ही पल मेरे कमरे के पीछे से वही पुरानी आवाज़ सुनाई दी।

आदित्य….

मैंने आँखें बंद कर लीं।

आज भी मैंने पीछे नहीं देखा। क्योंकि अब मैं जान चुका हूँ। रात 3 बजे अगर कोई तुम्हें पीछे से बुलाए। तो सबसे बड़ा साहस पीछे मुड़कर देखने में नहीं। बल्कि बिना देखे आगे बढ़ जाने में है।

और अगर कभी…. किसी सुनसान सड़क पर रात के ठीक 3:00 बजे तुम्हें अपने पीछे किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दे। तो मेरी एक बात हमेशा याद रखना।

पीछे मत देखना।

THE END |

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