यह कहानी आपको एक ऐसे श्रापित कमरे में ले जाएगी जहाँ हर रात 2:44 बजे दीवारों से खून टपकने लगता था। जो भी उस कमरे में एक रात रुकता, उसकी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल जाती। क्या यह सिर्फ़ भ्रम था या उस कमरे में कोई ऐसी ताकत कैद थी जो हर रात अपना नया शिकार चुनती थी ? जानिए इस रोंगटे खड़े कर देने वाली Darawani Kahani में।
जिस कमरे में कोई एक महीने से ज़्यादा नहीं टिक पाया
यह घटना 2022 की है। आज भी जब मैं किसी होटल, लॉज या किराए के कमरे में ठहरता हूँ। तो सोने से पहले सबसे पहले उसकी दीवारों को ध्यान से देखता हूँ क्योंकि मुझे आज तक यह नहीं पता चला कि उस रात जो मैंने देखा था।
वह सपना था या सच।
मेरा नाम निखिल शर्मा है। मैं पेशे से इंटीरियर डिज़ाइनर हूँ। काम की वजह से मुझे अलग-अलग शहरों में कई-कई दिन रुकना पड़ता था। उसी सिलसिले में मुझे मध्य प्रदेश के एक छोटे कस्बे देवगढ़ जाना पड़ा।
वहाँ एक पुरानी फैक्ट्री का रेनोवेशन चल रहा था। काम कम से कम दो महीने का था। लेकिन पूरे कस्बे में रहने के लिए सिर्फ़ एक ही सस्ता कमरा खाली मिला।
जिस कमरे को हर कोई छोड़कर भाग जाता था
मकान मालिक का नाम रामलाल था। करीब साठ साल का दुबला-पतला आदमी। जब उसने मुझे कमरे की चाबी दी। तो बिना मेरी तरफ़ देखे बोला। अगर कभी रात में कुछ भी सुनाई दे।
तो दरवाज़ा मत खोलना। मैं हँस पड़ा। चोरों का डर है क्या ?
उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस इतना कहा। सुबह होते ही अगर मन करे। तो कमरा छोड़ देना। उसकी बात अजीब लगी। लेकिन मैंने ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। कमरा पहली मंज़िल पर था।
पुरानी इमारत।
लंबा सुनसान गलियारा।
आख़िरी कमरा।
कमरा नंबर 17।
दरवाज़ा खोलते ही अंदर हल्की सी सीलन की गंध आई। कमरा छोटा था। एक लोहे का पलंग। लकड़ी की अलमारी। पुराना पंखा और चारों तरफ़ फीकी सफेद दीवारें। सब कुछ बिल्कुल सामान्य था।
शाम को सामान रखते समय मैंने देखा। दीवार के एक कोने पर हल्का-सा लाल धब्बा था। मैंने सोचा पुराना पेंट होगा। कपड़ा गीला करके साफ़ किया। धब्बा गायब हो गया। रात को खाना खाकर मैं सो गया।
करीब 2:44 बजे मेरी आँख अचानक खुल गई। कोई आवाज़ नहीं हुई थी। फिर भी ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरा नाम लेकर बहुत धीरे से पुकारा हो।
निखिल…..
मैंने मोबाइल देखा। 2:44 AM कमरे में अजीब ठंड थी। पंखा बंद था।
फिर…
टप….
एक आवाज़ आई। जैसे पानी की बूँद गिरी हो। मैंने सिर उठाकर देखा। दीवार पर ठीक वहीं जहाँ शाम को लाल धब्बा था। एक गाढ़ी लाल बूँद धीरे-धीरे नीचे लुढ़क रही थी। मैं पलंग से उठ गया।
कुछ ही सेकंड में दूसरी बूँद।
फिर तीसरी।
फिर….
पूरी दीवार से लाल तरल टपकने लगा। कमरे में लोहे जैसी तेज़ गंध फैल गई। मेरे हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। मैंने काँपते हुए दीवार को छुआ। तरल गर्म था। बिल्कुल ताज़े खून जैसा।
दीवार के पीछे कोई था
मैंने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया। उसी समय दीवार के अंदर से धीरे-धीरे
ठक….
ठक….
ठक….
किसी के दस्तक देने की आवाज़ आने लगी। ऐसा लग रहा था। जैसे कोई दूसरी तरफ़ फँसा हो और बाहर निकलना चाहता हो। मैंने खुद को समझाया। शायद पाइपलाइन होगी।
लेकिन तभी दस्तक की जगह नाखून रगड़ने की आवाज़ आने लगी।
खरररर….
खरररर….
ऐसा लग रहा था। जैसे कोई दीवार के अंदर से उसे खुरच रहा हो। मेरी साँसें तेज़ हो गईं। मैं दरवाज़े की तरफ़ भागा। हैंडल घुमाया। दरवाज़ा नहीं खुला। मैंने पूरी ताकत लगा दी। लेकिन दरवाज़ा जैसे बाहर से बंद था।
उसी समय कमरे की चारों दीवारों पर एक साथ लाल धारियाँ बनने लगीं। वे नीचे नहीं बह रही थीं। बल्कि धीरे-धीरे कुछ लिख रही थीं। मैं डर के मारे जड़ हो गया। कुछ ही सेकंड में दीवार पर एक ही वाक्य उभर आया।
आज रात….. मेरी जगह तुम हो।
उसी पल कमरे की लाइट अपने-आप बंद हो गई और अँधेरे में मुझे साफ़ महसूस हुआ। कि कमरे में अब मैं अकेला नहीं था। पूरा कमरा अँधेरे में डूब चुका था। इतना घना अँधेरा कि अपने हाथ तक दिखाई नहीं दे रहे थे।
लेकिन एक आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी।
साँस लेने की।
एक नहीं….
दो नहीं…..
कई लोगों की। ऐसा लग रहा था। जैसे कमरे के चारों कोनों में कोई खड़ा होकर धीरे-धीरे साँस ले रहा हो। मैंने काँपते हाथों से मोबाइल की टॉर्च जलाई। रोशनी फैलते ही कमरा फिर खाली था।
न कोई आदमी।
न कोई परछाई।
लेकिन फर्श पर गीले पैरों के लाल निशान बन चुके थे। वे निशान दीवार से निकल रहे थे और सीधे मेरे पलंग तक आकर रुक गए थे। ऐसा लग रहा था। जैसे कोई अभी-अभी दीवार के अंदर से बाहर आया हो।
दीवार में धँसा हुआ चेहरा
मैं पीछे हटने लगा। तभी मेरी नज़र सामने वाली दीवार पर पड़ी। दीवार का प्लास्टर धीरे-धीरे बाहर की तरफ़ फूलने लगा। पहले एक उभार बना।
फिर दूसरा।
और अचानक उस उभार का आकार एक इंसानी चेहरे जैसा हो गया।
नाक….
होंठ….
आँखें….
सब कुछ दीवार के अंदर से बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे। ऐसा लग रहा था। जैसे कोई आदमी दूसरी तरफ़ से पूरी ताकत लगाकर बाहर आने की कोशिश कर रहा हो। फिर…. धीरे-धीरे उसके होंठ खुले।
और दीवार के अंदर से एक टूटी हुई आवाज़ आई।
भाग जाओ….. यह कमरा…. छोड़ दो….
उसके अगले ही पल दीवार के अंदर से किसी ने उस चेहरे को पीछे खींच लिया। चेहरा गायब हो गया। लेकिन दीवार पर पाँच लंबी खून की धारियाँ रह गईं। जैसे किसी ने नाखून मार दिए हों।
सुबह होते ही सब कुछ सामान्य हो गया। दीवारें फिर सफेद थीं। फर्श सूखा था। खून का एक कतरा तक नहीं। मैं नीचे भागा। रामलाल बरामदे में बैठा था। मुझे देखते ही उसने सिर्फ़ एक सवाल पूछा।
रात दो बजकर चवालीस मिनट पर जाग गए थे…..
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने पूछा। आपको कैसे पता ?
उसने गहरी साँस ली। क्योंकि जो भी उस कमरे में रुकता है। पहली रात उसी समय जागता है। मैंने गुस्से में कहा।
वहाँ कोई है !
रामलाल बोला
है…..
लेकिन वह इंसान नहीं है।
जो लोग गायब हुए…. उनका कोई रिकॉर्ड नहीं
रामलाल ने बताया। पिछले दस सालों में कमरा नंबर 17 में रहने वाले सात लोग अचानक लापता हो चुके थे। किसी का सामान वहीं मिला।
किसी का मोबाइल।
किसी की चप्पल।
लेकिन आदमी कभी नहीं मिला। अजीब बात यह थी। पुलिस भी हर बार यही मानती रही कि वे खुद कहीं चले गए। क्योंकि कमरे में संघर्ष का कोई निशान कभी नहीं मिलता था। मैंने पूछा।
फिर आप यह कमरा किराए पर क्यों देते हैं ?
रामलाल की आँखें भर आईं। धीरे से बोला। अगर कमरा खाली छोड़ दूँ…..।
…..तो वह नीचे आने लगता है।
मैं कुछ समझ नहीं पाया। मतलब ?
उसने काँपती आवाज़ में कहा। हर बार जब महीनों तक कोई उस कमरे में नहीं रहता।
तो अगली रात दीवारों से खून नीचे वाली मंज़िल पर भी टपकने लगता है। वह अपना नया आदमी खुद ढूँढ़ लेता है।
मैंने उसी दिन कमरा छोड़ने का फैसला कर लिया। सामान पैक किया। लेकिन फैक्ट्री के मालिक ने कहा। कल सुबह ज़रूरी निरीक्षण है। मजबूरी में मुझे एक और रात वहीं रुकना पड़ा।
उस रात मैंने तय किया। मैं सोऊँगा ही नहीं। घड़ी की सुइयाँ धीरे-धीरे बढ़ती रहीं।
2:30….
2:38….
2:43….
और….
2:44।
पूरे कमरे की लाइट एक साथ बुझ गई। इस बार दीवारों से खून नहीं निकला। बल्कि पूरे कमरे में बच्चे के रोने की आवाज़ गूँजने लगी। धीरे-धीरे वह रोना हँसी में बदल गया और फिर किसी बूढ़ी औरत की आवाज़ आई।
मुड़कर देख….
मैंने तय किया था। पीछे नहीं देखूँगा। लेकिन मेरे कंधे पर किसी का ठंडा हाथ आकर टिक गया। मेरी साँस रुक गई। धीरे-धीरे मेरे कान के बिल्कुल पास किसी ने फुसफुसाकर कहा।
अब…. दीवार के अंदर तेरी जगह तैयार है….
मैंने हिम्मत करके पीछे मुड़कर देखा और जो देखा। उसने मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
दीवार के अंदर कैद लोग
मैंने जैसे ही पीछे देखा। मेरी चीख निकल गई। मेरे ठीक पीछे कोई बूढ़ी औरत नहीं खड़ी थी। वहाँ
पूरी दीवार साँस ले रही थी।
सफेद प्लास्टर किसी ज़िंदा चमड़ी की तरह ऊपर-नीचे हो रहा था। अचानक उसमें से दर्जनों हाथ बाहर निकल आए। पतले खून से लथपथ हड्डियों जैसे सफेद हाथ। उन्होंने एक साथ मेरी शर्ट पकड़ ली। मैं पूरी ताकत से पीछे हटने लगा।
लेकिन हाथों की पकड़ और मज़बूत होती गई। फिर दीवार के अंदर चेहरे उभरने लगे। एक….
दो….
दस….
बीस….
हर चेहरा दर्द से भरा हुआ था। कोई रो रहा था। कोई चीख रहा था।
कोई लगातार अपना सिर दीवार से मार रहा था और तभी एक चेहरा मुझे पहचान में आ गया। वह उसी फैक्ट्री का इंजीनियर था। जिसके बारे में लोगों ने कहा था कि वह दो साल पहले नौकरी छोड़कर चला गया।
लेकिन वह गया नहीं था। वह इसी दीवार के अंदर कैद था। उसने बड़ी मुश्किल से होंठ हिलाए।
भाग…. यह कमरा लोगों को मारता नहीं….
उन्हें निगल लेता है….
इतना कहते ही दीवार के अंदर से एक काला हाथ निकला। उसने उस आदमी का सिर पकड़कर अंदर खींच लिया। अगले ही पल उसका चेहरा गायब हो गया।
जिस चीज़ ने यह कमरा बनाया था
अचानक पूरा कमरा काँपने लगा। छत से प्लास्टर गिरने लगा। चारों दीवारों से खून तेज़ी से बहने लगा। फिर उन लाल धाराओं ने मिलकर फर्श पर एक आकृति बना दी। वह किसी इंसान जैसी नहीं थी।
उसका शरीर धुएँ से बना था। चेहरे की जगह एक गहरा काला गड्ढा और उस गड्ढे के अंदर सैकड़ों आँखें खुलती और बंद होती दिखाई दे रही थीं। वह धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ी। उसकी आवाज़ कमरे की हर दीवार से एक साथ आई।
मैं इस कमरे में नहीं रहता…. यह कमरा मेरे अंदर रहता है….
मेरे पैरों के नीचे का फर्श मुलायम होने लगा। जैसे मैं किसी मिट्टी पर नहीं। बल्कि किसी ज़िंदा शरीर पर खड़ा हूँ। मैं नीचे गिर पड़ा और देखा।
पूरे फर्श के नीचे हज़ारों चेहरे दबे हुए थे। वे लगातार ऊपर देखने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन हर बार फर्श उन्हें वापस निगल लेता था। दरवाज़ा अब भी बंद था। खिड़की भी नहीं खुल रही थी।
मैंने पूरी ताकत से लोहे की अलमारी उठाई और खिड़की के शीशे पर दे मारी।
धड़ाम…..!
काँच टूट गया। ठंडी हवा का झोंका अंदर आया। उसी पल कमरे में पहली बार वह काली आकृति पीछे हट गई। मैंने एक पल भी नहीं सोचा। सीधे पहली मंज़िल से नीचे छलाँग लगा दी। मेरे पैर में गंभीर चोट आई।
लेकिन मैं भागता रहा। पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत नहीं हुई। पीछे से बस एक आवाज़ आई।
हर कमरा हमेशा खाली नहीं रहता….
तुझे वापस आना होगा….
तीन महीने बाद….
मैंने वह शहर हमेशा के लिए छोड़ दिया। कभी वापस नहीं गया। लेकिन तीन महीने बाद एक रात मैं एक नए शहर के होटल में ठहरा हुआ था। कमरा बिल्कुल नया था। आधुनिक।
चमचमाता हुआ।
मैंने राहत की साँस ली। रात को सो गया। अचानक मेरी आँख खुली। मोबाइल उठाया।
2:44 AM
मेरे पूरे शरीर में सिहरन दौड़ गई। धीरे-धीरे सामने वाली सफेद दीवार पर एक लाल बूँद उभरी।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
मैं जड़ हो गया। कुछ ही सेकंड में दीवार पर वही शब्द बनने लगे।
मैंने कहा था….. तुझे वापस आना होगा…..
उसी समय दीवार के अंदर से दर्जनों हथेलियाँ बाहर निकलने लगीं और उनमें से एक हाथ धीरे-धीरे मेरी तरफ़ बढ़ा। उस हाथ की कलाई पर मेरी ही घड़ी बँधी हुई थी। मैंने चीखकर आँखें बंद कर लीं।
जब दोबारा खोलीं कमरा बिल्कुल सामान्य था। लेकिन मेरी कलाई खाली थी। मेरी घड़ी गायब हो चुकी थी।
THE END |
आज भी जब किसी पुराने कमरे की दीवार पर आपको हल्का-सा लाल धब्बा दिखाई दे। तो उसे पेंट का निशान समझकर नज़रअंदाज़ मत कीजिए। हो सकता है। वह धब्बा सिर्फ़ दीवार पर न हो।
हो सकता है….. कोई अंदर से बाहर आने का इंतज़ार कर रहा हो।
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5 thoughts on “जिस कमरे की दीवारों से रात को खून टपकता था (Haunted room story)”
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